गरुड महा पुराणम् - प्रेत खंड
11 - जीवकी ऊर्ध्वगति एवं अधोगतिका वर्णन
गरुडजीने कहा - हे देवश्रेष्ठ! मनुष्ययोनि कैसे प्राप्त होती है? मनुष्य कैसे मृत्युको प्राप्त होता है? शरीरका आश्रय लेकर कौन मरता है? उसकी इन्द्रियाँ कहाँसे कहाँ चली जाती हैं? मनुष्य कैसे अस्पृश्य हो जाता है? यहाँ किये हुए कर्मको कहाँ और कैसे भोगता है और कहाँ कैसे जाता है? यमलोक और विष्णुलोकको मनुष्य कैसे जाता है? हे प्रभो! आप मुझपर प्रसन्न हों। मेरे इस सम्पूर्ण भ्रमको विनष्ट करें।
श्रीकृष्णने कहा - हे विनता नन्दन! परायी स्त्री और ब्राह्मणके धनका अपहरण करके प्राणी अरण्य एवं निर्जन स्थानमें रहनेवाले ब्रह्म राक्षसकी योनिको प्राप्त करता है। रत्नोंकी चोरी करनेवाला मनुष्य नीच जातिके घर उत्पन्न होता है। मृत्युके समय उसकी जो - जो इच्छाएँ होती हैं, उन्हींके वशीभूत हो वह उन - उन योनियोंमें जाकर जन्म लेता है। इस जीवात्माका छेदन शस्त्र नहीं कर सकता, अग्नि इसको जलानेमें समर्थ नहीं है, जल इसे आर्द्र नहीं कर सकता और वायुके द्वारा इसका शोषण सम्भव नहीं है।
हे पक्षिन्! मुख, नेत्र, नासिका, कान, गुदा और मूत्रनली - ये सभी छिद्र अण्डजादि जीवोंके शरीरमें विद्यमान रहते हैं। नाभिसे मूर्धापर्यन्त शरीरमें आठ छिद्र हैं। जो सत्कर्म करनेवाले पुण्यात्मा हैं, उनके प्राण शरीरके ऊर्ध्व छिद्रोंसे निकलकर परलोक जाते हैं। मृत्युके दिनसे लेकर एक वर्षतक जैसी विधि पहले बतायी गयी है, उसीके अनुसार सभी और्ध्वदैहिक श्राद्धादि संस्कार निर्धन होनेपर भी यथाशक्ति श्रद्धापूर्वक करने चाहिये। जीव जिस शरीरमें वास करता है उसी शरीरमें वह अपने शुभाशुभ कर्म फलका भोग करता है। हे पक्षिराज! मन, वाणी और शरीरके द्वारा किये गये दोषोंकों वह भोगता है। जो [अनासक्त भावसे] सत्कर्ममें रत रहता है, वह मृत्युके बाद सुखी रहता है और सांसारिकताके मायाजालमें नहीं फँसता। जो विकर्ममें निरत रहता है वह मनुष्य पाशबद्ध हो जाता है।
Summary of chapter 11 of the Garuda Mahā Purana - Preta Khaṇḍa is as follows:
The Supreme Lord explains to Garuḍa the specific spiritual causes that lead to severe suffering along the sixteen intermediate cities of the path to Yamaloka. Bhagavān Vishṇu reveals that souls who lived in self-indulgence, neglected their aged parents, broke promises, or scoffed at sacred scriptures find the journey agonizingly difficult, encountering burning winds, sharp thorns, and deep abysses. Conversely, the Lord reassures that those who performed selfless charity, honored guests, protected animals, and lived in accordance with Dharma travel along this path with ease, shaded by divine trees and refreshed by cool breezes.