42 - भूमि तथा गोचर्म भूमि आदि दानोंका माहात्म्य और ब्रह्मस्यहरणका दोष

श्री विष्णुने कहा - हे गरुड! जिस प्रकार एक वत्स हजार गायोंके बीच स्थित अपनी माताको प्राप्त कर लेता है, उसी प्रकार पूर्वजन्ममें किया गया कर्म अपने कर्ताका अनुगमन करता है -

यथा धेनुसहस्त्रेषु वत्सो विन्दति मातरम्‌।

तथा पूर्वकृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति॥

भूमिदान करनेवाले प्राणीका अभिनन्दन सूर्य - चन्द्र, वरुण, अग्नि, ब्रह्मा, विष्णु और भगवान्‌ त्रिशूलधारी शिव करते हैं। इस संसारमें भूमिके समान दान नहीं है। भूमिके समान दूसरी निधि नहीं है। सत्यके समान धर्म नहीं है और असत्यके समान पातक नहीं है -

नास्ति भूमिसमं दान नास्ति भूमिसमो निधि:।

नास्ति सत्यसमो धर्मो नानृतात्पातकं परम्‌॥

अग्निका प्रथम पुत्र सुवर्ण है, पृथ्वी वैष्णवी कहलाती है तथा गाय सूर्यकी पुत्री है। अत: जो व्यक्ति स्वर्ण, गौ एवं पृथ्वीका दान देता है, उसने मानो त्रैलोक्यका दान कर दिया। गौ, पृथ्वी और विद्या इन तीनोंको अतिदान

(त्रीण्याहुरतिदानानि गाव: पृथ्वी सरस्वती।

नरकादुद्धरन्त्येते जपपूजनहोमत:॥)

कहा गया है। जप - पूजन तथा होम करके दिये गये ये तीनों दान नरकसे उद्धार करते हैं। बहुत - से पाप तथा क्रूर कर्म करके भी मनुष्य गोचर्म

(गवां शतं सैकवृषं यत्र तिष्ठत्ययन्त्रितम्‌।

तत्क्षेत्रं दशगुणितं गोचर्मपरिकीर्तितम्‌॥

(पराशरस्मृति))

अर्थात्‌ जितने स्थानपर एक हजार गौएँ और दस बैल स्वतन्त्ररूपसे घूम - फिर सकते हैं, उतना भूमिभाग गोचर्म कहलाता है।) भूमिका दान करलेसे शुद्धहो जाता है। इस दानमें दी हुई वस्तुको लोभवश हरण करनेवालेको हरण करनेसे रोकना चाहिये। जो उसका परिरक्षण नहीं करता है, वह घोर नरक़में जाता है।

प्राण भले ही कण्ठमें आ जायं तो भी निषिद्ध कर्म नहीं करना चाहिये, कर्तव्य कर्म ही करना चाहिये ऐसा धर्माचायोंने कहा है। किसीकी आजीविकाको नष्ट करनेपर हजार गौओंके वधके समान पाप लगता है तथा किसी जीविकारहितको आजीविका प्रदान करनेपर लक्ष धेनुके दानका फल प्राप्त होता है। गो - हत्यारे आदिसे एक गायको छुड़ा लेना श्रेष्ठ है, उसकी तुलनामें सौ गो - दान करना श्रेष्ठनहीं है। सौ गो - दान करना गो - हत्यारेसे एक गायको बचा लेनेकी समता नहीं कर सकता।

(वरमेकाप्यपहृता न तु दत्तं गवां शतम्‌।

एकां हत्वा शतं दत्त्वा न तेन समता भवेत्‌॥)

जो व्यक्ति स्वयं दान देकर स्वयं ही उसमें बाधक बन जाता है, वह प्रलयकालतक नरकका भोग करता है।

जीविकारहित निर्धन ब्राह्मणकी रक्षा करनेपर जैसा पुण्य मनुष्यको प्राप्त होता है, वैसा पुण्य विधिवत् दक्षिणासहित अश्वमेध - यज्ञ करनेपर भी सम्भव नहीं है। दुर्बल, त्रस्त ब्राह्मणकी रक्षा करनेमें जो पुण्य है, वह वेदाध्ययन और प्रचुर दक्षिणासे युक्त यज्ञ करनेपर नहीं है। बलात्‌ अपहरण किये गये ब्राह्मणोंके धनसे पाले - पोसे तथा समृद्ध बनाये गये वाहन और सैन्य शक्तियाँ युद्धकालमें वैसे ही नष्ट हो जाती हैं जैसे बालूके द्वारा बनाये गये पुल विनष्ट हो जाते हैं। जो व्यक्ति स्वयं अथवा दूसरेके द्वारा दी हुई भूमिका अपहरण करता है, वह साठ हजार वर्षतक विष्ठामें कृमि होकर जन्म लेता है। प्रेमसे जो ब्राह्मणका धन खाता है, वह अपने कुलकी सात पीढ़ीको भस्म कर देता है। उसी ब्रह्मस्वका उपयोग यदि चोरी करके किया जाय तो जबतक चन्द्रमा और तारागणोंकी स्थिति रहती है, तबतक उसकी कुल - परम्परा भस्म हो जाती है। पुरुष कदाचित्‌ लोहे और पत्थरके चूर्णको खाकर पचा सके, किंतु तीनों लोकमें कौन ऐसा व्यक्ति है जो ब्राह्मणके धनको पचानेमें समर्थ हो सकेगा?

देव - द्रव्यका विनाश करनेसे, ब्राह्मणके धनका हरण करनेसे और उसकी मर्यादाका उल्लंघन करनेसे प्राणियोंके कुल निर्मूल हो जाते हैं। यदि ब्राह्मण विद्यासे विवर्जित है तो आचार्यत्वादिके लिये वरण करनेके सन्दर्भमें उसका परित्याग करना ब्राह्मणातिक्रमण नहीं है। जलती हुई आगको छोड़कर राखमें हवन नहीं किया जाता है।

संक्रान्तिकालमें जो दान और हव्य - कव्य दिये जाते हैं, वह सब सात कल्पोंतक बार - बार सूर्य दानदाताको प्रदान करता है। प्रतिग्रह, अध्यापन और यज्ञ करवानेके कार्योंमें विद्वान्‌ प्रतिग्रहको ही अपना अभीष्टतम कहते हैं। प्रतिग्रहसे जप - होम और कर्म शुद्ध होते हैं, याजन - कर्मको वेद पवित्र नहीं करते। निरन्तर जप एवं होम करनेवाला तथा इसके द्वारा बनाये गये भोजनको न करनेवाला ब्राह्मण रत्नोंसे परिव्याप्त पृथ्वीका प्रतिग्रह करके भी प्रतिग्रहके दोषसे निर्लिप्त रहता है।

(सदा जापी सदा होमी परपाकविवर्जित:।

रत्नपूर्णामपि महीं प्रतिगृह्णान्न लिप्यते॥)