गरुड महा पुराणम् - प्रेत खंड
38 - तीर्थमरणकी महिमा, अन्त समयमें भगवन्नामकी महिमा, शालग्रामशिला तथा तुलसीकी सन्निधिमें मरणका फल, मुक्तिदायक तथा स्वर्गदायक प्रशस्त कर्म, इष्टापूर्तकर्म तथा अनाथ प्रेतके संस्कारका माहात्म्य
तार्क्ष्यने कहा - हे प्रभो! दान एवं तीर्थ करनेवालेको स्वर्ग तथा मोक्षकी प्राप्ति होती है। अब आप इसका ज्ञान मुझे करायें। हे स्वामिन्! किस दान और तीर्थ - सेवनसे मनुष्य मोक्ष प्राप्त करता है? किस दान एवं तीर्थके पुण्यसे प्राणी चिरकालतक स्वार्गमें रह सकता है? क्या करनेसे वह स्वर्गलोक एवं सत्यलोकसे तेजोलोकमें जाता है। किस पापसे मनुष्य नाना प्रकारके नरकोंमें डूबता रहता है। हे भक्तोंको मोक्ष प्रदान करनेवाले भगवान् जनार्दन! आप मुझको यह भी बतानेकी कृपा करें कि कहाँपर मृत्यु होनेसे प्राणीको स्वर्ग और मोक्ष भी प्राप्त होता है, जिससे कि पुनर्जन्म नहीं होता।
श्रीविष्णुने कहा - हे गरुड! भारतवर्षमें मानवयोनि तेरह जातियोंमें विभक्त है। यदि उसको प्राप्त करके मनुष्य अपने अन्तिम जीवनका उत्सर्ग तीर्थमें करता है तो उसका पुनर्जन्म नहीं होता है। अयोध्या, मथुरा, माया, काशी, काञ्ची, अवन्तिका और द्वारका - ये सात पुरियाँ मोक्ष देनेवाली हैं।
(अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवन्तिका॥
पुरी द्वारवती ज्ञेया सप्तैता मोक्षदायिका:।)
प्राणोंके कण्ठगत हो जानेपर ‘मैं संन्यासी हो गया’ - ऐसा जो कह दे तो मरनेपर विष्णुलोक प्राप्त करता है। पुनः पृथ्वीपर उसका जन्म नहीं होता।
जो मनुष्य मृत्युके समय एक बार ‘हरि’ इस दो अक्षरका उच्चारण कर लेता है, वह मानो मोक्ष प्राप्त करनेके लिये कटिबद्ध हो गया है। जो मनुष्य प्रतिदिन ‘कृष्ण - कृष्ण - कृष्ण’-यह कहकर मेरा स्मरण करता है, उसको मैं नरकसे उसी प्रकार निकाल देता हूँ जिस प्रकार जलका भेदन कर कमल ऊपर निकल जाता है। जहाँपर शालग्राम शिला है या जहाँपर द्वारवती शिला है किंवा जहाँपर इन दोनों शिलाखण्डोंका संगम है, वहाँ प्राणीको मुक्ति निस्संदेह ही प्राप्त होती है। समस्त पाप एवं दोषोंका विनाश करनेवाली शालग्राम शिला जहाँ विद्यमान है, वहाँ उसके सांनिध्यमें मृत्यु होनेसे जीवको निस्संदेह मोक्ष मिलता है-
मृतो विष्णुपुरं याति न पुनर्जायते क्षितौ।
सकृदुच्चरितं येन हरिरित्यक्षरद्वयम्॥
बद्ध: परिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति।
कृष्ण कृष्णेति कृष्णेति यो मां स्मरति नित्यश:॥
जल भित्त्वा यथा पद्मं नरकादुद्धराम्यहम् ।
शालग्रामशिला यत्र यत्र द्वारवती शिला॥
उभयोः सङ्गमो यत्र मुक्तिस्तत्र न संशय:।
शालग्रामशिला यत्र पापदोषक्षयावहा॥
तत्सन्निधानमरणान्मुक्तिर्जन्तो: सुनिश्चिता।
है खग! तुलसीका वृक्ष लगाने, पालन करने, सींचने, ध्यान - स्पर्श और गुणगान करनेसे मनुष्योंके पूर्व जन्मार्जित पाप जलकर विनष्ट हो जाते हैं -
रोपणात् पालनात् सेकाद्धयानस्पर्शनकीर्तनात्।
तुलसी दहते पापं नृणां जन्मार्जितं खग॥
राग - द्वेषरूपी मलको दूर करनेमें समर्थ, ज्ञानरूपी जलाशयके सत्यरूपी जलसे युक्त मानसतीर्थमें जिस मनुष्यने स्नान कर लिया है, वह कभी पापोंसे संलिप्त नहीं होता। देवता कभी काष्ठ और पत्थरकी शिलामें नहीं रहते, वे तो प्राणीके भावमें विराजमान रहते हैं। इसलिये सद्भावसे युक्त भक्तिका सम्यक् आचरण करना चाहिये
ज्ञानह्रदे सत्यजले रागद्वेषमलापहे।
यः स्नातो मानसे तीर्थे न स लिप्येत पातकै:॥
न काष्टे विद्यते देवो न शिलायां कदाचन।
भावे हि विद्यते देवस्तस्माद्धावं समाचरेत्॥
मछुआरे प्रतिदिन प्रातःकाल जाकर नर्मदा नदी (पुण्य तीर्थ) - का दर्शन करते हैं; किंतु वे शिवलोक नहीं पहुँच पाते हैं; क्योंकि उनकी चित्तवृत्ति बलवान् होती है। मनुष्योंके चित्तमें जैसा विश्वास होता है, वैसा ही उन्हें अपने कर्मोंका फल प्राप्त होता है। वैसी ही उनकी परलोक - गति होती है।
ब्राह्मण, गौ, स्त्री और बालककी हत्या रोकनेके लिये जो व्यक्ति अपने प्राणोंका बलिदान करनेमें तत्पर रहता है, उसे मोक्ष प्राप्त होता है -
ब्राह्मणार्थे गवार्थे च स्त्रीणां बालवधेषु च।
प्राणत्यागपरो यस्तु स वै मोक्षमवाप्नुयात्॥
जो निराहार व्रतके द्वारा मृत्यु प्राप्त करता है, उसे भी मुक्ति प्राप्त होती है। वह सभी बन्धनोंसे निर्मुक्त हो जाता है। ब्राह्मणोंको दान देनेसे मनुष्य मोक्षको प्राप्त कर सकता है।
हे गरुड! सभी प्राणियोंके लिये जैसे मोक्षमार्ग है, वैसे ही स्वर्गके मार्ग भी हैं। यथा -गोशालामें, देश - विध्वंस होनेपर, युद्धभूमि एवं तीर्थस्थलमें मृत्यु श्रेयस्कर है। प्राणी वहाँ अपने शरीरका परित्याग करके चिरकालतक स्वर्गवासका लाभ ले सकता है। पण्डितको जीवन और मरण इन दो तत्त्वोंपर ही ध्यान देना चाहिये। अत: वे दान तथा भोगसे जीवन धारण करें और युद्धभूमि एवं तीर्थमें मृत्युको प्राप्त करें। जो मनुष्य हरिक्षेत्र, कुरुक्षेत्र, भ्रुगुक्षेत्र, प्रभास, श्रीशैल, अर्बुद(आबू पर्वत), त्रिपुष्कर तथा शिवक्षेत्रमें मरता है, वह जबतक ब्रह्माका एक दिन पूरा नहीं हो जाता, तबतक स्वर्गमें रहता है। उसके बाद वह पुन: पृथ्वीपर आ जाता है। जो व्यक्ति सच्चरित्र ब्राह्मणको एक वर्षतक जीवन - निर्वाहके लिये अन्न - वस्त्रादिका दान देता है, वह सम्पूर्ण कुलका उद्धार करके स्वर्गलोकमें निवास करता है।
जो अपनी कन्याका विवाह वेदपारंगत ब्राह्मणके साथ करता है, वह अपने कुल - परिवारके सहित इन्द्रलोकमें निवास करता है। महादानोंको देकर भी मनुष्य ऐसा ही फल प्राप्त करता है। वापी, कूप, जलाशय, उद्यान एवं देवालयोंका जीर्णोद्धार करनेवाला पूर्व कर्ताकी भाँति फल प्राप्त करता है अथवा जीर्णेद्धारसे कर्ताका पुण्य दुगुना हो जाता है। जो मनुष्य विद्वान् ब्राह्मणके परिवारकी शीत, वायु और धूपसे रक्षा करनेके लिये घास, फूस और पत्तोंसे बनी झोपड़ीका दान देता है, वह साढ़े तीन करोड़ वर्षतक स्वर्गमें निवास करता है।
जो सवर्णा सती स्त्री अपने मृत पतिका अनुगमन करे, वह मृत्युके बाद शरीरमें रोमोंकी जितनी संख्या है, उतने वर्षोंतक स्वर्गका भोग करती है। पुत्र - पौत्रादिका परित्याग करके जो अपने पतिका अनुगमन करती है, वे दोनों पति - पत्नी दिव्य स्त्रियोंसे अलंकृत होकर स्वर्गका सुख वैभव प्राप्त करते हैं। सदैव पतिसे द्रोह रखनेवाली स्त्री अनेक प्रकारके पापोंको करके भी जब मरे हुए उस पतिका अनुगमन चितापर चढ़कर करती है तो उन सभी पापोंको धो डालती है। यदि किसी सच्चरित्र नारीका पति महापापोंका आचरण करता हुआ दुष्कर्मी बन जाता है तो वह स्त्री अपने सदाचरणसे उसके सभी पापोंको विनष्ट कर देती है।
जो व्यक्ति नियमपूर्वक प्रतिदिन मात्र एक ग्रास भोजनका दान करता है, वह चार चामससे युक्त दिव्य विमानपर चढ़कर स्वर्गलोक जाता है। जिस मनुष्यके द्वारा आजीवन पाप - कर्म किया गया है, वह ब्राह्मणको एक वर्षके लिये जीवन - निर्वाहकी वृत्ति देकर उस पापको विनष्ट कर देता है। विप्र - कन्याका विवाह करानेवाला व्यक्ति भूत, भविष्य और वर्तमानके तीनों जन्मके अर्जित पापोंको नष्ट कर देता है।
दस कूपके समान एक बावली होती है। दस बावलीके समान सरोवर होता है और दस सरोवरके समान पुण्य - शालिनी वह प्रपा (पौंसरा) होती है। जो वापी जलरहित वन एवं देशमें बनवायी जाती है और जो दान निर्धन ब्राह्मणको दिया जाता है तथा प्राणियोंपर जो दया की जाती है, उसके पुण्यसे कर्ता स्वर्गलोकका नायक बन जाता है।
(दशकूपसमा वापी दशवापीसमं सरः।
सरोभिर्दशभिस्तुल्या या प्रपा निर्जले वने॥
या वापी निर्जले देशे यद्दानं निर्धने द्विजे।
प्राणिनां यो दयां धत्ते स भवेन्नाकनायकः॥)
इसी प्रकार अन्य बहुत - से सुकृत हैं, जिनको करके मनुष्य स्वर्गलोकका भागी होता है। वह उन सभी पुण्योंके फलको ग्रहण करके परम प्रतिष्ठाको प्राप्त करता है।
व्यर्थक कार्योको छोड़कर निरन्तर धर्माचरण करना चाहिये। इस पृथ्वीपर दान, दम और दया - ये ही तीन सार हैं। दरिद्र, सज्जन ब्राह्मणको दान, निर्जन प्रदेशमें स्थित शिवलिङ्गका पूजन और अनाथ प्रेतका संस्कार - करोड़ों यज्ञका फल प्रदान करता है -
फल्गु कार्य परित्यज्य सततं धर्मवान् भवेत्।
दानं दमो दया चेति सारमेतत् त्रयं भुवि॥
दानं साधोर्दरिद्रस्य शून्यलिंगस्य पूजनम्।
अनाथप्रेतसंस्कार: कोटियज्ञफलप्रद:॥
Summary of chapter 36 of the Garuda Mahā Purana - Preta Khaṇḍa is as follows:
The Divine Lord exalts the supreme glory of Bhakti, declaring that loving devotion to Lord Vishṇu is the easiest, most powerful, and most joyful path to spiritual perfection in the age of Kali. Bhagavān Vishṇu explains that while arduous yogic austerities and complex rituals are difficult to execute perfectly, pure love directed toward the Supreme Lord instantly purifies the heart and attracts divine grace. The Lord assures Garuḍa that a devotee who surrenders all actions to Hari with love is protected from all fears of death and attains eternal residence in Vaikuṇṭha.