गरुड महा पुराणम् - प्रेत खंड
26 - 27 - सपिण्डीकरण श्राद्धका महत्त्व, प्रतिवर्ष विहित मासिक श्रादू आदिकी अनिवार्यता, पति - पत्नीके सह - मरण आदिकी विशेष परिस्थितिमें पाक एवं पिण्डदान आदिकी विभिन्न व्यवस्थाका निरूपण तथा बभ्रुवाहनकी कथा
गरुडने कहा - हे देवश्रेष्ठ! हे प्रभो! आप मेरे ऊपर कृपा करके यह बतायें कि मरे हुए प्राणियोंका सपिण्डीकर्म किस समय करना चाहिये? सपिण्डी कर्म होनेपर प्रेत कैसी गति प्राप्त करता है और जिस प्रेतका सपिण्डी कर्म नहीं होता, उसकी कैसी गति होती है? स्त्री और पुरुषका किसके साथ सपिण्डी कर्म होना चाहिये हे सुरेश्वर। स्त्री और पुरुष एक साथ सपिण्डी कर्मके भागीदार बनकर कैसे उत्तम गति प्राप्त कर सकते हैं? पतिके जीवित रहते हुए स्त्रियोंका सपिण्डी करण कैसे हो सकता है? वे किस प्रकार पतिलोक या स्वर्गकों जाती हैं? अग्न्यारोहण हो जानेपर स्त्रियोंका श्राद्ध कैसे होता है? उनका वृषोत्सर्ग किस प्रकारसे किया जाय? हे स्वामिन्! सपिण्डीकरण हो जानेपर मृतकके लिये घट - दान कैसे हो? हे हरे! आप संसारके कल्याणार्थ इसे बतानेकी कृपा करें।
श्री भगवान्ने कहा - हे पक्षिन्! जिस प्रकार सपिण्डीकरण होता है, वैसा ही मैं तुम्हें सुनाऊँगा। हे खगराज! जब मनुष्य मरनेके बाद एक वर्षकी महापथ - यात्रा करता है तो पुत्र - पौत्रादिके द्वारा सपिण्डीकरण हो जानेपर वह पितृलोकमें चला जाता है। इसलिये पुत्रको पिताका सपिण्डीकरण करना चाहिये। वर्षके पूर्ण हो जानेपर पिण्ड प्रवेशन अर्थात् सपिण्डीकरण करना चाहिये। हे पक्षियोंके सिंह! वर्षके अन्तमें निश्चित रूपसे प्रेत - पिण्डका मेलन होता है। पितृ पिण्डोंके साथ प्रेत - पिण्डका सम्मिलन हो जानेपर वह प्रेत परम गतिको प्राप्त करता है। तत्पश्चात् वह प्रेत नामका परित्याग करके पितृगण हो जाता है। अपने गोत्र या सापिण्ड्यमें जितने लोगोंको अशौच शास्त्रानुसार होता है उनके यहाँ यदि विवाह या कोई शुभ कार्य
होना है तो तीसरे पक्ष या छ: मासमें भी सपिण्डीकरण किया जा सकता है।
हे खगेश्वर! गृहस्थके घरमें यदि किसीका मरण हुआ हो तो विवाह आदि शुभ कार्य नहीं करने चाहिये। जबतक सपिण्डीकरण नहीं हो जाता है तबतक भिक्षुक उस घरकी भिक्षाको स्वीकार नहीं करता है। अपने गोत्रमें अशौच तबतक रहता है, जबतक पिण्डका मेलन नहीं हो जाता है। पिण्ड मेलन होनेपर ‘प्रेत’ शब्द निवृत्त हो जाता है। कुल - धर्म अनन्त हैं, पुरुषकी आयु क्षयशील है और शरीर नाशवान् है, इस कारण बारहवाँ दिन ही सपिण्डी करण - कर्मके लिये प्रशस्त समय होता है। मृत व्यक्ति अग्निहोत्री रहा हो अथवा न रहा हो, उसका सपिण्डीकरण द्वादशाहको ही कर देना चाहिये तत्त्वद्रष्टा ऋषियों ने बारहवें दिन, तीसरे पक्षमें, छठे मासमें अथवा वर्ष पूर्ण होनेपर सपिण्डीकरणका विधान किया है।
पुत्रवान्का सपिण्डीकरणके बाद कभी भी एकोदिष्ट नहीं करना चाहिये। सपिण्डीकरणके पश्चात् जहाँ - जहाँ श्राद्ध किया जाय, पुत्रवान्का एकोदिष्ट कभी न किया जाय। वहाँ - वहाँ तीन - तीन श्राद्ध (पार्वण श्राद्ध) करने आवश्यक हैं, अन्यथा कर्ता पितृघातक कहलाता हैं। अशक्त होनेपर भी पार्वण श्राद्ध करना चाहिये। ((क) यहाँपर ऊनमासिक आदि तथा सांवत्सरिक [ मृत्यु - तिथि आदि] श्राद्ध एकोद्दिष्ट श्राद्धके स्थानपर पार्वण श्राद्धकी विधि कात्यायनके मतसे लिखी गयी है। जो कुछ प्रदेशोंमें भी प्रचलित है। परंतु सामान्यतया ऊनमासिक सांवत्सरिकादि श्राद्धोंमें शौनकके मतानुसार एकोद्दिष्ट - विधिसे ही श्राद्ध किया जाता है।
(ख) सपिण्डीकरणं कृत्वा गयां गत्वा च धर्मवित्।
एकोद्दिष्टं न कुर्वोत साग्निर्वा नाग्निमानपि॥
(दिवोदासप्रकाश))
ऐसा मुनियोंने कहा है। यदि दिन और मास न ज्ञात हो तो उनका पार्वण श्राद्ध ही करना उचित है।
पितरोंके साथ वह पिता इस लोकमें पुत्रके द्वारा दिये गये दानका फल तबतक नहीं प्राप्त करता, जबतक उसके शरीरकी उत्पत्ति पुनः [ दशगात्रके पिण्डसे ] नहीं हो जाती। ऐसी स्थितिमें पुत्रद्वारा किये गये इन्हीं सोलह श्राद्धोंसे प्रेत यमपाशके बन्धनसे मुक्त होता है। पुत्ररहित पुरुषका सपिण्डीकरण नहीं करना चाहिये। (उपर्युक्त श्लोकोंमें ‘अपुत्रस्य’ यह वाक्य ‘पुत्रोत्पादन’ की विधिकी प्रशंसामें पर्यवसित है। इसका तात्पर्य अपुत्रवान् पुरुषके सपिण्डन - निषेधमें नहीं है। अन्यथा -
पुत्राभावे स्वयं कुर्युः स्वभर्तॄणाममन्त्रकम्।
सपिण्डीकरणं तत्र तत: पार्वणमन्वहम्॥
(श्राद्धकल्पलता पृष्ठ)
‘पुत्राभावे तु पत्नी स्यात् पत्यभावे सहोदर:।’
‘सर्वेषां पुत्रहीनानां पत्नी कुर्यात् सपिण्डनम्।”
-इन वाक्योंका विरोध हो जायगा। अत: यथाविधि योग्य पुत्र उत्पन्न करनेका प्रयत्न अवश्य करना चाहिये।)
पतिके जीवित रहनेपर स्त्रीका भी सपिण्डन नहीं होना चाहिये।
जिस कन्याका विवाह ब्राह्मादि - विवाह - विधिसे हुआ है, उसकी पिण्डोदक - क्रियाएँ पतिके गोत्रसे करनी चाहिये। आसुरादि - विधिसे जिसका विवाह हुआ है, उसकी पिण्डोदक - क्रिया पिताके गोत्रसे करनी चाहिये। पिताका सपिण्डीकरण सदैव पुत्र करे। यदि पुत्र नहीं है तो स्वयं उसकी पत्नी उस क्रियाका निर्वाह करे। उसके भी न रहनेपर सहोदर भाई, भाईका पुत्र अथवा शिष्य सपिण्डीकरण कर सकता है। सपिण्डीकरण करके वह नान्दीमुख श्राद्ध करे। हे खग! पुत्र न रहनेपर ज्येष्ठ भाईका सपिण्डीकरण कनिष्ठ भाई करे। उसके अभावमें भतीजा या पत्नी उस कर्मको सम्पन्न करे। मनुने कहा है कि - यदि सहोदर भाइयोंमेंसे एक भी भाई पुत्रवान् हो जाय तो उसी पुत्रसे अन्य सभी भाई पुत्रवान् हो जाते हैं।
(भ्रातॄणामेकजातानामेकश्चेत् पुत्रवान् भवेत्।
सर्वे ते तेन पुत्रेण पुत्रिणो मनुरब्रवीतु॥)
यदि सभी भाई पुत्रहीन हैं तो उनका सपिण्डीकरण उनकी पत्नीको करना चाहिये अथवा वह पत्नी स्वयं न करके ऋत्विजूसे या पुरोहितसे कराये।
चूडाकरण एवं उपनयन - संस्कारसे संस्कृत पुत्र पिताके श्राद्धको करे। जिस पुत्रका उपनयन - संस्कार नहीं हुआ है केवल चूडाकरण - संस्कार हुआ है वह श्राद्धमें स्वधाका उच्चारण तो कर सकता है पर वेद मन्त्रका उच्चारण नहीं कर सकता। स्त्रीका सपिण्डीकरण उसके पति, ससुर तथा परश्वशुरके साथ करना चाहिये। स्त्री - जातिका यह कर्म भतीजा तथा सहोदर छोटा भाई भी कर सकता है। संवत्सर पूर्ण होनेके पहले अथवा वर्षके पूर्ण होनेपर दूसरे वर्षके संधिकालमें जिन प्रेतोंका सपिण्डीकरण होता है, उनकी क्रिया पृथक् नहीं की जाती। हे वत्स! सपिण्डीकरण हो जानेके पश्चात् पृथक् क्रिया करना निन्दनीय माना गया है। जो व्यक्ति अपने पिताको पृथक पिण्डदान देता है, वह पितृहन्ता होता है। सपिण्डीकरणके बाद पृथक् श्राद्ध उचित नहीं है। यदि कोई पृथक् पिण्डदान करता है तो वह पुनः सपिण्डीकरण करे। जो मनुष्य सपिण्डीकरण करके एकोद्दिष्ट श्राद्ध करता है, वह स्वयंको तथा प्रेतकों यमराजके अधीन कर देता है।
हे पक्षिन्! वर्षपर्यन्त प्रेतसे सम्बन्धित जो भी क्रिया की जाय उसके नाम और गोत्रके सहित विद्वान् व्यक्ति करे। सपिण्डीकरण कर देनेपर भोजन और घटादिका दान, पददान तथा अन्य जो दान हैं उन्हें एकको (मृत व्यक्तिको) ही उद्देश्य करके देना चाहिये। वर्षभरके लिये अन्न और जल पूर्ण घटादिकी संख्याका निर्धारण करके ब्राह्मणको प्रदान करे। पिण्डदान देनेके पश्चात् यथाशक्ति वर्षभरके लिये उपयोगी समस्त सामग्री दानमें दे।
ऐसा होनेपर मृत व्यक्ति दिव्य देह धारण करके विमानद्वारा सुखपूर्वक यमलोक चला जाता है।
(अन्नं पानीयसहितं संख्यां कृत्वाब्दिकस्य च।
दातव्यं ब्राह्मणे पक्षिञ्जलपूर्णघटादिकम्॥
पिण्डान्ते तस्य सकला वर्षवृत्ति: स्वशक्तित:।
दिव्यदेहो विमानस्थ: सुखं याति यमालयम्॥)
पिताके जीवित रहनेके कारण मृत पुत्रका पिताके साथ सपिण्डीकरण नहीं हो सकता अर्थात् उसका सपिण्डीकरण पितामह आदिके साथ होगा ऐसे ही पतिके जीवित होनेपर स्त्रियोंका सपिण्डीकरण उसकी श्वश्रू आदिके साथ होगा। (पिताके जीवित रहनेपर पुत्रके मर जानेसे पुत्रका सपिण्डीकरण पिताके साथ न करके पितामहके साथ करनेका विधान है। इसी प्रकार पतिके जीवित रहनेपर मृत पत्नीका पतिके साथ सपिण्डीकरण न करके उसके श्वश्रू, परश्वश्रू और वृद्ध परश्वश्रू (सास, परसास, वृद्धपरसास) - के साथ सपिण्डीकरण करना चाहिये। इसके समर्थनमें ये वाक्य द्रष्टव्य हैं-
अपुत्रायां मृतायां तु पति: कुर्यात् सपिण्डनम्।
श्वश्र्वादिभि:सहैवास्याःसपिण्डीकरणं भवेत्॥
(पैठीनसि)
अपुत्रायां मृतायां तु पति: कुर्यात् सपिण्डनम्। श्वश्रूमात्रादिभि: सार्धमेव धर्मेण युज्यते॥ (व्यास))
पतिकी मृत्यु हो जानेके बाद चौथे दिन जो पतितव्रता स्त्री अपने शरीरको अग्निमें समर्पित कर देती है, उसका वृषोत्सर्गादि कर्म पतिकी क्रियाके ही दिन करना चाहिये। पुत्रिका पुत्रोत्पत्तिके पूर्व पतिके गोत्रवाली होती है। पुत्रोत्पत्तिके बाद वह पुनः पिताके गोत्रमें आ जाती है। पुत्रिका उस कन्याको कहते हैं, जिस कन्याका पिता विवाहके समय जामातासे यह तय कर लेता है कि इस कन्यासे जो पुत्र पैदा होगा वह मेरा पुत्र होगा। यदि स्त्री अपने पतिके साथ अग्निमें आरोहण करती है तो उसकी उसके पतिके साथ समस्त और्ध्वदैहिक क्रिया करनी चाहिये, किंतु क्षय - तिथिमें पुत्रकों उसका श्राद्ध पृथक् - रूपमें करना चाहिये। यदि पति - पत्नी पुत्ररहित हैं और वे दोनों एक ही दिन मर जाते हैं तथा उनका दाह - संस्कार एक ही चितापर होता है तो उन दोनोंके श्राद्धोंको पृथक् - पृथक् करना चाहिये, किंतु पत्नीका सपिण्डीकरण पतिके साथ ही होगा। यदि पतिके साथ पत्नीका पिण्डदान पृथक् - पृथक् होता है तो उस पिण्डदानसे वह दम्पति पापलिप्त नहीं होता, यह मेरा सत्य वचन है। यदि पति - पत्नी दोनोंका एक ही चितापर दाह संस्कार होता है तो उन दोनोंके लिये पाक एक ही साथ बनाया जाय, किंतु पिण्डदान पृथक् - पृथक् होना चाहिये। एकादशाहको वृषोत्सर्ग, षोडश प्रेतश्राद्ध, घटादि - दान, पददान और जो महादान हैं उन्हें पति - पत्नीका वर्षपर्यन्त पृथक् - पृथक् ही करना चाहिये। ऐसा करनेसे प्रेतको चिरकालीन संतृप्ति प्राप्त होती है।
एक गोत्रसे सम्बन्धित एक साथ मरे हुए स्त्री अथवा पुरुषसे सम्बद्ध - कृत्यमें आहुतिकी वेदी एक ही होनी चाहिये। किंतु होम पृथक् - पृथक् होना चाहिये। पति एवं पत्नीका एक साथ मरण होनेपर उनका एकादशाहका श्राद्ध एवं उनके निमित्त पिण्डदान, भोजन आदि पृथक् - पृथक् होगा, पर पाककी व्यवस्था एक ही होगी - यह विधान केवल पति - पत्नीके एक साथ मरणमें ही है अन्य किसीके मरणमें ऐसा विधान गर्हित है।
पुत्र माता - पिताके लिये एक ही पाकसे यथाविधान श्राद्ध करता है। विकिरान्नदान एक और पिण्डदान पृथक् - पृथक् करने चाहिये। इसी विधिका पालन तीर्थ, पितृपक्ष अथवा चन्द्र और सूर्य - ग्रहणके अवसरमें भी होना चाहिये।
जब स्त्री अपने मृत पतिके साथ अग्निमें जलती है तो अग्नि उसके शरीरको अवश्य जला देती है, किंतु आत्माको कष्ट नहीं दे पाती है, जिस प्रकार अमिनमें प्रज्वलित धातुओंका मात्र मल ही जलता है, उसी प्रकार अमृतके समान अमिनमें प्रविष्ट हुई नारीका शरीर दग्ध होता है। पुरुष शुद्ध होकर दिव्य देहधारी हो जाता है, जिसके कारण वह खौलते हुए तेल, दहकते हुए लौह तथा अग्निसे कदापि नहीं जलता, इसी प्रकार पतिके साथ चितामें जली हुई स्त्रीको कभी जला हुआ नहीं मानना चाहिये; क्योंकि उसकी अन्तरात्मा मेरे हुए पतिकी अन्तरात्मासे मिलकर एक हो जाती है।
यदि स्त्री पतिका साथ छोड़ करके अन्यत्र अपने प्राणोंका परित्याग करती है तो वह पतिलोकमें तबतक नहीं पहुँच पाती, जबतक प्रलय नहीं हो जाता। धन - दौलतसे युक्त माता - पिताको छोड़कर जो स्त्री अपने मरे हुए पतिका अनुगमन करती है, वह चिरकालतक सुखोपभोग करती है। वह पतिसंयुक्ता नारी उस स्वर्गमें साढ़े तीन करोड़ दिव्य वर्षोंतक नक्षत्रोंक साथ स्वर्गमें रहकर अन्तमें महती प्रीति प्राप्त करके ऐश्वर्य सम्पन्न कुलमें उत्पन्न होती है।
धर्मपूर्वक विवाहिता जो स्त्री यदि पति - संगति नहीं करती है, तो जन्म - जन्मान्तरतक दुखी, दुःशीला और अप्रियवादिनी होती है। जो स्त्री अपने पतिको छोड़कर पर पुरुषकी अनुगामिनी हो जाती है, वह अन्य जन्मोंमें चमगादड़ी, छिपकली, गोहनी अथवा द्विमुखी सर्पिणी होती है। अतः स्त्रीकों मन - वाणी और कर्म - इन सभीके द्वारा प्रयत्नपूर्वक अपने मृत या जीवित पतिकी सेवा करनी चाहिये। पतिके जीवित रहते हुए अथवा उसके मरनेपर जो स्त्री व्यभिचार करती है, वह अनेक जन्मोंतक वैधव्य जीवन प्राप्त करती है और दुर्भाग्य उसका साथ नहीं छोड़ता। देवता और पितरोंको श्रद्धापूर्वक जो कुछ दिया जाता है, उसका समग्र फल उसे पतिकी पूजा करनेसे ही प्राप्त हो जाता है, इसलिये स्त्रीको पतिकी ही पूजा करनी चाहिये।
हे पक्षिश्रेष्ठ! पातिव्रत्य धर्मरूप सत्कर्मका पालन करनेपर स्त्री चिरकाल तक पतिलोकमें निवास करती है। जबतक सूर्य और चन्द्र विद्यमान हैं, तबतक वह स्वर्गमें देवतुल्य बनी रहती है। उसके बाद दीर्घायु प्राप्त करके इस लोकमें वैभवशाली कुलमें जन्म लेती है तथा कभी भी पति - वियोगका दुःख नहीं झेलती।
हे खगराज! मैंने यह सब तुम्हें बता दिया। अब मृत प्राणीको सुख प्रदान करनेवाले विशेष कर्मको बताऊँगा। मृत्युके बाद द्वादशाहके दिन यथाविधि सपिण्डनादि समस्त कार्य करके वर्षपर्यन्त प्रतिदिन जलपूर्ण घट और अन्नका दान एवं मासिक श्राद्ध करना चाहिये। हे पक्षिन्! प्रेतकार्यको छोड़कर अन्य किये हुए कार्यकी आवृत्ति नहीं होनी चाहिये। (उत्तम षोडशी आदि जो प्रेतोद्देश्यक कार्य हैं सपिण्डनके बाद भी इनकी पुनरावृत्ति ऊनमासिक आदि श्राद्धके द्वारा वर्षपर्यन्त करना चाहिये। परंतु पितरोंके उद्देश्यसे किये गये कर्मकी पुनरावृत्ति नहीं होनी चाहिये -
द्वादशाहे कृतं सर्वं वर्षं यावत्सपिण्डनम्।
पुनः कुर्यात्सदा नित्यं घटान्नं प्रतिमासिकम्॥
कृतस्य करणं नास्ति प्रेतकार्याहते खग।
य: करोति नरः कश्चित्कृतपूर्वं विनश्यति॥
मृतस्यैव पुनः कुर्यात्प्रेतोऽक्षय्यमवाप्लुयात्।
प्रतिमासं घटा देया सोदना जलपूरिता:॥
अर्वाक्च वृद्धे: करणाच्च तार्क्ष्य सपिण्डनं यः कुरुते हि पुत्र:।
तथापि मासं प्रतिपिण्डमेकमन्नं च कुम्भं सजलं च दद्यात्॥)
यदि कोई मनुष्य अन्य कर्म करता है तो पूर्वका किया गया कार्य विनष्ट हो जाता है। मृतकके द्वादशाहके दिन विहित कृत्य वर्षपर्यन्त पुन: करने चाहिये, इससे प्रेत अक्षयसुख प्राप्त करता है। प्रतिमास जलसे परिपूर्ण सान्नोदक लटका दान करना चाहिये। हे तार्क्ष्य! वृद्धिश्राद्धके कारण जो पुत्र अपने पिताका सपिण्डीकरण श्राद्ध कर देता है तो भी उसे प्रत्येक मासमें एक पिण्ड, अन्न और जललसे पूर्ण कुम्भका दान करना चाहिये।
ताध्यने कहा - हे विभो! आपने जिन प्रेतोंका वर्णन किया है, वे इस धरतीपर कैसे निवास करते हैं; उनके रूप किस प्रकारके होते हैं, वे कौन - कौन - से कर्म - फलोंके द्वारा महाप्रेत और पिशाच बन जाते हैं और किस शुभ दानसे प्राणीकी प्रेतयोनि छूट जाती है? हे मधुसूदन! समस्त जगत्के कल्याणार्थ मुझको यह सब बतानेकी कृपा करें।
श्रीकृष्णने कहा - हे तार्क्ष्य! तुमने मानव - कल्याणके लिये बहुत अच्छी बात पूछी। प्रेतका लक्षण मैं कह रहा हूँ, उसे सावधान होकर सुनो। यह अत्यन्त गुप्त है। जिस - किसीके सामने इसको नहीं कहना चाहिये। तुम मेरे भक्त हो, इसलिये मैं तुम्हारे सामने इसे कह रहा हूँ।
हे पुत्र गरुड! पुराने समयमें बभ्रुवाहन नामका एक राजा था, जो महोदय (कान्यकुब्ज) नामक सुन्दर नगरमें रहता था। वह धर्मनिष्ठ, महापराक्रमी, यज्ञपरायण, दानशील, लक्ष्मीवान्, ब्राह्मण हितकारी, साधुसम्मत, सुशील, सदाचारी तथा दया - दाक्षिण्यादि सदगुणोंसे संयुत था। वह महाबली राजा सदैव अपनी प्रजाका पालन पुत्रवत् करता तथा क्षत्रिय - धर्मका सम्यक् पालन करते हुए सदैव अपराधियोंको दण्डित किया करता। कभी विशाल भुजाओंवाले उस राजाने अपनी सेनाके सहित शिकार करनेके लिये नाना प्रकारके वृक्षोंसे भरे हुए सैकड़ों सिंहोंसे परिव्याप्त, विभिन्न प्रकारके पक्षियोंक कलरवसे निनादित एक घनघोर वनमें प्रवेश किया। वनके बीचमें जाकर राजाने दूरसे ही एक मृगको देखा और उसके ऊपर अपने बाणको छोड़ दिया। उसके द्वारा छोड़े गये उस कठिन बाणसे वह मृग अत्यन्त आहत हो उठा और शरीरमें बिंधे हुए उस बाणके सहित वह मृग वहाँसे भागकर वनमें लुप्त हो गया, किंतु उसकी काँखसे बह रहे रक्तके चिह्नोंसे राजाने उसका पीछा किया। इस प्रकार उसके पीछे - पीछे वह राजा दूसरे वनमें जा पहुँचा।
भूख और प्याससे उसका कण्ठ सूख रहा था तथा परिश्रम करनेके कारण अत्यन्त थकानका अनुभव करता हुआ वह मूर्च्छित - सा हो गया था; उसको वहाँ एक जलाशय दिखायी दिया। जलाशय देखकर घोड़ेके सहित उसने वहाँ स्नान किया और कमल परागसे सुवासित शीतल जलका पान किया। तत्पश्चात् उस जलसे निकलकर राजा बभ्रुवाहन विशाल वट वृक्षकी मनमोहक शीतल छायाके नीचे बैठ गया, जो पक्षियोंक कलरवसे निनादित तथा उस समूचे वनकी पताकाके रूपमें अवस्थित था। इसके बाद उस राजाने वहाँपर भूख - प्याससे व्याकुल इन्द्रियोंवाले एक प्रेतको देखा, जिसके सिरकी केशराशि ऊपरकी ओर खड़ी थी। उसका शरीर मलिन, कुब्जा (रूक्ष), मांसरहित और देखनेमें महा भयंकर लगता था। मात्र शरीरमें शेष स्नायु - तन्त्रिकाओंसे जुड़ी हुई हड्डियोंवाला वह अपने पैरोंसे इधर - उधर दौड़ रहा था और अन्य बहुत - से प्रेत उसको चारों ओरसे घेरे हुए थे।
हे तार्क्ष्य! उस विकृत प्रेतको देखकर बभ्रुवाहन विस्मित हो गया और उस प्रेतको भी महाभयंकर वनमें आये हुए राजाको देखकर कम आश्चर्य नहीं हुआ। प्रसन्नचित्त होकर प्रेतने उस राजाके पास जाकर कहा - प्रेतने कहा - हे महाबाहों! आज आपके दर्शनका यह संयोग प्राप्त कर मैंने प्रेत भावको त्यागकर परम गति प्राप्त कर ली है। मुझसे बढ़कर धन्य कोई नहीं है।
राजाने कहा- हे प्रेत! तुम मुझे कृष्ण वर्णवाले भयंकर प्रेतके समान दिखायी दे रहे हो। तुम्हें इस प्रकारका स्वरूप जैसे प्राप्त हुआ है वैसा मुझे बताओ।
राजाके ऐसा कहनेपर उस प्रेतने अपने सम्पूर्ण जीवनवृत्तको इस प्रकार कहा - प्रेतने कहा - हे नृपश्रेष्ठ! मैं अपने सम्पूर्ण जीवन - वृत्तका विवरण आपको आदिसे सुना रहा हूँ, मेरे इस प्रेतत्वका कारण सुन करके आप दया अवश्य करेंगे । हे राजन् ! नाना रत्रोंसे युक्त तथा अनेक जनपदोंमें व्याप्त समस्त सम्पदाओंसे भरा हुआ, विभिन्न पुण्योंसे प्रख्यात अनेकानेक वृक्षोंसे आच्छादित विदिशा नामका एक नगर है। मैं वहींपर निरन्तर देवपूजामें अनुरक्त रहकर निवास करता था। उस जन्ममें मेरी जाति वैश्यकी थी और नाम मेरा सुदेव था। मैं उस जन्ममें हव्यसे देवताओंको, कव्यसे पितरोंको तथा नाना प्रकारके दानसे ब्राह्मणोंको सदैव संतृप्त किया करता था। मेरे द्वारा दीन - हीन, अनाथ और विशिष्ट जनोंकी अनेक प्रकारसे सहायता की गयी थी, किंतु दुर्भाग्यवश वह सब कुछ मेरा निष्फल हो गया। मेरे वे पुण्य जिस प्रकारसे विफल हुए, मैं आपको वह सुनाता हूँ।
हे तात! पूर्वजन्ममें न मेरे कोई संतान हुई, न कोई ऐसा बन्धु - बान्धव या मित्र ही रहा जो मेरी और्ध्वदैहिक क्रिया सम्पन्न करता। हे नृपोत्तम! उसीके कारण मुझे यह प्रेतयोनि प्राप्त हुई है। हे राजन! एकादशाह, त्रिपक्ष, षाण्मासिक, सांवत्सरिक, प्रतिमासिक और इसी प्रकारके अन्य जो षोडश श्राद्ध हैं, वे जिस प्रेतके लिये सम्पन्न नहीं किये जाते हैं, उस प्रेतकी प्रेतयोनि बादमें स्थिरताको प्राप्त कर लेती है, भले ही बादमें क्यों न उसके लिये सैकड़ों श्राद्ध किये जायँ। हे महाराज! ऐसा जानकर आप मेरा इस प्रेतयोनिसे उद्धार करें। राजाको सभी वर्णोंका बन्धु कहा जाता है। मैं आपको एक मणिरत्न दे रहा हूँ। हे राजेन्द्र! इस नरकसे मुझे उबार लें। हे नृपश्रेष्ठ हे महाबाहो! यदि आपकी मेरे ऊपर कृपा है तो जिस प्रकारसे मुझे शुभ गति प्राप्त हो मेरे लिये वही उपाय करें और आप अपना भी समस्त प्रकारसे और्ध्वदैहिक कार्य करें।
राजाने कहा - हे प्रेत! और्ध्वदैहिक कर्म करनेपर भी प्राणी कैसे प्रेत हो जाते हैं? किन कर्मोंको करनेसे उन्हें पिशाच होना पड़ता है? तुम उसे भी बताओ।
प्रेतने कहा - हे नृपश्रेष्ठ! जो लोग देवद्रव्य, ब्राह्मण - द्रव्य और स्त्री एवं बालकोंके संचित धनका अपहरण करते हैं, वे प्रेतयोनि प्राप्त करते हैं। जिनके द्वारा तपस्विनी, सगोत्रा एवं अगम्या स्त्रीका भोग किया जाता है, जो कमल पुष्पोंकी चोरी करते हैं, वे महाप्रेत होते हैं। हे राजन्! जो हीरा - मूँगा - सोना और वस्त्रके अपहर्ता हैं, जो युद्धमें पीठ दिखाते हैं, जो कृतघ्न, नास्तिक, क्रूर तथा दुःसाहसी हैं, जो पञ्चयज्ञ नहीं करते, किंतु बहुत बड़े - बड़े दान देनेमें अनुरक्त रहते हैं, जो अपने स्वामीसे वैर करते हैं, जो मित्र और ब्राह्मण द्रोही हैं, जो तीर्थमें जाकर पापकर्म करते हैं, वे प्रेतयोनिमें जन्म लेते हैं। हे महाराज! इस प्रकार इन सभी प्राणियोंका जन्म प्रेतयोनिमें होता है।
राजाने कहा - हे प्रेतराज! इस प्रेतत्वसे तुम्हें और तुम्हारे साथियोंको कैसे मुक्ति प्राप्त हो सकती है? मैं किस प्रकारसे अपना और्ध्वदैहिक कर्म कर सकता हूँ? वह कार्य किस विधानसे सम्भव है?
यह सब कुछ मुझे बताओ।
प्रेतने कहा - हे राजेन्द्र! संक्षेपमें नारायण बलिकी विधि सुनें। मैंने सुना है कि सदुग्रन्थोका श्रवण, विष्णुका पूजन तथा सज्जनोंका साथ प्रेतयोनिको विनष्ट करनेमें समर्थ होता है। अतः मैं आपको प्रेतत्व भावको नष्ट करनेवाली विष्णुपूजाका विधान बताऊँगा।
हे राजन! दो सुवर्ण (सुवर्णमाष ) ले करके उससे भगवान् नारायणकी सभी आभूषणोंसे विभूषित प्रतिमाका निर्माण करवाना चाहिये। मूर्तिको दो पीले वस्त्रोंसे आच्छादित करके चन्दन तथा अगुरुसे सुवासित करे। तदनन्तर नाना तीर्थोंसे लाये गये पवित्र जलके द्वारा सविधि स्नान कराकर तथा अधिवासितकर पूर्वमें भगवान् श्रीधर, दक्षिणमें भगवान् मधुसूदन, पश्चिममें भगवान् वामन, उत्तरमें भगवान् गदाधर, मध्यभागमें पितामह ब्रह्मा और भगवान् महेश्वरकी विधिवत् पूजा गन्ध - पुष्पादिसे पृथक् - पृथक् रूपमें की जाय। तत्पश्चात् उस देव मण्डलकी प्रदक्षिणा करके अग्निमें देवताओंकी संतुष्टिके लिये आहुति दे। घृत, दही और दूधसे विश्वे देवोंको संतृप्त करे। उसके बाद यजमान फिरसे स्नान करके विनम्रता पूर्वक एकाग्रचित्तसे भगवान् नारायणके सामने विधिवत् अपनी और्ध्वदैहिक क्रिया सम्पन्न करे। विनीतभावसे क्रोध एवं लोभरहित होकर कार्य आरम्भ करना चाहिये। इस अवसरपर सभी श्राद्ध और वृषोत्सर्ग करने चाहिये। तेरह ब्राह्मणोंको वस्त्र, छत्र, जूता, मुक्तामणिजटित अँगूठी, पात्र, आसन और भोजन देकर संतुष्ट करे। उसके बाद प्रेतकल्याणके लिये अन्न और जलपूर्ण कुम्भका दान देना चाहिये। शय्यादान करके घटदान भी प्रेतके उद्देश्यसे करें। तदनन्तर ‘नारायण’ नाम ही सत्य है - ऐसा कहकर सम्पुटमें स्थित भगवान् नारायणकी पूजा करे। ऐसा विधिवत् करनेपर निश्चित ही प्राणीको शुभ फल प्राप्त होता है।
राजाने कहा - हे प्रेत! प्रेतघट कैसा होना चाहिये, उसको प्रदान करनेका क्या विधान है? सभी प्राणियोंपर कृपा करनेके लिये तुम प्रेतके लिये मुक्तिदायक घटके विषयमें मुझे बताओ।
प्रेतने कहा - हे महाराज! आपने बड़ा अच्छा प्रश्न किया है। जिस दानसे प्रेतत्व प्राप्त नहीं होता, उसे मैं कहता हूँ, सुनें।
प्रेतघट नामका दान समस्त अमङ्गलोंका विनाशक है। दुर्गतिको क्षय करनेवाला यह प्रेतघटका दान सभी लोकोंमें दुर्लभ है। संतप्त स्वर्णमय घट बनवाकर उसे घृत और दूधसे परिपूर्ण करके लोकपालोंसहित ब्रह्मा, शिव और केशवको भक्तिपूर्वक प्रणाम कर ब्राह्मणको दानमें दे। अन्य सैकड़ों दान देनेसे क्या लाभ? इसके मध्यभागमें ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा पूर्वादिक सभी दिशाओंमें और कण्ठभागमें यथाक्रम लोकपालोंकी विधिवत पुष्प, धूप एवं चन्दनादिसे पूजा करके उसे दूध और घीसे पूर्ण स्वर्णमय घट दानमें देना चाहिये। यह सभी दानोंसे बढ़कर दान है। इस दानसे सभी महापातकोंका विनाश हो जाता है। प्रेतत्वकी निवृत्तिके लिये श्रद्धापूर्वक्त यह दान अवश्य करना चाहिये।
श्री भगवानने कहा - हे वैनतेय! उस प्रेतके साथ इस प्रकारका वार्तालाप राजाका चल ही रहा था कि उसी समय उनके पदचिह्नोंका अनुगमन करती हुई हाथी, घोड़े तथा रथसे परिव्याप्त उनकी सेना वहाँ आ पहुँची। सेनाके वहाँ आ जानेपर प्रेतने राजाको एक महामणि देकर प्रणाम किया और अपने प्रेतत्व - विमुक्तिकी प्रार्थना करके अदृश्य हो गया। उस वनसे निकलकर राजा भी अपने नगरको चला गया। हे पक्षिन्! नगरमें पहुँचकर राजाने उस प्रेतके द्वार कही गयी सम्पूर्ण और्ध्वदैहिक क्रियाको विधि - विधानसे सम्पन्न किया। उसके पुण्यसे वह प्रेत बन्धन - विमुक्त होकर स्वर्ग चला गया।
हे गरुड! पुत्रके द्वारा दिये गये श्राद्धसे पिताको सदगति प्राप्त होती है, इसमें आश्चर्य क्या है? जो मनुष्य इस पुण्यदायक इतिहासको सुनता है और जो सुनाता है, वह पापाचारसे युक्त होनेपर भी प्रेतत्व - योनिको प्राप्त नहीं होता है।
Summary of chapter 26 of the Garuda Mahā Purana - Preta Khaṇḍa is as follows:
The Divine Lord sets forth the sacred laws governing Āśauca, the temporary period of ceremonial impurity observed by family members following a birth or death in the lineage. Bhagavān Vishṇu explains that during this period, normal religious rituals are temporarily suspended as the family focuses on spiritual reflection, mourning, and energetic realignment following the departure of a member. The Lord outlines the specific durations of Āśauca for different social order and relationships, demonstrating how strict adherence to rules of physical cleanliness and emotional restraint preserves the spiritual purity and harmony of the household.