4 - आसन्नमृत्यु - व्यक्तिके निमित्त किये जानेवाले प्रायश्चित्त, दस दान आदि विविध कर्म, मृत्युके बाद किये जानेवाले कर्म, षट्पिण्डदान, दाह - संस्कारसे पूर्व किये जानेवाले कर्म, दाह - संस्कारके बाद अस्थिसंचयनादि कर्म तथा गृहप्रवेशके समयके कर्म, दुर्मुत्युकी गति, रायण - बलिका विधान, पुत्तलदाहविधि तथा पञ्चक -मृत्युके कृत्य

श्रीकृष्णने कहा - हे गरुड! जानमें या अनजानमें मनुष्य जो भी पाप करते हैं, उन पापोंकी शुद्धिके लिये उन्हें प्रायश्चित्त करना चाहिये। जो विद्वान्‌ है वह पहले पवित्र करनेवाले भस्म आदि दस स्नान करे और पापोंके प्रायश्चित्तके रूपमें शास्त्रोक्त कृच्छ्रादि व्रत अथवा तत्प्रतिनिधिभूत गोदानादि क्रिया करे। यदि मनुष्य उनमें अक्षमताके कारण सफल न हो रहा हो तो आधा ही सही, यदि आधा भी न हो तो उसका ही आधा सही और नहीं तो उस आधेका भी आधा उसे कुछ - न - कुछ प्रायश्चित्त अवश्य करना चाहिये। तत्पश्चात्‌ यथासामर्थ्य दस प्रकारके दान देनेका विधान है, उसको सुनो।

गो, भूमि, तिल, हिरण्य, घृत, वस्त्र, धान्य, गुड़, रजत और लवण - ये दस दान हैं -

गोभूमितिलहिरण्याज्यवासोधान्यगुडास्तथा।

रजतं लवणं चैव दानानि दश वै विदुः॥

यमद्वारपर पहुँचनेके लिये जो मार्ग बताये गये हैं, वे अत्यन्त दुर्गन्धदायक मवादादि तथा रक्तादिसे परिव्याप्त हैं। अतः उस मार्गमें स्थित वैतरणी नदीको पार करनेके लिये वैतरणी गौका दान करना चाहिये। जो गौ सर्वाङ्गमें काली हो, जिसके स्तन भी काले हों, उसे वैतरणी गौ माना गया है। (नदीं वैतरर्णी तर्तुं दद्याद्वैतरणीं च गाम्‌। कृष्णस्तनी सकृष्णाङ्गी सा वै वैतरणी स्मृता॥)

तिल, लोहा, स्वर्ण, कपास, लवण, सप्तधान्य, भूमि और गौ - ये पापसे शुद्धिके लिये पवित्रतामें एकसे बढ़कर एक हैं। इन आठ दानोंको महादान कहा जाता है। इनका दान उत्तम प्रकृतिवाले ब्राह्मणको ही देना चाहिये -

तिला लोहं हिरण्यं च कर्पासं लवणं तथा।

सप्तधान्यं क्षितिर्गाव एकैकं पावन स्मृतम्‌॥

एतान्यष्टौ महादानान्युत्तमाय द्विजातये।

अब पददानका वर्णन सुनो। छत्र, जूता, वस्त्र, अंगूठी, कमण्डलु, आसन, पात्र और भोज्यपदार्थ - ये आठ प्रकारके पद हैं -

छत्रोपानहवस्त्राणि मुद्रिका च कमण्डलु:।

आसन भाजनं भोज्यं पदं चाष्टविधं स्पृतम्‌॥

तिलपात्र, घृतपात्र, शय्या, उपस्कर तथा और भी जो कुछ अपनेको इष्ट हो, वह सब देना चाहिये। अश्व, रथ, भैंस, भोजन, वस्त्रका दान ब्राह्मणोंको करना चाहिये। अन्य दान भी अपनी शक्तिके अनुसार देना चाहिये।

हे पक्षिराज! इस पृथ्वीपर जिसने पापका प्रायश्चित्त कर लिया है, वह दस प्रकारके दान भी दे चुका है, वैतरणी गौ एवं अष्टदान कर चुका है, तिलसे भरा पूर्ण पात्र, घीसे भरा हुआ पात्र, शय्यादान और विधिवत्‌ पददान करता है तो वह नरकरूपी गर्भमें नहीं आता है अर्थात्‌ उसका पुनर्जन्म नहीं होता -

प्रायश्चित्तं कृतं येन दश दानान्यपि क्षितौ॥

दानं गोर्वैतरण्याश्च दानान्यष्टौ तथापि वा।

तिलपात्रं सर्पिःपात्रं शय्यादानं तथैव च॥

पददानं चर विधिवन्नासौ निरयगर्भग:।

पण्डित लोग स्वतन्त्र रूपसे भी लवण दान करनेकी इच्छा रखते हैं, क्योंकि यह लवण-रस विष्णुके शरीरसे उत्पन्न हुआ है, इस पृथ्वीपर मरणासन्न प्राणीके प्राण जब न निकल रहे हों तो उस समय लवण - रसका दान उसके हाथसे दिलवाना चाहिये; क्योंकि यह दान उसके लिये स्वर्गलोकके द्वार खोल देता है। मनुष्य स्वयं जो कुछ दान देता है, परलोकमें वह सब उसे प्राप्त होता है। वहाँ उसके आगे रखा हुआ मिलता है। हे पक्षिन्‌! जिसने यथाविधि अपने पापोंका प्रायश्चित्त कर लिया है, वही पुरुष है। वही अपने पापोंको भस्मसात् करके स्वर्गलोकमें सुखपूर्वक निवास करता है।

हे खगराज! गौका दूध अमृत है। इसलिये जो मनुष्य दूध देनेवाली गौका दान देता है, वह अमृतत्वको प्राप्त करता है। पहले कहे गये तिलादिक आठ प्रकारके दान देकर प्राणी गन्धर्वलोकमें निवास करता है। यमलोकका मार्ग अत्यधिक भीषण तापसे युक्त है, अतः छत्रदान करना चाहिये। छत्रदान करनेसे मार्गमें सुख प्रदान करनेवाली छाया प्राप्त होती है। जो मनुष्य इस जन्ममें पादुकाओंका दान देता है, वह ‘असिपत्रवन’ के मार्गको घोड़ेपर सवार होकर सुखपूर्वक पार करता है। भोजन और आसनका दान देनेसे प्राणीको परलोक गमनके मार्गमें सुखका उपभोग प्राप्त होता है। जलसे परिपूर्ण कमण्डलुका दान देनेवाला पुरुष सुखपूर्वक परलोकगमन करता है।

यमराजके दूत महाक्रोधी और महाभयंकर हैं। काले एवं पीले वर्णवाले उन दूतोंको देखनेमात्रसे भय लगने लगता है। उदारता पूर्वक वस्त्र - आभूषणादिका दान करनेसे वे यमदूत प्राणीको कष्ट नहीं देते हैं। तिलसे भरे हुए पात्रका जो दान ब्राह्मणको दिया जाता है, वह मनुष्यके मन, वाणी और शरीरके द्वारा किये गये त्रिविध पापोंका विनाश कर देता है। मनुष्य घृतपात्रका दान करनेसे रुद्रलोक प्राप्त करता है। ब्राह्मणको सभी साधनोंसे युक्त शय्याका दान करके मनुष्य स्वर्गलोकमें नाना प्रकारकी अप्सराओंसे युक्त विमानमें चढ़कर साठ हजार वर्षतक अमरावतीमें क्रीडा करके इन्द्रलोकके बाद गिरकर पुन: इस पृथ्वीलोकमें आकर राजाका पद प्राप्त करता है। जो मनुष्य काठी आदि उपकरणोंसे सजे - धजे, दोषरहित जवान घोड़ेका दान ब्राह्मणको देता है, उसको स्वर्गकी प्राप्ति होती है। हे खगेश! दानमें दिये गये इस घोड़ेके शरीरमें जितने रोम होते हैं, उतने वर्ष (कालतक) स्वर्गके लोकोंका भोग दानदाताको प्राप्त होता है। प्राणी ब्राह्मणको सभी उपकरणोंसे युक्त चार घोड़ोंवाले रथका दान दे करके राजसूय यज्ञका फल प्राप्त करता है। यदि कोई व्यक्ति सुपात्र ब्राह्मणको दुग्धवती, नवीन मेघके समान वर्णवाली, सुन्दर जघन - प्रदेशसे युक्त और मनमोहक तिलकसे समन्वित भैंसका दान देता है तो वह परलोकमें जाकर अभ्युदयको प्राप्त करता है, इसमें कोई संदेह नहीं है तालपत्रसे बने हुए पंखेका दान करनेसे मनुष्यको परलोकगमनके मार्गमें वायुका सुख प्राप्त होता है। वस्त्र - दान करनेसे व्यक्ति परलोकमें शोभासम्पन्न शरीर और उस लोकके वैभवसे सम्पन्न हो जाता है। जो प्राणी ब्राह्मणको रस, अन्न तथा अन्य सामग्रियोंसे युक्त घरका दान देता है, उसके वंशका कभी विनाश नहीं होता है और वह स्वयं स्वर्गका सुख प्राप्त करता है। हे खगेन्द्र! इन बताये गये सभी प्रकारके दानोंमें प्राणीकी श्रद्धा तथा अश्रद्धासे आयी हुई दानकी अधिकता और कमीके कारण उसके फलनमें श्रेष्ठता और लघुता आती है।

इस लोकमें जिस व्यक्तिने जल एवं रसका दान किया है, वह आपद्कालमें आह्लादका अनुभव करता है। जिस मनुष्यने श्रद्धापूर्वक इस संसारमें अन्न - दान दिया है, वह परलोकमें अन्न-भक्षणके बिना भी वही तृप्ति प्राप्त करता है, जो उत्तमोत्तम अन्नके भक्षणसे प्राप्त होती है। मृत्युके संनिकट आ जानेपर यदि मनुष्य यथाविधि संन्यासाश्रमको ग्रहण कर लेता है तो वह पुनः इस संसारमें नहीं आता, अपितु उसको मोक्ष प्राप्त हो जाता है।

यदि मृत्युके समीप पहुँचे हुए मनुष्यको लोग किसी पवित्र तीर्थमें ले जाते हैं और उसकी मृत्यु उसी तीर्थमें हो जाती है तो उसको मुक्ति प्राप्त होती है तथा यदि प्राणी मार्गके बीच ही मर जाता है तो भी मुक्ति प्राप्त करता ही है, साथ ही उसको तीर्थतक ले जानेवाले लोग पग-पगपर यज्ञ करनेके समान फल प्राप्त करते हैं -

आमसन्नमरणो मर्त्यश्चेत्तीर्थं प्रतिनीयते।

तीर्थप्राप्तौ भवेन्मुक्तिर्म्रियते यदि मार्गग:।

पदे पदे क्रतुसमं भवेत्तस्य न संशयः॥

हे द्विज! मृत्युके निकट आ जानेपर जो मनुष्य विधिवत्‌ उपवास करता है, वह भी मृत्युके पश्चात्‌ पुन: इस संसारमें नहीं लौटता है।

हे खगेश! मृत्युके संनिकट होनेपर कौन - सा दान करना चाहिये। इस प्रशनका उत्तर मैंने बता दिया है। मृत्यु और दाहके बीच मनुष्यके क्‍या कर्तव्य हैं? इस प्रशनका उत्तर अब तुम सुनो।

व्यक्तिको मरा हुआ जानकर उसके पुत्रादिक परिजनोंको चाहिये कि वे सभी शवको शुद्ध जलसे स्नान कराकर नवीन वस्त्रसे आच्छादित करें। तदनन्तर उसके शरीरमें चन्दन आदि सुगन्धित पदार्थोंका अनुलेप भी करें। उसके बाद जहाँ मृत्यु हुई है, उसी स्थानपर एकोद्दिष्ट श्राद्ध(यहाँ एकोद्दिष्टका तात्पर्य मरणस्थानपर यथाविधान एक पिण्डके दानसे है।) करना चाहिये। दाहकर्मके पूर्व शवको दाहके योग्य बनानेके लिये ऊपर बताये गये कर्म अनिवार्य हैं। इस एकोद्दिष्ट श्राद्धमें आसन तथा प्रोक्षण क्रिया होनी चाहिये, किंतु आवाहन, अर्चन, पात्रालम्भन और अवगाहन - ये चार क्रियाएँ नहीं करनी चाहिये। उस समय पिण्डदान अनिवार्य है, अन्नदानका संकल्प भी हो सकता है। रेखाकरण, प्रत्यवनेजन नहीं होता और दिये गये पदार्थके अक्षय्यकी कामना करनी चाहिये। अक्षय्योदक दान देना चाहिये। स्वधावाचन, आशीर्वाद और तिलक - ये तीन नहीं होने चाहिये। उड़दसे परिपूर्ण घट और लोहेकी दक्षिणा ब्राह्मणको प्रदान करनेका विधान है। तत्पश्चात्‌ पिण्ड हिलाना

चाहिये। किंतु उस समय आच्छादन, विसर्जन तथा स्वस्तिवाचन - ये तीन वर्जित हैं। हे खगेश! मरणस्थान, द्वार, चत्वर, विश्रामस्थान, काष्ठट - चयन और अस्थि - संचयन - ये छ: पिण्डदानके स्थान हैं।

प्राणीकी मृत्यु जिस स्थानपर होती है, वहाँपर दिये जानेवाले पिण्डका नाम ‘शव’ है, उससे भूमिदेवताकी तुष्टि होती है। द्वारपर जो पिण्ड दिया जाता है उसे ‘पान्थ’ नामक पिण्ड कहते हैं। इस कर्मको करनेसे वास्तुदेवताको प्रसन्‍नता होती है। चत्वर अर्थात्‌ चौराहेपर ‘खेचर’ नामक पिण्डका दान करनेपर भूतादिक, गगनचारी देवतागण प्रसन्न होते हैं। शवके विश्राम भूमिमें’ भूत - संज्ञक’ पिण्डका दान करनेसे दसों दिशाओंको संतुष्टि प्राप्त होती है।

चितामें ‘साधक’ नामका और अस्थि - संचयनमें ‘प्रेत - संज्ञक’ पिण्ड दिया जाता है।

शवयात्राके समय पुत्रादिक परिजन तिल, कुश, घृत और ईंधन लेकर ‘यमगाथा’ अथवा वेदके ‘यमसूक्त’ का पाठ करते हुए श्मशानभूमिकी ओर जाते हैं। प्रतिदिन गौ, अश्व, पुरुष और बैल आदि चराचर प्राणियोंको अपनी ओर खींचते हुए यम संतुष्ट नहीं होते हैं, जिस प्रकार कि मद्य पीनेवाला संतुष्ट नहीं होता।

(अहरहर्नीयमानो गामश्वं पुरुषं वृषम्‌। वैवस्वतो न तृप्येत सुरया त्विव दुर्मति:॥ इसीका नाम यमगाथा है।)

‘ॐ अपेतेति०’ इस यम (यजु०अ० 35 ‘यमसूक्त’ कहलाता है।) सूक्तका अथवा ‘यमगाथा ‘का पाठ शवतयात्राके मार्गमें करना चाहिये। सभी बन्‍धु - बान्धवोंको दक्षिण दिशामें स्थित श्मशानकी वनभूमिमें शवको ले जाना चाहिये। हे पक्षिन्‌! पूर्वोक्त विधिसे मार्गमें दो श्राद्ध करना चाहिये। उसके बाद श्मशानभूमिमें पहुँचकर धीरेसे शवको पृथ्वीपर उतारते हुए दक्षिण दिशाकी ओर सिर स्थापित कर चिताभूमिमें पूर्वोक्त विधिके अनुसार श्राद्ध करना चाहिये। शब - दाहकी क्रियाके लिये पुत्रादिक परिजनोंको स्वयं तृण, काष्ठ, तिल और घृत आदि ले जाना चाहिये। शूद्रोंके द्वारा श्मशानमें पहुँचायी गयी वस्तुओंसे वहाँ किया गया सम्पूर्ण कर्म निष्फल हो जाता है। वहाँपर सभी कर्म अपसव्य और दक्षिणाभिमुख होकर करना चाहिये। हे पक्षिराज! शास्त्रसम्मत विधिके अनुसार एक वेदीका निर्माण करना चाहिये। तदनन्तर प्रेतवस्त्र अर्थात्‌ कफनको दो भागोंमें फाड़ कर उसके आधे भागसे उस शवको ढक दे और दूसरे भागको श्मशानमें निवास करनेवाले प्राणीके लिये भूमिपर ही छोड़ दे। उसके बाद पूर्वोक्त विधिके अनुसार मरे हुए व्यक्तिके हाथमें पिण्डदान करे। तदनन्तर शवके सम्पूर्ण शरीरमें घृतका लेप करना चाहिये।

हे खगेश! प्राणीकी मृत्यु और दाह - संस्कारके बीच पिण्डदानकी जो विधि है, अब उसे सुनो।

पहले बताये गये मृतस्थान, द्वार, चौराहे, विश्रामस्थान तथा काष्ठसंचयनस्थानमें प्रदत्त पाँच पिण्डोंका दान करनेसे शवमें की आहुति ( अग्निदाह) - की योग्यता आ जाती है, अथवा किसी प्रकारके प्रतिबन्धके कारण उपर्युक्त पिण्ड नहीं दिये गये तो शव राक्षसोंके भक्षण योग्य हो जाता है। अतः स्वच्छ भूमिपर बनी हुई वेदीको भलीकभाँति मार्जन, उपलेपनके द्वारा शुद्ध कर उसके ऊपर यथाविधि अग्निको स्थापित करना चाहिये। तदनन्तर पुष्प - अक्षत आदिसे क्रव्याद नामवाले अग्निदेवकी विधिवत्‌ पूजा करके दाह करे। दाहकार्यमें चाण्डालके घरकी अग्नि, चिताकी अग्निऔर पापीके घरकी अग्निका प्रयोग नहीं करना चाहिये और निम्नलिखित मंत्रसे अग्निकी प्रार्थना करनी चाहिये -

त्वं भूतकृज्जगद्योनिस्त्वं लोकपरिपालकः॥

उपसंहर तस्मात्त्वमेनं स्वर्गं नयामृतम्‌।

हे देव! आप भूतकृत्‌ हैं। हे देव! आप इस संसारके योनिस्वरूप और सभीके पालनहार हैं। इसलिये आप इस शवका अपनेमें उपसंहार करके अमृतस्वरूप स्वर्गमें ले जाइये’

इस प्रकार क्रव्याद देवकी विधिवत्‌ पूजा कर शवको चिताकी अग्निमें जलानेका उपक्रम करना चाहिये। जब शवके शरीरका आधा भाग उस अग्निमें जल जाय तो उस समय क्रिया करनेवाले व्यक्तिको निम्नलिखित मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये-

अस्मात्त्वमधिजातोऽसि त्वदयं पुनः॥

असौ स्वर्गाय लोकाय स्वाहा०॥(यजु०)

अर्थात्‌ हे देव! आप इसीसे उत्पन्न हुए हैं। यह शरीरी पुन: आपसे उत्पन्न हो। अमुक नामवाला यह प्राणी स्वर्गलोकको प्राप्त करे - ऐसा कहकर तिलमिश्रित आज्याहुति चितामें जल रहे शवके ऊपर छोड़े। उसके बाद भावविह्वल होकर उस आत्मीयजनके लिये रोना चाहिये। इस कृत्यको करनेसे उस मृतकको अत्यधिक सुख प्राप्त होता है।

दाह - क्रिया करनेके पश्चात्‌ अस्थि - संचयन क्रिया करनी चाहिये। हे खगराज! दाहकी पीड़ाकी शान्तिके लिये प्रेत - पिण्ड भी प्रदान करे। तत्पश्चात्‌ वहाँपर गये हुए सभी लोग चिताकी प्रदक्षिणा कर कनिष्ठादि क्रमसे सूक्त जपते हुए स्नानके लिये जलाशय आदिपर जायाँ। वहाँ पहुँचकर अपने वस्त्रोंका प्रक्षालनकर पुनः उन्हें ही पहनकर मृत व्यक्तिका ध्यान करते हुए उसे जल - दान देनेकी प्रतिज्ञा करें और मृत व्यक्तिने प्रेतरूपमें जल - दान देनेकी आज्ञा दी है - ऐसी भावना करते हुए पुनः जलमें मौन धारणपूर्वक प्रवेश करें और यथाधिकार एक वस्त्र होकर अपनी शिखा खोलकर तथा अपसव्य होकर स्नान करें। यह स्नान दक्षिणाभिमुख होकर’ अपनः शोशुचदघम्’(यजु० 353 ) ‘इस वेदमन्त्रका उच्चारण करते हुए करना चाहिये । उस समय स्नान करनेवाले लोगोंकों जलका आलोडन नहीं करना चाहिये। तत्पश्चात्‌ किनारे आ करके अपनी शिखाको बाँध ले और सीधे कुशको दक्षिणाग्र करके दोनों हाथोंमें रखकर अञ्जलिसे तिलयुक्त जल लेकर पितृतीर्थसे दक्षिण दिशामें एक बार, तीन बार अथवा दस बार भूमिपर या पत्थरपर जल - दान करें। इस समय तिलाञ्जलि देनेवाले परिजनोंको कहना चाहिये कि ‘हे अमुक गोत्रमें उत्पनन अमुक नामवाले प्रेत! तुम मेरे द्वारा दिये जा रहे इस तिलोदकसे संतृप्त हो। मैं तुम्हें तिलाझलि दे रहा हूँ, अतः इसको ग्रहण करनेके लिये तुम यहाँपर उपस्थित होओ।

(तिलोदककी अञ्जलि इस प्रकार कहकर देनी चाहिये -

अद्येहामुक गोत्रामुकप्रेतचितादाहजनिततापतृषोपशमाय एष तिलकुशतोयाञ्जलिलर्मद्दत्तस्तवोपतिष्ठताम्‌।’)

हे कश्यपपुत्र गरुड! तत्पश्चात्‌ जलसे निकलकर वस्त्र पहनकर स्नान - वस्त्रको एक बार निचोड़कर पवित्र भूमिपर बैठ जायँ। शवदाह तथा तिलाञ्जलि देकर मनुष्यको अश्रुपात नहीं करना चाहिये, क्योंकि उस समय रोते हुए अपने बन्धु - बान्धवोंके द्वारा आँख और मुँहसे गिराये आँसू एवं कफको मरा हुआ व्यक्ति विवश होकर पान करता है। अत: रोना नहीं चाहिये, अपितु यथाशक्ति क्रिया करनी चाहिये। तदनन्तर कोई पुराणज्ञ संसारकी अनित्यताको बताता हुआ मृतकके परिजनोंको इस प्रकारका उपदेश देकर शोकनिवारण करनेका प्रयत्न करे - ‘मनुष्यका यह शरीर केलेके वृक्षके समान बड़ा ही सारहीन एवं जलके बुदबुदेके समान क्षणभंगुर है। इसमें जो सारतत्त्वको खोजता है, वह महामूर्ख है। यदि पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायुतत्त्व - इन पाँच तत्त्वोंसे बना हुआ यह शरीर पुनः अपने किये हुए कमोके अनुसार उन्हीं पञ्चतत्त्वोंमें जाकर विलीन हो जाता है तो उसके लिये रोना क्या? जब पृथ्वी, समुद्र तथा देवलोक विनष्ट हो जाते हैं तो फेनके समान प्रसिद्ध यह मर्त्यलोक नष्ट नहीं होगा?’ इस उपदेशको सुनकर वे सभी परिवारके सदस्य अपने घरको जायूँ। पहलेसे घरके द्वारपर रखी हुईनीमकी पत्तियोंको चचाकर आचमन करें। तदनन्तर अग्नि, जल, गोबर, श्वेत सरसों, दूर्वा, प्रवाल,वृषभ तथा अन्य माङ्गलिक वस्तुओंका हाथसे स्पर्श करके पैरसे पत्थरका भी स्पर्श करें और धीरे - धीरे घरमें प्रवेश करें।

जो व्यक्ति विद्वान्‌ है, वह अपने अग्निहोत्री परिजनकी मृत्यु होनेपर उसका दाह - संस्कार श्रौतकी अग्निके द्वारा ही यथाविधि करे। दो वर्षसे कम आयुवाले छोटे बालककी मृत्यु होनेपर उसको श्मशानभूमिमें गड्ढा खोदकर मिट्टीसे ढक देना चाहिये। उसके लिये उदक - क्रियाका विधान नहीं है। जो स्त्री पतित्रता है, यदि वह मरे हुए पतिका अनुगमन करना चाहती है तो धर्मविहित नियमोंके अनुसार पतिको प्रणाम करके चितामें प्रवेश करे।

जो स्त्री जीवनके व्यामोहसे चितापर चढ़कर पुनःबाहर आ जाती है, उसे ‘प्राजापत्यव्रत’ करना चाहिये।

मनुष्यके शरीरमें साढ़े तीन करोड़ रोएँ होते हैं, जो स्त्री पतिका अनुगमन करती है, उतने कालतक वह स्वर्गमें वास करती है। जिस प्रकार सर्पको पकड़नेवाला सपेरा बिलसे सर्पको बलातू बाहर निकाल लेता है, उसी प्रकार पतिका अनुगमन करनेवाली सती नारी अपने पतिका उद्धार कर उसके साथ स्वर्गमें सुखपूर्वक निवास करती है। अप्सराएँ उसका सम्मान करती हैं तथा वह पतिक्रता नारी तबतक पतिके साथ सुखोपभोग करती है, जबतक चौदह इन्द्रोंकी अवधि पूर्ण नहीं हो जाती है। यदि पति ब्रह्म हत्यारा, कृतघ्न या मित्रघाती हो, फिर भी सधवा स्त्री मृत्यु होनेपर पतिके साथ सती होकर उसे पवित्र कर देती है। पतिके मर जानेपर जो स्त्री उसीके साथ अग्निमें अपने शरीरको भेंट कर देती है, वह अरुन्धतीके समान आचरण करती हुई स्वर्गलोकमें जाकर सम्मान प्राप्त करती है।

पतिकी मृत्यु होनेपर जबतक स्त्री अपनेको चिताकी भेंट नहीं चढ़ा देती है, तबतक वह स्त्रीके शरीरसे किसी प्रकार मुक्त नहीं हो सकती है। जो स्त्री अपने पतिके साथ सती हो जाती है, वह पितृकुल, मातृकुल और पतिकुल - इन तीनों कुलोंको पवित्र कर देती है। जो स्त्री पतिके दु:खमें दुःखी, सुखमें सुखी, विदेशगमनमें मलिनवसना, कृशकाय तथा मृत्यु होनेपर चितामें उसीके साथ जलकर मृत्युका संवरण करती है, उस स्त्रीको पतिव्रता मानना चाहिये। पातिव्रत धर्मका पालन करनेवाली स्त्री पतिकी मृत्यु हो जानेपर पृथक्‌ चितामें समारूढ होकर परलोक गमनके योग्य नहीं होती। क्षत्रियादि सभी सवर्णा स्त्रियोंको अपने पतिके साथ ही चितामें आरोहणकर परलोकसुख प्राप्त करना चाहिये। ब्राह्मण वर्णकी स्त्रीसे लेकर चाण्डाल वर्णकी स्त्रीके लिये पतिके साथ चितामें जलकर सती होनेका विधान एक समान ही है। पतिकी मृत्युके समय जो स्त्रियाँ गर्भसे रहित हैं और जिनके छोटे - छोटे बच्चे नहीं हैं, उन सभीको सतीधर्मका पालन करना चाहिये।

हे पक्षिन्‌! मनुष्यके दाह - संस्कारकी जो विधि है, उसको सामान्य रूपसे मैंने तुम्हें सुना दिया है। अब और क्‍या सुनना चाहते हो?

इसपर गरुडने कहा - हे संसारके स्वामिन्‌! यदि प्रवास कालमें पतिकी मृत्यु हो जाती है और उसकी अस्थियाँ भी स्त्रीको नहीं प्राप्त होती हैं तो उसका दाह किस प्रकारसे करना चाहिये, यह बतानेकी कृपा करें।

श्रीकृष्णने कहा - हे गरुड! यदि प्रवासी पतिकी अस्थियाँ नहीं प्राप्त होती हैं तो मैं उसकी भी सद्गतिका विधान तुम्हें सुनाता हूँ। उस परम गोपनीय तत्त्वको तुम सुनो। जो प्राणी भूखसे पीड़ित होनेके कारण मृत्युको प्राप्त होते हैं, जो व्याघ्रादि हिंसक प्राणियोंके द्वारा मारे जाते हैं, जिनकी मृत्यु गलेमें फाँसीका फन्दा लगानेसे हो जाती है, शरीरकी क्षीणताके कारण जिनकी मृत्यु होती है, जो हाथीके द्वारा मारे जाते हैं, जो विष, अग्नि, बैल और ब्राह्मण - शापसे मृत्युको प्राप्तहोते हैं, जिनकी मृत्यु हैजासे होती है, जो आत्मघाती हैं, जो गिरकर या रस्सी आदिके द्वारा किये गये बन्धन अथवा जलमें डूबनेसे मर जाते हैं, उनकी स्थितिकों तुम सुनो। जो सर्प, व्याघ्र, श्रृंगधारी पशु, उपसर्ग (चेचक),पत्थर, जल, ब्राह्मण, जंगली हिंसक पशु, वृक्षपात और विद्युत्पातसे और लोहेसे, पर्वतपरसे गिरनेसे अथवा दीवालके गिरनेसे, पहाड़के खड़े कगारसे, खाट या मध्य कक्षमें मृत्युको प्राप्त होते हैं, ऋतुमती, चाण्डाली, शूद्रा तथा धोबिन आदि त्याज्य स्त्रियोंका संसर्ग, शारीरिक स्पर्श या अधरोंका पान करते हुए जो लोग मृत्युको प्राप्त होते हैं, जो शस्त्राघातसे मरते हैं, विषैले कुत्तेक मुखका स्पर्श करनेसे जिनकी मृत्यु हो जाती है, विधि - विहीन - रूपमें (अकस्मात्‌ किसी ऐसी स्थितिमें मरण हो रहा है जब मरणासन्न व्यक्तिके लिये शास्त्रोक्त विधियाँ सम्पन्न नहीं हो पाती हैं, तब ऐसा मरण विधि - विहीन मरण माना जाता है।) जो मृत्यु हो जाती है, उसको दुर्मरण समझना चाहिये। उसी पापसे नरकोंको भोगकर वे पुनः प्रेतत्वको प्राप्त होते हैं। ऐसे व्यक्तिका दाह,उदकक्रिया और मरणनिमित्तक अन्य कृत्य तथा और्ध्वदैहिक कर्म नहीं करना चाहिये। इस प्रकारसे अपमृत्यु होनेपर पिण्डदानका कर्म भी वर्जित है। यदि प्रमादवश कोई पिण्डदान करता है तो वह उसे प्राप्त नहीं होता और अन्तरिक्षमें विनष्ट हो जाता है।

अतः लोकगर्हासे डरकर उसके शुभेच्छु पुत्र - पौत्र और सगोत्री जनोंको मृतकके लिये ‘नारायणबलि’! करनी चाहिये। ऐसा करनेपर ही उन्हें शुचिता प्राप्त होती है अन्यथा नहीं; यह यमराजका वचन है।

नारायणबलि किये जानेपर और्ध्वदैहिक कर्मकी योग्यता आ जाती है। अपमृत्यु होनेपर ऐसे प्राणीका शुद्धिकरण इसी कर्म (नारायणबलि) - से सम्भव है अन्यथा नहीं।

नारायणबलि सम्यक्‌ रूपसे तीर्थमें करना चाहिये। ब्राह्मणोंके द्वारा भगवान्‌ कृष्णके समक्ष नारायणबलि करानेसे मनुष्य पवित्र हो जाता है। पुराण, वेदके ज्ञाता ब्राह्मण सबसे पहले तर्पण करें। सभी प्रकारकी औषधियोंको और अक्षतको जलमें मिलाकर ‘पुरुषसूक्त’ या ‘वैष्णवसूक्त’ का उच्चारण करते हुए विष्णुके उद्देश्यसे सम्पन्न करना चाहिये। उसके बाद दक्षिणाभिमुख होकर प्रेत और विष्णुका इस प्रकार स्मरण करे -

अनादिनिधनो देव: शङ्कचक्रगदाधरः॥

अक्षय: पुण्डरीकाक्ष प्रेतमोक्षप्रदो भव।

‘हे देव! आप अनादि, अजर और अमर हैं। है देव! आप शंख, चक्र एवं गदासे सुशोभित विष्णु हैं। आप कभी न विनष्ट होनेवाले परमात्मा हैं। हे पुण्डरीकाक्ष! आप इस प्रेतको मोक्ष प्रदान करनेकी कृपा करें।!

वीतराग, विमत्सर, जितेन्द्रिय, शुचिष्मान्‌ और धर्मतत्पर होकर वहींपर भक्तिपूर्वक एकादश श्राद्ध करे। उसके बाद वह सावधानमनसे विधिवत्‌ जल, अक्षत, यव, गेहूँ और कँगनीका दान दे। उस समय शुभ हविष्यान्न, सुन्दर बनी हुई सोनेकी अंगूठी, छत्र और पगड़ीका दान देना चाहिये। इन वस्तुओंके अतिरिक्त दूध - मधुसे समन्वित सभी प्रकारके अन्न देना चाहिये। वस्त्र और पादुका समन्वित आठ प्रकारका पददान सुपात्रोंको समभावसे दिया जाना चाहिये। पिण्डदान करनेके बाद मन्त्रोच्चार सहित गन्ध, पुष्प और अक्षतसे पूजा करे, तत्पश्चात्‌ ब्राह्मणोंको सम्मानसहित दान दे। शंख, खड्ग अथवा ताम्रपात्रमें पृथक्‌ - पृथक्‌ तर्पण करना चाहिये। उसके बाद ध्यान - धारणासे संयुक्त होकर दोनों घुटनोंके बल पृथ्वीपर अवस्थित होकर मन्त्रोच्चार पूर्वक उद्दिष्ट देवोंके लिये पृथक्‌ - पृथक्‌ अर्घ्य प्रदान करे। पञ्चरत्नसे युक्त पृथक्‌ - पृथक्‌ पाँच कुम्भोंमें ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, यम और प्रेत - इन पाँचोंको स्थापित करना चाहिये। इसके अतिरिक्त वस्त्र, यज्ञोपवीत, मूँग और पददान पृथक्‌ - पृथक्‌ स्थापित करे। यथाविधि उन देवोंके लिये पाँच श्राद्ध करना चाहिये। शंख या ताम्रपात्र न मिलनेपर मृण्मयपात्रमें सर्वौषधिसे युक्त तिलोदक लेकर प्रत्येक पिण्डपर पृथक्‌ - पृथक्‌ जलधारा देनी चाहिये। तिलसे पूर्ण ताम्रपात्र दक्षिणा और स्वर्णसे युक्त तथा पददान मुख्य ब्राह्मणोंको देना चाहिये। यमके निमित्त दक्षिणासहित तिल और लोहेका दान देना चाहिये। विष्णुदेवके लिये यथाशक्ति विधिपूर्वक बलि प्रदान करनेपर मृत व्यक्तिका नरक लोकसे उद्धार हो जाता है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।

जो व्यक्ति सर्पदंशसे मर जाता है, उसके विषयमें विशेष बात मुझसे सुनो - एक भार सोनेकी नागप्रतिमा बनवाकर गौके सहित विधिवत्‌ उसका दान ब्राह्मणको कर देना चाहिये। ऐसा करके पुत्र अपने पिताके ऋणसे मुक्त हो जाता है। इस प्रकार सर्पबलि देकर मनुष्य सर्पदोषके पापसे दूर हो जाता है। हे गरुड! उसके बाद सर्वौषधिसे समन्वित पुत्तलका निर्माण करनाचाहिये। पुत्तलके निर्माणमें पलाश और बृन्तोंका विभाग सुनो - काले मृगका चर्म बिछाकर उसके ऊपर कुशसे निर्मित एक पुरुषकी आकृति बनानी चाहिये। तीन सौ साठ वृन्तोंसे मनुष्यकी अस्थियोंका निर्माण होता है। उन वृन्तोंका विन्यास इन अङ्गोमें पृथक्‌ - पृथक्‌ रूपसे करना चाहिये। चालीस वृन्त शिरोभाग, दस वृन्त ग्रीवा, बीस वृन्त वक्ष:स्थल, बीस वृन्त उदर, सौ वृन्त दोनों बाहु, बीस वृन्त कटि, सौ वृन्त दोनों उरुभाग, तीस वृन्त दोनों जंघा प्रदेश, चार वृन्त शिशन , छः वृन्त दोनों अण्डकोश और दस वृन्त पैरकी अंगुली भागमें स्थापित करनेका विधान है। इसके बाद शिरोभागमें नारियल, तालु प्रदेशमें लौकी, मुखमें पञ्चरत्न, जिह्वामें कदलीफल, आँतोंके स्थानमें कमलनाल, नासिका भागमें बालू, वसाके स्थानमें मिट्टी, हरिताल और मनःशिल, वीर्यके स्थानपर पारद, पुरीषके स्थानपर पीतल, शरीरमें मनःशील, संधिभागोंमें तिलका पाक, मांसके स्थानपर पिसा हुआ यव, रक्तके स्थानपर मधु, केशराशिके स्थानपर जटाजूट, त्वचाके स्थानपर मृगचर्म, दोनों कानके स्थानपर तालपत्र, दोनों स्तनोंके स्थानपर गुञ्जफल, नासिका भागमें शतपत्र, नाभि मण्डलमें कमल, दोनों अण्डकोशोंके स्थानपर बैगन, लिङ्गभागमें बढ़िया सुन्दर गाजर, नाभिमें घी, कौपीनके स्थानपर त्रपु अर्थात्‌ लाह, स्तनोंमें मोती, ललाटपर कुंकुमका लेप, कर्पूर एवं अगुरु धूप, सुगन्धित मालाका अलंकरण, पहननेके लिये हृदयमें पट्टसूत्रका विन्यास करना चाहिये। उसकी दोनों भुजाओंमें ऋद्धि एवं वृद्धि, दोनों नेत्रोंमें कौड़ी, दाँतोंमें अनारके बीज, अँगुलियोंके स्थानमें चम्पाके पुष्प और नेत्रोंके कोण भागमें सिन्दूर भरकर ताम्बूल आदि शोभादायक अन्य पदार्थ भी भेंट करना चाहिये।

इस प्रकार सर्वौषधियुक्त उस प्रेतकी पूजा कर यदि मृत व्यक्ति अग्निहोत्री रहा हो तो उसके अङ्गोमें यथाक्रम यज्ञ - पात्र स्थापित करे। तदनन्तर ‘स्त्रियः पुनन्तु मे शिर०’ तथा ‘इमं मे वरुणेन च०’ इन मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित शालग्रामशिलायुक्त जलसे उक्त प्रेतको पवित्र करके भगवान्‌ विष्णुको उद्देश्य कर सुशीला, दूध देनेवाली गौका दान देना चाहिये। तत्पश्चात्‌ तिल, लौह, स्वर्ण, कपास, लवण, सप्तधान्य, पृथ्वी तथा गौ, जो एक - से - एक बढ़कर पवित्र बताये गये हैं, उनका भी दान करना चाहिये। उसके बाद तिल - पात्र तथा पददान भी करना चाहिये। तदनन्तर प्रेतकी मुक्तिके लिये वैष्णव श्राद्ध करे। उसके बाद श्राद्धकर्ता हृदयमें भगवान्‌ विष्णुका ध्यान करके प्रेतमोक्षका कार्य सम्पन्न करे।

उक्त विधिसे बनाये गये पुत्तलका विधिपूर्वक दाह करना चाहिये। तत्पश्चात्‌ उसकी शुद्धिके लिये पुत्रादि संस्कर्ता प्रायश्चित्त करें। जिसमें तीन, छः, बारह तथा पंद्रह कृच्छ्रव्रत करनेका विधान है। प्रायश्चित्त कर्ममें असमर्थ होनेपर गाय, सुवर्णादिका दान अथवा तत्प्रतिनिधिभूत द्रव्यका दान करना चाहिये। विद्वानूकों इस प्रकार अपनी शुद्धि करनी चाहिये। अशुद्ध दाताके द्वारा अशुद्धको उद्देश्य करके जो कुछ श्राद्ध तथा दानादिक किया जाता है, वह सब कुछ अन्तरिक्षमें ही विनष्ट हो जाता है। अत: विधिवत्‌ शुद्ध होकर मनुष्यको दाहादिक और्ध्वदैहिक कर्म करना चाहिये।

हे गरुड! जो प्राणी बिना प्रायश्चित्त किये ही दाहादिक कर्म ज्ञानपूर्वक या अज्ञान पूर्वक करता है, वह वहन, अग्निदान, जलदान, स्नान, स्पर्श, रज्जुछेदन तथा अश्रुपात करके तप्तकृच्छ्रव्रतसे शुद्ध होता है। जो शवको ले जाता है अथवा दाह - संस्कार करता है, वह कटोदक - क्रिया करके कृच्छ्रसान्तपन व्रत करे। छोटे दोषको दूर करनेके लिये छोटा और बड़े दोषको दूर करनेके लिये बड़ा प्रायश्चित्त करना चाहिये।

गरुडने कहा - हे प्रभो! कृच्छ्र, तप्तकृच्छ्र तथा सान्तपन - ये जो तीन प्रायश्चित्त व्रत आपने बताये हैं; इन तीनोंके लक्षणोंको भी मुझे बतानेकी कृपा करें।

भगवान्‌ श्रीकृष्णने कहा - हे गरुड! तीन दिन प्रातःकाल, तीन दिन सायंकाल, तीन दिन अयाचित हविष्यान्नका आहार और तीन दिनका उपवास क्रमशः जिस व्रतमें किया जाता है, वह ‘कृच्छ्रव्रत’ कहलाता हैं।

(श्लोक त्र्यहं प्रातसत्र्यहं सायं त्र्यहमद्यादयाचितम्‌।

उपवाससत्र्यहञ्चैव एष कृच्छ्र उदाहत:॥)

जिस व्रतमें क्रमश: एक दिन गरम दूध, दूसरे दिन गरम घी तथा तीसरे दिन गरम जल पानकर चौथे दिन एक रात्रिका उपवास किया जाता है, उसका नाम ‘तप्तकृच्छ्र’ व्रत है।

(तप्कक्षीरघृताम्बूनामेकैकं प्रत्यहं पिबेत्‌।

एकरात्रोपवासश्च तप्तकृच्छ्र उदाहत:॥)

जब गोमूत्र, गोमय, गोदधि, गोदुग्ध और कुशोदक - इन पाँच पदार्थोंको क्रमश: एक - एक दिन पान करके पुनः कृच्छ्रव्रतका उपवास किया जाता है तो उसको ‘सान्तपनव्रत’ कहा जाता है।

(गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधिसर्पि:कुशोदकम्‌।

जगध्वा परेऽह्नयुपवसेत्कृच्छ्रं सान्तपनं चरन्॥)

हे पक्षिन्‌! पापी व्यक्तिके मरनेपर कौन - सी क्रिया करनी चाहिये, यह मैंने तुम्हें बता दिया है। पुत्तलदाहमें (पुत्तलके हृदयपर रखा) जलता हुआ दीपक जब बुझ जाय तो उस समय उसकी मृत्यु समझनी चाहिये। तदनन्तर अग्निदाह करे और तीन दिनका सूतक करे। दशाह और गर्तपिण्ड करना चाहिये। इस विधिका सम्यक्‌ पालन करनेसे प्रेत मुक्ति प्राप्त करता है। यदि किसीके मरणका भ्रम होनेसे उसकी प्रतिकृतिका दाह - संस्कार हो जाय और वह मनुष्य उसके बाद आ जाय तो उसे ले जाकर घृतकुण्डमें स्नान कराना चाहिये। तदनन्तर जातकर्मादि संस्कार पुन: किये जायं। ऐसे पुरुषको अपनी विवाहिता पत्नीसे विधिवत्‌ पुनर्विवाह कर लेना चाहिये। हे खग। यदि विदेशमें गये किसी व्यक्तिको पंद्रह अथवा बारह वर्ष बीत गये हों और उसका इस अवधिके बीच कोई समाचार नहीं प्राप्त होता है तो उसकी प्रतिकृति बनाकर उसका दाह - संस्कार कर डालना चाहिये।

हे गरुड ! रजस्वला और सूतिका स्त्रीके मरनेपर कौन - सा विशेष कर्म करना धर्मसम्मत है, अब उसको तुम सुनो - सूतिका स्त्रीकी मृत्यु होनेपर याज्ञिकजन कुम्भमें जल और पञ्चगव्य लाकर पुण्यजनित मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित करके उससे स्वयंको शुद्ध करे। उसके बाद सौ शूपजलसे विधिपूर्वक शवको स्नान कराके पुन: उसको पञ्चगव्यसे स्नान कराये। फिर कपड़ेसे बनायी गयी आकृतिके साथ यथाविधि जला देना चाहिये। पञ्चककालमें मृत्यु होनेपर दाह - संस्कारकी विधि क्या है? उसको मैं कहता हूँ, तुम सुनो - है खगेश! मासके प्रारम्भमें धनिष्ठा नक्षत्रके अर्धभागसे लेकर रेवती नक्षत्रतक पञ्चककाल होता है। इसको सदैव दोषपूर्ण एवं अशुभ मानना चाहिये। इस कालमें मरे हुए व्यक्तिका दाह - संस्कार करना उचित नहीं है। यह काल सभी प्राणियोंमें दु:ख उत्पन्न करनेवाला है। ऐसे दिनोंमें मृत्युको प्राप्त होनेवाले लोगोंको जलतक नहीं देना चाहिये, क्योंकि ऐसा करनेसे सर्वदा अशुभ होता है। अत: पञ्चककालके समाप्त होनेपर ही मृतकके सभी कर्म करने चाहिये अन्यथा पुत्र और सगोत्रके लिये कष्ट ही होता है। इन नक्षत्रोंमें मृतकका दाह - संस्कार करनेपर घरमें किसी - न - किसी प्रकारकी हानि होती है।

हे गरुड! इन नक्षत्रोंके मध्यमें मनुष्योंका दाह - संस्कार आहुति प्रदान करके विधिपूर्वक किया जा सकता है। सुयोग्य ब्राह्मणोंको वैदिक मन्त्रोंके द्वारा विधिपूर्वक उसका संस्कार करना चाहिये। अत: शवस्थानके समीपमें कुशसे चार पुत्तलक बनाकर नक्षत्र मन्त्रोंसे उनको अभिमन्त्रित करके रख दे। तदनन्तर उन्हीं पुत्तलकोंके साथ मृतकका दाह-संस्कार करे। अशौचके समाप्त हो जानेपर मृतकके पुत्रोंदूारा शान्ति एवं पौष्टिक कर्म भी होना चाहिये।

जो मनुष्य इन पञ्चक नक्षत्रोंमें मर जाता है,उसको सद्गतिकी प्राप्ति नहीं होती। अतएव मृतकके पुत्रोंको उसके कल्याणहेतु तिल, गौ, सुवर्ण और घीका दान देना चाहिये। समस्त विघ्नोंका विनाश करनेके लिये ब्राह्मणोंको भोजन, पादुका, छत्र, सुवर्णमुद्रा तथा वस्त्र देना चाहिये। यह दान मृतकके समस्त पापोंका विनाशक है और ब्राह्मणोंको दक्षिणा देनी चाहिये, इससे समस्त पापोंका विनाश होता है।