35 - सपिण्डीकरण - श्राद्धमें प्रेतपिण्डके मेलनका विधान, पितरोंकी प्रसन्‍नताका फल, पञ्चक - मरण तथा शान्तिविधान, पुत्तलिकादाह, प्रेतश्राद्धमें त्याज्य अठारह पदार्थ, मलिनषोडशी, मध्यमषोडशी तथा उत्तमषोडशी श्राद्ध, शवयात्रा - विधान

तार्क्ष्यने कहा - हे जनार्दन! अब मुझे दूसरा संदेह उत्पन्न हो गया है। यदि किसी भी पुरुषकी माताका देहावसान हो गया है, किंतु उसकी पितामही, प्रपितामही, वृद्धप्रपितामही जीवित है और यदि पिता भी जीवित हो, मातामह, प्रमातामह एवं वृद्धप्रमातामह भी जीवित हों तो उस माताका सपिण्डन किसके साथ किया जायगा? हे प्रभो! इसको बतानेकी कृपा करें।

श्रीकृष्णने कहा - हे पक्षिन्‌! पूर्वमें कहे गये सपिण्डीकरण विधानको मैं पुन: कह रहा हूँ। यदि माताके उपर्युक्त सभी सम्बन्धी जीवित हैं तो माताके पिण्डका सम्मेलन उमा, लक्ष्मी तथा सावित्रीके साथ कर देना चाहिये। इस संसारमें तीन पुरुष पिण्डका भोग करनेवाले हैं, तीन पुरुष त्याजक हैं, तीन पुरुष पिण्डानुलेप और दसवाँ पुरुष पंक्तिसंनिध होता है। पिता तथा माताके कुलमें इन्हीं पुरुषोंकी प्रसिद्धि होती है। यजमान अपनेसे पूर्व दस पुरुषों एवं अपनेसे बादके दस पुरुषोंका उद्धार कर सकता है। पहले जो तीन पुरुष बताये गये हैं अर्थात्‌ पिता, पितामह तथा प्रपितामह - ये सपिण्डीकरण करनेपर सपिण्ड माने गये हैं। जो प्रपितामहके पूर्व वृद्धप्रपितामह और उनसे दो पूर्व पुरुष हैं, उन्हें त्याजक रूपमें स्वीकार करना चाहिये। इस अन्तिम त्याजक पुरुषके बाद जो पुरुष होता है, वह प्रथम लेपक होता है, उसके पूर्वमें जो अन्य दो पुरुष होते हैं, उन्हें भी उसी लेपककी कोटिमें समझना चाहिये। इस कोटिके तीसरे पुरुषके पूर्व जो पुरुष होता है, वह पंक्तिसंनिध है। इस प्रकार दस पूर्व पुरुषोंके बाद स्वयं यजमान एक पुरुष है। भविष्यमें जो यथाक्रम दस पुरुष होते हैं, उन सभीको मिलाकर पितरोंकी संख्या इक्कीस होती है।

इस संसारमें विधिपूर्वक जो मनुष्य उक्त श्रेष्ठतम श्राद्ध करता है, उसमें कर्ताकी ओरसे कोई संदेहकी स्थिति नहीं रह जाती है तो उसका जो फल होता है, उसे भी तुम सुनो।

हे खगेश! पिता प्रसन्न होकर पुत्रोंको संतान प्रदान करता है, जिससे उनकी वंश - परम्परा अविच्छिन्न होती है। श्राद्धकर्ताका प्रपितामह प्रसन्न हो करके स्वर्णदाता हो जाता है। वृद्ध प्रपितामह प्रसन्न होकर श्राद्ध कर्ताको विपुल अन्नादि प्रदान करते हैं। श्राद्धके जो ये फल हैं, ये ही पितरोंके तर्पणसे भी प्राप्त होते हैं। हे पक्षिन्‌! इस मर्त्यलोकमें जिस पुरुषकी संतान - परम्परा नष्ट हो जाती है, वह मृत्युके बाद उसी प्रकार नरक लोकमें वास करता है, जिस प्रकार कीचड़में फँसा हुआ हाथी होता है ।(नरक - भोग प्राप्त करनेके बाद) वह प्राणी वृक्ष अथवा सरीसृप - योनिमें जन्म लेता है। वह उस नरकसे बिना संतानके निश्चित ही मुक्त नहीं होता है। अत: संतान विहीन मरे हुए प्राणीके लिये आचार्य, शिष्य अथवा दूरके सगोत्री (अबान्धव) - को उसके उद्देश्यसे भक्तिपूर्वक ‘नारायणबलि’ कर देनी चाहिये। उस कृत्यसे पाप विमुक्त होकर वह विशुद्धात्मा निश्चित ही नरकसे छुटकारा पा जाता है और स्वर्गमें जाकर वास करता है। इसमें कुछ विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है।

धनिष्ठासे लेकर रेवती पर्यन्त जो पाँच नक्षत्र हैं, ये सभी सदैव अशुभ होते हैं। उन नक्षत्रोंमें ब्राह्मण आदि समस्त जातियोंका दाह - संस्कार या बलिकर्म नहीं करना चाहिये। इन नक्षत्रोंमें मृत प्राणीके लिये जल भी प्रदान करना उचित नहीं है, ऐसा करनेसे वह अशुभ हो जाता है। दुःखार्त (मृत) स्वजन हों तो भी इस कालमें लोक (शव) - यात्रा नहीं करनी चाहिये। स्वजनको पञ्चककी शान्तिके बाद ही मृतका सब संस्कार करना चाहिये, अन्यथा पुत्र और सगोत्रियोंको उस अशुभ पञ्चकके कुप्रभावसे दुःख ही झेलना पड़ता है। जो मनुष्य इन नक्षत्रोंमें मृत्यु प्राप्त करता है, उसके घरमें हानि होती है।

इस पञ्चककी अवधिमें जो प्राणी मर जाता है, उसका दाह - संस्कार तत्सम्बन्धित नक्षत्रके मन्त्रसे आहुति प्रदान करके नक्षत्रके मध्यकालमें भी किया जा सकता है। सद्यः की गयी आहुति पुण्यदायिनी होती है; तीर्थमें किया गया दाह उत्तम होता है। ब्राह्मणोंको नियमपूर्वक यह कार्य मन्त्रसहित विधिपूर्वक करना चाहिये। वे यथाविधि अभिमन्त्रित कुशकी चार पुत्तलिकाओंको बना करके शवके समीपमें रख दें। उसके बाद उन पुत्तलिकाओंके सहित उस शवका दाह - संस्कार करें। तदनन्तर सूतकके समाप्त होनेपर पुत्रको शान्तिकर्म भी करना चाहिये।

जो मनुष्य इन धनिष्ठादि पाँच नक्षत्रोंमें मरता है, उसको उत्तम गति नहीं प्राप्त होती है। अतएव उसके उद्देश्यसे तिल, गौ, सुवर्ण और घृतका दान विप्रोंको देना चाहिये। ऐसा करनेसे सभी प्रकारके उपद्रवोंका विनाश हो जाता है। अशौचके समाप्त होनेपर मृत प्राणी अपने सत्पुत्रोंसे सद्गति प्राप्त करता है। जो पात्र, पादुका, छत्र, स्वर्ण - मुद्रा, वस्त्र तथा दक्षिणा ब्राह्मणको दी जाती है, वह सभी पापोंको दूर करने वाली है। पञ्चकमें मरे हुए बाल, युवा और वृद्ध प्राणियोंका और्ध्वदेहिक संस्कार प्रायश्चित्त पूर्वक जो मनुष्य नहीं करता है, उसके लिये नाना प्रकारका विघ्न जन्म लेता है।

प्रेतश्राद्धमें अठारह वस्तुएँ त्याज्य होती हैं। यथा - आशीर्वाद, द्विगुण कुश (मोटक), प्रणवका उच्चारण, एकसे अधिक पिण्डदान, अग्नौकरण, उच्चिष्ट श्राद्ध, वैश्वदेवार्चन, विकिरदान, स्वधाका उच्चारण और पितृशब्दोच्चार नहीं करना चाहिये। (किन्हीं आचार्योंके मतमें मृत व्यक्तिके अनन्तर उनके अनुयायियोंको ‘ये च त्वामनुगच्छन्ति तेभ्यश्व०’-ऐसा उच्चारण करके पिण्ड शेषान्न पिण्डके समीपमें दिया जाता है, वह प्रेत - श्राद्धमें नहीं करना चाहिये।) इस श्राद्धमें ‘अनु’ शब्दका प्रयोग, आवाहन तथा उल्मुख वर्जित है। आसीमान्तेगमन, (श्राद्धमें ब्राह्मप - भोजन करानेके अनन्तर ब्राह्मणके पीछे - पीछे गाँवकी सीमातक जाकर उनकी प्रदक्षिणा करके उनका विसर्जन किया जाता है। यह आसीमान्तगमन प्रेत - श्राद्धमें नहीं करना चाहिये।) विसर्जन, प्रदक्षिणा, तिल - होम और पूर्णाहुति तथा बलिवैश्वदेव भी नहीं करना चाहिये। यदि कर्ता ऐसा करता है तो उसे अधोगति प्राप्त होती हैं।

(अष्टादशैव वस्तूनि प्रेतश्राद्धे विवर्जयेत्‌।

आशिषो द्विगुणान्‌ दर्भान्‌ प्रणवान्‌ नैकपिण्डताम्‌॥

अग्नौकरणमुच्छिष्टं श्राद्धं वै वैश्वदैविकम्‌।

विकिरं च स्वधाकारं पितृशब्दं न चोच्चरेत्‌॥

अनुशब्दं न कुर्वीत नावाहनमथोल्मुकम्‌।

आसीमान्तं न कुर्वीत प्रदक्षिणविसर्जनम्‌॥

न कुर्यात्‌ तिलहोमं च द्विज: पूर्णाहुतिं तथा।

न कुर्याद्वैश्वदेवं चेत्कर्ता गच्छत्यधोगतिम्‌॥)

प्रथम षोडशीको मलिन - श्राद्धके नामसे अभिहित किया जाता है। यथा - मृत्युस्थान, द्वार, अर्धमार्ग, चितामें, (श्मशानवासी प्राणियों एवं पड़ोसियोंके उद्देश्ससे) शवके हाथमें तथा छठा श्राद्ध अस्थि - संचय - कालमें होता है। उसके बाद दस पिण्ड - श्राद्ध जो प्रतिदिन एक - एक करके दस दिन किये जाते हैं, वे भी मलिन - श्राद्धकी कोटियें आते हैं। इस प्रकार इन्हें प्रथम षोडश श्राद्ध कहा गया है। हे तार्क्ष्य! अन्य मध्यम या द्वितीय षोडशीको भी तुम मुझसे सुनो ।

इन षोडश श्राद्धोंकी क्रियामें सबसे पहले विधिवत्‌ एकादश श्राद्ध करना चाहिये । उसके बाद ब्रह्मा, विष्णु, शिव, यम और तत्पुरुषके नामसे पाँच श्राद्ध हों, ऐसा तत्त्वचिन्तकोंने कहा है। हे खगेश! इन षोडश श्राद्धोंके बाद प्रतिमास एक श्राद्धके अनुसार बारह श्राद्ध, ग्यारहवें मासमें ऊनाब्दिक श्राद्ध, त्रिपाक्षिक श्राद्ध, ऊनमासिक और ऊनषाण्मासिक श्राद्ध करनेका विधान है। शव - शोधनके लिये आद्य श्राद्ध करके तथा अन्य त्रिषोडश श्राद्ध करके पितृ पंक्तिकी विशुद्धिके लिये पचासतवें श्राद्धसे मिलाना चाहिये। जिसका पचासवाँ श्राद्ध नहीं किया गया है, वह पितृपंक्तिमें मिलने योग्य नहीं है। उक्त त्रिषोडश अर्थात्‌ अड़तालीस श्राद्धोंसे मृत प्राणीके प्रेतत्वका विनाश होता है। उनचास श्राद्ध हो जानेपर पंक्तिसंनिध (पितृगणोंका सामीप्य) प्राणीको मिल जाता है। पचासवें श्राद्धसे पितृके साथ संधि - मेलन करना चाहिये।

अब शव - विधि बतायी जाती है। शव - यात्रा प्रारम्भ करनेके पूर्व बनायी गयी पालकीमें शवके हाथ - पैर बाँध देना चाहिये। यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो वह पिशाच - योनियोंके हाथ पहुँच जाता है। शवको अकेला नहीं छोड़ना चाहिये। यदि उसको अकेला छोड़ दिया जाता है तो दुष्ट योनियोंके स्पर्शसे उसकी दुर्गति होती है। गाँवके मध्य शव विद्यमान है - ऐसा सुननेके बाद इच्छानुसार यदि भोजन कर लिया जाता है तो उस अन्न और जलको क्रमश: मांस तथा रक्त समझना चाहिये। गाँवके बीच शवके रहनेपर ताम्बूल - सेवन, दन्‍तधावन, भोजन, स्त्री - सहवास तथा पिण्डदान त्याज्य हैं। स्नान, दान, जप, होम, तर्पण और देव पूजनका कार्य करना भी व्यर्थ ही हो जाता है।

हे पक्षिराज! बन्धु - बान्धव और सगे - सम्बन्धियोंके लिये मृतकालमें ऐसा ही उपर्युक्त व्यवहार अपेक्षित है। इस धर्मके त्यागनेसे प्रेत पाप - संलिप्त हो जाता है।