20 - प्रेतबाधाका स्वरूप तथा मुक्तिके उपाय

श्री गरुड़ने कहा - हे प्रभो! प्रेतयोनिमें जो कोई भी प्राणी जाते हैं, वे कहाँ वास करते हैं? प्रेतलोकसे निकलकर वे कैसे और किस स्थानमें चले जाते हैं? चौरासी लाख योनियोंसे परिव्याप्त, यम तथा हजारों भूतोंसे रक्षित होनेपर भी प्राणी नरकसे निकलकर कैसे इस संसारमें विचरण करते हैं? इसे आप बतानेकी कृपा करें।

श्री कृष्णने कहा - हे पक्षिराज! जहाँ प्रेतगण निवास करते हैं, उसको तुम सुनो। छलसे पराये धन और परायी स्त्रीका अपहरण तथा द्रोहसे मनुष्य निशाचर - योनिको प्राप्त होते हैं। जो लोग अपने पुत्रके हितचिन्तनमें ही अनुरक्त रहते हैं तथा सभी प्रकारका पाप करते हैं, वे शरीर रहित होकर भूख - प्यासकी अथाह पीड़ाको सहन करते हुए यत्र - तत्र भटकते रहते हैं। वे प्रेत चोरके समान उस महापथके लिये पितृ भागमें दिये गये जलका अपहरण करते हैं। तदनन्तर पुनः अपने घरमें आकर वे मित्रके रूपमें प्रविष्ट हो जाते हैं और वहींपर रहते हुए स्वयं रोग - शोक आदिकी पीड़ासे ग्रसित होकर सब कुछ देखते रहते हैं। वे एक दिनका अन्तराल देकर आनेवाले ज्वरका रूप धारण करके अपने सम्बन्धियोंकों पीड़ा पहुँचाते हैं अथवा तिजरिया ज्वर बनकर और शीत - वातादिसे उन्हें कष्ट देते हैं। उच्छिष्ट अर्थात्‌ जूठे अपवित्र स्थानोंमें निवास करते हुए उन प्रेतोंके द्वारा सदैव अभिलक्षित प्राणियोंको कष्ट देनेके लिये शिरोवेदना, विषूचिका तथा नाना प्रकारके अन्य बहुत - से रोगोंका रूप धारण कर लिया जाता है। इस प्रकार वे दुष्कर्मी प्रेत नाना दोषोंमें प्रवृत्त होते हैं।

गरुडने कहा - हे प्रभो! वे प्रेत किस रूपसे किसका क्या करते हैं? किस विधिसे उनकी जानकारी प्राप्त की जा सकती है? क्‍योंकि वे न कुछ कहते हैं, न बोलते हैं? हे हृषीकेश! यदि आप मेरा कल्याण चाहते हों तो मेरे मनके इस व्यामोहको दूर कर दें। इस कलिकालमें प्राय: बहुत - से लोग प्रेतयोनिको ही प्राप्त होते हैं।

श्री विष्णुने कहा - हे गरुड! प्रेत होकर प्राणी अपने ही कुलको पीड़ित करता है, वह दूसरे कुलके व्यक्तिको तो कोई आपराधिक छिद्र प्राप्त होनेपर ही पीड़ा देता है। जीते हुए तो वह प्रेमीकी तरह दिखायी देता है, किंतु मृत्यु होनेपर वही दुष्ट बन जाता है। जो भगवान्‌ श्रीरुद्रके मन्त्रका जप करता है, धर्ममें अनुरक्त रहता है, देवता और अतिथिकी पूजा करता है, सत्य तथा प्रिय बोलनेवाला है, उसको प्रेत पीड़ा नहीं दे पाते हैं। जो व्यक्ति सभी प्रकारकी धार्मिक क्रियाओंसे परिभ्रष्ट हो गया है, नास्तिक है, धर्मकी निन्‍दा करनेवाला है और सदैव असत्य बोलता है, उसीको प्रेत कष्ट पहुँचाते हैं।

(रुद्रजापी धर्मरतो देवतातिथिपूजक:।

सत्यवाक्‌ प्रियवादी च न प्रेत: स हि पीड्यते॥

सर्वक्रियापरिभ्रष्टो नास्तिको धर्मनिन्दकः।

असत्यवादनिरतो नर: प्रेतै: स पीड्यते॥)

हे तार्क्ष्य! कलिकालमें अपवित्र क्रियाओंको करनेवाला प्राणी प्रेतयोनिको प्राप्त होता है। हे काश्यप! इस संसारमें उत्पन्न एक ही माता - पितासे पैदा हुए बहुत - से संतानोंमें एक सुखका उपभोग करता है, एक पाप कर्ममें अनुरक्त रहता है, एक संतानवान्‌ होता है, एक प्रेतसे पीड़ित रहता है और एक पुत्र धनधान्यसे सम्पन्न रहता है, एकका पुत्र मर जाता है, एकके मात्र पुत्रियाँ ही होती हैं। प्रेतदोषके कारण बन्धु - बान्धवोंके साथ विरोध होता है। प्रेतयोनिके प्रभावसे मनुष्यको संतान नहीं होती है। यदि संतान उत्पन्न भी होती है तो वह मर जाती है। प्रेतबाधाके कारण तो व्यक्ति पशुहीन और धनहीन हो जाता है। उसके कुप्रभावसे उसकी प्रकृतिमें परिवर्तन आ जाता है, वह अपने बन्धु - बान्धवोंसे शत्रुता रखने लगता है। अचानक प्राणीको जो दुःख प्राप्त होता है, वह प्रेतबाधाके कारण होता है। नास्तिकता, जीवन - वृत्तिकी समाप्ति, अत्यन्त लोभ तथा प्रतिदिन होनेवाले कलह - यह प्रेतसे पैदा होनेवाली पीड़ा है। जो पुरुष माता - पिताकी हत्या करता है, जो देवता और ब्राह्मणोंकी निन्‍दा करता है, उसे हत्याका दोष लगता है। यह पीड़ा प्रेतसे पैदा होती है। नित्य - कर्मसे दूर, जप - होमसे रहित और पराये धनका अपहरण करनेवाला मनुष्य दुःखी रहता है, इन दुःखोंका कारण भी प्रेतबाधा ही है। अच्छी वर्षा होनेपर भी कृषिका नाश होता है, व्यवहार नष्ट हो जाता है, समाजमें कलह उत्पन्न होता है, ये सभी कष्ट प्रेतबाधासे ही होते हैं। हे पक्षिराज! मार्गमें चलते हुए पथिकको जो बवंडरसे पीड़ा होती है, उसको भी तुम्हें प्रेतबाधा समझना चाहिये। यह बात मैं सत्य ही कह रहा हूँ।

प्राणी जो नीच जातिसे सम्बन्ध रखता है, हीन कर्म करता है और अधर्ममें नित्य अनुरक्त रहता है, वह प्रेतसे उत्पन्न पीड़ा है। व्यसनोंसे द्रव्यका नाश हो जाता है, प्राप्तत्यका विनाश हो जाता है। चोर, अग्नि और राजासे जो हानि होती है, यह प्रेतसम्भूत पीड़ा है। शरीरमें महा भयंकर रोगकी उत्पत्ति, बालकोंकी पीड़ा तथा पत्नीका पीड़ित होना - ये सब प्रेत बाधाजनित हैं। वेद, स्मृति - पुराण एवं धर्म शास्त्रके नियमोंका पालन करनेवाले परिवारमें जन्म होनेपर भी धर्मके प्रति प्राणीके अन्त:करणमें प्रेमका न होना प्रेतजनित बाधा ही है। जो मनुष्य प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूपसे देवता, तीर्थ और ब्राह्मणकी निन्‍दा करता है, यह भी प्रेतोत्पन्न पीड़ा है। अपनी जीविकाका अपहरण, प्रतिष्ठा तथा वंशका विनाश भी प्रेतबाधाके अतिरिक्त अन्य प्रकारसे सम्भव नहीं है। स्त्रियोंका गर्भ विनष्ट हो जाता है, जिनमें रजोदर्शन नहीं होता और बालकोंकी मृत्यु हो जाती है, वहाँ प्रेतजन्य बाधा ही समझनी चाहिये। जो मनुष्य शुद्ध भावसे सांवत्सरादिक श्राद्ध नहीं करता है, वह भी प्रेतबाधा है। तीर्थमें जाकर दूसरेमें आसक्त हुआ प्राणी जब अपने सत्कर्मका परित्याग कर दे तथा धर्मकार्यमें स्वार्जित धनका उपयोग न करे तो उसको भी प्रेतजन्य पीड़ा ही समझना चाहिये। भोजन करनेके समय कोपयुक्त पति - पत्नीके बीच कलह, दूसरोंसे शत्रुता रखनेवाली बुद्धि - यह सब प्रेत - सम्भूत पीड़ा है। जहाँ पुष्प और फल नहीं दिखायी देते तथा पत्नीका विरह होता है, वहाँ भी प्रेतोत्पन्न पीड़ा है।

जिन लोगोंमें सदैव उच्चाटनके अत्यधिक चिह्न दिखायी देते हैं, अपने क्षेत्रमें उसका तेज निष्फल हो जाता है तो उसे प्रेतजनित बाधा ही माननी चाहिये। जो व्यक्ति सगोत्रीका विनाशक है, जो अपने ही पुत्रको शत्रुके समान मार डालता है, जिसके अन्तःकरणमें प्रेम और सुखकी अनुभूतियोंका अभाव रहता है, वह दोष उस प्राणीमें प्रेतबाधाके कारण होता है। पिताके आदेशकी अवहेलना, अपनी पत्नीके साथ रहकर भी सुखोपभोग न कर पाना, व्यग्रता और क्रूर बुद्धि भी प्रेतजन्य बाधाके कारण होती है।

हे तार्क्ष्य! निषिद्ध कर्म, दुष्ट - संसर्ग तथा वृषोत्सर्गके न होने और अविधिपूर्वक की गयी और्ध्वदैहिक क्रियासे प्रेत होता है। अकाल मृत्यु या दाह - संस्कारसे वञ्चित होनेपर प्रेतयोनि प्राप्त होती है, जिससे प्राणीको दुःख झेलना पड़ता है। हे पक्षिराज! ऐसा जानकर मनुष्य प्रेत - मुक्तिका सम्यक्‌ आचरण करे। जो व्यक्ति प्रेत योनियोंको नहीं मानता है, वह स्वयं प्रेत योनिको प्राप्त होता है। जिसके वंशमें प्रेत - दोष रहता है, उसके लिये इस संसारमें सुख नहीं है। प्रेतबाधा होनेपर मनुष्यकी मति, प्रीति, रति, लक्ष्मी और बुद्धि - इन पाँचोंका विनाश होता है। तीसरी या पाँचवीं पीढ़ीमें प्रेत बाधाग्रस्त कुलका विनाश हो जाता है। ऐसे वंशका प्राणी जन्म - जन्मान्तर दरिद्र, निर्धन और पापकर्ममें अनुरक्त रहता है। विकृत मुख तथा नेत्रवाले, क्रुद्ध स्वभाव वाले, अपने गोत्र, पुत्र - पुत्री, पिता, भाई, भौजाई अथवा बहूको नहीं माननेवाले लोग भी विधिवश प्रेत - शरीर धारण कर सदगतिसे रहित हो ‘बड़ा कष्ट है’, यह चिल्लाते हुए अपने पापको स्मरण करते हैं।