गरुड महा पुराणम् - प्रेत खंड
14 - और्ध्वदैहिक क्रिया, गोदान एवं वृषोत्सर्गका माहात्म्य
गरुडने कहा - हे विभो! मृत्युको प्राप्त कर रहे दुःखित व्यक्तिके द्वारा जो दान दिया जाता है, उसका क्या फल है? स्वस्थ अवस्थामें और विधिहीन जो दान दिया जाता है, उसका क्या फल है?
श्रीकृष्णने कहा - हे पक्षिश्रेष्ठ। स्वस्थ चित्तवाले मनुष्यके द्वारा दानमें दी गयी एक गौ, रोगी पुरुषके द्वारा दानमें दी गयी एक सौ गाय, मर रहे प्राणीके द्वारा दानमें धनको छोड़कर दी गयी हजार गाय तथा व्यक्तिके मर जानेपर विधिवत पुत्र - पौत्रादिके द्वारा दानमें दी गयी एक लाख गायोंके बराबर होती है।
तीर्थ एवं पात्रके समायोगसे यथाविधि एक ही गोदान कर दिया जाय तो वह अकेली गौ दाताको एक लाख गोदानका पुण्य प्रदान करती है।
हे खगराज! सत्पात्रको दिया गया दान दिन - दिन बढ़ता है। दाताके दिये हुए दानको यदि ज्ञानी ग्रहण करता है तो उसे पाप नहीं लगता। विष और शीतका अपहरण करनेवाले मन्त्र और अग्नि क्या दोषभाजन होते हैं? अतः प्रतिदिन सत्पात्रको विशेष उद्देश्योंकी पूर्तिके लिये दान देना चाहिये।
अपने कल्याणकी इच्छा करनेवाले व्यक्तिको अपात्रको कुछ भी नहीं देना चाहिये। यदि कदाचित् अपात्रके लिये गौका दान दिया जाता है तो वह दाताको नरकमें ले जाता है और अपात्र ग्रहीताको इक्कीस पीढ़ियोंक सहित नरकमें ढकेल देता है।
हे खगेश! जिस प्रकारसे अपने हाथसे भूमिमें निवेश किया गया धन मनुष्यके आवश्यकतानुसार वह जब चाहे काममें आ सकता है, उसी प्रकार अपने हाथसे किया गया दान भी देहान्तरमें प्राप्त होता है। निर्धन होनेके बाद भी अपुत्र व्यक्तिको मोक्षकी कामनासे अपनी और्ध्वदैहिक क्रिया अवश्य कर लेनी चाहिये। थोड़े धनसे भी अपने हाथसे की गयी अपनी और्ध्वदैहिक क्रिया उसी प्रकारसे अक्षय फल देनेवाली होती है, जिस प्रकार अग्निमें डाली हुई आज्याहुति। दान लेनेके योग्य व्यक्तिको ही शय्या, कन्या एवं गौका दान देना चाहिये और यह भी ध्यान रखना चाहिये कि दो शय्याएँ एकको न दी जायाँ, दो कन्याएँ एकको न दी जायूँ तथा दो गायें भी एकको न दी जायाँ। इसका आशय यह है कि भलीभाँति गोपालनमें समर्थ,
गोपालनके प्रति आस्थावान् तथा दान लेने योग्य प्रतिग्रहीताको ही गोदान करना चाहिये। इसके अतिरिक्त यह भी विशेषरूपमें ज्ञातव्य है कि दो दान लेने योग्य व्यक्तियोंको भी एक गौ कदापि न दी जाय; क्योंकि यदि वह किसीके हाथ बेची जाती है अथवा उसका किन्हीं दो या दोसे अधिक लोगोंके बीच विभाजन होता है तो ऐसा करनेवाले मनुष्यको सात पीढ़ियोंके सहित वह दान जला देता है। अत: इस नश्वर जीवनमें समस्त और्ध्वदैहिक कर्म स्वयं सम्पन्न कर लेना चाहिये। पाथेयके रूपमें दिये गये दानादिको प्राप्त करके प्राणी उस महाप्रयाणके मार्गमें सुखपूर्वक जाता है, अन्यथा पाथेयरहित जीवात्मा अनेक प्रकारका कष्ट झेलता है। ऐसा जानकर मनुष्य विधिवत् वृषोत्सर्ग करे। जो पुत्रहीन वृषोत्सर्ग किये बिना ही मर जाता है, उसे मुक्ति नहीं प्राप्त होती है। अत: पुत्रविहीन मनुष्य इस धर्मका पालन विधिवत् करे। ऐसा करनेसे यमके उस महापथमें वह सुखपूर्वक गमन करता है। अग्निहोत्र, विभिन्न प्रकारके यज्ञ और दानादिसे प्राणीको वह सद्गति नहीं प्राप्त होती है, जो गति वृषोत्सर्गसे प्राप्त होती है। समस्त यज्ञोंमें वृषोत्सर्ग यज्ञ श्रेष्ठटम है, इसलिये प्रयास करके मनुष्यको भलीभाँति वृषोत्सर्ग सम्पन्न करना चाहिये।
गरुडने कहा - हे गोविन्द! आप मुझे क्षयाह और और्ध्वदैहिक क्रियाके विषयमें उपदेश दें कि इस क्रियाको किस काल, किस तिथि और किस प्रकारकी विधिसे सम्पन्न करना चाहिये। इसको करके मनुष्य क्या फल प्राप्त करता है, इसे भी आप मुझे बतायें। हे गोविन्द! आपकी कृपासे तो प्राणी मुक्त हो जाता है।
श्रीकृष्णने कहा - हे पक्षिन्! कार्तिक आदि मासमें सूर्यके दक्षिणायन हो जानेपर शुक्लपक्षकी ट्वादशी आदि शुभ तिथियोंमें, शुभ लग्न और मुहूर्तमें तथा पवित्र देशमें समाहितचित्त होकर विधिज्ञ, शुभ लक्षणोंसे युक्त सत्पात्र ब्राह्मणको बुलाकर जप, होम तथा दानसे अपने शरीरका सर्वप्रथम शोधन करे। उसके बाद वह अभिजित् नक्षत्रमें ग्रहों और देवताओंकी विधिवत् पूजा करके विभिन्न वैदिक मन्त्रोंसे यथाशक्ति अग्निमें आहुति प्रदान करे। हे खगेश्वर! तदनन्तर ग्रहस्थापन - कार्य करके मातृका - पूजनका कार्य करना चाहिये। तत्पश्चात् वह वसुधारा हवन सम्पन्न करे। अग्नि - स्थापन करके पूर्णाहुतिका कार्य करे। इसके बाद शालग्रामको स्थापित कर वैष्णव श्राद्ध करे। वस्त्राभूषणोंसे वृषको सुसज्जित करके उसकी विधिवत् पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर पहले चार बछियोंको सुगन्धित पदार्थोंसे सुवासित करे। वस्त्र और अलंकारसे विभूषित कर उन्हें उस यज्ञमें वृषके साथ स्थान दे। उसके बाद उनकी प्रदक्षिणा एवं होम करके अन्तमें विसर्जन करे। तत्पश्चात् उत्तराभिमुख होकर इस मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये -
धर्म त्वं वृषरूपेण ब्रह्मणा निर्मितः पुरा॥
तवोत्सर्गप्रभावान्मामुद्धरस्व भवार्णवात्।
‘हे धर्म! पुराकालमें ब्रह्माने आपको वृषके रूपमें निर्मित किया है। आपके उत्सर्गके प्रभावसे मेरा भवसागरसे उद्धार हो।’
इसके बाद पवित्र करनेवाले शुभ मन्त्रोंसे विधिपूर्वक वृषको अभिषिक्त करके ‘तेन क्रीडन्ति०’ इस मन्त्रसे वृषोत्सर्ग करे। पुन: रुद्र नामक कुम्भके जलसे उस नील वृषका अभिषेक करना चाहिये। उसके बाद उस नील वृषके नाभिभागमें घटको स्पर्श करके वह जल अपने सिरपर भी डालना चाहिये। हे पक्षिराज! तदनन्तर अन्नश्राद्ध कर द्विजोत्तमको दान देना चाहिये। इन कार्योंको करके जलाशयपर पहुँचे और वहाँ जलाञ्जलि क्रिया करे। मनुष्यको अपने जीवनमें जो वस्तु प्रिय हो, उसका यथाशक्ति वहाँपर दान करना चाहिये। वृषोत्सर्ग करनेपर न्यूनता पूरी हो जाती है। मृत व्यक्ति इससे भलीभाँति तृत्त होकर यमलोकके कठिन मार्गमें सुखपूर्वक गमन करता है, इसमें संदेह नहीं है। सदैव दानादिकी क्रियाओंमें अनुरक्त मनुष्य यमलोकका टर्शनतक नहीं करते हैं। जबतक प्राणीका एकादशाह श्राद्ध नहीं किया जाता है, तबतक अपने द्वारा दिया गया दान अथवा दूसरेके हाथसे दिया गया दान न इस लोकमें प्राप्त होता है और न परलोकमें ही।
हे गरुड! श्रद्धाभावपूर्ण प्राणीको क्रमश: तेरह, सात, पाँच तथा तीन पद - दान करना चाहिये। अत: दाता पहले यथाक्रम सात एवं पाँच तिलपात्रोंका दान करे। वह ब्राह्मणोंकों भोजन कराकर उन्हें एक गौका दान भी दे। तत्पश्चात् ‘वृषं हि शं नो देवी०’ इस वेदमन्त्रसे यथाविधि चार बहछियोंके साथ वृषका विवाह करना चाहिये। तदनन्तर उसके शरीरमें बायीं ओर चक्र और दाहिनी ओर त्रिशूलका चिह्न अंकित करके और जिसको वृषदान किया गया है, उसको उसका मूल्य देकर विसर्जन कर दे।
बुद्धिमान् व्यक्तिको एकोदिष्ट विधानके अनुसार क्रमश: प्रयत्नपूर्वूक एकादशाह तथा द्वादशाह श्राद्ध करना चाहिये। सपिण्डीकरणके पहले घोडश श्राद्ध सम्पन्न करे। ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें पद - दान दे। उसके बाद ताम्रपात्रमें कार्पास (सूती) वस्त्रपर भगवान् विष्णुकी मूर्तिको स्थापित करे और वस्त्रसे आच्छादित करके शुभ फलसे अर्घ्य समर्पित करे। तत्पश्चात् ईंखके पेड़ोंसे नौकाका निर्माण करके रेशमी सूत्रसे उसको लपेट दिया जाय। बैतरणीके निमित्त कांस्यपात्रमें घृत रखकर नौकारोहणकी क्रिया हो और भगवान् गरुडध्वजकी पूजा करे। सामर्थ्यके अनुसार किया गया दान अनन्त फलोंको देनेवाला है। भगवान् जनार्दन इस संसार - सागरमें डूब रहे शोक - संतापसे दुःखित तथा धर्मरूपी नौकासे रहित जनोंके उद्धारक हैं।
हे ताक्षर्य! तिल, लौह, सुवर्ण, कार्पास वस्त्र, लवण, सप्तधान्य, पृथ्वी और गौ एक - से - एक बढ़कर पवित्र माने गये हैं। श्राद्धमें तिलसे परिपूर्ण पात्रोंका दान देकर शय्यादान देना चाहिये। दीन - अनाथ एवं विशिष्टजनोंको सामर्थ्यानुसार दक्षिणा भी प्रदान करे। पुत्रहीन अथवा पुत्रवान् जो भी इसे करता है, उसको वही सिद्धि प्राप्त होती है, जो एक ब्रह्मचारीको प्राप्त होती है। मनुष्य इस पृथ्वीपर जबतक जीवित रहता है, तबतक उसे नित्य - नैमित्तिक कर्म करने चाहिये। जो कोई जीवित - श्राद्ध करता है, तीर्थयात्रा, व्रत एवं सांवत्सरिक श्राद्धादि धर्मकार्य करता है, उसका अक्षय फल उसे प्राप्त होता है। देवता, गुरु और माता - पिताके निमित्त पुरुषको प्रयत्नपूर्वक दान करना चाहिये। वह दान प्रतिदिन अभिवृद्धिको प्राप्त होता है।
इस यज्ञमें जिसके द्वारा प्रचुर धन दानमें दिया जाता है, वह सब अक्षय होता है, जिस प्रकार इस संसारमें संन्यासी और ब्रह्मचारी अत्यधिक पूज्य हैं, उसी प्रकार वृषोत्सर्गाद कर्मोंको करनेवाले सभी पुण्यात्मा भी इस संसारमें पूजे जाते हैं। उन पुण्यात्माओंको मैं, चतुर्मुख ब्रह्मा और शिव सदैव वरदान देते हैं। वे सभी परम लोककी गति प्राप्त करते हैं। मेरा यह वचन सत्य है।
छोड़ा गया वृषभ जिस जलाशयमें जलपान करता है अथवा सींगसे जिस भूमिको नित्य खोद - खोदकर प्रसन्न होता है, उससे पितरोंके लिये अन्न और पेय पदार्थ अत्यधिक मात्रामें उत्पन्न होता है।
पूर्णिमा अथवा अमावास्या तिथिमें तिलसे परिपूर्ण पात्रोंका दान देना चाहिये। हजार संक्रान्तियों और सैकड़ों सूर्यग्रहणके पर्वोंपर दान देकर जो पुण्य अर्जित होता है, वह मात्र नील वृषको छोड़कर ही मनुष्य प्राप्त कर सकता है।
(संक्रान्तीनां सहस्त्राणि सूर्यपर्वशतानि च।
दत्त्वा यत्फलमाप्नोति तद्वै नीलविसर्जने॥)
ब्राह्मणोंको बछिया, पद - दान तथा शिव - भक्तोंको तिलसे पूर्ण पात्रोंका दान देना चाहिये। उस समय उमा - महेश्वरको भी परिधानसे अलंकृत कर दान करना चाहिये। अतसी (तीसी) पुष्पके सदृश कान्तिवाले पीताम्बरधारी भगवान् अच्युतकी प्रतिमाको वस्त्राच्छादित कर प्रदान करना चाहिये। जो लोग भगवान् गोविन्दको नमन करते हैं, उनके लिये भय नहीं रहता है। प्रेतत्वसे मोक्ष चाहनेवाले जो प्राणी इस सत्कर्मको करेंगे, वे श्रेष्ठ लोकोंको प्राप्त करेंगे। मेरा यह कथन सत्य ही है।
हे गरुड! मैंने तुमसे जो सम्पूर्ण और्ध्वदैहिक क्रिया कही है, इसे सुनकर मनुष्य अपने समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है, इसमें संदेह नहीं है।
इस प्रकारका अनुपम माहात्म्य सुनकर गरुड अत्यन्त प्रसन्न हो उठे और उन्होंने मनुष्योंके हितमें पुनः भगवान् केशवसे पूछा।
Summary of chapter 14 of the Garuda Mahā Purana - Preta Khaṇḍa is as follows:
Bhagavān Vishṇu describes the celestial assembly hall of Citragupta, the divine recorder who maintains an unerring, immortal ledger of every thought, word, and deed committed by every living being in the universe. The Lord details how Citragupta presents this impartial record before Lord Yama, where no secret action can be hidden and no falsehood can be spoken. In this atmosphere of absolute divine truth, the soul’s own conscience testifies to its past life, ensuring that the rewards of virtue and the purifications of sin are awarded with perfect, flawless cosmic equity.