गरुड महा पुराणम् - प्रेत खंड
23 - प्रेतबाधाजन्य विविध स्वप्न तथा उसका प्रायश्चित्तविधान
श्रीगरूडने कहा - हे देवेश! पिशाच योनिमें रहनेवाले प्रेत क्या - क्या करते हैं? वे क्या कहते हैं? उसे आप कहिये।
श्री भगवानने कहा - हे पक्षिराज! उनका जैसा स्वरूप है, जो उनकी पहचान है और जिस प्रकार वे स्वप्न दिखाते हैं, वह सब मैं तुम्हें सुनाता हूँ। भूख - प्याससे दुःखित वे अपने घरमें प्रवेश करते हैं। उसी वायुरूपी देहमें प्रविष्ट होकर अपने वंशजोंको अपना चिह्न दिखाते हैं प्रेत अपने पुत्र, अपनी स्त्री तथा अपने बन्धु - बान्धवोंके पास जाता है और अश्व, हाथी, बैल अथवा मनुष्यका विकृत रूप धारण करके वह स्वणमें दिखायी देता है। जो व्यक्ति सोकर उठनेपर अपनेको शय्यापर विपरीत स्थितिमें देखता है, वह अवस्थिति प्रेत योनिके कारण हुई है, ऐसा मानना चाहिये। यदि स्वप्नमें अपने - आपको जंजीरमें बँधा हुआ देखे और मरा हुआ पूर्वज निन्दनीय वेषमें दिखायी दे, खाते हुए. व्यक्तिका अन्न लेकर भाग जाय और प्याससे पीड़ित वह अपना या परायेका जलपान कर ले तो उसे पिशाच योनिमें गया हुआ मानें।
यदि स्वप्नमें वह बैलकी सवारी करता है, बैलोंके साथ कहीं जाता है, डरकर आकाश या भूखसे व्याकुल होकर तीर्थमें चला जाता है, अपनी वाणीसे गौ, बैल, पक्षी और घोड़ेकी भाषामें बोलता है, उसे हाथी, देव, भूत, प्रेत तथा निशाचरके चिह्न दिखायी देते हैं तो उसे पिशाच योनि प्राप्त हुआ ही मानें।
हे पक्षीन्द्र! प्राणीको स्वप्नमें प्रेतयोनिसे सम्बन्धित बहुत - से चिह्न दिखायी देते हैं। जो स्वप्नमें अपनी जीवित स्त्री, अपने जीवित भाई, पुत्र या पुत्रीको मरा हुआ देखे तो उसे प्रेतदोष समझना चाहिये। प्रेतदोषसे ही व्यक्ति स्वप्नमें भूख - प्याससे व्यथित होकर दूसरेसे याचना करता है तथा तीर्थमें जाकर पिण्डदान करता है। यदि स्वप्नमें घरसे निकलते हुए पुत्र, पिता, भ्राता, पति तथा पशु दिखायी दे तो ऐसा प्रेतदोषसे दिखायी देता है।
हे ट्विजराज! स्वप्नमें ऐसे चिह्न दिखायी देनेपर प्रायश्चित्त करनेका विधान बताया गया है। घर या तीर्थमें स्नान करके मनुष्य बेलके वृक्षमें जल - तर्पण करे तथा वेदपारंगत ब्राह्मणकी सम्यक् पूजा करके उन्हें काले धान्यका दान दे, तदनन्तर यथाशक्ति हवन करके गरुड महापुराणका पाठ करे। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक प्रेतचिह्न बतानेवाले इस अध्यायका पाठ करता है अथवा सुनता है, उसका प्रेतदोष स्वतः ही नष्ट हो जाता है।
Summary of chapter 23 of the Garuda Mahā Purana - Preta Khaṇḍa is as follows:
The Supreme Lord narrates the inspiring historical legend of the noble King Babhruvāhana, who encountered a group of emaciated, suffering Pretas in a dense and lonely forest during a royal hunting expedition. Moved by curiosity and deep compassion, the king inquired about their tragic condition, and the chief ghost revealed that despite their earthly wealth in past lives, the total absence of obsequial rites and charity had condemned them to ghostly torment. The narrative illustrates the real, palpable suffering of forgotten souls, setting the stage for a dramatic demonstration of the power of royal piety and ritual redemption.