गरुड महा पुराणम् - प्रेत खंड
37 - और्ध्वदैहिक कर्ममें उदकुम्भदानका माहात्म्य
तार्क्ष्यने कहा - हे जनार्दन! जिस प्रकारसे जलपूर्ण कुम्भका दान करना चाहिये, उसका वर्णन करें। यह कार्य किस विधिसे करना चाहिये? इसके लक्षण कैसे हैं? इसकी पूर्ति कैसे होती है? इसको किसे देना चाहिये? प्रेतोंको संतुष्टि प्रदान करनेमें समर्थ इन कुम्भोंका दान किस कालमें उचित है? यह बतानेकी कृपा करें।
श्रीकृष्णने कहा - हे गरुड! जलपूर्ण कुम्भदानके विषयमें पुन: मैं तुम्हें भली प्रकारसे बता रहा हूँ। हे महापक्षिन्! अन्न और जलसे परिपूर्ण कुम्भोंका दान प्रेतके उद्देश्यसे देना चाहिये। यह दान विशेषरूपसे प्रेतके लिये मुक्ति दायक है। बारहवें दिन, छठे मास, त्रिपक्ष और वार्षिक श्राद्धके दिन विशेष रूपसे जीवको यममार्गमें सुख प्रदान करनेके लिये उदकुम्भ देना चाहिये। गोबरसे भलीभाँति लीपकर स्वच्छ बनायी गयी भूमिपर प्रतिदिन तिल या पक्वान्नसे युक्त जलपूर्ण कुम्भका दान देना चाहिये। उसी स्थानपर प्रेतके निमित्त स्वेच्छासे उस पात्रका दान भी दे देना चाहिये। उससे प्रसन्न होकर प्रेत यमदूतोंके साथ चला जाता है।
प्रेतके द्वादशाह - संस्कारके अवसरपर जलपूरित कुम्भोंका दान विशेष महत्त्व रखता है। यजमान उस दिन बारह जलभरे घटोंका संकल्प करके दान करे। उसी दिन वह पक्वान्न और फलसे परिपूर्ण एक वर्द्धनी (विशेष प्रकारका जलपात्र) भगवान् विष्णुके लिये संकल्प करके सुयोग्य एवं सच्चरित्र ब्राह्मणको प्रदान करे। तदनन्तर वह एक वर्द्धनी, पक्वान्न तथा फल धर्मराजको समर्पित करे। उससे संतुष्ट होकर धर्मराज उस प्रेतको मोक्ष प्रदान करते हैं। उसी समय एक वर्द्धनी चित्रगुप्तके लिये दानमें देना चाहिये। उसके पुण्यसे प्रेत वहाँ पहुँचकर सुखी रहता है।
अपने मृत पिताके कल्याणार्थ उड़द और जलसे पूर्ण सोलह घटोंका दान दे। उसका विधान यह है कि उत्क्रान्ति श्राद्धसे लेकर षोडश श्राद्धतकके लिये सोलह ब्राह्मणोंको एक - एक घट दानमें दिया जाय।
एकादशाहसे लेकर वर्षपर्यन्त प्रतिदिन नियमपूर्वक पक्वान्न एवं जलसे पूर्ण एक घटका दान देय है। हे खगेश्वर! यह बात तो उचित है कि जलपूर्ण पात्र और पक्वान्न पूरित बड़े घटोंका दान नित्य दिया जाय, किंतु वहींपर एक वर्द्धनी (कलश) ऐसी होनी चाहिये जिसके ऊपर बाँस - निर्मित पात्रमें मिष्ठान्न रखकर पितृका आह्वान करके कुंकुम, अगुरु आदि सुगन्धित पदार्थोंसे उनका पूजन करे। तत्पश्चातू वस्त्राच्छादन करके विधिवत् संकल्प पूर्वक वैदिक धर्माचरणसे परिपूर्ण कुलीन ब्राह्मणको नित्य ऐसे एक - एक घट दान दे। यह दान विद्या और सदाचारसे युक्त ब्राह्मणको ही देना चाहिये। कभी मूर्खको यह दान न दे, क्योंकि वेदसम्मत आचार - विचारवाला ब्राह्मण यजमान और स्वयंका भी उद्धार करनेमें समर्थ है।
Summary of chapter 35 of the Garuda Mahā Purana - Preta Khaṇḍa is as follows:
Bhagavān Vishṇu illuminates the practical means for attaining Moksha, the ultimate state of eternal freedom, peace, and union with the Supreme Lord. The Master explains that cultivate non-attachment toward perishable material pleasures, practicing self-discipline, meditating upon the Supreme Brahman, and performing duties as an offering to God burns away all remaining karmic seeds. The Lord reassures Garuḍa that whoever develops deep dispassion for worldly illusion and realizes the immortal nature of the inner Ātman breaks the bonds of birth and death forever.