43 - शुद्धि - विधान

श्री विष्णुने कहा - जो जल, अग्नि तथा अन्य किसी बन्धनके भयसे धर्मपथसे विचलित हो गये हैं और जो संन्यास - धर्मका परित्याग करके पतित हो चुके हैं, वे गौ और वृषभका दान देकर दो चान्द्रायण व्रतसे शुद्धि प्राप्त करते हैं। बारह वर्षसे कम और चार वर्षसे अधिक आयुके बालकके पापका प्रायश्चित्त माता - पिता अथवा अन्य बान्धवको करना चाहिये। चार वर्षसे कम आयुवाले बालकका न कोई अपराध है और न कोई पाप। उसके लिये न तो राजदण्ड है और न कोई प्रायश्चित्तका विधान ही है।

यदि रजोदर्शन होनेपर स्त्री रोगग्रस्त हो जाय तो वह चौथे दिन वस्त्रादिका परित्याग करके स्‍नानसे शुद्ध हो सकती है। आतुरकालमे जननाशौच प्रयुक्त स्नान होनेपर कोई जो रुग्ण न हो ऐसा व्यक्ति दस बार स्नान करके प्रत्येक स्नानके बाद यदि उस आतुर व्यक्तिका स्पर्श करता जाय तो वह आतुर शुद्ध हो जाता है।