गरुड महा पुराणम् - प्रेत खंड
17 - समस्त शुभाशुभ कर्मोंके साक्षी ब्रह्माके पुत्र श्रवणदेवोंका स्वरूप
श्री गरुडने कहा - हे देव! यह एक संदेह मेरे हृदयको बाधित कर रहा है कि श्रवण किसके पुत्र हैं, यमलोकमें वे किस प्रकारसे रहते हैं? हे प्रभो! किस शक्तिके प्रभावसे वे मानव - कर्मको जान लेते हैं? वे कैसे किसी बातको सुन लेते हैं? उनको यह ज्ञान किससे प्राप्त हुआ है? हे देवेश्वर! उन्हें भोजन कहाँसे प्राप्त होता है? आप प्रसन्न होकर मेरे इस समस्त संदेहको नष्ट करें। पक्षिराज गरुडके इस कथनको सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण बोले - श्री कृष्णने कहा - हे तार्क्ष्य! सभी प्राणियोंको सुख देनेवाले मेरे इस वचनको तुम सुनो। श्रवणसे सम्बन्धित उन समस्त बातोंको तुम्हें मैं बताऊँगा। प्राचीन कालमें जब समस्त स्थावर - जंगमात्मक सृष्टि एकाकार हो गयी थी और मैं समस्त सृष्टिको आत्मलीन करके क्षीरसागरमें सो रहा था। उस समय मेरे नाभिकमल पर स्थित ब्रह्माने बहुत वर्षोंतक तपस्या की। उन्होंने एकाकार उस सृष्टिको चार प्रकारके प्राणियोंमें विभक्त किया। तदनन्तर ब्रह्मासे ही बनी सृष्टिके पालनका भार विष्णुने स्वीकार किया। तत्पश्चात् ब्रह्माके द्वारा संहार मूर्ति रुद्रका निर्माण हुआ। उसके बाद समस्त चराचर जगत्में प्रवाहित होनेवाले वायु, अत्यन्त तेजस्वी सूर्य तथा चित्रगुप्तके साथ धर्मराजकी सृष्टि हुई।
इन सभीकी रचना करके ब्रह्मा पुनः तपस्यामें निमग्न हो गये। विष्णुके नाभिपङ्कजमें तपस्या करते हुए उनको बहुत वर्ष बीत गये। वहींपर लोकसृष्टिमें लगे हुए ब्रह्माने कहा कि जिन लोगोंकी उत्पत्ति पहले हुई है, उन सभीको अपनी योग्यताके अनुसार कर्ममें लग जाना चाहिये। अतः रुद्र, विष्णु तथा धर्म पृथ्वीके शासन - कार्यमें लग गये, किंतु उन लोगोंने कहा कि हम सभी लोगोंको लोक - व्यवहारका कुछ भी ज्ञान नहीं है। इस सम्बन्धमें आप ही कुछ बतायें। इस विषयमें चिन्तित होकर सभी देवताओंने उस समय परस्पर विचार - विमर्श किया। तत्पश्चात् देवताओंने हाथमें पत्र - पुष्प लेकर ब्रह्म - मन्त्रका ध्यान किया। उसके बाद देवताओंकी प्रेरणासे ब्रह्माने अत्यन्त तेजस्वी एवं बड़े - बड़े नेत्रोंवाले बारह पुत्रोंको जन्म दिया। इस संसारमें जो कोई जैसा भी शुभ या अशुभ बोलता है, उसे वे अत्यन्त शीघ्र ब्रह्माके कानोंतक पहुँचाते हैं। हे पक्षिन्! दूरसे ही सुनने एवं दूरसे ही देख लेनेका विशेष ज्ञान उन्हें प्राप्त है। कूँकि वे सब कुछ सुन लेते हैं, उसीके कारण उन्हें ‘श्रवण’ कहा गया है। वे आकाशमें रहकर प्राणियोंकी जो भी चेष्टा होती है, उसको जानकर धर्मराजके सामने मृत्युकालके अवसरपर कहते हैं। उनके द्वारा प्राणियोंके धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - इन चारोंकी विवेचना उस समय धर्मराजसे की जाती है। हे वैनतेय! संसारमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - ये चार मार्ग हैं। जो उत्तम प्रकृतिवाले प्राणी हैं, वे धर्ममार्गसे चलते हैं। जो अर्थ अर्थात् धन - धान्यका दान करनेवाले प्राणी हैं, वे विमानसे परलोक जाते हैं। जो प्राणी अभिलषित याचककी इच्छाको संतुष्ट करनेवाले हैं। वे अश्वोपर सवार होकर प्रस्थान करते हैं। जो प्राणी मोक्षकी आकाङ्क्षा रखते हैं, वे हंसयुक्त विमानसे परलोकको जाते हैं। इनके अतिरिक्त प्राणी जो धर्मादि पुरुषार्थ चतुष्टयसे हीन है, वह पैदल ही काँटों तथा पत्थरोंके बीचसे कष्ट झेलता हुआ ‘असिपत्रवन’ में जाता है।
है पक्षिराज! इस मनुष्य लोकमें जो कोई भी पक्वान्न, वर्धनी और जलपात्रके द्वारा मेरे सहित इन श्रवण देवोंकी पूजा करता है, उसको मैं वह प्रदान करता हूँ, जिसकी प्राप्ति देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। भक्ति पूर्वक शुभ एवं पवित्र ग्यारह ब्राह्मण तथा बारहवें सपत्नीक ब्राह्मणको भोजन कराकर मेरी प्रसन्नताके लिये पूजा करनी चाहिये।
ऐसा मनुष्य सभी देवताओंसे पूजित होकर सुख प्राप्त करता है। उनकी पूजासे मैं और चित्रगुप्तके सहित धर्मराज प्रसन्न होते हैं। उन्हींकी संतुष्टिसे - धर्म परायण लोग मेरे विष्णु लोकको प्राप्त करते हैं।
हे खगेश्वर! जो प्राणी इन श्रवण देवोंके माहात्म्य, उत्पत्ति और शुभ चेष्टाओंको सुनता है, वह पापसे संलिप्त नहीं होता है। वह इस लोकमें सुख भोगकर स्वर्गमें महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त करता है।
Summary of chapter 17 of the Garuda Mahā Purana - Preta Khaṇḍa is as follows:
The Divine Master provides a detailed account of the sixteen distinct intermediate cities located along the vast highway to Yamaloka, including Saumyapura, Śauripura, and Nagandhanapura. Bhagavān Vishṇu explains that the soul travels through these cities over the span of one full year, encountering unique landscapes and challenges at each stage of its passage. The Lord reveals that the monthly Śrāddha offerings made by living family members on Earth materialize as vital provisions at each of these sixteen stops, sustaining the soul’s energy and providing comfort as it completes its long journey to the hall of judgment.