गरुड महा पुराणम् - प्रेत खंड
22 - प्रेतयोनि दिलानेवाले निन्दित कर्म, पञ्चप्रेतोपाख्यान तथा प्रेतत्व प्राप्ति न करानेवाले श्रेष्ठ कर्म
श्री गरुडने कहा - हे प्रभो! प्रेतोंकी उत्पत्ति कैसे होती है? वे कैसे चलते हैं? उनका कैसा रूप और कैसा भोजन होता है? वे किस प्रकार प्रसन्न होते हैं और उनका कहाँ निवास होता है? हे प्रसन्नचित्त देवेश! कृपा कर मेरे इन प्रश्नोंका समाधान करें।
श्री भगवानने कहा - हे पक्षिराज! सुनो। जो पूर्वजन्म संचित कर्मक अधीन रहकर पापकर्ममें अनुरक्त रहते हैं, वे मृत्युके पश्चात् प्रेतयोनिमें जन्म लेते हैं। जो मनुष्य बावली, कूप, जलाशय, उद्यान, देवालय, प्याऊ, घर, आम्रादिक फलदार वृक्ष, रसोईघर, पितृ - पितामहके धर्मको बेच देता है, वह पापका भागी होता है। ऐसा व्यक्ति मरनेके बाद प्रलयकालतक प्रेतयोनिमें रहता है। जो लोग लोभवश गोचारणकी भूमि, ग्रामकी सीमा, जलाशय, उपवन और गुफाभागको जोत लेते हैं, वे प्रेत होते हैं।
(पापकर्मरता ये वै पूर्वकर्मवशानुगा:।
जायन्ते ते मृता: प्रेतास्ताञ्छृणुष्व वदाम्यहम्॥
वापीकूपतडागांश्च आरामं सुरमन्दिरम्।
प्रपां सद्म सुवृक्षांश्च तथा भोजनशालिका:॥
पितृपैतामहं धर्मं विक्रीणाति स पापभाक्।
मृतः प्रेतत्वमाप्नेति यावदाभूतसम्प्लवम्॥
गोचरं ग्रामसीमां च तडागारामगह्वरम्।
कर्षयन्ति च ये लोभात् प्रेतास्ते वै भवन्ति हि॥)
पापियोंकी मृत्यु चण्डाल, जल, सर्पदंश, ब्राह्मण - शाप, विद्युत् - निपात, अग्नि, दन्त - प्रहार तथा पशुके आक्रमणसे होती है। जो लोग फाँसी लगानेसे, विषद्वारा और शस्त्रसे मरते हैं, जो आत्मघाती हैं, जिनकी विषूचिका (हैजा) आदि रोगोंसे मृत्यु होती है, जो क्षयादिक महारोग, पापजन्य रोग और चोर - डकैतोंके द्वारा मारे जाते हैं, जिनका मरनेपर संस्कार नहीं हुआ है, विहित आचारसे रहित, वृषोत्सर्गादिसि रहित और मासिक पिण्डदान जिनका लुप्त हो गया है, जिस मरे हुए प्राणीके लिये तृण, काष्ठ, हविष्य तथा अग्नि शूद्र लाता है, पर्वतों अथवा दीवालके ढहनेसे जिनकी मृत्यु हो जाती है, निन्दित दोषोंसे जिनकी मृत्यु होती है, जिनकी मृत्यु भूमिमें नहीं होती, जिनकी मृत्यु अन्तरिक्षमें होती है, जो भगवान् विष्णुका स्मरण न करते हुए मर जाते हैं, जिनकी मृत्यु सूतक और श्वानादि निकृष्ट योनियोंके संसर्गमें होती है, वे प्रेतयोनिमें जाते हैं।
(असंस्कृतप्रमीता ये विहिताचारवर्जिता:॥
वृषोत्सर्गादिलुप्ताश्च लुप्तमासि कपिण्डका:।
यस्यानयति शूद्रोऽग्निं तृणकाष्टहवींषि स:॥
पतनात् पर्वतानां च भित्तिपातेन ये मृता:।
रजस्वलादिदोषैश्च न च भूमौ मृताश्च ये॥
अन्तरिक्षे मृता ये च विष्णुस्मरणवर्जिता:।
सूतकैः श्वादिसम्पर्कै: प्रेतभावा इह क्षितौ॥)
इसी प्रकारके अन्य कारणोंसे जो प्राणी दुर्मृत्युको प्राप्त होते हैं, उनको प्रेतयोनिमें मरुस्थल प्रदेशमें भटकना पड़ता है।
हे तार्क्ष्य! जो व्यक्ति निर्दोष माता, बहन, पत्नी, पुत्रवधू तथा कन्याका परित्याग करता है, वह निश्चित ही प्रेत होता है। जो भ्रातृद्रोही, ब्रह्मघाती, गोहन्ता, मद्यपी, गुरुपत्नीके साथ सहवास करनेवाला, स्वर्ण और रेशमका चोर है, वह प्रेतत्वको प्राप्त होता है। घरमें रखी हुई धरोहरका अपहारक, मित्रद्रोही, परस्त्रीरत, विश्वासघाती एवं क्रूर व्यक्ति अवश्य प्रेतयोनिमें जन्म लेता है। जो वंश परम्परागत धर्मपथका परित्याग करके दूसरे धर्मको स्वीकार करनेवाला है, विद्या और सदाचारसे जो विहीन है, वह भी निस्संदेह प्रेत ही होता है ।
(मातरं भगिनीं भार्यां स्नुषां दुहितरं तथा।
अदृष्टदोषां त्यजति स प्रेतो जायते ध्रुवम्॥
भ्रातृध्रुग्ब्रह्महा गोघ्न: सुरापों गुरुतल्पगः।
हेमक्षौमहरस्तार्क्ष्य स वै प्रेतत्वमाप्नुयात्॥
न्यासापहर्ता मित्रध्रुक् परदाररतस्तथा।
विश्वासघाती क्रूरस्तु स प्रेतो जायते धुवम्॥
कुलमार्गांश्च संत्यज्य परधर्मरतस्तथा।
विद्यावृत्तविहीनश्च स प्रेतो जायते ध्रुवम्॥)
हे सुव्रत! इस विषयमें एक प्राचीन इतिहास है, जो पितामह भीष्म और युधिष्टिरके संवादमें कहा गया था। मैं उसीको कहता हूँ, उसे सुन करके मनुष्य सुख प्राप्त करता है।
युधिष्ठिरने कहा - हे पितामह! प्राणी किस कर्मफलसे प्रेत होता है? उसकी कैसे और किस उपायसे मुक्ति होती है? इस बातको आप मुझे बतानेकी कृपा करें, जिसको सुन करके मैं पुनः भ्रमित न हो सकूँ।
भीष्मने कहा - हे वत्स! मनुष्यको जैसे प्रेतयोनि प्राप्त होती है, वह जैसे उस योनिसे मुक्त होता जैसे वह दुस्तर घोर नरकमें जाता है, नरकमें जाकर दुःख झेल रहे प्राणियोंको जिसका नाम, गुण, कीर्तन और श्रवण करनेसे मुक्ति प्राप्त होती है, वह सब मैं तुम्हें बता रहा हूँ।
हे पुत्र! ऐसा सुना जाता है कि प्राचीन कालमें एक ख्यातिलब्ध संतप्तक नामक सुव्रत तपस्वी ब्राह्मण वनमें रहता था। दयावान्, योगयुक्त, स्वाध्यायरत, अग्निहोत्री उस द्विजश्रेष्ठका समय सदैव यज्ञादिक धार्मिक कृत्योंमें बीतता था। परलोकका भय उसे बहुत था, अतः ब्रह्मचर्य, सत्य, शौचका पालन करते हुए और निर्मलचित्त होकर वह तपस्यामें संलग्न रहता था। श्रद्धापूर्वक गुरुके उपदेश, अतिथि - पूजन तथा आत्मतत्त्वके चिन्तनमें अनुरक्त वह तपस्वी सांसारिक द्वन्द्दोंसे रहित था। इस संसारको जीतनेकी इच्छासे योगाभ्यासमें सदैव अपनेको वह समर्पित रखता था। इस प्रकारका आचरण करते हुए उस जितेन्द्रिय मुमुश्षु ब्राह्मणको वनमें ही बहुत - से वर्ष बीत गये। एक दिन तपस्वी संतप्तकके मनमें तीर्थाटनकी इच्छा उत्पन्न हुई। उसने मनमें यह संकल्प किया कि अब मैं तीर्थोके पवित्र जलसे इस शरीरको पवित्र बनाऊँगा, अनन्तर वह स्नान तथा जप - नमस्कारादि कृत्योंको सम्पन्न कर सूर्योदय होनेपर वह तीर्थ - यात्रापर निकल पड़ा।
चलते - चलते वह महातपस्वी ब्राह्मण मार्ग भूल गया। भ्रान्त मार्गमें चलते हुए उसे अत्यन्त भयानक पाँच प्रेत दिखायी पड़े। उस निर्जन वनमें विकृत शरीरवाले भयंकर प्रेतोंको देखकर ब्राह्मणका हृदय कुछ भयभीत हो उठा। अतः वहींपर खड़े होकर वह विस्फारित नेत्रोंसे उसी ओर देखता रहा। तत्पश्चात् ब्राह्मणने अपने भयको दूरकर धेर्यका सहारा लिया और मधुर भाषामें पूछा - ‘हे विकृत मुखवालो! तुम सब कौन हो? कैसा पापकर्म तुम लोगोंने किया है, जिसके फलस्वरूप तुम्हें यह विकृति प्राप्त हुई है? तुम सब कहाँ जानेका निश्चय कर रहे हो?’
प्रेतराजने कहा - हे द्विजश्रेष्ठ! हम सभीने अपने - अपने कर्मके कारण प्रेतयोनिको प्राप्त किया है। परद्रोहमें रत होनेके कारण हम पाप और मृत्युके वशमें हुए। नित्य भूख - प्याससे पीड़ित रहकर यह प्रेत - जीवन बिता रहे हैं। हम लोगोंकी वाणी उसी पापसे विनष्ट हुई है, शरीर कान्तिहीन हो गया है, हम संज्ञाहीन और विकृत चित्तवाले हो गये हैं। हे तात! हमें दिशाओं तथा विदिशाओंका कोई ज्ञान नहीं है। पाप - कर्मसे पिशाच बने हुए हम मूढ प्राणी कहाँ जा रहे हैं, इसका भी ज्ञान हमें नहीं है। हम लोगोंके न माता हैं और न पिता हैं। अपने कर्मोंके फलस्वरूप, अत्यन्त दु:खदायी यह प्रेतयोनि हम सभीको प्राप्त हुई है। हे ब्रह्मन्! आपके दर्शनसे हम लोग अत्यधिक प्रसन्न हैं। आप मुहूर्तभर रुकें। आपसे हम अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त प्रारम्भसे कहेंगे। उनमेंसे एक प्रेतने कहा - है विप्रदेव! मेरा नाम पर्युषित है, यह दूसरा सूचीमुख है, तीसरा शीघ्रग, चौथा रोधक और पाँचवाँ लेखक है।
ब्राह्मणणे कहा - हे प्रेत! प्राणीको कर्म फलानुसार प्रेतयोनि मिलती है यह तो ठीक बात है, पर अपने जो नाम तुम बताते हो, उसके प्राप्त होनेका क्या कारण है?
प्रेतराजने कहा - हे द्विजश्रेष्ठ! मैंने सदैव सुस्वादु भोजन किया और ब्राह्मणकों बासी अन्न दिया है, इस कारण मेरा नाम पर्युषित (बासी) है। भूखे ब्राह्मणकी याचनाकों सुनकर यह शीघ्र ही वहाँसे हट जाता था, इसलिये यह शीघ्रग नामका प्रेत हुआ । अन्नादिकी आकांक्षासे इसने बहुत - से ब्राह्मणोंको पीड़ित किया था, इस कारण यह सूचीमुख नामक प्रेत हो गया। इसने पोष्यवर्ग एवं ब्राह्मणोंको दिये बिना अकेले ही मिष्टान्न खाया था, इसलिये इसको रोधक कहा गया है। यह कुछ माँगनेपर मौन धारण करके पृथ्वी कुरेदने लगता था, अत: उस कर्मफलके अनुसार यह लेखक कहलाया।
हे ब्राह्मण! कर्मभावसे ही प्रेतत्व और इस प्रकारके नामकी प्राप्ति हुई है। यह लेखक मेषमुख, रोधक पर्वताकार मुखवाला, शीघ्रग पशुकी तरह मुखवाला और सूचक सुईके समान मुखवाला है, इसके बेढंगे रूपको देखें। हे नाथ! हम अत्यन्त दुःखित हैं। मायावी रूप बनाकर हम लोग पृथ्वीपर विचरण करते हैं। हम सभी अपने ही कर्मसे विकृत आकारवाले, लम्बे ओठवाले, विकृत मुखवाले और बृहद् शरीरवाले तथा भयावह हो गये हैं। हे विप्र! यह सब मैंने आपसे प्रेतत्वका कारण बता दिया है।
आपके दर्शनसे हम सभीमें ज्ञान उत्पन्न हो गया है, आपकी जिस बातको सुननेकी अभिरुचि हो, वह आप पूछें, उसे मैं आपको बतानेके लिये तैयार हूँ।
ब्राह्मणने कहा - हे प्रेतराज! पृथ्वीपर जो भी जीव जीते हैं, वे सब आहारसे ही जीवित रहते हैं। यथार्थ रूपमें तुम लोगोंके भी आहारको सुननेकी मेरी इच्छा है।
प्रेतोंने कहा - हे द्विजराज! यदि आपकी श्रद्धा हमारे आहारको जाननेकी है तो सावधान हो करके आप सुनें।
हम सभीका आहार समस्त प्राणियोंके लिये निन्दनीय है, जिसको सुनकर आप बार - बार निन्दा करेंगें। प्राणियोंके शरीरसे निकले हुए कफ, मूत्र और पुरीषादि मल एवं अन्य प्रकारसे उच्छिष्ट भोजन प्रेतोंका आहार है। जो घर अपवित्र रहते हैं, जिनकी घरेलू सामग्रियाँ इधर - उधर बिखरी रहती हैं, जिन घरोंमें प्रसूतादिकि कारण मलिनता बनी रहती है, वहींपर प्रेत भोजन करते हैं। जिस घरमें सत्य, शौच और संयम नहीं होता, पतित एवं दस्युजनोंका साथ है, उसी घरमें प्रेत भोजन करते हैं। जो घर भूतादिक बलि, देवमन्त्रोच्चार, अग्निहोत्र, स्वाध्याय तथा व्रतपालनसे हीन है, प्रेत उसमें ही भोजन करते हैं। जो घर लज्जा एवं मर्यादासे रहित है, जिसका स्वामी स्त्रीसे जीत लिया गया है, जहाँ माता - पिता और गुरुजनोंकी पूजा नहीं होती है, प्रेत वहाँ ही भोजन करते हैं। जिस घरमें नित्य लोभ, क्रोध, निद्रा, शोक, भय, मद, आलस्य तथा कलह - ये सब दुर्गुण विद्यमान रहते हैं, वहाँ प्रेत भोजन करते हैं। हे दृढ़व्रत तपोनिधि विप्रदेव! हम सब इस प्रेतभावसे दुःखित हैं, जिससे प्रेतयोनि प्राप्त न हो वह हमें बतायें। प्राणीकी नित्य मृत्यु हो वह अच्छा है पर उसे कभी भी प्रेतयोनि न प्राप्त हो।
ब्राह्मणने कहा - नित्य उपवास रखकर कृच्छ एवं चान्द्रायण व्रतमें लगा हुआ तथा अनेक प्रकारसे अन्य व्रतोंसे पवित्र मनुष्य प्रेत नहीं होता है। जो व्यक्ति जागरण सहित एकादशीव्रत करता है और अन्य सत्कर्मोंसे अपनेको पवित्र रखता है, वह प्रेत नहीं होता है। जो प्राणी अश्वमेधादि यज्ञोंको सम्पन्न करके नाना प्रकारके दान देता है तथा क्रीडा, उद्यान, वापी एवं जलाशयका निर्माता है, ब्राह्मणकी कन्याओंका यथाशक्ति विवाह कराता है, विद्यादान और अशरणको शरण देनेवाला है, वह प्रेत नहीं होता है।
(उपवासपरो नित्यं कृच्छ्रचान्द्रायणे रत:।
व्रतैश्च विविधै: पूतो न प्रेतो जायते नरः॥
एकादश्यां व्रतं कुर्वञ्चागरेण समन्वितम्।
अपरै: सुकृतैः पूतो न प्रेतो जायते नर:॥
इष्टा वै वाश्वमेधादीन् दद्याद् दानानि यो नर:।
आरामोद्यानवाप्यादे: प्रपायाश्चैव कारक:॥
कुमारीं ब्राह्मणानां तु विवाहयति शक्तित:।
विद्यादोऽभयदश्चैव न प्रेतो जायते नर:॥)
खाये हुए शुद्रान्नके जठरस्थित रहते हुए जिसकी मृत्यु हो जाती है या जो दुर्मृत्युसे मरता है, वह प्रेत होता है। जो अयाज्यका याजक तथा मद्यपीका साथ करके मदिरा पीनेवाली स्त्रीका संसर्ग करता है और अज्ञानवश भी मांस खाता है, वह प्रेत होता है। जो देवता, ब्राह्मण और गुरुक धनका अपहारक है, जो धन लेकर अपनी कन्या देता है, वह प्रेत होता है। जो माता, भगिनी, स्त्री, पुत्रवधू तथा पुत्रीका बिना कोई दोष देखे परित्याग कर देता है, उसे भी प्रेत होना पड़ता है। जो विश्वासपर रखी हुई परायी धरोहरका अपहर्ता है, मित्रद्रोही है, सदैव परायी स्त्रीमें अनुरक्त रहता है, विश्वासघाती और कपटी है, वह प्रेतयोनिमें जाता है, जो प्राणी भ्रातृद्रोही, ब्रह्महन्ता, गोहन्ता, मद्यपी, गुरु पत्नीगामी, इनका संसर्गी और वंश परम्पराका परित्याग करके
सदा झूठ बोलता रहता है, स्वर्णकी चोरी तथा भूमिका अपहरण करता है, वह प्रेत होता है।
(देवद्रव्यं च ब्रह्मस्वं गुरुद्रव्यं तथैव च।
कन्यां ददाति शुल्केन स प्रेतो जायते नर:॥
मातरं भगिनीं भार्यां स्नुषां दुहितरं तथा।
अदृष्टदोषास्त्यजति स प्रेतो जायते नर:॥
न्यासापहर्ता मित्रध्रुक्परदाररत: सदा।
विश्वासघाती कूटश्च स प्रेतो जायते नर:॥
भ्रातृध्रुग्ब्रह्महा गोघ्न: सुरापो गुरुतल्पगः।
कुलमार्गं परित्यज्य ह्यनृतोक्तौ सदा रत:।
हर्ता हेम्नश्च भूमेश्च स प्रेतो जायते नर:॥)
भीष्मने कहा - हे युधिष्ठिर! इस प्रकार ब्राह्मण संतप्तक ऐसा कह ही रहा था कि आकाशमें दुन्दुभि बजने लगी। देवोंने उस ब्राह्मणके ऊपर फूलोंकी वर्षा की। प्रेतोंके लिये वहाँ पाँच देवविमान आ गये। विधिवत् उस ब्राह्मणकी आज्ञा लेकर वे सभी प्रेत दिव्य विमानोंमें बैठकर स्वर्ग चले गये। इस प्रकार ब्राह्मणके द्वारा प्राप्त ज्ञान एवं उसके साथ सम्भाषण एवं पुण्य - संकीर्तनके प्रभावसे उन सभी प्रेतोंका पाप विनष्ट हो गया और उन्हें परम पदकी प्राप्ति हुई।
सूतजीने कहा - इस आख्यानको सुनकर गरुडजी पीपल - पत्रके समान काँप उठे। उन्होंने पुनः मनुष्योंके कल्याणके लिये श्रीभगवान् विष्णुसे पूछा।
Summary of chapter 22 of the Garuda Mahā Purana - Preta Khaṇḍa is as follows:
Bhagavān Vishṇu explains the subtle nature, origins, and afflictions of the ghostly existence known as Pretayoni, detailing how souls trapped in this state possess invisible bodies made of air and ether. The Lord describes how these unfortunate spirits suffer from perpetual, insatiable hunger and thirst, yet remain unable to consume material food or water due to their lack of a physical mouth. Bhagavān Vishṇu reveals that intense worldly attachments, unfulfilled desires, and sudden unexpiated deaths bind souls to this miserable state, emphasizing the urgent need for living relatives to perform holy rites to grant them relief.