3 - नरकोंका स्वरूप, नरकोंमें प्राप्त होनेवाली विविध यातनाएँ तथा नरकमें गिरानेवाले कर्म एवं जीवकी शुभाशुभ गति

श्रीसूतजीने कहा - पूछे गये अपने प्रशनोंका सम्यक्‌ उत्तर सुनकर पक्षिराज गरुड अतिशय आह्लादित हो भगवान्‌ विष्णुसे नरकोंके स्वरूपको जाननेकी इच्छा प्रकट की।

गरुडने कहा - हे उपेन्द्र! आप मुझे उन नरकोंका स्वरूप और भेद बतायें, जिनमें जाकर पापीजन अत्यधिक दुःख भोगते हैं।

श्रीभगवानने कहा - हे अरुणके छोटे भाई गरुड! नरक तो हजारोंकी संख्यामें हैं। सभीको विस्तृत रूपमें बताना सम्भव नहीं है। अतः मैं मुख्य - मुख्य नरकोंको बता रहा हूँ।

हे पक्षिराज! तुम मुझसे यह जान लो कि ‘रौरव’ नामक नरक अन्य सभीकी अपेक्षा प्रधान है। झूठी गवाही देनेवाला और झूठ बोलनेवाला व्यक्ति रौरव नरकमें जाता है। इसका विस्तार दो हजार योजन है। जाँघभरकी गहराईमें वहाँ दुस्तर गड्ढा है। दहकते हुए अंगारोंसे भरा हुआ वह गड्ढा पृथ्वीके समान बराबर (समतल भूमि - जैसा) दीखता है। तीव्र अग्निसे वहाँकी भूमि भी तप्ताङ्गार - जैसी है। उसमें यमके दूत पापियोंको डाल देते हैं। उस जलती हुई अग्निसे संतप्त होकर पापी उसीमें इधर - उधर भागता है। उसके पैरमें छाले पड़ जाते हैं, जो फूटकर बहने लगते हैं। रात - दिन वह पापी वहाँ पैर उठा - उठाकर चलता है। इस प्रकार वह जब हजार योजन उस नरकका विस्तार पार कर लेता है, तब उसे पापकी शुद्धिके लिये उसी प्रकारके दूसरे नरकमें भेजा जाता है।

हे पक्षिन्‌! इस प्रकार मैंने तुम्हें रौरव नामक प्रथम नरककी बात बता दी। अब तुम ‘महारौरव’ नामक नरककी बात सुनो। यह नरक पाँच हजार योजनमें फैला हुआ है। वहाँकी भूमि ताँबेके समान वर्णवाली है। उसके नीचे अग्नि जलती रहती है। वह भूमि विद्युत्‌ - प्रभाके समान कान्तिमान्‌ है। देखनेमें वह पापीजनोंको महाभयंकर प्रतीत होती है। यमदूत पापी व्यक्तिके हाथ - पैर बाँधकर उसे उसीमें लुढ़का देते हैं और वह लुढ़कता हुआ उसमें चलता है। मार्गमं कौआ, बगुला, भेड़िया, उलूक, मच्छर और बिच्छू आदि जीव - जन्तु क्रोधातुर होकर उसे खानेके लिये तत्पर रहते हैं। वह उस जलती हुई भूमि एवं भयंकर

जीव - जन्तुओंके आक्रमणसे इतना संतप्त हो जाता है कि उसकी बुद्धि ही भ्रष्ट हो जाती है। वह घबड़ाकर चिल्लाने लगता है तथा बार - बार उस कष्टसे बेचैन हो उठता है। उसको वहाँ कहींपर भी शान्ति नहीं प्राप्त होती है। इस प्रकार उस नरक लोकके कष्टको भोगते हुए पापीके जब हजारों वर्ष बीत जाते हैं, तब कहीं जाकर मुक्ति प्राप्त होती है।

इसके बाद जो नरक है उसका नाम ‘अतिशीत’ है। वह स्वभावत: अत्यन्त शीतल है। महारौरव नरकके समान ही उसका भी विस्तार बहुत लंबा है। वह गहन अन्धकारसे व्याप्त रहता है। असह्य कष्ट देनेवाले यमदूतोंके द्वारा पापीजन लाकर यहाँ बाँध दिये जाते हैं। अत: वे एक - दूसरेका आलिंगन करके वहाँकी भयंकर ठंडकसे बचनेका प्रयास करते हैं। उनके दाँतोंमें कटकटाहट होने लगती है। हे पक्षिराज! उनका शरीर वहाँकी उस ठंडकसे काँपने लगता है। वहाँ भूख - प्यास बहुत अधिक लगती है। इसके अतिरिक्त भी अनेक कष्टोंका सामना उन्हें वहाँ करना पड़ता है। वहाँ हिमखण्डका वहन करनेवाली वायु चलती है, जो शरीरकी हड्डियोंको तोड़ देती है। वहाँके प्राणी भूखसे त्रस्त होकर मज्जा, रक्त और गल रही हड्डियोंकों खाते हैं। परस्पर भेंट होनेपर वे सभी पापी एक - दूसरेका आलिंगन कर भ्रमण करते रहते हैं। इस प्रकार उस तमसावृत नरकमें मनुष्यको बहुत - से कष्ट झेलने पड़ते हैं।

हे पक्षिश्रेष्ठ! जो व्यक्ति अन्यान्य असंख्य पाप करता है, वह इस नरकके अतिरिक्त ‘निकृन्तन’ नामसे प्रसिद्ध दूसरे नरकमें जाता है। हे खगेन्द्र! वहाँ अनवरत कुम्भकारके चक्रके समान चक्र चलते रहते हैं, जिनके ऊपर पापीजनोंको खड़ा करके यमके अनुचरोंके द्वारा अँगुलिमें स्थित कालसूत्रसे उनके शरीरको पैरसे लेकर शिरोभागतक छेदा जाता है। फिर भी उनका प्राणान्त नहीं होता। इसमें शरीरके सैकड़ों भाग टूट - टूट कर छिन्न - भिन्न हो जाते हैं और पुन: इकट्ठे हो जाते हैं। इस प्रकार यमदूत पापकर्मियोंको वहाँ हजारों वर्षतक चक्कर लगवाते रहते हैं। जब सभी पापोंका विनाश हो जाता है, तब कहीं जाकर उन्हें उस नरकसे मुक्ति प्राप्त होती है।

‘अप्रतिष्ठ’ नामका एक अन्य नरक है। वहाँ जानेवाले प्राणी असह्य दुःखका भोग भोगते हैं। वहाँ पापकर्मियोंके दुःखके हेतुभूत चक्र और रहट लगे रहते हैं। जबतक हजारों वर्ष पूरे नहीं हो जाते, तबतक वह रुकता नहीं। जो लोग उस हैं, वे जलके घटकी भाँति उसपर घूमते रहते हैं। पुनः रक्तका वमन करते हुए उनकी आँतें मुखकी ओरसे बाहर आ जाती हैं और नेत्र आँतोंमें घुस जाते हैं। प्राणियोंको वहाँ जो दुःख प्राप्त होते हैं, वे बड़े ही कष्टकारी हैं।

हे गरुड! अब ‘असिपत्रवन’ नामक दूसरे नरकके विषयमें सुनो। यह नरक एक हजार योजनमें फैला हुआ है। इसकी सम्पूर्ण भूमि अग्निसे व्याप्त होनेके कारण अहर्निश जलती रहती है। इस भयंकर नरकमें सात - सात सूर्य अपनी सहस्र - सहस्र रश्मियोंके साथ सदैव तपते रहते हैं, जिनके संतापसे वहाँके पापी हर क्षण जलते ही रहते हैं। इसी नरकके मध्य एक चौथाई भागमें ‘शीतस्निग्धपत्र’ नामका वन है। हे पक्षिश्रेष्ठ! उसमें वृक्षोंसे टूटकर गिरे फल और पत्तोंके ढेर लगे रहते हैं। मांसाहारी बलवान कुत्ते उसमें विचरण करते रहते हैं। वे बड़े - बड़े मुखवाले, बड़े - बड़े दाँतोंवाले तथा व्याघ्रकी तरह महा बलवान्‌ हैं। अत्यन्त शीत एवं छायासे व्याप्त उस नरकको देखकर भूख - प्याससे पीडित प्राणी दुःखी होकर करुण क्रन्दन करते हुए वहाँ जाता हैं । तापसे तपती हुई पृथ्वीकी अगिनसे पापियोंके दोनों पैर जल जाते हैं, अत्यन्त शीतल वायु बहने लगती है, जिसके कारण उन पापियोंके ऊपर तलवारके समान तीक्ष्ण धारवाले पत्ते गिरते हैं। जलते हुए अग्नि - समूहसे युक्त भूमिमें पापीजन छिन्न - भिन्‍न होकर गिरते हैं। उसी समय वहाँके रहनेवाले कुत्तोंका आक्रमण भी उन पापियोंपर होने लगता है। शीघ्र ही वे कुत्ते रोते हुए उन पापियोंके शरीरके मांसको खण्ड - खण्ड करके खा जाते हैं।

हे तात! असिपत्रवन नामक नरकके विषयको मैंने बता दिया। अब तुम महाभयानक ‘तप्तकुम्भ’ नामवाले नरकका वर्णन मुझसे सुनो - इस नरकमें चारों ओर फैले हुए अत्यन्त गरम - गरम घड़े हैं। उनके चारों ओर अग्नि प्रज्वलित रहती है, वे उबलते हुए तेल और लौहके चूर्णसे भरे रहते हैं। पापियोंको ले जाकर उन्हींमें औंधे मुख डाल दिया जाता है। गलती हुई मज्जारूपी जलसे युक्त उसीमें फूटते हुए अङ्गोवाले पापी काढ़ाके समान बना दिये जाते हैं। तदनन्तर भयंकर यमदूत नुकीले हथियारोंसे उन पापियोंकी खोपड़ी, आँखों तथा हड्डियोंको छेद - छेदकर नष्ट करते हैं। गिद्ध बड़ी तेजीसे वहाँ आकर उनपर झपट्टा मारते हैं। उन उबलते हुए पापियोंको अपनी चोंचसे खींचते हैं और फिर उसीमें छोड़ देते हैं। उसके बाद यमदूत उन पापियोंके सिर, स्नायु, द्रवीभूत मांस, त्वचा आदिको जल्दी - जल्दी करछुलसे उसी तेलमें घुमाते हुए उन महापापियोंको काढ़ा बना डालते हैं।

हे पक्षिन्‌! यह तप्तकुम्भ - जैसा है, इस बातको विस्तार पूर्वक मैंने तुम्हें बता दिया। सबसे पहले नरकको रौरव और दूसरे उसके बादवालेको महारौरव नरक कहा जाता है। तीसरे नरकका नाम अतिशीत एवं चौथेका नाम निकृन्तन है। पाँचवाँ नरक अप्रतिष्ठ, छठा असिपत्रवन एवं सातवाँ तप्तकुम्भ है। इस प्रकार ये सात प्रधान नरक हैं। अन्य भी बहुत - से नरक सुने जाते हैं, जिनमें पापी अपने कर्मोंके अनुसार जाते हैं। यथा - रोध, सूकर, ताल, तप्तकुम्भ, महाज्वाल, शबल, विमोहन, कृमि, कृमिभक्ष, लालाभक्ष, विषञ्जन, अध:शिर, पूयवह, रुधिरान्ध, विड्भुज, वैतरणी, असिपत्रवन, अग्निज्वाल, महाघोर, संदंश, अभोजन, तमस्‌, कालसूत्र, लौहतापी, अभिद, अप्रतिष्ठ तथा अवीचि आदि - ये सभी नरक यमके राज्यमें स्थित हैं।

पापीजन पृथक्‌ - पृथक्‌ रूपसे उनमें जाकर गिरते हैं। रौरव आदि सभी नरकोंकी अवस्थिति इस पृथ्वीलोकसे नीचे मानी गयी है। जो मनुष्य गौकी हत्या, भ्रूणहत्या और आग लगानेका दुष्कर्म करता है, वह ‘रोध’ नामक नरकमें गिरता है। जो ब्रह्मघाती, मद्यपी तथा सोनेकी चोरी करता है, वह ‘सूकर’ नामके नरकमें गिरता है। क्षत्रिय और वैश्यकी हत्या करनेवाला ‘ताल’ नामक नरकमें जाता है।

जो मनुष्य ब्रह्महत्या एवं गुरुपत्नी तथा बहनके साथ सहवास करनेकी दुश्चेष्टा करता है, वह ‘तप्तकुम्भ’ नामक नरकमें जाता है।

जो असत्य-सम्भाषण करनेवाले राजपुरुष हैं, उनको भी उक्त नरककी ही प्राप्ति होती है। जो प्राणी निषिद्ध पदार्थोंका विक्रेता, मदिराका व्यापारी है तथा स्वामिभक्त सेवकका परित्याग करता है, वह ‘तप्तलौह’ नामक नरकको प्राप्त करता है। जो व्यक्ति कन्या या पुत्रवधूके साथ सहवास करनेवाला है, जो बेद - विक्रेता और वेदनिन्दक है, वह अन्तमें ‘महाज्वाल’ नामक नरकका वासी होता है। जो गुरुका अपमान करता है, शब्दबाणसे उनपर प्रहार करता है तथा अगम्या स्त्रीके साथ मैथुन करता है, वह ‘शबल’ नामक नरकमें जाता है।

शौर्य - प्रदर्शनमें जो वीर मर्यादाका परित्याग करता है, वह ‘विमोहन’ नामक नरकमें गिरता है। जो दूसरेका अनिष्ट करता है, उसे ‘कृमिभक्ष’ नामक नरककी प्राप्ति होती है। देवता और ब्राह्मणसे द्वेष रखनेवाला प्राणी ‘लालाभक्ष’ नरकमें जाता है। जो परायी धरोहरका अपहर्ता है तथा जो बाग - बगीचोंमें आग लगाता है, उसे ‘विषञ्जन’ नामक नरककी प्राप्ति होती है। जो मनुष्य असत् - पात्रसे दान लेता है तथा असत्‌ प्रतिग्रह लेनेवाला, अयाज्ययाजक और जो नक्षत्रसे जीविकोपार्जन करता है, वह मनुष्य ‘अध:शिर’ नरकमें जाता है। जो मदिरा, मांस आदि पदार्थोंका विक्रेता है, वह ‘पूयवह’ नामक घोर नरकमें गिरता है। जो कुक्कुट, बिल्ली, सुअर, पक्षी, मृग, भेंड़को बाँधता है, वह भी उसी प्रकारके नरकमें जाता है। जो गृहदाही है, जो विषदाता है, जो कुण्डाशी है, जो सोमविक्रेता है, जो मद्यपी है, जो मांसभोजी है तथा जो पशुहन्ता है, वह व्यक्ति ‘रुधिरान्ध’ नामक नरकमें जाता है, ऐसा विद्वानोंका अभिमत है। एक ही पंक्तिमें बैठे हुए किसी प्राणीको धोखा देकर जो लोग विष खिला देते हैं, उन सभीको ‘विड्भुज’ नामक घोर नरक प्राप्त होता है। मधु निकालनेवाला मनुष्य ‘वैतरणी’ और क्रोधी ‘मूत्रसंज्ञक’ नामक नरकमें जाता है। अपवित्र और क्रोधी व्यक्ति ‘असिपत्रवन’ नामक नरकमें जाता है। मृगोंका शिकार करनेवाला व्याध ‘अग्निज्वाल’ नामक नरकमें जाता है, जहाँ उसके शरीरको नोच - नोचकर कौवे खाते हैं।

यज्ञकर्ममें दीक्षित होनेपर जो ब्रतका पालन नहीं करता, उसे उस पापसे ‘संदंश’ नरकमें जाना पड़ता है। यदि स्वपनमें भी संन्यासी या ब्रह्मचारी स्खलित हो जाते हैं तो वे ‘अभोजन’ नामक नरकमें जाते हैं। जो लोग क्रोध और हर्षसे भरकर वर्णाश्रम - धर्मके विरुद्ध कर्म करते हैं, उन सबको नरकलोककी प्राप्ति होती है।

सबसे ऊपर भयंकर गर्मीसे संतप्त रौरव नामक नरक है। उसके नीचे अत्यन्त दुःखदायी महारौरव है। उस नरकसे नीचे शीतल और उस नरकके बाद नीचे ‘तामस’ नरक माना गया है। इसी प्रकार बताये गये क्रमसे अन्य नरक भी नीचे ही हैं।

इन नरक लोकोंके अतिरिक्त भी सैकड़ों नरक हैं, जिनमें पहुँचकर पापी प्रतिदिन पकता है, जलता है, गलता है, विदीर्ण होता है, चूर्ण किया जाता है, गीला होता है, क्वाथ बनाया जाता है, जलाया जाता है और कहीं वायुसे प्रताड़ित किया जाता है - ऐसे नरकोंमें एक दिन सौ वर्षके समान होता है। सभी नरकोंसे भोग भोगनेके बाद पापी तिर्यक्‌ - योनिमें जाता है। तत्पश्चात्‌ उसको कृमि, कीट, पतंग, स्थावर तथा एक खुरवाले गधेकी योनि प्राप्त होती है। तदनन्तर मनुष्य जंगली हाथी आदिकी योनियोंमें जाकर गौकी योनिमें पहुँचता है। हे गरुड! गधा, घोड़ा, खच्चर, गौर मृग, शरभ और चमरी - ये छ: योनियाँ एक खुरवाली होती हैं। इनके अतिरिक्त बहुत - सी पापाचार - योनियाँ भी हैं, जिनमें जीवात्माको कष्ट भोगना पड़ता है। उन सभी योनियोंको पाकर प्राणी मनुष्य - योनिमें आता है और कुबड़ा, कुत्सित, वामन, चाण्डाल और पुल्कश आदि नर - योनियोंमें जाता है। अवशिष्ट पाप - पुण्यसे समन्वित जीव बार - बार गर्भमें जाता है और मृत्युको प्राप्त होता है। उन सभी पापोंके समाप्त हो जानेके बाद प्राणीको शूद्र, वैश्य तथा क्षत्रिय आदिकी आरोहिणी - योनि प्राप्त होती है। कभी - कभी वह सत्कर्मसे ब्राह्मण, देव और इन्द्रत्वके पदपर भी पहुँच जाता है।

हे गरुड! यमद्ठारा निर्दिष्ट योनिमें पुण्यगति प्राप्त करनेमें जो प्राणी सफल हो जाते हैं, वे सुन्दर - सुन्दर गीत गाते, वाद्य बजाते और नृत्यादि करते हुए प्रसन्‍नचित्त गन्धर्वोंके साथ, अच्छे - से - अच्छे हार, नूपुर आदि नाना प्रकारके आशभूषणोंसे युक्त, चन्दन आदिकी दिव्य सुगन्ध और पुष्पोंके हारसे सुवासित एवं अलंकृत चमचमाते हुए विमानमें स्वर्गलोकको जाते हैं। पुण्य - समाप्तिके पश्चात्‌ जब वे वहाँसे पुनः पृथ्वीपर आते हैं तो राजा अथवा महात्माओंके घरमें जन्म लेकर सदाचारका पालन करते हैं। समस्त भोगोंको प्राप्त करके पुनः स्वर्गको प्राप्त करते हैं अन्यथा पहलेके समान आरोहिणी - योनिमें जन्म लेकर दुःख भोगते हैं।

मृत्युलोकमें जन्म लेनेवाले प्राणीका मरना तो निश्चित है। पापियोंका जीव अधोमार्गसे निकलता है। तदनन्तर पृथ्वीतत्त्वमें पृथ्वी, जलतत्त्वमें जल, तेजतत्त्वमें तेज, वायुतत्त्वमें वायु, आकाशतत्त्वमें आकाश तथा सर्वव्यापी मन चन्द्रमें जाकर विलीन हो जाता है। हे गरुड! शरीरमें काम, क्रोध एवं पञ्चेन्द्रियाँ हैं। इन सभीको शरीरमें रहनेवाले चोरकी संज्ञा दी गयी है। काम, क्रोध और अहंकार नामक विकार भी उसीमें रहनेवाले चोर हैं। उन सभीका नायक मन है। इस शरीरका संहार करनेवाला काल है, जो पाप और पुण्यसे जुड़ा रहता है। जिस प्रकार घरके जल जानेपर व्यक्ति अन्य घरकी शरण लेता है, उसी प्रकार पञ्चेन्द्रियोंसे युक्त जीव इन्द्रियाधिष्ठात्‌ देवताओंके साथ शरीरका परित्याग कर नये शरीरमें प्रविष्ट हो जाता है। शरीरमें रक्त - मज्जादि सात धातुओंसे युक्त यह षाट्कौशिक शरीर है। सभी प्राण, अपान आदि पञ्च वायु, मल - मूत्र, व्याधियाँ, पित्त, श्लेष्म, मज्जा, मांस, मेदा, अस्थि, शुक्र और स्नायु - ये सभी शरीरके साथ ही अग्निमें जलकर भस्म हो जाते हैं।

हे ताक्ष्र्य! प्राणियोंके विनाशको मैंने तुम्हें बता दिया। अब उनके इस शरीरका जन्म पुनः कैसे होता है, उसको मैं तुम्हें बता रहा हूँ।

यह शरीर नसोंसे आबद्ध, श्रोत्रादिक इन्द्रियोंसे युक्त और नवद्वारोंसे समन्वित है। यह सांसारिक विषय - वासनाओंके प्रभावसे व्याप्त, काम - क्रोधादि विकारसे समन्वित, राग - द्वेषसे परिपूर्ण तथा तृष्णा नामक भयंकर चोरसे युक्त है। यह लोभरूपी जालमें फँसा हुआ और मोहरूपी वस्त्रसे ढका हुआ है। यह मायासे भलीभाँति आबद्ध एवं लोभसे अधिष्ठित पुरके समान है। सभी प्राणियोंका शरीर इनसे व्याप्त है। जो लोग अपनी आत्माको नहीं जानते हैं, वे पशुओंके समान हैं।

हे गरुड! चौरासी लाख योनियाँ हैं और उद्भिज्ज (पृथ्वीमें अंकुरित होनेवाली वनस्पतियाँ), स्वेदज (पसीनेसे जन्म लेनेवाले जुएँ और लीख आदि कीट), अण्डज (पक्षी) तथा जरायुज ( मनुष्य) - में यह सम्पूर्ण सृष्टि विभक्त है।