12 - चौरासी लाख योनियोंमें मनुष्य जन्मकी श्रेष्ठता, मनुष्य मात्रका एकमात्र कर्तव्य - धर्माचरण

श्रीकृष्णजीने कहा - हे तार्क्ष्य! मनुष्योंके हित एवं प्रेतत्वकी विमुक्तिके लिये जीवित प्राणीके कर्म - विधानका निर्णय मैंने तुम्हें सुना दिया। इस संसारमें चौरासी लाख योनियाँ हैं। उनका विभाजन चार प्रकारके जीवोंमें हुआ है। उन्हें अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज और जरायुज कहा जाता है। इक्कीस लाख योनियाँ अण्डज मानी गयी हैं। इसी प्रकार क्रमश: स्वेदज, उद्भिज्ज तथा जरायुज योनियोंके विषयमें भी कहा गया है। मनुष्यादि योनियाँ जरायुज कही जाती हैं। इन सभी प्राणियोंमें मनुष्ययोनि परम दुर्लभ है। पाँच इन्द्रियोंसे युक्त यह योनि प्राणीको बड़े ही पुण्यसे प्राप्त होती है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र - ये चार वर्ण हैं। रजक, चमार, नट, बंसखोर, मछुआरा, मेद तथा भिल्‍ल - ये सात अन्त्यज जातियाँ मानी गयी हैं। म्लेच्छ और तुम्बु जातिके भेदसे अनेक प्रकारकी जातियाँ हो जाती हैं। जीवोंके हजारों भेद हैं। आहार, मैथुन, निद्रा, भय और क्रोध - ये कर्म सभी प्राणियोंमें पाये जाते हैं, किंतु विवेक सभीमें परम दुर्लभ है। एक पाद, दो पाद आदिके भेदसे शारीरिक संरचनामें भी अनेक भेद प्राप्त होते हैं।

जिस देशमें कृष्णसार नामक मृग रहता है, वह धर्मदेश कहलाता है। सब प्रकारसे ब्रह्मा आदि देवता वहीं निवास करते हैं। पञ्च महाभूतोंमें प्राणी, प्राणियोंमें बुद्धिजीवी, बुद्धिजीवियोंमें मनुष्य और मनुष्योंमें ब्राह्मण श्रेष्ठ है। स्वर्ग और मोक्षके साधनभूत मनुष्ययोनिको प्राप्त करके जो प्राणी इन दोनोंमेंसे एक भी लक्ष्य सिद्ध नहीं कर पाता, निश्चित ही उसने अपनेको ठग दिया। सौका मालिक एक हजार और एक हजारवाला व्यक्ति लाखकी पूर्तिमें लगा रहता है। जो लक्षाधिपति है वह राज्यकी इच्छा करता है। जो राजा है वह सम्पूर्ण पृथ्वीको अपने वशमें रखना चाहता है। जो चक्रवर्ती नरेश है वह देवत्वकी इच्छा करता है। देवत्व - पदके प्राप्त होनेपर उसकी अभिलाषा देवराज इन्द्रके पदके लिये होती है और देवराज होनेपर वह ऊर्ध्वगतिकी कामना करता है; फिर भी उसकी तृष्णा शान्त नहीं होती। तृष्णासे पराजित व्यक्ति नरकमें जाता है। जो लोग तृष्णासे मुक्त हैं, उन्हें उत्तम लोककी प्राप्ति होती है।

(इच्छति शती सहस्रं सहस्री लक्षमीहते कर्तुम्‌।

लक्षाधिपती राज्यं राजापि सकलां धरां लब्धुम्‌॥

चक्रधरोऽपि सुरत्वं सुरभावे सकलसुरपतिर्भवितुम्‌।

सुरपतिरूर्ध्वगतित्वं तथापि न निवर्तते तृष्णा॥

तृष्णया चाभिभूतस्तु नरकं प्रतिपद्यते।

तृष्णामुक्तास्तु ये केचित्‌ स्वर्गवासं लभन्ति ते॥)

इस संसारमें जो प्राणी आत्माके अधीन है, वह निश्चित ही सुखी है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध - ये पाँच विषय हैं, इनकी अधीनतामें रहनेवाला निश्चित ही दुःखी रहता है। मृग, हाथी, पतंग, भ्रमर और मीन - ये पाँचों क्रमश: शब्द, स्पर्श, रूप, गन्ध, रस -ये एक -एक विषयके सेवनसे मारे जाते हैं; फिर जो प्रमादी मनुष्य पाँचों इन्द्रियोंसे इन पाँचों विषयोंका सेवन करता है, वह इनके द्वारा कैसे नहीं मारा जायगा? मनुष्य बाल्यावस्थामें अपने पिता - माताके अधीन होता है। युवावस्था आनेपर वह स्त्रीका हो जाता है और अन्त समय आनेपर पुत्र - पौत्रके व्यामोहमें फँस जाता है। वह मूर्ख कभी किसी अवस्थामें आत्माके अधीन नहीं रहता। लौह और काष्ठके बने हुए पाशसे बँधा हुआ व्यक्ति मुक्त हो जाता है, किंतु पुत्र तथा स्त्री आदिके मोहपाशमें बँधा हुआ प्राणी कभी मुक्त नहीं हो पाता।

पाप एक मनुष्य करता है, किंतु उसके फलका उपभोग बहुत - से लोग करते हैं। भोक्ता तो अलग हो जाते हैं पर कर्ता दोषका भागी होता है। चाहे बालक हो, चाहे वृद्ध हो और चाहे युवा हो, कोई भी मृत्युपर विजय नहीं प्राप्त कर सकता। कोई अधिक सुखी हो अथवा अधिक दुःखी हो, वह बारम्बार आता - जाता है। मृत प्राणी सबके देखते - देखते सब कुछ छोड़कर चला जाता है। इस मर्त्यलोकमें प्राणी अकेला ही पैदा होता है, अकेले ही मरता है और अकेले ही पाप - पुण्यका भोग करता है । ‘बन्धु- बान्धव मरे हुए स्वजनके शरीरको पृथ्वीपर लकड़ी और मिट्टीके ढेलेकी भाँति फेंककर पराड्मुख हो जाते हैं; धर्म ही उसका अनुसरण करता है। प्राणाका धन - वैभव घरमें ही छूट जाता है। मित्र एवं बन्धु - बान्धव श्मशानमें छूट जाते हैं। शरीरको अग्नि ले लेती है। पाप - पुण्य ही उस जीवात्माके साथ जाते हैं।

मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्टसमं क्षितौ॥

बान्धवा विमुखा यान्ति धर्मस्तमनुगच्छति।

गृहेष्वर्था निवर्तन्ते श्मशानान्मित्रबान्धवा:॥

शरीरं वह्नीरादत्ते सुकृतं दुष्कृतं ब्रजेत्‌।

शरीरं वह्निना दग्धं पुण्यं पापं सह स्थितम्‌॥

‘मनुष्यने जो भी शुभ या पाप - कर्म किया है, वह सर्वत्र उसीको भोगता है। हे पक्षिराज! सूर्यास्ततक जिसने याचकोंको अपना धन नहीं दे दिया तो न जाने प्रात: होनेपर उसका वह धन किसका हो जायगा?

पूर्वजन्मके पुण्यसे जो थोड़ा या बहुत धन प्राप्त हुआ है, उसे यदि परोपकारके कार्यमें नहीं लगाया या श्रेष्ठ द्विजोंको दानमें नहीं दिया तो उसका वह धन यह रटता रहता है कि कौन मेरा भर्ता होगा? ऐसा विचार कर धर्मके कार्यमें अपना धन लगाना चाहिये। मनुष्य श्रद्धापूत शुद्ध मनसे दिये गये धनके द्वारा धर्मको धारण करता है। श्रद्धारहित धर्म इस लोक तथा परलोकमें फलीभूत नहीं होता। धर्मसे ही अर्थ और कामकी भी प्राप्ति होती है। धर्म ही मोक्षका प्रदायक है। अत:मनुष्यको धर्मका सम्यक्‌ आचरण करना चाहिये। धर्मकी सिद्धि श्रद्धासे होती है, प्रचुर धनराशिसे नहीं। अकिञ्चन अर्थात्‌ धन - वैभवसे रहित श्रद्धावान्‌ मुनियोंको स्वर्गकी प्राप्ति हुई है। श्रद्धारहित होकर किया गया होम, दान तथा तप असत्‌ कहा जाता है। हे पक्षिन्‌! उसका फल न तो इस लोकमें मिलता है और न परलोकमें ही मिलता है’-

शुभं वा यदि वा पापं भुङ्क्ते सर्वत्र मानव:।

यदनस्तमिते सूर्ये न दत्तं धनमर्थिनाम्‌॥

न जाने तस्य तद्वित्तं प्रातः कस्य भविष्यति।

रारटीति धन तस्य को मे भर्ता भविष्यति॥

न दत्तं द्विजमुख्येभ्यः परोपकृतये तथा।

पूर्वजन्मकृतात्‌ पुण्याद्यल्लब्धं बहु चाल्पकम्‌॥

तदीदृशं परिज्ञाय धर्मार्थे दीयते धनम्‌।

धनेन धार्यते धर्म: श्रद्धापूतेन चेतसा॥

श्रद्धाविरहितो धर्मों नेहामुत्र च तत्फलम्‌।

धर्माच्च जायते ह्यर्थो धर्मात्‌ कामोऽपि जायते॥

धर्म एवापवर्गाय तस्माद्धर्मं समाचरेत्‌।

श्रद्धया साध्यते धर्मो बहुभिर्नार्थशाशिभि:॥

अकिञ्चना हि मुनय: श्रद्धावन्तो दिवं गता:।

अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्‌।

असदित्युच्यते पक्षिन्‌ प्रेत्य चेह न तत्फलम्‌॥