1 - वैकुण्ठलोकका वर्णन, मरणकालमें और मरणके अनन्तर जीवके कल्याणके लिये विहित विभिन्‍न कर्तव्योंके बारेमें गरूडजीके द्वारा किये गये प्रश्न, प्रेतकल्पका उपक्रम

श्रीगणेशजीको नमस्कार है। ‘ॐ’कारसे युक्त भगवान्‌ वासुदेव हरिको प्रणाम है।

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्‌।

देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत्‌॥

भगवान्‌ श्रीनारायण, नरोत्तम नर एवं भगवती श्रीसरस्वती देवीको नमस्कार करके पुराणका वाचन करना चाहिये। जिन भगवान्‌का धर्म ही मूल है, वेद जिनका स्कन्ध है, पुराणरूपी शाखासे जो समृद्ध हैं, यज्ञ जिनके पुष्प हैं, मोक्ष जिनका फल है - ऐसे भगवान्‌ मधुसूदन रूपी कल्पवृक्षकी जय हो।

देवक्षेत्र नैमिषारण्यमें शौनकादिक श्रेष्ठ मुनियोंने सुखपूर्वक विराजमान श्रीसूतजी महाराजसे कहा - हे श्रीसूतजी! आप श्रीवेदव्यासजीकी कृपासे सब कुछ जानते हैं। अतः आप हम सभीके संदेहका निवारण करें। कुछ लोगोंका कहना है कि जिस प्रकार कोई जोंक तिनकेसे तिनकेका सहारा लेकर आगे बढ़ती है, उसी प्रकार शरीरधारी जीव एक शरीरके बाद दूसरे शरीरका आश्रय ग्रहण करता है। दूसरे विद्वानोंका कहना है कि प्राणी मृत्युके पश्चात्‌ यमराजकी यातनाओंका भोग करता है, तदनन्तर उसको दूसरे शरीरकी प्राप्ति होती है - इन दोनोंमें क्या सत्य है? यह हमें बतानेकी कृपा करें।

सूतजीने कहा - हे महाभाग! आप लोगोंने अच्छा प्रश्न किया है। आप लोगोंको संदेह हो यह असम्भव है। आप लोगोंने तो लोकहितसे प्रेरित होकर ही ऐसा प्रश्न किया है। हे विप्रगणो! मैं आप सबके हृदयमें अवस्थित उस संदेहको भगवान्‌ श्रीकृष्ण और गरुडके बीच हुए संवादके द्वारा दूर करूँगा। सर्वप्रथम मैं उन भगवान्‌ श्रीकृष्णको नमस्कार करता हूँ, जिनका आश्रय लेकर मनुष्य इस भव सागरको एक क्षुद्र नदीकी भाँति अनायास ही पार कर जाते हैं।

हे मुनियो! एक बार विनता पुत्र गरुडके हृदयमें इस ब्रह्माण्डके सभी लोकोंको देखनेकी इच्छा हुई। अतः हरिनामका उच्चारण करते हुए उन्होंने सभी लोकोंका भ्रमण किया। पाताल, पृथ्वीलोक तथा स्वर्गलोकका भ्रमण करते हुए वे पृथ्वी लोकके दुःखसे अत्यन्त दुःखित एवं अशान्तचित्त होकर पुन: वैकुण्ठ लोक वापस आ गये।

वैकुण्ठ लोकमें न रजोगुणकी प्रवृत्ति है, न तमोगुणकी ही प्रवृत्ति है, [मृत्युलोकके समान] रजोगुण तथा तमोगुणसे मिश्रित सत्त्वगुणकी भी प्रवृत्ति वहाँ नहीं है। वहाँ केवल शुद्ध सत्त्वगुण ही अवस्थित रहता है। वहाँ माया भी नहीं है, वहाँ किसीका विनाश नहीं होता। वहाँ राग - द्वेष आदि षड्विकार भी नहीं हैं । वहाँ देव और असुर - वर्गद्वारा पूजित श्याम वर्णकी सुन्दर कान्तिसे सुशोभित राजीवलोचन भगवान्‌ विष्णुके पार्षद विराजमान रहते हैं, जिनके शरीर पीतवसन और मनोहारी आभूषणोंसे विभूषित हैं और मणियुक्त स्वर्णके अलङ्करणोंसे सुशोभित हैं। भगवान्‌के वे सभी पार्षद चार - चार भुजाओंसे युक्त हैं। उनके कानोंमें कुण्डल और सिरपर मुकुट है। उनका वक्षःस्थल सुन्दर पुष्पोंकी मालासे सुशोभित है। मनको मोहित करनेवाली अप्सराओंसे युक्त, महात्माओंके चमकते हुए विमानोंकी पंक्तिकी कान्तिसे वे सभी सदा भास्वरित होते रहते हैं। वहाँ नाना प्रकारके वैभवोंसे समन्वित लक्ष्मी प्रसन्‍नतापूर्वक भगवान्‌ श्रीहरिके चरणोंकी पूजा करती रहती हैं।

गरुडजीने वहाँ देखा कि श्रीहरि झूलेपर विराजमान हैं। सखियों द्वारा स्तुत्य लक्ष्मीजी झूलेमें स्थित भगवान्‌की स्तुति कर रही हैं। अपने लाल - लाल बड़े - बड़े नेत्रोंसे युक्त प्रसन्‍नमुख देवोंके अधिपति, श्रीपति, जगत्पति और यज्ञपति भगवान्‌ श्रीहरि अपने नन्द, सुनन्‍द आदि प्रधान पार्षदोंको देख रहे थे। उनके सिरपर मुकुट, कानोंमें कुण्डल और वक्ष:स्थल श्रीसे सुशोभित था । वे पीताम्बरसे विभूषित थे। उनकी चार भुजाएँ थीं। प्रसन्नमुद्रामें हँसता हुआ उनका मुख था। बहुमूल्य आसनपर विराजमान वे हरि उस समय अपनी अन्यान्य शक्तियोंसे आवृत थे। प्रकृति, पुरुष, महत्‌, अहंकार, पञ्च कर्मेन्द्रिय, पञ्च ज्ञानेन्द्रिय, मन, पञ्च महाभूत तथा पञ्च तन्मात्राओंसे निर्मित शरीरवाले अपने ही स्वरूपमें रमण करते हुए उन भगवान्‌ हरिका दर्शन करनेसे विनतासुत गरुडका अन्तःकरण आनन्दविभोर हो उठा। उनका शरीर रोमाञ्चित हो गया। उनके नेत्रोंसे प्रेमाश्रुओंकी धारा बहने लगी। आनन्दमग्न होकर उन्होंने प्रभुको प्रणाम किया। प्रणाम करते हुए अपने वाहन गरुडको देखकर भगवान्‌ विष्णुने कहा - हे पक्षिन्‌! आपने इतने दिनोंमें इस जगत्‌की किस भूमिका परिभ्रमण किया है?

गरुडने कहा - भगवन्‌! आपकी कृपासे मैंने समस्त त्रिलोकीका परिभ्रमण किया है। उनमें स्थित जगत्‌के सभी स्थावर और जङ्गम प्राणियोंको भी देखा। हे प्रभो! यमलोकको छोड़कर पृथ्वी लोकसे सत्यलोकतक सब कुछ मेरे द्वारा देखा जा चुका है। सभी लोकोंकी अपेक्षा भूलोंक प्राणियोंसे अधिक परिपूर्ण है। सभी योनियोंमें मानवयोनि ही भोग और मोक्षका शुभ आश्रय है। अत: सुकृतियोंके लिये ऐसा लोक न तो अभीतक बना है और न भविष्यमें बनेगा। देवता लोग भी इस लोककी प्रशंसामें गीत गाते हुए कहते हैं - ‘जो लोग पवित्र भारतकी भूमिमें जन्म लेकर निवास करते हैं, वे धन्य हैं। देवता लोग भी स्वर्ग एवं अपवर्गरूप फलकी प्राप्तिके लिये पुनः भारत भूमिमें मनुष्यरूपमें जन्म लेते हैं’-

गायन्ति देवा: किल गीतकानि धन्यास्तु ये भारतभूमिभागे।

स्वर्गापवर्गस्थ फलार्जनाय भवन्ति भूय: पुरुषा: सुरत्वात्‌॥

हे प्रभो! आप यह बतानेकी कृपा करें कि मृत्युको प्राप्त हुआ प्रेत किस कारण पृथ्वीपर डाल दिया जाता है?

उसके मुखमें पञ्चरत्न (सोना, चाँदी, मोती, लाजावर्त(लाजवर्द)तथा मूँगा - ये पाँच पञ्चरत्न कहलाते हैं। )क्यों डाला जाता है? मरे हुए प्राणीके नीचे लोग कुश किसलिये बिछा देते हैं? उसके दोनों पैर दक्षिण दिशाकी ओर क्यों कर दिये जाते हैं? मरनेके समय मनुष्यके आगे पुत्र - पौत्रादि क्‍यों खड़े रहते हैं? हे केशव! मृत्युके समय विविध वस्तुओंका दान एवं गोदान किसलिये दिया जाता है? बन्धु - बान्धव, मित्र और शत्रु आदि सभी मिलकर क्‍यों क्षमा - याचना करते हैं? किससे प्रेरित होकर लोग मृत्युकालमें तिल, लोहा, स्वर्ण, कपास, नमक, सप्तधान्य,( जौ, धान, तिल, कँगनी, मूँग,चना तथा साँवा - ये सप्तधान्य कहलाते हैं।) भूमि और गौका दान देते हैं? प्राणी कैसे मरता है और मरनेके बाद कहाँ जाता है? उस समय वह आतिवाहिक शरीर (निराधार - रूपमें आत्माको वहन करनेवाले शरीर) - को कैसे प्राप्त करता है? अग्नि देनेवाले पुत्र और पौत्र उसे कन्धेपर क्यों ले जाते हैं? शवमें घृतका लेप क्‍यों किया जाता है? उस समय एक आहुति देनेकी परम्परा कहाँसे चली है? शवको भूमिस्पर्श किसलिये करवाया जाता है? स्त्रियाँ उस मरे हुए व्यक्तिके लिये क्‍यों विलाप करती हैं? शवके उत्तर दिशामें ‘यमसूक्त’ का पाठ क्‍यों किया जाता है? मरे हुए व्यक्तिको पीनेके लिये जल एक ही वस्त्र धारण करके क्‍यों दिया जाता है? उस समय सूर्य - बिम्ब - निरीक्षण, पत्थरपर स्थापित यव, सरसों, दूर्वा और नीमकी पत्तियोंका स्पर्श करनेका विधान क्‍यों है? उस समय स्त्री एवं पुरुष दोनों नीचे - ऊपर एक ही वस्त्र क्यों धारण करते हैं? शवका दाह - संस्कार करनेके पश्चात्‌ उस व्यक्तिको अपने परिजनोंके साथ बैठकर भोजनादि क्‍यों नहीं करना चाहिये? मरे हुए व्यक्तिके पुत्र दस दिनके पूर्व किसलिये पिण्डोंका दान देते हैं? चबूतरे (वेदी) - पर पके हुए मिट्टीके पात्रमें दूध क्यों रखा जाता है? रस्सीसे बँधे हुए तीन काष्ठ (तिगोड़िया)-के ऊपर रात्रिमें गाँवके चौराहेपर एकान्तमें वर्षपर्यन्त प्रतिदिन दीपक क्‍यों दिया जाता है? शवका दाह - संस्कार तथा अन्य लोगोंके साथ जल - तर्पणकी क्रिया क्‍यों की जाती है? हे भगवन्‌! मृत्युके बाद प्राणी आतिवाहिक शरीरमें चला जाता है, उसके लिये नौ पिण्ड देने चाहिये, इसका क्या प्रयोजन है? किस विधानसे पितरोंको पिण्ड प्रदान करना चाहिये और उस पिण्डको स्वीकार करनेके लिये उनका आवाहन कैसे किया जाय?

हे देव! यदि ये सभी कार्य मरनेके तुरंत बाद सम्पन्न हो जाते हैं तो फिर बादमें पिण्डदान क्‍यों किया जाता है? पूर्व किये गये पिण्ड दानके बाद पुन: पिण्डदान या अन्य क्रियाओंको करनेकी कया आवश्यकता है? दाह - संस्कारके बाद अस्थि - संचयन और घट फोड़नेका विधान क्‍यों है? दूसरे दिन और चौथे दिन साग्निक द्विजके स्नानका विधान क्‍यों है? दसवें दिन सभी परिजनोंके साथ शुद्धिके लिये स्नान क्‍यों किया जाता है? दसवें दिन तेल एवं उबटनका प्रयोग क्‍यों किया जाता है। उस तेल और उबटनका प्रयोग भी एक विशाल जलाशयके तटपर होना अपेक्षित है, इसका क्या कारण है? दसवें दिन पिण्डदान क्‍यों करना चाहिये? एकादशाहके दिन वृषोत्सर्ग आदिके सहित पिण्डदान करनेका क्‍या प्रयोजन है? पात्र, पादुका, छत्र, वस्त्र तथा अंगूठी आदि वस्तुओंका दान क्‍यों दिया जाता है? तेरहवें दिन पददान क्‍यों दिया जाता है। वर्षपर्यन्त सोलह श्राद्ध क्यों किये जाते हैं तथा तीन सौ साठ सान्‍नोदक घट क्‍यों दिये जाते हैं। प्रेततृप्तिके लिये प्रतिदिन अन्नसे भरे हुए एक घटका दान क्‍यों करना चाहिये।

हे प्रभो! मनुष्य अनित्य है और समय आनेपर ही वह मरता है, किंतु मैं उस छिद्रको नहीं देख पाता हूँ, जिससे जीव निकल जाता है? प्राणीके शरीरमें स्थित किस छिद्रसे पृथ्वी, जल, मन, तेज, वायु और आकाश निकल जाते हैं? हे जनार्दन! इसी शरीरमें स्थित जो पाँच कर्मेन्द्रियाँ और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा पाँच वायु हैं, वे कहाँसे निकल

जाते हैं । लोभ, मोह, तृष्णा, काम और अहंकाररूपी जो पाँच चोर शरीरमें छिपे रहते हैं, वे कहाँसे निकल जाते हैं ।

हे माधव ! प्राणी अपने जीवनकालमें पुण्य अथवा पाप जो कुछ भी कर्म करता है, नाना प्रकारके दान देता है, वे सब शरीरके नष्ट हो जानेपर उसके साथ कैसे चले जाते हैं । वर्षके समाप्त हो जानेपर भी मरे हुए प्राणीके लिये सपिण्डीकरण क्यों होता है ? उस प्रेतकृत्यमें (संपिण्डन) प्रेतपिण्डका मिलन किसके साथ किस विधिसे होना चाहिये, इसे आप बतानेकी कृपा करें।

हे हरे! मूर्च्छासे अथवा पतनसे जिनकी मृत्यु होती है, उनके लिये क्‍या होना चाहिये। जो पतित मनुष्य जलाये गये अथवा नहीं जलाये गये तथा इस पृथ्वीपर जो अन्य प्राणी हैं, उनके मरनेपर अन्तमें क्या होना चाहिये। जो मनुष्य पापी, दुराचारी अथवा हतबुद्धि हैं, मरनेके बाद वे किस स्थितिको प्राप्त करते हैं? जो पुरुष आत्मघाती, ब्रह्महत्यारा, स्वर्णादकी चोरी करनेवाला, मित्रादिके साथ विश्वासघात करनेवाला है, उस महापातकीका क्‍या होता है? हे माधव! जो शूद्र कपिला गौका दूध पीता है अथवा प्रणव महामन्त्रका जप करता है या ब्रह्मसूत्र अर्थात्‌ यज्ञोपवीतको धारण करता है तो मृत्युके बाद उसकी क्‍या गति होती है? हे संसारके स्वामी! जब कोई शूद्र किसी ब्राह्मणीको पत्नी बना लेता है तो उस पापीसे मैं भी डरता हूँ। आप बतायें कि उस पापीकी क्या दशा होती है? साथ ही उस पापकर्मके फलको बतानेकी भी कृपा करें।

हे विश्वात्मन! आप मेरी दूसरी बातपर भी ध्यान दें। मैं कौतूहलवश वेगपूर्वक लोकोंको देखता हुआ सम्पूर्ण जगत्‌में जा चुका हूँ, उसमें रहनेवाले लोगोंको मैंने देखा है कि वे सभी दुःखमें ही डूब रहे हैं। उनके अत्यन्त कष्टोंको देखकर मेरा अन्तःकरण पीड़ासे भर गया है। स्वर्गमें दैत्योंकी शत्रुतासे भय है। पृथ्वी लोकमें मृत्यु और रोगादिसे तथा अभीष्ट वस्तुओंके वियोगसे लोग दुःखित हैं। पाताललोकमें रहनेवाले प्राणियोंको मेरे भयसे दुःख बना रहता है।(पाताल लोकमे नागोंको गरुडका भय रहता है ।) हे ईश्वर! आपके इस वैष्णव पद(वैकुण्ठ)के अतिरिक्त अन्यत्र किसी भी लोकमें ऐसी निर्भयता नहीं दिखायी देती। कालके वशीभूत इस जगत्‌की स्थिति स्वप्नकी मायाके समान असत्य है। उसमें भी इस भारतवर्षमें रहनेवाले लोग बहुत - से दुःखोंको भोग रहे हैं। मैंने वहाँ देखा है कि उस देशके मनुष्य राग - द्वेष तथा मोह आदिमें आकण्ठ डूबे हुए हैं। उस देशमें कुछ लोग अन्धे हैं, कुछ टेढ़ी दृष्टिवाले हैं, कुछ दुष्ट वाणीवाले हैं, कुछ लूले हैं, कुछ लँगड़े हैं, कुछ काने हैं, कुछ बहरे हैं, कुछ गूँगे हैं, कुछ कोढ़ी हैं, कुछ लोमश (अधिक रोमवाले) हैं, कुछ नाना रोगसे घिरे हैं और कुछ आकाश - कुसुमकी तरह नितान्त मिथ्या अभिमानसे चूर हैं। उनके विचित्र दोषोंको देखकर तथा उनकी मृत्युको देखकर मेरे मनमें जिज्ञासा उत्पन्न हो गयी है कि यह मृत्यु क्या है? इस भारत वर्षमें यह कैसी विचित्रता है? ऋषियोंसे मैंने पहले ही इस विषयमें सामान्यतः यह सुन रखा है कि जिसकी विधिपूर्वक वार्षिक क्रियाएँ नहीं होती हैं, उसकी दुर्गति होती है। फिर भी हे प्रभो! इसकी विशेष जानकारीके लिये मैं आपसे पूछ रहा हूँ।

है उपेन्द्र! मनुष्यकी मृत्युके समय उसके कल्याणके लिये कया करना चाहिये? कैसा दान देना चाहिये। मृत्यु और श्मशान - भूमितक पहुँचनेके बीच कौन - सी विधि अपेक्षित है। चितामें शवको जलानेकी क्या विधि है? तत्काल अथवा विलम्बसे उस जीवको कैसे दूसरी देह प्राप्त होती है, यमलोक (संयमनी नगरी) - को जानेवालेके लिये वर्षपर्यन्त कौन - सी क्रियाएँ करनी चाहिये। दुर्बुद्धि अर्थात्‌ दुराचारी व्यक्तिकी मृत्यु होनेपर उसका प्रायश्चित्त क्या है? पञ्चक आदिमें मृत्यु होनेपर पञ्चक शान्तिके लिये क्या करना चाहिये। हे देव! आप मेरे ऊपर प्रसन्‍न हों। आप मेरे इस सम्पूर्ण भ्रमको विनष्ट करनेमें समर्थ हैं। मैंने आपसे यह सब लोकमङ्गलकी कामनासे पूछा है, मुझे बतानेकी कृपा करें।