श्रीनारायण कहते हैं-
नारद! इस प्रकार परशुरामने हर्षमग्न चित्तसे दुर्गाकी स्तुति करके पुनः श्रीहरिद्वारा बतलाये गये स्तोत्रसे गणेशका स्तवन किया। तत्पश्चात् नाना प्रकारके नैवेद्यों, धूपों, दीपों, गन्धों और तुलसीके अतिरिक्त अन्य पुष्पोंसे भक्तिपूर्वक उनकी पूजा की। इस प्रकार परशुरामने भक्तिभावसहित भाई गणेशका भलीभाँति पूजन करके गुरुपत्नी पार्वती और गुरुदेव शिवको नमस्कार किया तथा शंकरकी आज्ञा ले वे वहाँसे जानेको उद्यत हुए।
नारदजीने पूछा-
प्रभो ! परशुरामने जब विविध नैवेद्यों तथा पुष्पोंद्वारा भगवान् गणेशकी पूजा की थी, उस समय उन्होंने तुलसीको छोड़ क्यों दिया? मनोहारिणी तुलसी तो समस्त पुष्पों में मान्य एवं धन्यवादकी पात्र हैं; फिर गणेश उस सारभूत पूजाको क्यों नहीं ग्रहण करते ?
श्रीनारायण बोले-
नारद! ब्रह्मकल्पमें एक ऐसी घटना घटित हुई थी, जो परम गुह्य एवं मनोहारिणी है। उस प्राचीन इतिहासको मैं कहता हूँ, सुनो। एक समयकी बात है। नवयौवन सम्पन्ना तुलसीदेवी नारायणपरायण हो तपस्याके निमित्तसे तीर्थोंमें भ्रमण करती हुई गङ्गा तटपर जा पहुँचीं। वहाँ उन्होंने गणेशको देखा, जिनकी नयी जवानी थी; जो अत्यन्त सुन्दर शुद्ध और पीताम्बर धारण किये हुए थे; जिनके सारे शरीर में चन्दनकी खौर लगी थी; जो रत्नोंके आभूषणों से विभूषित थे; सुन्दरता जिनके मनका अपहरण नहीं कर सकती; जो कामनारहित, जितेन्द्रियों में सर्वश्रेष्ठ और योगीन्द्रोंके गुरु-के-गुरु हैं तथा मन्द मन्द मुस्कराते हुए जन्म, मृत्यु और बुढ़ापाका नाश करनेवाले श्रीकृष्णके चरणकमलोंका ध्यान कर रहे थे; उन्हें देखते ही तुलसीका मन गणेशकी ओर आकर्षित हो गया। तब तुलसी उनसे लम्बोदर तथा गजमुख होनेका कारण पूछकर उनका उपहास करने लगी। ध्यान भङ्ग होनेपर गणेशजीने पूछा- 'वत्से! तुम कौन हो ? किसकी कन्या हो ? यहाँ तुम्हारे आनेका क्या कारण है? माता! यह मुझे बतलाओ; क्योंकि शुभे! तपस्वियोंका ध्यान भङ्ग करना सदा पापजनक तथा अमङ्गलकारी होता है। शुभे! श्रीकृष्ण कल्याण करें, कृपानिधि विघ्नका विनाश करें और मेरे ध्यान भङ्गसे उत्पन्न हुआ दोष तुम्हारे लिये अमङ्गलकारक न हो।' इसपर तुलसीने कहा- प्रभो ! मैं धर्मात्मजकी नवयुवती कन्या हूँ और तपस्यामें संलग्न हूँ। मेरी यह तपस्या पति प्राप्तिके लिये है; अतः आप मेरे स्वामी हो जाइये। तुलसीकी बात सुनकर अगाध बुद्धिसम्पन्न गणेश श्रीहरिका स्मरण करते हुए विदुषी तुलसीसे मधुरवाणीमें बोले।
गणेशने कहा-
हे माता! विवाह करना बड़ा भयंकर होता है; अतः इस विषयमें मेरी बिलकुल इच्छा नहीं है; क्योंकि विवाह दुःखका कारण होता है, उससे सुख कभी नहीं मिलता। यह हरि भक्तिका व्यवधान, तपस्याके नाशका कारण, मोक्षद्वारका किवाड़, भव बन्धनकी रस्सी, गर्भवासकारक, सदा तत्त्वज्ञानका छेदक और संशयोंका उद्गमस्थान है। इसलिये महाभागे ! मेरी ओरसे मन लौटा लो और किसी अन्य पतिकी तलाश करो। गणेशके ऐसे वचन सुनकर तुलसीको क्रोध आ गया। तब वह साध्वी गणेशको शाप देते हुए बोली- 'तुम्हारा विवाह होगा।' यह | सुनकर शिव-तनय सुरश्रेष्ठ गणेशने भी तुलसीको शाप दिया- 'देवि! तुम निस्संदेह असुरद्वारा ग्रस्त होओगी। तत्पश्चात् महापुरुषोंके शापसे तुम वृक्ष हो जाओगी।' नारद! महातपस्वी गणेश इतना कहकर चुप हो गये। उस शापको सुनकर तुलसीने फिर उस सुरश्रेष्ठ गणेशकी स्तुति की। तब प्रसन्न होकर गणेशने तुलसीसे कहा।
गणेश बोले-
मनोरमे! तुम पुष्पोंकी सारभूता होओगी और कलांशसे स्वयं नारायणकी प्रिया बनोगी। महाभागे ! यों तो सभी देवता तुमसे प्रेम करेंगे, परंतु श्रीकृष्णके लिये तुम विशेष प्रिय होओगी। तुम्हारे द्वारा की गयी पूजा मनुष्योंके लिये मुक्तिदायिनी होगी और मेरे लिये तुम सर्वदा त्याज्य रहोगी। तुलसीसे यों कहकर सुरश्रेष्ठ गणेश पुनः तप करने चले गये। वे श्रीहरिकी आराधनामें व्यग्र होकर बदरीनाथके संनिकट गये। इधर तुलसीदेवी दुःखित हृदयसे पुष्करमें जा पहुँची और निराहार रहकर वहाँ दीर्घकालिक तपस्यामें संलग्न हो गयी। नारद! तत्पश्चात् मुनिवरके तथा गणेशके शापसे वह चिरकालतक शङ्खचूडकी प्रिय पत्नी बनी रही। मुने! तदनन्तर असुरराज शङ्खचूड शंकरजीके त्रिशूलसे मृत्युको प्राप्त हो गया, तब नारायणप्रिया तुलसी कलांशसे वृक्षभावको प्राप्त हो गयी। यह इतिहास, जिसका मैंने तुमसे वर्णन किया है, पूर्वकालमें धर्मके मुखसे सुना था। इसका वर्णन अन्य पुराणोंमें नहीं मिलता। यह तत्त्वरूप तथा मोक्ष प्रदान करनेवाला है। तदनन्तर महाभाग परशुराम गणेशका पूजन करके तथा शंकर और पार्वतीको नमस्कार कर तपस्याके लिये वनको चले गये। इधर गणेश समस्त सुरश्रेष्ठों तथा मुनिवरोंसे वन्दित एवं पूजित होकर शिव-पार्वतीके निकट स्थित हुए। जो मनुष्य इस गणपतिखण्डको दत्तचित्त होकर सुनता है, उसे निश्चय ही राजसूययज्ञ के फलकी प्राप्ति होती है। पुत्रहीन मनुष्य श्रीगणेश कृपासे धीर, वीर, धनी, गुणी, चिरजीवी, यशस्वी, पुत्रवान्, विद्वान्, श्रेष्ठ कवि, जितेन्द्रियोंमें श्रेष्ठ, समस्त सम्पदाओंका दाता, परम पवित्र, सदाचारी, प्रशंसनीय, विष्णुभक्त, अहिंसक, दयालु और तत्त्वज्ञानविशारद पुत्र पाता है। महावन्ध्या स्त्री वस्त्र, अलंकार और चन्दनद्वारा भक्तिपूर्वक गणेशकी पूजा करके और इस गणपतिखण्डको सुनकर पुत्रको जन्म देती है। जो मनुष्य नियमपरायण हो मनमें किसी कामनाको लेकर इसे सुनता है, सुरश्रेष्ठ गणेश उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण कर देते हैं। विघ्ननाशके लिये यत्नपूर्वक इस गणपतिखण्डको सुनकर वाचकको सोनेका यज्ञोपवीत, श्वेत छत्र, श्वेत अश्व, श्वेतपुष्पोंकी माला, स्वस्तिक मिष्टान्न, तिलके लड्डू और देशकालोद्भव पके हुए फल प्रदान करना चाहिये। (अध्याय ४६)
॥ गणपतिखण्ड सम्पूर्ण ॥
Summary of chapter 40 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Gaṇeśa Khaṇḍa is as follows:
In this illuminating chapter, Lord Śrī Kṛshṇa explained the deep esoteric meanings behind the primary names of Lord Gaṇeśa, particularly the revered title Ekadanta. He revealed that the syllable Eka signifies the single, supreme Parabrahman, while Danta signifies the mighty power that shatters all illusions and demonic tendencies, making Ekadanta the supreme symbol of non-dual spiritual truth. The text outlines the eight principal names of Gaṇeśa—Vighnanāsha, Ekadanta, Heramba, Lambodara, Gajanana, Vināyaka, Gaṇādhyaksha, and Bhālachandra—promising that whoever recites these holy names daily becomes free from all obstacles, poverty, and fear.