श्री ब्रह्म वैवर्त महापुराण - गणेश खंड

25- जमदग्नि और कार्तवीर्यका युद्ध तथा ब्रह्माद्वारा उसका निवारण

नारायण कहते हैं-

नारद ! तदनन्तर कार्तवीर्यने दुःखी हृदयसे श्रीहरिका स्मरण किया और कुपित हो मुनिके पास दूत भेजकर कहलवाया 'मुनिश्रेष्ठ! युद्ध कीजिये अथवा मुझ अतिथि एवं भृत्यको मेरी वाञ्छित गौ दीजिये। भलीभािँ विचार करके जो उचित समझिये वही कीजिये। दूतकी यह बात सुनकर मुनिवर जमदग्नि ठहाका मारकर हँस पड़े और जो हितकारक, सत्य, नीतिका सार तत्त्व था, वह सब दूतसे कहने लगे ।

मुनि बोले-

दूत ! राजाको आहाररहित देखकर मैं उसे अपने घर ले आया और यथोचितरूपसे शक्तिके अनुसार अनेक प्रकारके व्यञ्जन भोजन कराये। अब वह राजा मेरी प्राणों प्यारी कपिलाको बलपूर्वक माँग रहा है। मैं उसे देनेमें सर्वथा असमर्थ हूँ; अतः युद्ध-दान दूँगा -यह निश्चित है। मुनिका वह वचन सुनकर दूत लौट गया और सभाके मध्यभागमें भयके कारण कवच धारण करके बैठे हुए नरेशसे सारा वृत्तान्त कह सुनाया।

इधर मुनिने कपिलासे कहा- 'इस समय मैं क्या करूँ; क्योंकि जैसे कर्णधारके बिना नौका अनियन्त्रित रहती है, वही दशा मेरे बिना इस सेनाकी हो रही है। तब कपिलाने मुनिको अनेक प्रकारके शस्त्र युद्धशास्त्रकी शिक्षा और उसके उपयोगमें आनेवाले संधान आदिका ज्ञान प्रदान करते हुए कहा- 'विप्रवर! आपकी जय हो। आप युद्धमें निश्चय ही शत्रुको जीत लेंगे तथा यह भी ध्रुव है कि अमोघ दिव्यास्त्रके बिना आपकी मृत्यु नहीं होगी। आप ब्राह्मण हैं; अतः आपका दत्तात्रेयके शिष्य एवं अमोघ शक्तिधारी राजाके साथ युद्ध होना युक्त नहीं है।' ब्रह्मन् ! इतना कहकर मनस्विनी कपिला चुप हो गयी। तब मनस्वी मुनिने सेनाको सुसज्जित किया और उस सारी सेनाको साथ लेकर वे युद्धस्थलको प्रस्थित हुए। उधर राजा भी युद्धके लिये आ डटा। उसने मुनिवर जमदग्निको प्रणाम किया। फिर दोनों सेनाओंमें अत्यन्त दुष्कर युद्ध होने लगा। उस युद्धमें कपिलाकी सेनाने बलपूर्वक राजाकी सारी सेनाको जीत लिया और खेल-ही खेलमें राजाके विचित्र रथको चूर-चूर कर दिया। फिर हँसते-हँसते राजाके कवच और धनुषको भी छिन्न-भिन्न कर डाला। इस प्रकार राजा कार्तवीर्य कपिलाकी सेनाको जीतने में असमर्थ हो गया। उन सेनाओंने शस्त्रोंकी वर्षासे राजाको हथियार रख देनेके लिये विवश कर दिया। तत्पश्चात् बाणों तथा शस्त्रोंकी वर्षासे राजा मूच्छित हो गया। उस समय राजाकी कुछ सेना तो मर चुकी थी और कुछ भाग खड़ी हुई। मुने! जब कृपासागर मुनिवर जमदग्निने देखा कि मेरा अतिथि बना हुआ राजराजेश्वर कार्तवीर्य मूर्च्छित हो गया है, तब कृपापरवश हो उन्होंने उस सेनाको लौटा लिया। फिर तो वह कृत्रिम सेना जाकर कपिलाके शरीरमें विलीन हो गयी। तदनन्तर कृपालु मुनिने शीघ्र ही राजाको अपनी चरण धूलि देकर 'तुम्हारी जय हो' ऐसा शुभाशीर्वाद - प्रदान किया और अपने कमण्डलुके जलके छींटे देकर उसे चैतन्य कराया। होशमें आनेपर वह राजा युद्धभूमिमें उठकर खड़ा हो गया और भक्तिपूर्वक हाथ जोड़े हुए उसने मुनिवरको सिर झुकाकर प्रणाम किया। तब मुनिने राजाको शुभाशीष देकर हृदयसे लगा लिया और पुनः उसे स्नान कराकर यत्नपूर्वक भोजन कराया; क्योंकि ब्राह्मणोंका हृदय सदा मक्खनके समान कोमल होता है; परंतु दूसरोंका हृदय सदा छुरेकी धारके सदृश तेज, असाध्य और दारुण होता है। तत्पश्चात् मुनिवरने राजासे कहा- 'नरेश ! अब तुम अपने घर लौट जाओ।'

तब राजाने कहा-

महाबाहो ! युद्ध कीजिये अथवा मेरी अभीष्ट गौ मुझे समर्पित कीजिये।

नारायण कहते हैं –

नारद! भूपालके वचनको - सुनकर मुनिवरने श्रीहरिका स्मरण करके जो हितकर, सत्य और नीतिका साररूप था, ऐसा वचन कहना आरम्भ किया।

मुनिने कहा-

महाभाग ! अपने घर जाओ और सनातनधर्मकी रक्षा करो; क्योंकि धर्मके सुरक्षित रहनेपर सारी सम्पत्तियाँ सदा स्थिररूपसे निवास करती हैं- यह पूर्णतया निश्चित है। राजन्! तुम्हें भोजनसे वञ्चित देखकर मैं अपने घर लाया और विधिपूर्वक यथाशक्ति तुम्हारा आदर सत्कार किया। इस समय तुम्हें मूच्छित देखकर मैंने चरणधूलि और शुभाशीर्वाद दिया, जिससे तुम्हारी मूर्च्छा दूर हुई; अतः तुम्हारा ऐसा कहना उचित नहीं है। उस वचनको सुनकर राजाने मुनिवरको प्रणाम किया और एक-दूसरे रथपर सवार हो 'युद्ध कीजिये'– ऐसे ललकारा। तब मुनि भी कवच धारण करके उससे युद्ध करनेके लिये उद्यत हो गये। क्रोधके कारण राजाकी बुद्धि मारी गयी थी; अतः वह मुनिके साथ जूझने लगा। मुनिने कपिलाद्वारा दी गयी शक्ति और शस्त्रके बलसे राजाको शस्त्रहीन करके मूर्च्छित कर दिया। तब कमललोचन राजा कार्तवीर्य पुनः होशमें आकर क्रोधपूर्वक मुनिके साथ लोहा लेने लगा। उस नृपश्रेष्ठने समरभूमिमें आग्नेयास्त्रका प्रयोग किया, तब मुनिने वारुणास्त्रद्वारा उसे हँसते-हँसते शान्त कर दिया। फिर राजाने रणभूमिमें मुनिके ऊपर वारुणास्त्र फेंका, तब मुनिने लीलापूर्वक वायव्यास्त्रद्वारा उसे शान्त कर दिया। तब राजाने युद्धस्थलमें वायव्यास्त्र चलाया; मुनिने उसे उसी क्षण गान्धर्वास्त्रद्वारा निवारण कर दिया। फिर नरेशने रणके मुहानेपर नागास्त्र छोड़ा, मुनिवरने उसे हर्षपूर्वक तत्काल ही गारुड़ास्त्रद्वारा प्रतिहत कर दिया। तब नृपवरने, जो सैकड़ों सूर्योके समान कान्तिमान् एवं दसों दिशाओंको उद्दीप्त करनेवाला था, उस माहेश्वर नामक महान् अस्त्रका प्रयोग किया। नारद! तब मुनिने बड़े यत्नके साथ त्रिलोकव्यापी दिव्य वैष्णवास्त्रद्वारा उसका निवारण कर दिया और फिर यत्नपूर्वक नारायणास्त्र चलाया। उस अस्त्रको देखकर महाराज कार्तवीर्य उसे नमस्कार करके शरणागत हो गया। तब प्रलयाग्निके समान वह अस्त्र वहाँ ऊपर ही ऊपर - घूमकर क्षणभरतक दसों दिशाओंको प्रकाशित करके स्वयं अन्तर्धान हो गया। फिर मुनिने रणके मुहानेपर जृम्भणास्त्र छोड़ा। उस अस्त्रके प्रभाव से राजाको निद्राने आ घेरा और वह मृतक-तुल्य होकर सो गया। तब राजाको निद्रित देखकर मुनिने उसी क्षण अर्धचन्द्रद्वारा उस भूपालके सारथि, रथ और धनुषबाणको छिन्न-भिन्न कर दिया। क्षुरप्रसे मुकुट, छत्र और कवच काट डाला तथा भाँति-भाँतिके अस्त्र प्रयोगसे उसके अस्त्र, तरकस और घोड़ोंकी धज्जियाँ उड़ा दीं फिर युद्धस्थलमें हँसते हुए मुनिने खेल-ही-खेलमें नागास्त्रद्वारा राजाके सभी मन्त्रियोंको बाँधकर कैद कर लिया; फिर लीलापूर्वक उत्तम मन्त्रका प्रयोग करके उस राजाको जगाया और उन बँधे हुए सभी मन्त्रियोंको उसे दिखाया। राजाको दिखाकर मुनिने तत्काल ही उन्हें बन्धन मुक्त कर दिया और नरेशको आशीर्वाद देकर कहा- 'राजन् ! अब अपने घर जाओ।' परंतु राजा क्रोधसे भरा हुआ था। उसने उठकर त्रिशूल उठा लिया और यत्नपूर्वक उसे मुनिवर जमदग्रिपर चला दिया। तब मुनिने उसपर शक्तिसे प्रहार किया। इसी बीच उस युद्धस्थलमें ब्रह्माने आकर उत्तम नीतिद्वारा उन दोनों में परस्पर प्रेम स्थापित करा दिया। तब मुनिने | संतुष्ट होकर रणक्षेत्रमें ब्रह्माके चरणोंमें प्रणिपात किया और राजा ब्रह्मा तथा मुनिको नमस्कार करके अपने घरको प्रस्थान कर गया। फिर मुनि और ब्रह्मा अपने-अपने भवनको चले गये। इस प्रकार इसका वर्णन तो कर दिया, अब आगे तुमसे कुछ और कहूँगा (अध्याय २५-२६)