श्री ब्रह्म वैवर्त महापुराण - गणेश खंड

27- जमदग्नि-कार्तवीर्य-युद्ध, कार्तवीर्यद्वारा दत्तात्रेयदत्त शक्तिके प्रहारसे जमदग्निका - वध, रेणुकाका विलाप, परशुरामका आना और क्षत्रियवधकी प्रतिज्ञा करना, भृगुका आकर उन्हें सान्त्वना देना

नारायण कहते हैं-

नारद! राजा घर लौट तो गया पर उसके मनमें युद्धकी लगी रही; इस उसने लाखों सेना संग्रह करके फिर जमदग्निके आश्रमपर जाकर आश्रमको घेर लिया। राजाकी विशाल सेनाको देखकर जमदग्निके आश्रमवासी भयसे मूच्छित हो गये। महर्षिने मन्त्रोच्चारणपूर्वक बाणोंका एक ऐसा जाल बिछाया कि उससे आश्रमभूमि पूरी ढक गयी सारी सेना उसीमें आबद्ध हो गयी। तब राजाने रथसे उतरकर महर्षिको नमस्कार किया। महर्षिने उसे आशीर्वाद दिया। राजाने फिर आक्रमण किया। यों कई बार राजा आक्रमण करता रहा, मूर्च्छित होता रहा, पर क्षमाशील मुनिने उसका वध नहीं किया बड़ा घोर युद्ध हुआ। अन्तमें राजा कार्तवीर्यने दत्तात्रेय मुनिके द्वारा प्राप्त एक पुरुषका नाश करनेवाली अमोघ शक्तिका प्रयोग किया। वह भगवान् विष्णुकी शक्ति थी। उसने मुनिके हृदयको बींध डाला। मुनिने उसके आघातसे जीवनविसर्जन कर दिया। शक्ति भगवान् विष्णुके पास चली गयी।

जगत्में हाहाकार मच गया। कपिला गौ 'तात तात' पुकारती हुई गोलोकको प्रस्थान कर - गयी। तदनन्तर राजा कार्तवीर्यार्जुन ब्रह्महत्या जनित पापका प्रायश्चित्त करके अपनी राजधानीको लौट गया।

इधर पतिव्रता महर्षिपत्नी रेणुका पतिके मरणसे अत्यन्त दुःखी होकर रोने लगीं। वे अपने पुत्र परशुरामको पुकारने लगीं। उस समय योगी परशुराम पुष्करमें थे। वे उसी क्षण मानस-गतिसे

चलकर माताके पास आ पहुँचे। उन्होंने माताको प्रणाम किया और पिताकी अन्त्येष्टि - क्रियाकी तैयारी की सारी बातें सुनकर माता युद्ध न करनेका अनुरोध करनेपर भी भार्गव परशुरामने इक्कीस बार पृथ्वीको क्षत्रियहीन करनेकी प्रतिज्ञा कर ली और राजा कार्तवीर्यार्जुनके वध करनेका प्रण कर लिया। फिर विलाप करती हुई पति शोकपीड़िता माताको समझाते - हुए बोले !

परशुरामने कहा-

माता ! जो पिताकी आज्ञा भङ्ग करनेवाले तथा पिताके हिंसकका वध नहीं करता, वह महान् मूर्ख है। उसे निश्चय ही रौरव नरकमें जाना पड़ता है। आग लगानेवाला, विष देनेवाला, हाथमें हथियार लेकर मारनेके लिये आनेवाला, धनका अपहरण करनेवाला, क्षेत्रका विनाश करनेवाला, स्त्रीको चुरानेवाला, पिताका वध करनेवाला, बन्धुओंकी हिंसा करनेवाला, सदा अपकार करनेवाला, निन्दक और कटु वचन कहनेवाला- ये ग्यारह वेदविहित घोर पापी हैं। ये मार डालने योग्य हैं। इसी बीच वहाँ स्वयं महर्षि भृगु आ पहुँचे। वे मनस्वी मुनि अत्यन्त भयभीत थे और उनका  हृदय दुःखी था। उन्हें देखकर रेणुका और परशुराम उनके चरणोंपर गिर पड़े। तब भृगुमुनि उन दोनोंसे ऐसी वेदोक्त बात कहने लगे जो परलोकके लिये हितकारिणी थी।

भृगुजी बोले -

बेटा ! तुम तो मेरे वंशमें उत्पन्न और ज्ञानसम्पन्न हो; फिर विलाप कैसे कर रहे हो। इस संसारमें सभी चराचर प्राणी जलके बुलबुलेके समान क्षणभङ्गुर हैं। पुत्र ! सत्यके सार तथा सत्यके बीज तो श्रीकृष्ण ही हैं। तुम उन्हींका स्मरण करो। वत्स! जो बीत गया, सो गया; क्योंकि बीती हुई बात पुनः लौटती नहीं। जो होनेवाला है, वह होता ही है और आगे भी जो होनेवाला होगा वह होकर ही रहेगा; क्योंकि निषेकजन्य (प्रारब्धजन्य) कर्म सत्य (अटल) होता है। भला, कर्मफलभोगको कौन हटा सकता है? है ? वत्स! श्रीकृष्णने जिस प्रकारके भूत, वर्तमान और भविष्यकी रचना की है, उनके द्वारा निरूपित उस कर्मको कौन निवारण कर सकता है? बेटा! मायाका कारण, मायावियोंके पाञ्चभौतिक शरीर और संकेतपूर्वक नाम- ये प्रातः कालके स्वप्नसदृश निरर्थक हैं। परमात्माके अंशभूत आत्माके चले जानेपर भूख, निद्रा, दया, शान्ति, क्षमा, कान्ति, प्राण, मन तथा ज्ञान सभी चले जाते हैं। जैसे राजाधिराजके पीछे नौकर-चाकर चलते हैं, उसी प्रकार बुद्धि तथा सारी शक्तियाँ उसीका अनुगमन करती हैं; अतः तुम यत्नपूर्वक श्रीकृष्णका भजन करो। बेटा! कौन किसके पितर हैं और कौन किसके पुत्र हैं। ये सभी इस दुस्तर भवसागरमें कर्मरूपी लहरियोंसे प्रेरित हो रहे हैं। पुत्र ! ज्ञानीलोग विलाप नहीं करते, अतः अब तुम भी रुदन मत करो; क्योंकि रोनेके कारण आँसुओंके गिरनेसे मृतकोंको निश्चय ही नरकमें जाना पड़ता है।(ज्ञानिनो मा रुदन्त्येव मा रोदीः पुत्र साम्प्रतम् रोदनाश्रुप्रपतनान्मृतानां नरकं ध्रुवम् ॥ (२७।६२)) भाई-बन्धु आदि कुटुम्बके लोग जिस सांकेतिक नामका उच्चारण करके रुदन करते हैं, उसे वे सौ वर्षोंतक रोते रहनेपर भी नहीं पा सकते - यह निश्चित है; क्योंकि त्वचा आदि पृथ्वीके अंशको पृथ्वी, जलांशको जल, शून्यांशको आकाश, वायुके अंशको वायु तथा तेजांशको तेज ग्रहण कर लेता है। इस प्रकार सभी अंश अपने-अपने अंशीमें विलीन हो जाते हैं; फिर रोनेसे कौन वापस आयेगा। मरनेके बाद तो नाम, शास्त्र, ज्ञान, यश और कर्मकी कथामात्र अवशिष्ट रह जाती है। इसलिये जो वेदविहित पारलौकिक कर्म है, इस समय तुम वही करो; क्योंकि जो परलोकके लिये हितकारी हो, वही वास्तवमें पुत्र है और वही बन्धु है। भृगुके उस वचनको सुनकर महासाध्वी रेणुकाने उसी क्षण शोकका परित्याग कर दिया और मुनिसे कहना आरम्भ किया। (अध्याय २७)