श्री ब्रह्म वैवर्त महापुराण - गणेश खंड

40- परशुरामद्वारा पुत्रसहित राजा सहस्त्राक्षका वध, कार्तवीर्य परशुराम युद्ध, परशुरामकी मूर्च्छा, शिवद्वारा उन्हें पुनर्जीवन दान, कार्तवीर्य परशुराम संवाद, - आकाशवाणी सुनकर शिवका विप्रवेष धारण करके कार्तवीर्यसे कवच माँग लेना, परशुद्वारा कार्तवीर्य तथा अन्यान्य क्षत्रियोंका संहार, ब्रह्माका आगमन और परशुरामको गुरुस्वरूप शिवकी शरणमें जानेका उपदेश देकर स्वस्थानको लौट जाना

श्रीनारायण कहते हैं-

नारद! जब भगवान् विष्णु महालक्ष्मीकवच तथा दुर्गाकवचको लेकर वैकुण्ठको चले गये, तब भृगुनन्दन परशुरामने पुत्रसहित राजा (पुष्कराक्षका दूसरा नाम प्रतीत होता है।) सहस्राक्षपर प्रहार किया। यद्यपि राजा कवचहीन था तथापि वह प्रयत्नपूर्वक ब्रह्मास्त्रद्वारा एक सप्ताहतक युद्ध करता रहा। अन्ततोगत्वा पुत्रसहित धराशायी हो गया। सहस्राक्षके गिर जानेपर महाबली कार्तवीर्यार्जुन दो लाख अक्षौहिणी सेनाके साथ स्वयं युद्ध करनेके लिये आया। वह रत्ननिर्मित खोलसे आच्छादित स्वर्णमय रथपर सवार हो अपने चारों ओर नाना प्रकारके अस्त्रोंको सुसज्जित करके रणके मुहानेपर डटकर खड़ा हो गया। परशुरामने राजराजेश्वर कार्तवीर्यको समरभूमिमें उपस्थित देखा। वह रत्ननिर्मित आभूषणोंसे सुशोभित करोड़ों राजाओंसे घिरा हुआ था। रत्ननिर्मित छत्र उसकी शोभा बढ़ा रहा था। वह रत्नोंके गहनोंसे विभूषित था। उसके सर्वाङ्गमें चन्दनकी खौर लगी हुई थी। उसका रूप अत्यन्त मनोहर था और वह मन्द मन्द मुस्करा रहा था। राजा मुनिवर परशुरामको देखकर रथसे उतर पड़ा और उन्हें प्रणाम करके पुनः रथपर सवार हो राज समुदायके साथ सामने खड़ा हुआ। तब परशुरामने राजाको समयोचित शुभाशीर्वाद दिया और पुनः यों कहा-'अनुयायियोंसहित तुम स्वर्ग में जाओ।' नारद! इसके बाद वहाँ दोनों सेनाओं में युद्ध होने लगा। तब परशुरामके शिष्य तथा उनके महाबली भाई कार्तवीर्यसे पीड़ित होकर भाग खड़े हुए। उस समय उनके सारे अङ्ग घायल हो गये थे। राजाके बाणसमूहसे आच्छादित होनेके कारण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ परशुरामको अपनी तथा राजाकी सेना ही नहीं दीख रही थी। फिर तो परस्पर घोर दिव्यास्त्रोंका प्रयोग होने लगा। अन्तमें राजाने दत्तात्रेयके दिये हुए अमोघ शूलको यथाविधि मन्त्रोंका पाठ करके परशुरामपर छोड़ दिया। उस सैकड़ों सूर्योके समान प्रभाशाली एवं प्रलयानिकी शिखाके सदृश शूलके लगते ही परशुराम धराशायी हो गये। तदनन्तर भगवान् शिवने वहाँ आकर परशुरामको पुनर्जीवन दान दिया। इसी समय वहाँ युद्धस्थलमें भक्तवत्सल कृपालु भगवान् दत्तात्रेय शिष्यकी रक्षा करने के लिये आ पहुँचे। फिर परशुरामने क्रुद्ध होकर पाशुपतास्त्र हाथमें लिया; परंतु दत्तात्रेयकी दृष्टि पड़नेसे वे रणभूमिमें स्तम्भित हो गये। तब रणके मुहानेपर स्तम्भित हुए परशुरामने देखा कि जिनके शरीरकी कान्ति नूतन जलधरके सदृश है; जो हाथमें वंशी लिये बजा रहे हैं; सैकड़ों गोप जिनके साथ हैं; जो मुस्कराते हुए प्रज्वलित सुदर्शन चक्रको निरन्तर घुमा रहे हैं और अनेकों पार्षदोंसे घिरे हुए हैं एवं ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर जिनका स्तवन कर रहे हैं; वे गोपवेषधारी श्रीकृष्ण युद्धक्षेत्र में राजाकी रक्षा कर रहे हैं। इसी समय वहाँ यों आकाशवाणी हुई— 'दत्तात्रेयद्वारा दिया हुआ परमात्मा श्रीकृष्णका कवच उत्तम रत्नकी गुटिकाके साथ राजाकी दाहिनी भुजापर बँधा हुआ है, अतः योगियोंके गुरु शंकर भिक्षारूपसे जब उस कवचको माँग लेंगे, तभी परशुराम राजाका वध करनेमें समर्थ हो सकेंगे।' नारद! उस आकाशवाणीको सुनकर शंकर ब्राह्मणका रूप धारण करके गये और राजासे याचना करके उसका कवच माँग लाये। फिर शम्भुने श्रीकृष्णका वह कवच परशुरामको दे दिया। इसके बाद देवगण अपने-अपने उत्तम स्थानको चले गये। तब परशुरामने राजाको युद्धके लिये प्रेरित करते हुए कहा।

परशुरामजी बोले-

राजेन्द्र ! उठो और साहसपूर्वक युद्ध करो; क्योंकि मनुष्योंकी जय पराजयमें काल ही कारण है। तुमने विधिपूर्वक शास्त्रों का अध्ययन किया है, दान दिया है, सारी पृथ्वीपर उत्तम रीतिसे शासन किया है, संग्राम में यशोवर्धक कार्य किया है, इस समय मुझे मूर्च्छित कर दिया है, सभी राजाओंको जीत लिया है, लीलापूर्वक रावणको काबूमें कर लिया है और दत्तात्रेयद्वारा दिये गये त्रिशूलसे मुझे पराजित कर दिया है; परंतु शंकरजीने मुझे पुनः जीवित कर दिया है। परशुरामकी बात सुनकर परम धर्मात्मा राजा कार्तवीर्यने सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और यथार्थ बात कहना आरम्भ किया।

राजाने कहा-

प्रभो! मैंने क्या अध्ययन किया, क्या दान दिया अथवा पृथ्वीका क्या उत्तम शासन किया ? भूतलपर मेरे समान कितने भूपाल इस लोकसे चले गये। मेरी बुद्धि, तेज, पराक्रम, विविध प्रकारकी युद्ध-निपुणता, लक्ष्मी, ऐश्वर्य, ज्ञान, दानशक्ति, लौकिक गुण, आचार, विनय, विद्या, प्रतिष्ठा, परम तप ये सभी मनोरमाके साथ ही नष्ट हो गये। समय आनेपर इन्द्र मानव हो जायँगे। समय आनेपर ब्रह्मा भी मरेंगे। समय आनेपर प्रकृति श्रीकृष्णके शरीरमें तिरोहित हो जायगी। समय आनेपर सभी देवता मर जायँगे और समय आनेपर त्रिलोकीमें स्थित समस्त चर अचर प्राणी नष्ट हो जाते हैं। कालका अतिक्रमण करना दुष्कर है। परात्पर श्रीकृष्ण उस काल के-काल हैं और स्वेच्छानुसार सृष्टिरचयिताके स्त्रष्टा, संहारकर्ताके संहारक और पालन करनेवाले के पालक हैं। जो महान्, स्थूलसे स्थूलतम, सूक्ष्मसे सूक्ष्मतम, कृश, परमाणुपरक काल, कालभेदक काल है। सारे विश्व जिसके रोयें हैं; वह महाविराट् पुरुष तेजमें परमात्मा श्रीकृष्ण के सोलहवें अंशके बराबर है, जिससे क्षुद्र विराट् उत्पन्न हुआ है, जो सबका उत्कृष्ट कारण है। जो स्वयं स्स्रष्टा है और ब्रह्मा जिसके नाभिकमलसे उत्पन्न हुए हैं। उस समय ब्रह्मा यत्नपूर्वक लाखों वर्षोंतक भ्रमण करनेपर भी जब नाभिकमलके दण्डका अन्त न पा सके, तब अपने स्थानपर स्थित हो गये। वहाँ उन्होंने वायुका आहार करके एक लाख वर्षतक तप किया। तदनन्तर उन्हें गोलोक तथा पार्षदसहित श्रीकृष्णके दर्शन हुए। उस समय श्रीकृष्ण गोप और गोपियों से घिरे हुए थे, उनके दो भुजाएँ थीं, हाथमें मुरली लिये हुए थे, रत्न सिंहासनपर आसीन थे और राधाको वक्षःस्थलसे लगाये हुए थे। उन्हें देखकर ब्रह्माने बारंबार प्रणाम किया और ईश्वरेच्छा जानकर उनकी आज्ञा ले सृष्टिकी रचना करनेमें मन लगाया। शिव, जो सृष्टिके संहारक हैं, वे सृष्टि कर्ताके ललाटसे उत्पन्न हुए हैं। श्वेतद्वीपनिवासी क्षुद्र विराट् विष्णु पालनकर्ता हैं। सृष्टिके कारणभूत ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर सभी विश्वोंमें श्रीकृष्णकी कलासे उत्पन्न हुए हैं। प्रकृति सबको जन्म देनेवाली है और श्रीकृष्ण प्रकृतिसे परे हैं। मायापति परमेश्वर भी उस प्रकृतिरूपिणी शक्तिके बिना सृष्टिका विधान करनेमें समर्थ नहीं हैं; क्योंकि माया बिना सृष्टिकी रचना नहीं हो सकती। वह महेश्वरी माया नित्य है। वह सृष्टि, संहार और पालनकर्ता श्रीकृष्णमें छिपी रहती है| और सृष्टि रचनाके समय प्रकट हो जाती है। जैसे मिट्टीके बिना कुम्हार घड़ा नहीं बना सकता और स्वर्णके बिना सोनार कुण्डलका निर्माण करनेमें असमर्थ है (उसी तरह स्स्रष्टा मायाके बिना सृष्टि रचना नहीं कर सकते) । वह शक्ति ईश्वरकी इच्छासे सृष्टिकालमें राधा, पद्मा, सावित्री, दुर्गादेवी और सरस्वती नामसे पाँच प्रकारकी हो जाती हैं। परमात्मा श्रीकृष्णकी जो प्राणाधिष्ठात्री देवी हैं, वह प्राणोंसे भी बढ़कर प्रियतमा 'राधा' कही जाती हैं। जो सम्पूर्ण मङ्गलोंको सम्पन्न करनेवाली, परमानन्दरूपा तथा ऐश्वर्यकी अधिष्ठात्री देवी हैं; वे 'पद्मा' नामसे पुकारी जाती हैं। जो वेद, शास्त्र और योगकी जननी, परम दुर्लभ और परमेश्वरकी विद्याकी अधिष्ठात्री देवी हैं उनका नाम 'सावित्री' है। जो सर्वशक्तिस्वरूपिणी, सर्वज्ञानात्मिका, सर्वस्वरूपा और बुद्धिकी अधिष्ठात्री देवी हैं; वे दुर्गनाशिनी 'दुर्गा' कहलाती हैं। जो वाणीकी अधिष्ठात्री देवी और सदा शास्त्र ज्ञान प्रदान करनेवाली हैं तथा जो श्रीकृष्णके कण्ठसे उत्पन्न हुई हैं; वे देवी 'सरस्वती' कही जाती हैं। आदिमें स्वयं मूलप्रकृति परमेश्वरीदेवी पाँच प्रकारकी थीं। परंतु वे ही पीछे सृष्टि क्रमसे बहुत-सी कलाओंवाली हो गयीं। सृष्टि कालमें मायाद्वारा स्त्रियाँ प्रकृतिके और पुरुषगण पुरुषके अंश से उत्पन्न हुए; क्योंकि माया शक्ति बिना सृष्टि नहीं हो सकती। ब्रह्मन्! प्रत्येक विश्वमें सृष्टि सदा ब्रह्मासे ही प्रकट होती है। विष्णु उसके पालक और निरन्तर मङ्गल प्रदान करनेवाले शिव संहारक हैं। परशुराम! यह ज्ञान दत्तात्रेयजीका दिया हुआ है, उन्होंने पुष्करतीर्थमें माघी पूर्णिमाके दिन दीक्षाके अवसरपर मुनिवरोंके संनिकट मुझे दिया था। इतना कहकर कार्तवीर्यने मुस्कराते हुए परशुरामको नमस्कार किया और शीघ्र ही बाणसहित धनुष हाथमें लेकर वह रथपर जा बैठा। तत्पश्चात् परशुरामने श्रीहरिका स्मरण करते हुए ब्रह्मास्त्रद्वारा राजाकी सेनाका सफाया कर दिया। फिर लीलापूर्वक पाशुपतास्त्रका प्रयोग करके राजाकी जीवनलीला समाप्त कर दी। इसी प्रकार परशुरामने शिवजीका स्मरण करते हुए खेल-ही-खेलमें क्रमश: इक्कीस बार पृथ्वीको राजाओंसे शून्य कर दिया। परशुरामने अपनी प्रतिज्ञाकी रक्षा करनेके लिये क्षत्रियोंके गर्भ में स्थित तथा माताकी गोदमें खेलनेवाले शिशुओंका, नौजवानोंका तथा वृद्धोंका संहार कर डाला। इस प्रकार कार्तवीर्य गोलोकमें श्रीकृष्णके संनिकट चला गया और परशुराम श्रीहरिका स्मरण करते हुए अपने आश्रमको लौट गये। महेश्वरने इक्कीस बार पृथ्वीको भूपालोंसे हीन देख और रामको फरसेद्वारा क्रीडा करते देखकर उनका नाम परशुराम रख दिया। नारद! तब देवता, मुनि, देवियाँ, सिद्ध, गन्धर्व, किन्नर- ये सभी लोग परशुरामके मस्तकपर पुष्पोंकी वृष्टि करने लगे। स्वर्गमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं और हरिनाम संकीर्तन होने लगा। इस प्रकार परशुरामके उज्ज्वल यशसे सारा जगत् व्याप्त हो गया। फिर ब्रह्मा, भृगु, शुक्र, च्यवन, वाल्मीकि तथा परम प्रसन्न हुए जमदग्नि ब्रह्मलोकसे वहाँ पधारे। उनके सारे अङ्ग पुलकायमान थे और नेत्रों में आनन्दके आँसू छलक आये थे। वे सभी हाथमें दूब और पुष्प लेकर मङ्गलाशासन कर रहे थे। तब परशुरामने दण्डकी भाँति भूमिपर लेटकर उन सबको प्रणाम किया। तब क्रमशः 'तात' यों कहते हुए पहले ब्रह्माने उन्हें अपनी गोदमें बैठा लिया। फिर जगद्गुरु स्वयं ब्रह्मा परशुरामसे हितकारक, नीतियुक्त, वेदका सारतत्त्व और परिणाममें सुखदायक वचन बोले।

ब्रह्माने कहा-

राम! जो सम्पूर्ण सम्पत्तियोंको देनेवाला परमोत्कृष्ट सर्वसम्मत और सत्य है, वह काण्वशाखोक्त वचन कहता हूँ, सुनो। जो सभी पूजनीयोंमें इष्ट, पूज्यतम और प्रधान है, वह जन्म देनेके कारण जनक और पालन करनेके कारण पिता कहा जाता है। किंतु मुने! जो अन्नदाता पिता है, वह जन्मदाता पितासे बड़ा है; क्योंकि पितासे उत्पन्न हुआ शरीर अन्नके बिना नित्य क्षीण होता जाता है। माता उन दोनोंसे सौ गुनी पूज्या मान्या और वन्दनीया है; क्योंकि गर्भमें धारण करने और पालन-पोषण करनेसे वह उन दोनोंसे बड़ी है। श्रुतिमें ऐसा सुना गया है कि अपना अभीष्टदेव उन सबसे सौगुना बढ़कर पूज्य है और ज्ञान, विद्या तथा मन्त्र देनेवाला गुरु अभीष्टदेवसे भी बढ़कर है। गुरुपुत्र गुरुकी भाँति ही मान्य है; किंतु गुरुपत्नी उससे भी अधिक पूज्या है। देवताके रुष्ट होनेपर गुरु रक्षा कर लेते हैं, परंतु गुरुके क्रुद्ध होनेपर कोई भी रक्षा नहीं कर सकता। इसलिये गुरु ही ब्रह्मा, गुरु ही विष्णु गुरु ही महेश्वरदेव, गुरु ही परब्रह्म और ब्राह्मणोंसे भी बढ़कर प्रिय हैं। गुरु ही ज्ञान देते हैं और वह ज्ञान हरि भक्ति उत्पन्न करता है। इस प्रकार जो हरि-भक्ति प्रदान करनेवाला है, उससे बढ़कर बन्धु दूसरा कौन है? अज्ञानरूपी अन्धकारसे आच्छादित हुए मनुष्यको जहाँ से ज्ञानरूपी दीपक प्राप्त होता है, जिसे पाकर सब कुछ निर्मल दीखने लगता है, उससे बढ़कर बन्धु दूसरा कौन है ? गुरुके दिये हुए मन्त्रका जप करनेसे ज्ञानकी प्राप्ति होती है और उस ज्ञानसे सर्वज्ञता तथा सिद्धि मिलती है; अतः गुरुसे बढ़कर बन्धु दूसरा कौन है? गुरुद्वारा दी गयी जिस विद्याके बलसे मनुष्य सर्वत्र सुखपूर्वक विजयी होता है और जगत्में पूज्य भी हो जाता है, उस गुरुसे बढ़कर बन्धु दूसरा कौन है ? हे पुत्र! श्रीकृष्ण तुम्हारे अभीष्टदेव हैं और स्वयं शंकर गुरु हैं; अतः तुम अभीष्टदेवसे भी बढ़कर पूजनीय गुरुकी शरण ग्रहण करो। जिनके आश्रयसे तुमने इक्कीस बार पृथ्वीको भूपालोंसे रहित कर दिया है और श्रीहरिकी भक्ति प्राप्त की है; उन शिवकी शरणमें जाओ। जो मङ्गलस्वरूप, कल्याणकी मूर्ति, कल्याणदाता, कल्याणके कारण, पार्वतीके आराध्य और शान्तरूप हैं; अपने गुरुदेव उन शिवकी शरण में जाओ। तुम्हारे इष्टदेव जो गोलोकनाथ भगवान् श्रीकृष्ण हैं, वे ही अपने अंशसे शिवका रूप धारण करके तुम्हारे गुरु हुए हैं, अतः उन्हींकी शरण ग्रहण करो। बेटा! समस्त प्राणियों में श्रीकृष्ण आत्मा हैं, शिव ज्ञान हैं, मैं मन हूँ और विष्णुकी सारी शक्तियोंसे सम्पन्न प्रकृति प्राण है। जो ज्ञानदाता, ज्ञानस्वरूप, ज्ञानके कारण, सनातन मृत्युको जीतनेवाले तथा कालके भी काल हैं; उन गुरुकी शरणमें जाओ। जो ब्रह्मज्योतिः स्वरूप, भक्तोंके लिये मूर्तिमान् अनुग्रह, सर्वज्ञ, ऐश्वर्यशाली और सनातन हैं; उन गुरुदेवकी शरणका आश्रय लो। प्रकृतिस्वरूपिणी पार्वतीने लाखों वर्षोतक तपस्या करके जिन परमेश्वरको अपने मनोनीत प्रियतम पतिके रूपमें प्राप्त किया है; उन गुरुदेवकी शरण ग्रहण करो। नारद! इतना कहकर कमलजन्मा ब्रह्मा मुनियोंके साथ चले गये। तब परशुरामने भी कैलास जानेका विचार किया। (अध्याय ४०)