श्रीनारायण कहते हैं-
नारद! पुण्यक व्रतका विधान सुनकर पार्वतीका मन प्रसन्न हो गया। तत्पश्चात् उन्होंने व्रतकी सम्पूर्ण विधि विषयमें प्रश्न करना आरम्भ किया।
पार्वती बोलीं-
नाथ! आप वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, करुणाके सागर तथा परात्पर हैं। दीनबन्धो ! इस व्रतका सारा विधान मुझे बतलाइये। प्रभो ! कौन-कौन से द्रव्य और फल इस व्रतमें उपयोगी - होते हैं? इसका समय क्या है ? किस नियमका पालन करना पड़ता है? इसमें आहारका क्या विधान है ? और इसका क्या फल होता है ? यह सब मुझ विनम्र सेविकासे वर्णन कीजिये। साथ ही एक उत्तम पुरोहित, पुष्प एकत्रित करनेके लिये ब्राह्मण और सामग्री जुटानेके लिये भृत्योंको भी नियुक्त कर दीजिये। इनके अतिरिक्त और भी जो व्रतोपयोगी वस्तुएँ हैं, जिन्हें मैं नहीं जानती हूँ, वह सब भी एकत्र करा दीजिये; क्योंकि स्त्रियोंके लिये स्वामी ही सब कुछ प्रदान करनेवाला होता है। स्त्रियोंकी तीन अवस्थाएँ होती हैं- कौमार, युवा और वृद्ध । कौमार- अवस्थामें पिता, युवावस्थामें पति और वृद्धावस्था में पुत्र सब तरहसे पालन करनेवाले होते हैं। प्राणनाथ! आप तो सर्वात्मा, ऐश्वर्यशाली, सर्वसाक्षी और सर्वज्ञ हैं, अतः अपने आत्माकी निर्वृतिका कारणभूत एक श्रेष्ठ पुत्र मुझे प्रदान कीजिये। भगवन् ! यह तो मैंने अपनी जानकारीके अनुरूप आप जैसे महात्मासे निवेदन किया है। आप तो सबके आन्तरिक अभिप्रायके ज्ञाता और परम ज्ञानी हैं। भला, मैं आपको क्या समझा सकती हूँ? यों कहकर पार्वतीने प्रेमपूर्वक अपने पतिदेव चरणोंमें माथा टेक दिया। तब कृपासिन्धु भगवान् शिव कहनेको उद्यत हुए।
श्रीमहादेवजीने कहा-
देवि! मैं इस व्रतकी विधि, नियम, फल और व्रतोपयोगी द्रव्यों तथा फलोंका वर्णन करता हूँ, सुनो। इस व्रतके हेतु मैं फल पुष्प लानेके लिये सौ शुद्ध ब्राह्मणोंको, सामग्री जुटानेके निमित्त सौ भृत्यों और बहुसंख्यक दासियोंको तथा पुरोहितके स्थानपर सनत्कुमारको, जो सम्पूर्ण व्रतोंकी विधिके ज्ञाता, वेद-वेदान्तके पारंगत विद्वान्, हरिभक्तों में सर्वश्रेष्ठ, सर्वज्ञ, उत्तम ज्ञानी और मेरे ही समान हैं, नियुक्त करता हूँ। तुम इन्हें ग्रहण करो। देवि! शुद्ध समय आनेपर परम नियमपूर्वक व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये । प्रिये ! माघमासकी शुक्ल त्रयोदशीके दिन इस व्रतका आरम्भ शुभ होता है। उत्तम व्रतीको चाहिये कि वह व्रतारम्भके पूर्वदिन उपवास करे और शरीरको अत्यन्त निर्मल करके यत्नपूर्वक वस्त्रको धोकर स्वच्छ कर ले। फिर दूसरे दिन अरुणोदय वेलामें शय्यासे उठ जाय और मुखको - शुद्ध करके निर्मल जलमें स्नान करे। तत्पश्चात् हरिस्मरणपूर्वक आचमन करके पवित्र हो जाय। फिर भक्तिसहित श्रीहरिको अर्घ्य देकर शीघ्र ही घर लौट आये। वहाँ धुली हुई धोती और चादर धारण करके पवित्र आसनपर बैठे। फिर आचमन और तिलक करके अपना नित्यकर्म समाप्त करे। तत्पश्चात् पहले प्रयत्नपूर्वक पुरोहितका वरण करके स्वस्तिवाचनपूर्वक कलश स्थापन करे । फिर वेदविहित संकल्प करके इस व्रतका अनुष्ठान आरम्भ करे। तदनन्तर सौन्दर्य, नेत्रदीति, विविध अङ्गों सौन्दर्य, पति- सौभाग्य आदिके लिये विभिन्न वस्तुओंके संख्यासहित समर्पण करनेकी बात कहकर शंकरजी पुनः बोले- देवि ! पुत्र प्राप्ति - लिये कूष्माण्ड, नारियल, जम्बीर तथा श्रीफल – इन फलोंको श्रीहरिके अर्पण करना चाहिये। असंख्य जन्मपर्यन्त स्वामीके धनकी वृद्धिके निमित्त यत्नपूर्वक श्रीकृष्णको एक लाख रत्नेन्द्रसार समर्पित करना चाहिये। व्रतीको चाहिये कि व्रतकालमें सम्पत्तिकी वृद्धिके हेतु झाँझ-मजीरा आदि नाना प्रकार के उत्तम बाजे बजाकर श्रीहरिको सुनावे। स्वामीकी भोगवृद्धिके लिये भक्तिपूर्वक श्रीहरिको मनोहर खीर और शक्करयुक्त घी तथा पूड़ीका भोग प्रदान करे। हरिभक्तिकी विशेष उन्नतिके लिये स्वेच्छानुसार सुगन्धित पुष्पोंकी एक लाख माला, जो टूटी हुई न हों, भक्तिपूर्वक श्रीहरिको अर्पित करनी चाहिये । दुर्गे! श्रीकृष्णकी प्रसन्नता प्राप्तिके हेतु नाना प्रकारके स्वादिष्ट एवं मधुर नैवेद्योंका भोग लगाना चाहिये। सुव्रते! इस व्रतमें श्रीकृष्णको प्रसन्न करनेके लिये भक्तिसहित तुलसीदलसे संयुक्त अनेक प्रकारके पुष्प निवेदन करना चाहिये। व्रतीको चाहिये कि वह व्रतकालमें जन्म-जन्मान्तरमें अपने धन धान्यकी समृद्धिके लिये प्रतिदिन एक सहस्र ब्राह्मणों को भोजन करावे। देवि! प्रतिदिन पूजनकाल में पुष्पोंसे भरी हुई सौ अञ्जलियाँ समर्पित करे तथा भक्तिकी वृद्धि के लिये सौ बार प्रणाम करना चाहिये। सुव्रते! व्रतकालमें छः मासतक हविष्यान्न, पाँच मासतक फलाहार और एक पक्षतक हविका भोजन करे तथा एक पक्षतक केवल जल पीकर रहना चाहिये। अग्निदेवके लिये सौ अखण्ड रत्नदीपोंका दान करना चाहिये। रात्रिमें कुशासन बिछाकर नित्य जागरण करना उत्तम है। व्रतीको चाहिये कि व्रतकी शुद्धिके लिये स्मरण, कीर्तन, केलि, प्रेक्षण, गुह्यभाषण, संकल्प, अध्यवसाय तथा क्रियानिष्पत्ति — इन अष्टविध मैथुनोंका - परित्याग कर दे ।
देवि! इस प्रकार व्रतके भलीभाँति पूर्ण होनेपर तदनन्तर व्रतोद्यापन करना चाहिये। उस समय तीन सौ साठ डलियाएँ, जो वस्त्रों से आच्छादित तथा भोजनके पदार्थ, यज्ञोपवीत और मनोहर उपहारोंसे सजी हुई हों, दान करनी चाहिये। एक हजार तीन सौ साठ ब्राह्मणोंको भोजन तथा एक हजार तीन सौ साठ तिलकी आहुतियाँ देनेका विधान है। फिर व्रत समाप्त हो जानेपर विधिपूर्वक एक हजार तीन सौ साठ स्वर्णमुद्राओंकी दक्षिणा देनी चाहिये। इसके अतिरिक्त व्रत समाप्तिके दिन दूसरी दक्षिणा भी - बतलाऊँगा। देवि! इस व्रतका फल यही है कि श्रीहरिमें भक्ति दृढ़ हो जाती है। श्रीहरिके सदृश तीनों भुवनोंमें विख्यात पुत्र उत्पन्न होता है और सौन्दर्य, पतिसौभाग्य, ऐश्वर्य और अतुल धनकी
प्राप्ति होती है। महेश्वरि! यह व्रत प्रत्येक जन्ममें समस्त वाञ्छित सिद्धियोंका बीज है, जिसका मैंने इस प्रकार वर्णन किया है; अतः देवि! तुम भी इस व्रतका अनुष्ठान करो। साध्वि! तुम्हें पुत्र उत्पन्न होगा। यों कहकर शिवजी चुप हो गये। (अध्याय ४)
Summary of chapter 2 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Gaṇeśa Khaṇḍa is as follows:
High upon the snow-capped peaks of Mount Kailāsa, Goddess Pārvatī sat in profound sorrow, filled with an intense maternal longing to cradle a divine son in her arms. Beholding her distress, Her divine consort Lord Śiva lovingly solaced her heart, explaining that a transcendent son endowed with divine attributes cannot be obtained without rigorous penance and unwavering devotion to the Supreme Being. Lord Śiva revealed to her the sacred discipline of the Puṇyaka Vrata, an exalted vow dedicated to Lord Śrī Vishṇu that spans a full year and requires total physical purity, strict fasting, charity, and continuous meditation upon the Supreme Lord. Encouraged by Her husband's divine guidance, Goddess Pārvatī resolved to undertake this arduous vow with unyielding determination to attract the supreme grace of Lord Śrī Kṛshṇa.