परशुरामने कहा-
भाई! मैं ईश्वरको प्रणाम करनेके लिये अन्तःपुरमें जाऊँगा और भक्तिपूर्वक माता पार्वतीको नमस्कार करके तुरंत ही घरको लौट जाऊँगा। जो सगुण-निर्गुण, भक्तोंके लिये अनुग्रहके मूर्तरूप, सत्य, सत्यस्वरूप, ब्रह्मज्योति, सनातन, स्वेच्छामय, दयासिन्धु, दीनबन्धु, मुनियोंके ईश्वर, आत्मामें रमण करनेवाले, पूर्णकाम, व्यक्त अव्यक्त, परात्पर, पर अपरके रचयिता, इन्द्रस्वरूप, सम्मानित, पुरातन, परमात्मा, ईशान, सबके आदि, अविनाशी, समस्त मङ्गलोंके मङ्गलस्वरूप, सम्पूर्ण मङ्गलोंके कारण, सभी मङ्गलोंके दाता, शान्त, समस्त ऐश्वर्योंको प्रदान करनेवाले, परमोत्कृष्ट, शीघ्र ही संतुष्ट होनेवाले, प्रसन्न मुखवाले, शरणमें आये हुएकी रक्षा करनेवाले भक्तोंके लिये अभयप्रद भक्तवत्सल और समदर्शी हैं, जिनसे मैंने नाना प्रकारकी विद्याओं और अनेक प्रकारके परम दुर्लभ शस्त्रों को प्राप्त किया है; उन जगदीश्वर गुरुके इस समय मैं दर्शन करना चाहता हूँ। यों कहकर परशुराम गणपतिके आगे खड़े हो गये। इसपर श्रीगणेशजीने उनको बहुत तरहसे समझाया कि इस समय भगवान् शंकर और माताजी अन्तःपुरमें हैं। आपको वहाँ नहीं जाना चाहिये, पर परशुरामजी हठ करते ही रहे। उन्होंने अनेकों युक्तियोंद्वारा अपना अंदर जाना निर्दोष बतलाया। यों परस्पर दोनों में वाद-विवाद होता रहा। गणेशजी विनयपूर्वक ही परशुरामको रोकते रहे, पर जब परशुरामने बलपूर्वक जाना चाहा तो गणेशजीने रोक दिया। तब परस्पर में वाग्युद्ध और करताड़न होने लगा। अन्तमें परशुरामने गणेशजीपर अपना फरसा उठा लिया। तब कार्तिकेयने बीचमें आकर उन्हें समझाया। परशुरामने गणेशजीको धक्का दे दिया, वे गिर पड़े। फिर उठकर उन्होंने परशुरामको फटकारा। इसपर परशुरामने पुनः कुठार उठा लिया। तब गणेशजीने अपनी सूँड़को बहुत लंबा कर लिया और उसमें परशुरामको लपेटकर वे घुमाने लगे। जैसे छोटेसे साँपको गरुड़ ऊपर उठा लेता है, वैसे ही अपने योगबलसे शिवपुत्र गणेशने उनको उठाकर स्तम्भित कर दिया और सप्तद्वीप, सप्तपर्वत, सप्तसागर, भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, जनलोक, तपोलोक, ध्रुवलोक, गौरीलोक, शम्भुलोक उनको दिखा दिये। तदनन्तर उन्हें गम्भीर समुद्रमें फेंक दिया। जब वे तैरने लगे तो पुनः पकड़कर उठा लिया और घुमाते हुए वैकुण्ठ दिखलाकर फिर गोलोकधाममें भगवान् श्रीकृष्णके दर्शन कराये। उस समय भगवान् रत्नाभरणोंसे विभूषित हो रत्ननिर्मित सिंहासनपर आसीन थे। राधाजी उनके वक्षःस्थलसे सटी हुई थीं। तेजमें वे करोड़ों सूर्योके समान प्रभाशाली थे। उनके दो भुजाएँ थीं, हाथमें मुरली शोभा पा रही थी, परम मनोहर रूप था और वे मन्द मन्द मुस्करा रहे थे। इस प्रकार श्रीकृष्णके दर्शन कराकर उनसे बारंबार प्रणाम कराया। यों सम्पूर्ण पापोंका पूर्णतया नाश कर देनेवाले इष्टदेव श्रीकृष्णके दर्शन कराकर गणेशजीने परशुरामके भ्रूणहत्याजनित पापको दूर कर दिया। यों तो पापजनित यातना भोगे बिना नष्ट नहीं होती, किंतु परशुरामको थोड़ी ही भोगनी पड़ी और सब श्रीकृष्णके दर्शनसे नष्ट हो गयी। क्षणभरके बाद परशुरामकी चेतना लौट आयी और वे वेगपूर्वक भूतलपर गिर पड़े। उस समय उनका गणेशद्वारा किया गया स्तम्भन भी दूर हो गया तब उन्होंने अपने अभीष्टदेव श्रीकृष्ण, अपने गुरु जगद्गुरु शम्भु तथा गुरुद्वारा दिये गये परम दुर्लभ स्तोत्र और कवचका स्मरण किया। मुने! तदनन्तर परशुरामने अपने अमोघ फरसेको, जिसकी प्रभा ग्रीष्म ऋतुके मध्याह्नकालिक - सूर्यकी प्रभासे सौगुनी थी और जो तेजमें शिव तुल्य था, गणेशपर चला दिया। पिताके उस अमोघ अस्त्रको आते देखकर स्वयं गणपतिने उसे अपने बायें दाँतसे पकड़ लिया; उस अस्त्रको व्यर्थ नहीं होने दिया। तब महादेवजीके बलसे वह फरसा वेगपूर्वक गिरकर मूलसहित गणेश दाँतको काटकर पुनः परशुरामके हाथमें लौट आया। यह देखकर वीरभद्र, कार्तिकेय और क्षेत्रपाल आदि पार्षद तथा आकाशमें देवगण महान् भयसे भीत होकर हाहाकार करने लगे। इधर वह दाँत खूनसे सनकर शब्द करता हुआ भूमिपर गिर पड़ा, मानो गेरुसे युक्त स्फटिकका
पर्वत धराशायी हो गया हो। विप्रवर! उस महान् शब्दसे भयभीत होकर पृथ्वी काँप उठी। सभी कैलासवासी प्राणी उसी क्षण डरके मारे मूच्छित हो गये। उस समय निद्राके स्वामी जगदीश्वर शिवकी निद्रा भंग हो गयी। वे घबराये हुए पार्वती के साथ अन्तः पुरसे बाहर आये। मुने! उस समय गणेश घायल हो गये थे, उनका दाँत टूट गया था और मुख रक्तसे सराबोर था। उनका क्रोध शान्त हो गया था और वे लज्जित होकर मुस्कराते हुए सिर झुकाये हुए थे। उन्हें इस दशामें सामने देखकर पार्वतीने शीघ्र ही स्कन्दसे पूछा- 'बेटा! यह क्या बात है?' तब स्कन्दने भयपूर्वक पूर्वापरका सारा वृत्तान्त उनसे कह सुनाया। उसे सुनकर दुर्गाको क्रोध आ गया। वे कृपापरवश हो रोने लगीं और शम्भुके सामने अपने पुत्र गणेशको छातीसे लगाकर बोलीं। सती साध्वी पार्वतीने शोकके कारण डरकर - विनयपूर्वक शम्भुको समझाया और फिर प्रणत होकर प्रणतकी पीड़ा हरनेवाले पतिदेवसे कहने लगीं। (अध्याय ४२- ४३)
Summary of chapter 37 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Gaṇeśa Khaṇḍa is as follows:
As the cosmic atmosphere threatened to dissolve under the heat of Goddess Pārvatī's anger, the Supreme Lord Śrī Kṛshṇa personally descended from Goloka, appearing in the center of Kailāsa as a radiant child holding a flute. The mere sight of Lord Śrī Kṛshṇa cooled the blazing heat of Pārvatī's wrath, bringing supreme peace to the minds of all present. Approaching the Divine Mother with gentle sweetness, Lord Śrī Kṛshṇa picked up the infant Gaṇeśa, wiped his blood, and solaced Pārvatī with profound words of spiritual wisdom, explaining that the breaking of the tusk was an auspicious event ordained to establish Gaṇeśa's transcendent glory as Ekadanta throughout eternity.