नारदने पूछा-
महाभाग नारायण! आप तो वेदवेदाङ्गोंके पारगामी विद्वान् हैं। परमेश्वर! मैं आपसे एक बहुत बड़े संदेहका समाधान जानना चाहता हूँ। प्रभो ! जो देवेश्वर महात्मा शंकरके पुत्र तथा विनोंके विनाशक हैं, उन गणेश्वरके लिये जो विघ्न घटित हुआ, उसका क्या कारण है? जब परिपूर्णतम परात्पर परमात्मा श्रीमान् गोलोकनाथ स्वयं ही अपने अंशसे पार्वतीके पुत्र होकर उत्पन्न हुए थे, तब उन ग्रहाधिराज भगवान् श्रीकृष्णके मस्तकका ग्रहकी दृष्टिसे कट जाना बड़े आश्चर्यकी बात है। आप इस वृत्तान्तको मुझे बतलानेकी कृपा करें।
श्रीनारायणने कहा-
ब्रह्मन् ! विघ्नेश्वरका यह विघ्र जिस कारणसे हुआ था, उस प्राचीन इतिहासको तुम सावधान होकर श्रवण करो। नारद! एक समयकी बात है। भक्तवत्सल शंकरने माली और सुमालीको मारनेवाले सूर्यपर बड़े क्रोधके साथ त्रिशूलसे प्रहार किया। वह शिवके समान तेजस्वी त्रिशूल अमोघ था। अतः उसकी चोटसे सूर्यकी चेतना नष्ट हो गयी और वे तुरंत ही रथसे नीचे गिर पड़े। जब कश्यपजीने देखा कि मेरे पुत्रकी आँखें ऊपरको चढ़ गयी हैं और वह चेतनाहीन हो गया है, तब वे उसे छातीसे लगाकर फूट-फूटकर विलाप करने लगे। उस समय सारे देवताओंमें हाहाकार मच गया। वे सभी भयभीत होकर जोर-जोरसे रुदन करने लगे। अन्धकार छा जानेसे सारा जगत् अंधीभूत हो गया। तब ब्रह्माके पौत्र तपस्वी कश्यपजी, जो ब्रह्मतेजसे प्रज्वलित हो रहे थे, अपने पुत्रको प्रभाहीन देखकर शिवको शाप देते हुए बोले 'जिस प्रकार आज तुम्हारे त्रिशूलसे मेरे पुत्रका वक्षःस्थल विदीर्ण हो गया है, उसी तरह तुम्हारे पुत्रका मस्तक कट जायगा।' शिवजी आशुतोष तो हैं ही; अतः क्षणमात्रमें ही उनका क्रोध जाता रहा। तब उन्होंने उसी क्षण ब्रह्मज्ञानद्वारा सूर्यको जीवित कर दिया। तदनन्तर जो ब्रह्मा, विष्णु और महेशके अंशसे उत्पन्न हैं, वे त्रिगुणात्मक भक्तवत्सल सूर्य चेतना प्राप्त करके पिताके समक्ष खड़े हुए। फिर भक्तिपूर्वक पिताको तथा शंकरको नमस्कार किया। साथ ही (पिताद्वारा दिये गये) शम्भुके शापको जानकर वे कश्यपजीपर क्रुद्ध हो गये, जिससे उन्होंने अपने विषयको ग्रहण नहीं किया और क्रोधावेशमें यों कहा- 'ईश्वरके बिना यह सब कुछ तुच्छ, अनित्य और नश्वर है, अतः विद्वान्को चाहिये कि वह मङ्गलकारक सत्यको छोड़कर अमङ्गलकी इच्छा न करे। इसलिये अब मैं विषयका परित्याग करके परमेश्वर श्रीकृष्णका भजन करूँगा।' यह सुनकर देवताओंने ब्रह्माको प्रेरित किया, तब उन प्रभुने शीघ्रतापूर्वक वहाँ पधारकर सूर्यको समझाया और उन्हें इनके कार्यपर नियुक्त किया। फिर ब्रह्मा, शिव और कश्यप आनन्दपूर्वक सूर्यको आशीर्वाद देकर अपने-अपने भवनको चले गये। इधर सूर्य भी अपनी राशिपर आरूढ़ हुए। तत्पश्चात् माली और सुमाली व्याधिग्रस्त हो गये। उनके शरीर में सफेद कोढ़ हो गयी, जिससे सारा अङ्ग गल गया, शक्ति जाती रही और प्रभा नष्ट हो गयी। तब स्वयं ब्रह्माने उन दोनोंसे कहा-'सूर्यके कोपसे ही तुम दोनों हतप्रभ हो गये हो और तुम्हारा शरीर गल गया है, अतः तुमलोग सूर्यका भजन करो।' फिर ब्रह्मा उन दोनोंको सूर्यका कवच, स्तोत्र और पूजाकी सारी विधि बतलाकर ब्रह्मलोकको चले गये। मुने! तदनन्तर वे दोनों पुष्करमें जाकर सूर्यका भजन करने लगे। वहाँ वे तीनों काल स्नान करके भक्तिपूर्वक उत्तम सूर्य मन्त्रके जपमें तल्लीन हो गये। फिर समयानुसार सूर्यसे वरदान पाकर वे पुनः अपने असली रूपमें आ गये। इस प्रकार मैंने यह सारा वृत्तान्त वर्णन कर दिया, अब और क्या सुनना चाहते हो? (अध्याय १८)
Summary of chapter 15 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Gaṇeśa Khaṇḍa is as follows:
Elaborating upon the divine family lineages connected to Lord Śiva, this chapter details the birth, spiritual discipline, and transcendent glories of Goddess Manasā, the mind-born daughter of Maharshi Kashyapa and spiritual disciple of Lord Śiva. Endowed with profound Vedic wisdom and intense ascetic power, Goddess Manasā performed severe austerities on Mount Kailāsa for thousands of years to master the supreme sciences of yoga and devotion. Pleased by her devotion, Lord Śiva imparted to her the secret Kṛshṇa Mantra and the knowledge of all scriptures, establishing her as the queen of serpents who protects humanity from venomous creatures and grants spiritual elevation to her devotees.