नारायण कहते हैं-
नारद ! तदनन्तर परशुरामने ब्रह्माकी बात सुनकर उन जगद्गुरुको प्रणाम किया और उनसे वरदान पाकर वे सफलमनोरथ हो शिवलोकको चले। वायुके आधारपर टिका हुआ वह मनोहर लोक एक लाख योजन ऊँचा तथा ब्रह्मलोकसे विलक्षण है। उसका वर्णन करना अत्यन्त कठिन है। उसके दक्षिणभागमें वैकुण्ठ और वामभागमें गौरीलोक है। नीचे ओर ध्रुवलोक है, जो सम्पूर्ण लोकोंसे परे कहा जाता है। उन सबके ऊपर पचास करोड़ योजनके विस्तारवाला गोलोक है। उससे ऊपर दूसरा लोक नहीं है। वही सर्वोपरि कहा जाता है। मनके समान वेगशाली योगीन्द्र परशुरामने उस शिवलोकको देखा। वह महान् अद्भुत लोक उपमान और उपमेयसे रहित अर्थात् अनुपम श्रेष्ठ योगीन्द्रों,सिद्धों, विद्याविशारदों, करोड़ों कल्पोंकी तपस्या से पवित्र शरीरवाले पुण्यात्माओंसे निषेवित, मनोरथ पूर्ण करनेवाले कल्पवृक्षोंके समूहोंसे परिवेष्टित, असंख्य कामधेनुओंके समुदायोंसे सुशोभित, पारिजात वृक्षोंकी वनावलीसे विशेष शोभायमान, दो हजार पुष्पोद्यानोंसे युक्त, सदा उत्कृष्ट शोभा सम्पन्न, बहुमूल्य मणियोंद्वारा रचित सुन्दर मणिवेदियों तथा सैकड़ों दिव्य राजमार्गोंद्वारा बाहर भीतर विभूषित और नाना प्रकारकी पच्चीकारीसे युक्त उत्तम मणियोंके कलशोंसे उज्ज्वल दीखनेवाले अमूल्य मणियोंद्वारा निर्मित सौ करोड़ भवनोंसे युक्त था। उसके रमणीय मध्यभागमें उन्हें शंकरजीका भवन दीख पड़ा। उस परम मनोहर भवनके चारों ओर बहुमूल्य मणियोंकी चहारदीवारीका निर्माण हुआ था। वह इतना ऊँचा था कि आकाशका स्पर्श कर रहा था। उसका रंग दूध और जलके समान उज्ज्वल था। उसमें सोलह दरवाजे थे तथा वह सैकड़ों ऐसे मन्दिरोंसे सुशोभित था, जो अमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित तथा रत्नोंकी सीढ़ियोंसे विभूषित थे। उनमें हीरे जड़े हुए रत्नोंके खंभे और किवाड़ लगे थे। वे मणियोंकी जालियोंसे सुशोभित, उत्तम रत्नोंके कलशोंसे प्रकाशित, नाना प्रकारके विचित्र चित्रोंसे चित्रित अतएव परम मनोहर थे। वहाँ उस भवनके आगे परशुरामने सिंहद्वारका दर्शन किया, जिसमें बहुमूल्य रत्नोंके बने हुए किवाड़ लगे थे। उसका भीतरी भाग पद्मराग एवं महामरकत मणियोंद्वारा रचित वेदियोंसे सदा बाहर भीतर सुशोभित रहता था। नाना प्रकारके - चित्रोंसे चित्रित होनेके कारण वह अत्यन्त सुहावना लग रहा था। उसके द्वारपर दो भयंकर द्वारपाल नियुक्त थे, जिन्हें परशुरामने देखा उनकी आकृति बेडौल थी, दाँत और मुख बड़े विकराल थे। तीन बड़े-बड़े नेत्र थे, जिनमें कुछ पीलिमा और ललाई छायी हुई थी। वे जले हुए पर्वतके समान काले और महान् बल पराक्रमसे सम्पन्न थे। शरीर उत्तम बाघम्बर तथा विभूतिसे विभूषित थे। त्रिशूल और पट्टिश धारण किये हुए वे दोनों ब्रह्मतेजसे प्रज्वलित हो रहे थे। उन्हें देखकर परशुरामका मन भयग्रस्त हो गया। फिर भी वे डरते-डरते कुछ कहनेको उद्यत हुए। उन्होंने विनीत होकर बड़ी नम्रताके साथ उन दोनों महाबली उच्छृंखलोंके सामने अपना सारा वृत्तान्त कह सुनाया। ब्राह्मणकी बात सुनकर उन दोनों के मनमें दयाका संचार हो आया, तब उन श्रेष्ठ अनुचरोंने दूतद्वारा महात्मा शंकरकी आज्ञा लेकर परशुरामको भीतर प्रवेश करनेका आदेश दिया। परशुराम उनकी आज्ञा पाकर श्रीहरिका स्मरण करते हुए भवनके अंदर प्रविष्ट हुए। वहाँ उन्होंने एक-एक करके सोलह दरवाजोंको देखा, जो नाना प्रकारकी चित्रकारीसे चित्रित होनेके कारण अत्यन्त सुन्दर थे तथा उनपर द्वारपाल नियुक्त थे। थे उन्हें देखकर परशुरामको महान् आश्चर्य हुआ। आगे बढ़नेपर उन्हें शंकरजीकी सभा दिखायी पड़ी, जो बहुत से सिद्धगणोंसे व्यास, महर्षियोंद्वारा सेवित तथा पारिजात-पुष्पोंके गन्धसे युक्त वायुद्वारा सुवासित थी। उस सभामें उन्होंने देवेश्वर शंकरके दर्शन किये। वे रत्नाभरणोंसे सुसज्जित हो रत्नसिंहासनपर विराजमान थे। उनके ललाटपर चन्द्रमा सुशोभित हो रहा था। वे बाघाम्बर पहने तथा त्रिशूल और पट्टिश धारण किये हुए थे। उनका शरीर विभूति से सुशोभित था। वे सर्पका यज्ञोपवीत पहने थे तथा महान् कल्याणस्वरूप, कल्याण करनेवाले, कल्याणके कारण, कल्याणके आश्रयस्थान, आत्मामें रमण करनेवाले, पूर्णकाम और करोड़ों सूर्योके समान प्रभाशाली थे। उनका मुख प्रसन्न था, जिसपर मन्द मुस्कानकी अद्भुत छटा बिखर रही थी, वे भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये अधीर हो रहे थे। वे सनातन ज्योतिः स्वरूप, लोकोंके लिये अनुग्रह मूर्त रूप, जटाधारी, सतीकी हड्डियोंसे शोभित, तपस्याओंके फल देनेवाले तथा सम्पूर्ण सम्पदाओंके दाता थे। उनका वर्ण शुद्ध स्फटिकके सदृश उज्ज्वल था। उनके पाँच मुख और तीन नेत्र थे। वे तत्त्वमुद्राद्वारा शिष्योंको गुह्य ब्रह्मका उपदेश कर रहे थे। योगीन्द्र उनके स्तवनमें तथा बड़े बड़े सिद्ध उनकी सेवामें नियुक्त थे। श्रेष्ठ पार्षद श्वेत चँवरों द्वारा निरन्तर उनकी सेवा कर रहे थे। वे बुढ़ापा और मृत्युका हरण करनेवाले, गुणातीत, स्वेच्छामय, परिपूर्णतम परब्रह्मके ध्यानमें निमग्न थे, जो ज्योतीरूप सबके आदि, प्रकृतिसे परे और परमानन्दमय हैं। उन श्रीकृष्णका ध्यान करते समय उनके शरीरमें रोमाञ्च हो रहा था तथा वे आँखों में आँसू भरे उत्तम स्वरसे उनकी गुणावलीका गान कर रहे थे और भूतेश्वर, रुद्रगण तथा क्षेत्रपाल उन्हें घेरे हुए थे। उन्हें देखकर परशुरामने बड़े आदरके साथ सिर झुकाकर प्रणाम किया। तत्पश्चात् शिवजीके वामभागमें कार्तिकेय, दाहिनी ओर गणेश्वर, सामने नन्दीश्वर महाकाल और वीरभद्र तथा उनकी गोदमें उनकी प्रियतमा पत्नी गिरिराजनन्दिनी गौरीको देखा। उन सबको भी परशुरामने बड़े हर्षके साथ भक्तिपूर्वक सिर झुकाकर नमस्कार किया। उस समय शिवजीका दर्शन करके परशुराम परम संतुष्ट हुए। शोकसे पीड़ित तो वे थे ही; अतः आँखोंमें आँसू भरकर अत्यन्त कातर हो हाथ जोड़कर शान्तभावसे दीन एवं गद्दवाणीके द्वारा शिवजीकी स्तुति करने लगे।
परशुराम बोले-
ईश ! मैं आपकी स्तुति करना चाहता हूँ, परंतु स्तवन करनेमें सर्वथा असमर्थ हूँ। आप अक्षर और अक्षरके कारण तथा इच्छारहित हैं, तब मैं आपकी क्या स्तुति करूँ? मैं मन्दबुद्धि हूँ; मुझमें शब्दोंकी योजना करनेका ज्ञान तो है नहीं और चला हूँ देवेश्वरकी स्तुति करने। भला, जिनका स्तवन करनेकी शक्ति वेदोंमें नहीं है, उन आपकी स्तुति करके कौन पार पा सकता है? आप मन, बुद्धि और वाणीके अगोचर, सारसे भी साररूप, परात्पर, ज्ञान और बुद्धिसे असाध्य, सिद्ध, सिद्धोंद्वारा सेवित, आकाशकी तरह आदि, मध्य और अन्तसे हीन तथा अविनाशी, विश्वपर शासन करनेवाले, तन्त्ररहित, स्वतन्त्र, तन्त्रके कारण, ध्यानद्वारा असाध्य, दुराराध्य, साधन करने में अत्यन्त सुगम और दयाके सागर हैं। दीनबन्धो ! मैं अत्यन्त दीन हूँ। करुणासिन्धो ! मेरी रक्षा कीजिये। आज मेरा जन्म सफल तथा जीवन सुजीवन हो गया; क्योंकि भक्तगण जिन्हें स्वप्नमें भी नहीं देख पाते, उन्हींको इस समय मैं प्रत्यक्ष देख रहा हूँ। जिनकी कलासे इन्द्र आदि देवगण तथा जिनके कलांशसे चराचर प्राणी उत्पन्न हुए हैं, उन महेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। जो सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, जल और वायुके रूपमें विराजमान हैं, उन महेश्वरको मैं अभिवादन करता हूँ। जो स्त्रीरूप, नपुंसकरूप और पुरुषरूप धारण करके जगत्का विस्तार करते हैं, जो सबके आधार और सर्वरूप हैं, उन महेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। हिमालयकन्या देवी पार्वतीने कठोर तपस्या करके जिनको प्राप्त किया है। दीर्घ तपस्याके द्वारा भी जिनका प्राप्त होना दुर्लभ है; उन महेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। जो सबके लिये कल्पवृक्षरूप हैं और अभिलाषासे भी अधिक फल प्रदान करते हैं, जो बहुत शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं और जो भक्तोंके बन्धु हैं; उन महेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। जो लीलापूर्वक क्षणभरमें अनन्त विश्व सृष्टियोंका संहार करनेवाले हैं; उन भयंकर - रूपधारी महेश्वरको मेरा प्रणाम है जो कालरूप, कालके काल, कालके कारण और कालसे उत्पन्न होनेवाले हैं तथा जो अजन्मा एवं बारंबार जन्म धारण करनेवाले आदि सब कुछ हैं; उन महेश्वरको मैं मस्तक झुकाता हूँ। यों कहकर भृगुवंशी परशुराम शंकरजीके चरण-कमलोंपर गिर पड़े। तब शिवजीने परम प्रसन्न होकर उन्हें शुभाशीर्वाद दिये। नारद! जो भक्तिभावसहित इस परशुरामकृत स्तोत्रका पाठ करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे पूर्णतया मुक्त होकर शिवलोकमें जाता है। (अध्याय २९)
Summary of chapter 24 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Gaṇeśa Khaṇḍa is as follows:
While hunting in the dense forests with his massive army, King Kārtavīryārjuna became exhausted and thirsty, eventually reaching the quiet hermitage of Sage Jamadagni. The holy sage welcomed the royal monarch and his vast military retinue with deep warmth and hospitality. Utilizing the divine powers of his wish-fulfilling cow Kāmadhenu, Sage Jamadagni instantly produced a lavish royal feast, exquisite garments, jewel-studded seating, and refreshing drinks for the king and his entire army. Beholding this miraculous display of infinite wealth in a simple forest hermitage, King Kārtavīryārjuna was overcome with intense envy and greed.