श्री ब्रह्म वैवर्त महापुराण - गणेश खंड

7- पार्वतीद्वारा व्रतारम्भ, व्रत-समाप्तिमें पुरोहितद्वारा शिवको दक्षिणारूपमें माँगे जानेपर पार्वतीका मूच्छित होना, शिवजी तथा देवताओं और मुनियोंका उन्हें समझाना, पार्वतीका विषाद, नारायणका आगमन और उनके द्वारा पतिके बदले गोमूल्य देकर पार्वतीको व्रत समाप्त करनेका आदेश, पुरोहितद्वारा उसका अस्वीकार, एक अद्भुत तेजका आविर्भाव और देवताओं, मुनियों तथा पार्वतीद्वारा उसका स्तवन

श्रीनारायणजी कहते हैं-

नारद! तदनन्तर हर्षसे गद्गद हुए मनवाले शिवजीने श्रीहरिक आज्ञा स्वीकार करके श्रीहरिके साथ किये गये माङ्गलिक वार्तालापको प्रेमपूर्वक पार्वतीसे कह सुनाया। तब पार्वतीका मन प्रसन्न हो गया। फिर तो उन्होंने शिवजीकी आज्ञा मानकर उस मङ्गलव्रतके अवसरपर माङ्गलिक बाजा बजाया। फिर सुन्दर दाँतोंवाली पार्वतीने भलीभाँति स्नान करके शरीरको शुद्ध किया और स्वच्छ साड़ी तथा चद्दर धारण किया। तत्पश्चात् जो चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमसे विभूषित, फल और अक्षतसे सुशोभित तथा आमके पल्लवसे संयुक्त था, ऐसे रत्नकलशको चावलकी राशिपर स्थापित किया। फिर रत्नोंके उद्भवस्थान हिमालयकी कन्या सती पार्वतीने, जो रत्नोंसे विभूषित तथा रत्नजटित आसनपर विराजमान थी, रत्नसिंहासनोंपर समासीन मुनिश्रेष्ठोंकी पूजा करके चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और रत्नाभरणोंसे भूषित तथा रत्नसिंहासनपर विराजमान पुरोहितकी समर्चना की। इसके बाद विधि-विधानके अनुसार रत्नभूषित दिक्पालों, देवताओं, मनुष्यों और नागोंको आगे स्थापित करके भक्तिपूर्वक उनका भलीभाँति पूजन किया। फिर पुण्यक व्रतमें, जिनकी अग्रिमें तपाकर शुद्ध किये गये बहुमूल्य रत्नोंके भूषणों, उत्तम उत्तम वस्त्रों तथा पूजनोपयोगी नाना प्रकारकी सामग्रियोंसे पूजा की गयी थी और जो चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमसे सुशोभित थे, उन ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वरकी परम भक्तिपूर्वक समर्चना की।

मुने! तत्पश्चात् पार्वतीदेवीने स्वस्तिवाचनपूर्वक व्रत आरम्भ किया। तदनन्तर उत्तम व्रतका आचरण करनेवाली सतीने उस मङ्गल कलशपर अपने अभीष्ट देवता श्रीकृष्णका आवाहन करके उन्हें भक्तिपूर्वक क्रमशः षोडशोपचार समर्पित किया। फिर व्रतमें जिन अनेक प्रकारके द्रव्योंके देनेका विधान है, एक-एक करके उन सभी फलदायी पदार्थोंको प्रदान किया। पुनः व्रतके लिये कहा गया उपहार, जो त्रिलोकीमें दुर्लभ है, वह सब भी भक्तिसहित अर्पण किया। इस प्रकार उस सतीने वेदमन्त्रोच्चारणपूर्वक सभी पदार्थोंको अर्पित करके तिल और घीसे तीन लाख आहुतियोंका | हवन कराया और ब्राह्मणों, देवताओं तथा पूजित अतिथियोंको भोजनसे तृप्त किया। इस प्रकार उत्तम व्रतवाली सतीने उस पालनीय पुण्यक व्रतमें सारे कर्तव्यको वर्षपर्यन्त प्रतिदिन विधानके साथ पूर्ण किया। समाप्तिके दिन विप्रवर पुरोहितने उनसे कहा- 'सुव्रते! इस उत्तम व्रतमें तुम मुझे अपने पतिको दक्षिणारूपमें दे दो। पुरोहितके इस कथनको सुनकर महामाया पार्वती उस देव-सभाके मध्य विलाप करके मूर्च्छित हो गयी; क्योंकि उस समय मायाने उनके चित्तको मोह लिया था।

नारद! उन्हें मूच्छित देखकर उन मुनिवरोंको तथा ब्रह्मा और विष्णुको हँसी आ गयी। तब उन्होंने शंकरजीको पार्वतीके पास भेजा। उस समय पार्वतीको होशमें लानेके लिये सभासदोंद्वारा प्रेरित किये जानेपर वक्ताओंमें श्रेष्ठ शिवजी कहने लगे।

श्रीमहादेवजीने कहा-

भद्रे! उठो, निस्संदेह तुम्हारा कल्याण होगा। तुम होशमें आकर मेरी बात सुनो। फिर जिनके कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये थे, उन पार्वतीसे यों कहकर शिवजीने उन्हें हृदयसे लगा लिया और चेतनायुक्त कर दिया। तत्पश्चात् हितकर, सत्य, परिमित, परिणाममें सुखप्रद, यशस्कर और फलदायक वचन कहना आरम्भ किया। देवि! जिसका वेदने निरूपण किया है, जो सर्वसम्मत और इष्ट है, उस धर्मार्थका इस धर्मसभामें मैं वर्णन करता हूँ, सुनो देवि! दक्षिणा समस्त कर्मोंकी सारभूता है। धर्मिष्ठे! वह धर्म कर्ममें नित्य ही यश और फल प्रदान करनेवाली है। प्रिये! देवकार्य, पितृकार्य अथवा नित्य-नैमित्तिक जो भी कर्म दक्षिणासे रहित होता है, वह सब निष्फल हो जाता है और उस कर्मसे निश्चय ही दाता कालसूत्र नामक नरकमें जाता है। तत्पश्चात् वह शत्रुओंसे पीड़ित होकर दीनताको प्राप्त होता है। ब्राह्मणके उद्देश्य से संकल्प की हुई दक्षिणा यदि उसी समय नहीं दे दी जाती है तो वह बढ़ते-बढ़ते अनेक गुनी हो जाती है।

श्रीविष्णुने कहा-

धर्मिष्ठ! धर्मकर्मके विषयमें तुम अपने धर्मकी रक्षा करो; क्योंकि धर्मज्ञे! अपने धर्मका पूर्णतया पालन करनेपर सबकी रक्षा हो जाती है।

ब्रह्माने कहा-

धर्मज्ञे! जो किसी कारणवश धर्मकी रक्षा नहीं करता है तो धर्मके नष्ट हो जानेपर उसके कर्त्ताका विनाश हो जाता है। धर्मने कहा- साध्वि! पतिको दक्षिणारूपमें देकर यत्नपूर्वक मेरी रक्षा करो। महासाध्वि! मेरे सुरक्षित रहनेपर सब कुछ कल्याण ही होगा।

देवताओंने कहा-

महासाध्वि! तुम धर्मकी रक्षा करके अपने व्रतको पूर्ण करो। सती! तुम्हारे व्रतके पूरा हो जानेपर हमलोग तुम्हारे मनोरथको पूर्ण कर देंगे।

मुनियोंने कहा -

पतिव्रते! हवनको पूरा करके ब्राह्मणोंको दक्षिणा प्रदान करो। धर्मज्ञे! हमलोगोंके उपस्थित रहते अमङ्गल कैसे होगा ? सनत्कुमारने कहा – शिवे! या तो तुम मुझे शिवको दक्षिणारूपमें दे दो, अन्यथा इस व्रतके फलको तथा चिरकालसे संचित अपनी तपस्याके फलको भी छोड़ दो साध्वि! इस प्रकार कर्मके दक्षिणारहित हो जानेपर मैं इस व्रतके फलको तथा यजमानके सारे कर्मोंके फलको पा जाऊँगा। तब पार्वतीजी बोलीं- देवेश्वरो! जिस कर्ममें पतिकी ही दक्षिणा दी जाती है, उस कर्मसे मुझे क्या लाभ ? मुने! दक्षिणा देनेसे तथा धर्म और पुत्रकी प्राप्तिसे भी मेरा कौन-सा प्रयोजन सिद्ध होगा? भला, यदि भूमिकी पूजा न की जाय तो वृक्षके पूजनसे क्या फल मिलेगा? क्योंकि कारणके नष्ट हो जानेपर कार्यकी स्थिति कहाँ और फिर अन्न तथा फल कहाँसे प्राप्त हो सकते हैं? यदि स्वेच्छानुसार प्राणोंका ही त्याग कर दिया जाय तो फिर शरीरसे क्या प्रयोजन है ? जिसकी दृष्टिशक्ति ही नष्ट हो गयी है, उस आँखसे क्या लाभ ? सुरेश्वरो! पतिव्रताओंके लिये पति सौ पुत्रों के समान होता है। ऐसी दशामें यदि व्रतमें पतिको ही दे देना है तो उस व्रतसे अथवा (व्रतके फलस्वरूप) पुत्रसे क्या सिद्ध होगा? माना कि पुत्र पतिका वंश होता है, किंतु उसका एकमात्र मूल तो पति ही है। भला, जहाँ मूलधन ही नष्ट हो जाय वहाँ उसका सारा व्यापार तो निष्फल हो ही जायगा।

इस प्रकार वाद विवाद चल ही रहा था, इसी बीच उस सभामें स्थित देवताओं और मुनियोंने आकाशमें बहुमूल्य रत्नोंके बने हुए एक रथको देखा, जो पार्षदोंद्वारा घिरा हुआ था। वे सभी पार्षद श्याम रंगवाले तथा चार भुजाधारी थे। उनके गलेमें वनमाला शोभा पा रही थी और वे रत्नाभरणोंसे विभूषित थे। तत्पश्चात् वैकुण्ठवासी भगवान् उस विमानसे उतरकर हर्षपूर्वक उस सभामें आये। फिर तो सुरेश्वरोंने उनकी स्तुति करना आरम्भ किया। तदनन्तर जिनके चार भुजाएँ थीं; जो शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये हुए थे; जो लक्ष्मी और सरस्वतीके स्वामी, शान्तस्वरूप, परम मनोहर और सुखपूर्वक दर्शन करने योग्य थे, परंतु भक्तिहीनोंके लिये जिनका दर्शन करोड़ों जन्मोंमें भी नहीं हो सकता; जिनके नील रंगकी आभा करोड़ों कामदेवोंको मात कर रही थी; जिनका प्रकाश करोड़ों चन्द्रमाओंके समान था; जो अमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित सुन्दर भूषणोंसे विभूषित थे, जो ब्रह्मा आदि देवताओंद्वारा सेवनीय हैं, भक्तगण सदा जिनका स्तवन करते हैं; जो अपने प्रकाशसे आच्छादित देवर्षियोंद्वारा घिरे हुए थे उन परमेश्वरको ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवताओंने एक श्रेष्ठ रत्नसिंहासनपर बैठाया और सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया। उस समय उन सबकी अञ्जलियाँ बँधी हुई थीं, शरीर रोमाञ्चित थे और आँखोंमें आँसू छलक आये थे। तब परम बुद्धिमान् भगवान्ने मुस्कराते हुए मधुर वाणीद्वारा उनसे सारा वृत्तान्त पूछा और उनके द्वारा सब जान लेनेपर कहना आरम्भ किया।

श्रीनारायण बोले-

सुरगणो ! मेरे सिवा ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त यह सारा जगत् प्रकृति से उत्पन्न हुआ है - यह सर्वथा सत्य है। विश्वमें सारे प्राणी जिस शक्तिसे शक्तिमान् हुए हैं, उन शक्तिको मैंने ही प्रकाशित किया है। सृष्टिके आदिमें मेरी इच्छासे वह प्रकृतिदेवी मुझसे ही प्रकट हुई हैं और मेरे सृष्टिका संहार कर लेनेपर वह अन्तर्हित होकर शयन करती हैं। प्रकृति ही सृष्टिकी विधायिका और समस्त प्राणियोंकी परा जननी है। वह मेरी माया मेरे समान है, इसी कारण नारायणी कहलाती है। शम्भुने चिरकालतक मेरा ध्यान करते हुए तपस्या की है, इसलिये तपकी फलस्वरूपा मायाको मैंने उन्हें प्रदान किया है। मायारूपा पार्वतीका यह व्रत लोकशिक्षाके लिये ही है, अपने लिये नहीं है; क्योंकि त्रिलोकीमें व्रतों और तपस्याओंका फल देनेवाली तो ये स्वयं ही हैं। इनकी मायासे सभी प्राणी मोहित हैं। फिर प्रत्येक कल्पमें पुन पुनः इनके स्तवन, व्रत और व्रत फलकी साधनासे क्या लाभ? देवताओंमें श्रेष्ठ जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर हैं, वे मेरे ही अंश हैं तथा जीवधारी प्राणी और देवता आदि मेरी ही कलाएँ तथा कलांशरूप हैं। जैसे कुम्हार मिट्टीके बिना घटका निर्माण नहीं कर सकता तथा सोनार स्वर्णके बिना कुण्डल बनानेमें असमर्थ हैं, उसी तरह मैं भी शक्तिके बिना अपनी सृष्टिकी रचना करने में असमर्थ हूँ। अतः सृष्टिके सृजनमें शक्तिकी ही प्रधानता है - यह सभी दर्शनशास्त्रोंको मान्य है। मैं समस्त देहधारियोंका आत्मा, निर्लेप, अदृश्य और साक्षी हूँ। प्रकृतिसे उत्पन्न सभी पाञ्चभौतिक शरीर नश्वर हैं, परंतु सूर्यके समान प्रकाशमान शरीरवाला मैं नित्य हूँ। जगत्में प्रकृति सबकी आधारस्वरूपा है और मैं सबका आत्मा हूँ। वेदमें ऐसा निरूपण किया गया है कि मैं आत्मा हूँ, ब्रह्मा मन हैं, महेश्वर ज्ञानरूप हैं, स्वयं विष्णु पञ्चप्राण हैं, ऐश्वर्यशालिनी प्रकृति बुद्धि है, मेधा, निद्रा आदि ये सभी प्रकृतिकी कलाएँ हैं और वह प्रकृति ही ये शैलराजकन्या पार्वती हैं। मैं सनातनदेव ही वैकुण्ठका अधिपति हूँ और मैं ही गोलोकका भी स्वामी हूँ। वहाँ गोलोकमें मैं दो भुजाधारी होकर गोप और गोपियोंसे घिरा रहता हूँ तथा यहाँ वैकुण्ठमें मैं देवेश्वर और लक्ष्मीपतिके रूपमें चार भुजाएँ धारण करता हूँ और मेरे पार्षद मुझे घेरे रहते हैं। वैकुण्ठसे ऊपर पचास करोड़ योजनकी दूरीपर स्थित गोलोकमें मेरा निवास स्थान है, वहाँ मैं 'गोपीनाथ' रूपसे रहता हूँ। उन्हीं द्विभुजधारी गोपीनाथकी व्रतद्वारा आराधना की जाती है और वे ही उसका फल प्रदान करते हैं। जो जिस रूपसे उनका ध्यान करता है, उसे उसी रूपसे उसका फल देते हैं। अतः शिवे ! तुम शिवको दक्षिणारूपमें देकर अपना व्रत पूर्ण करो। फिर समुचित मूल्य देकर अपने स्वामीको वापस कर लेना शुभे! जैसे गौएँ विष्णुकी देहस्वरूपा हैं, उसी प्रकार शिव भी विष्णुके शरीर हैं; अतः तुम ब्राह्मणको गोमूल्य प्रदान करके अपने स्वामीको लौटा लेना। यह बात श्रुतिसम्मत है; क्योंकि जैसे स्वामी यज्ञपत्नीका दान करनेके लिये सदैव समर्थ है, उसी तरह यज्ञपत्नी भी स्वामीको दे डालनेकी अधिकारिणी है।

सभाके बीच यों कहकर नारायण वहीं अन्तर्धान हो गये। इसे सुनकर सभी सभासद् हर्षविभोर हो गये तथा हर्ष-गद्गद हुई पार्वती दक्षिणा देनेको उद्यत हुईं। तदनन्तर शिवा हवनकी पूर्णाहुति करके शिवको दक्षिणारूपमें दे दिया और उधर सनत्कुमारजीने उस देवसभामें 'स्वस्ति' ऐसा कहकर दक्षिणा ग्रहण कर ली। उस समय भयभीत होनेके कारण दुर्गाका कण्ठ, ओठ और तालु सूख गया था, वे हाथ जोड़कर दुःखी हृदयसे ब्राह्मणसे बोलीं ।

पार्वतीजीने कहा -

विप्रवर! 'गौका मूल्य मेरे पतिके बराबर है- ऐसा वेदमें कहा गया है, अतः मैं आपको एक लाख गौएँ प्रदान करूँगी। आप मेरे स्वामीको लौटा दीजिये। पतिके मिल जानेपर मैं ब्राह्मणोंको अनेक प्रकारकी दक्षिणाएँ बाँदूँगी। (अभी तो मैं आत्महीन हूँ, ऐसी दशामें) भला, आत्मासे रहित शरीर कौन सा कर्म करनेमें समर्थ हो सकता है ?

सनत्कुमारजी बोले-

देवि! मैं ब्राह्मण हूँ। मुझे एक लाख गौओंसे क्या प्रयोजन है और इस अमूल्य रत्नको गौओंके बदले देनेसे भी क्या लाभ होगा? त्रिलोकीमें सभी लोग स्वयं अपने-अपने कर्मके कर्ता हैं। क्या कर्ताका अभीष्ट कर्म कहीं दूसरेकी इच्छासे होता है? मैं इन दिगम्बरको आगे करके तीनों लोकों में भ्रमण करूँगा। उस समय ये बालक-बालिकाओंके समुदायके लिये हँसीके कारण होंगे।

मुने! उस देवसभामें यों कहकर ब्रह्माके पुत्र तेजस्वी सनत्कुमारने शंकरजीको अपने संनिकट बैठा लिया। इस प्रकार कुमारद्वारा शंकरजीको ग्रहण किये जाते देखकर पार्वतीके कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये। वे शरीर छोड़ देनेके लिये उद्यत हो गयीं। उस समय वे मन ही मन सोचने लगीं कि यह कैसी कठिन बात हुई कि न तो अभीष्टदेवका दर्शन मिला और न व्रतका फल ही प्राप्त हुआ। इसी बीच पार्वतीसहित देवताओंने आकाशमें एक परमोत्कृष्ट तेजसमूह देखा। उसकी प्रभा करोड़ों सूर्योकी प्रभासे उत्कृष्ट थी, वह दसों दिशाओंको प्रज्वलित कर रहा था और सम्पूर्ण देवताओंसे युक्त कैलास पर्वतको तथा सबको आच्छादित कर रहा था। उसकी मण्डलाकृति बड़ी विस्तृत थी। भगवान् उस तेजको देखकर देवता लोग क्रमशः उनकी स्तुति करने लगे।

विष्णुने कहा -

भगवन् ! यह जो महाविराट् है, जिसके रोमछिद्रोंमें सभी ब्रह्माण्ड वर्तमान हैं, वह जब आपका सोलहवाँ अंश है, तब हम लोगोंकी क्या गणना है ? ब्रह्माने कहा परमेश्वर ! जो वेदोंके उपयुक्त दृश्य है, उसका प्रत्यक्ष दर्शन करने, स्तवन करने तथा वर्णन करनेमें मैं समर्थ हूँ; परंतु जो वेदोंसे परे है, उसकी मैं क्या स्तुति करूँ ?

श्रीमहादेवजीने कहा-

भगवन् ! जो सबके - लिये अनिर्वचनीय, स्वेच्छामय, व्यापक और ज्ञानसे परे हैं, उन आपका मैं ज्ञानका अधिष्ठातृदेवता होकर किस प्रकार स्तवन करूँ ?

धर्मने कहा-

जो अदृश्य होते हुए भी अवतारके समय सभी प्राणियोंके लिये दृश्य हो जाते हैं, उन भक्तोंके मूर्तिमान् अनुग्रहस्वरूप तेजोरूपकी मैं कैसे स्तुति करूँ ?

देवताओंने कहा-

देवेश्वर! भला जिनका गुणगान करनेमें वेद समर्थ नहीं हैं तथा सरस्वतीकी शक्ति कुण्ठित हो जाती है, उन आपका स्तवन करनेके लिये हमलोग कैसे समर्थ हो सकते हैं; क्योंकि हम तो आपके कलांश हैं।

मुनियोंने कहा-

देव ! वेदोंको पढ़कर विद्वान् कहलानेवाले हमलोग वेदोंके कारणस्वरूप आपकी स्तुति कैसे कर सकते हैं? आप मन वाणीके परे हैं; आपका स्तवन सरस्वती भी नहीं कर सकतीं।

सरस्वतीने कहा-

अहो ! यद्यपि वेदवादी लोग मुझे वाणीकी अधिष्ठातृदेवी कहते हैं, तथापि आपकी स्तुति करनेके लिये मुझमें कुछ भी शक्ति नहीं है; क्योंकि आप वाणी और मनके अगोचर हैं।

सावित्रीने कहा-

नाथ! प्राचीनकालमें मेरी उत्पत्ति आपकी कलासे हुई थी। मैं वेदोंकी जननी हूँ। अतः स्त्रीस्वभाववश मैं सम्पूर्ण कारणोंके भी कारणस्वरूप आपकी किस प्रकार स्तुति करूँ ?

लक्ष्मीने कहा-

भगवन्! मैं आपके अंशभूत विष्णुकी पत्नी हूँ, जगत्का पालन-पोषण करनेवाली हूँ और आपकी कलासे उत्पन्न हुई हूँ। ऐसी दशामें जगत्‌की उत्पत्तिके कारणस्वरूप आपका स्तवन कैसे कर सकती हूँ? हिमालयने कहा – नाथ! मैं कर्मसे स्थावर हूँ, अतः मुझे स्तुति करनेके लिये उद्यत देखकर सत्पुरुष मेरा उपहास कर रहे हैं। मैं क्षुद्र हूँ और स्तवन करनेके लिये सर्वथा अयोग्य हूँ; फिर किस प्रकार आपकी स्तुति करूँ ?

मुने! इस प्रकार जब सभी देवता, देवियाँ और मुनिगण क्रमशः उन नारायणकी स्तुति करके चुप हो गये, तब जो उत्तमव्रतपरायणा, तपस्याओं और सम्पूर्ण कर्मोंका फल प्रदान करनेवाली और जगन्माता हैं, वे पार्वतीदेवी शिवजीकी प्रेरणासे व्रतके आराध्यदेव परमात्माकी स्तुति करनेको उद्यत हुईं। उस व्रतकालमें उन सतीका शरीर धौतवस्त्रसे आच्छादित था। वे सिरपर जटाका भार धारण किये हुए थीं। उनका रूप धधकती हुई अग्निकी लपटके समान प्रकाशमान था और वे तेजकी मूर्तिमान् विग्रह जान पड़ती थीं।

पार्वतीजी बोलीं-

श्रीकृष्ण! आप तो मुझे जानते हैं; परंतु मैं आपको जानने में असमर्थ हूँ। भद्र! आपको वेदज्ञ, वेद अथवा वेदकर्ता इनमें से कौन जानते हैं? अर्थात् कोई नहीं। भला, जब आपके अंश आपको नहीं जानते, तब आपकी कलाएँ आपको कैसे जान सकती हैं? इस तत्त्वको आप ही जानते हैं। आपके अतिरिक्त दूसरे लोग कौन इसे जाननेमें समर्थ हैं? आप सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतम, अव्यक्त, स्थूलसे भी महान् स्थूलतम हैं। आप सनातन, विश्वके कारण, विश्वरूप और विश्व हैं। आप ही कार्य, कारण, कारणोंके भी कारण, तेजःस्वरूप, षडैश्वयसे युक्त, निराकार, निराश्रय, निर्लिप्त, निर्गुण, साक्षी, स्वात्माराम, परात्पर, प्रकृतिके अधीश्वर और विराट्के बीज हैं। आप ही विरारूप भी हैं। आप सगुण हैं और सृष्टि रचनाके लिये अपनी कलासे प्राकृतिक रूप धारण कर लेते हैं। आप ही प्रकृति हैं, आप ही पुरुष हैं और आप ही वेदस्वरूप हैं। आपके अतिरिक्त अन्य कहीं कुछ भी नहीं है। आप जीव, साक्षीके भोक्ता और अपने आत्माके प्रतिबिम्ब हैं। आप ही कर्म और कर्मबीज हैं तथा कर्मोंके फलदाता भी आप ही हैं। योगीलोग आपके निराकार तेजका ध्यान करते हैं तथा कोई-कोई आपके चतुर्भुज, शान्त, लक्ष्मीकान्त मनोहर रूपमें ध्यान लगाते हैं। नाथ ! जो वैष्णव भक्त हैं, वे आपके उस तेजस्वी, साकार, कमनीय, मनोहर, शङ्ख-चक्र-गदा-पद्मधारी, पीताम्बरसे सुशोभित, रूपका ध्यान करते हैं और आपके भक्तगण परमोत्कृष्ट, कमनीय, दो भुजावाले, सुन्दर, किशोर अवस्थावाले, श्यामसुन्दर, शान्त, गोपीनाथ तथा रत्नाभरणोंसे विभूषित रूपका निरन्तर हर्षपूर्वक सेवन करते हैं। योगीलोग भी जिस रूपका ध्यान करते हैं, वह भी उस तेजस्वी रूपके अतिरिक्त और क्या है? देव! प्राचीनकालमें जब असुरोंका वध करनेके लिये ब्रह्माजीने मेरा स्तवन किया, तब मैं आपके उस तेजको धारण करनेवाले देवताओंके तेजसे प्रकट हुई। विभो ! मैं अविनाशिनी तथा तेज: स्वरूपा हूँ। उस समय मैं शरीर धारण करके रमणीय रमणीरूप बनाकर वहाँ उपस्थित हुई। तत्पश्चात् आपकी मायास्वरूपा मैंने उन असुरोंको मायाद्वारा मोहित कर लिया और फिर उन सबको मारकर मैं शैलराज हिमालयपर चली गयी तदनन्तर तारकाक्षद्वारा पीड़ित हुए देवताओंने जब मेरी सम्यक् प्रकारसे स्तुति की, तब मैं उस जन्ममें दक्ष-पत्नीके गर्भसे उत्पन्न होकर शिवजीकी भार्या हुई और दक्षके यज्ञमें शिवजीकी निन्दा होनेके कारण मैंने उस शरीरका परित्याग कर दिया। फिर मैंने ही शैलराजके कर्मोंके परिणामस्वरूप हिमालयकी पत्नीके गर्भसे जन्म धारण किया। इस जन्ममें भी अनेक प्रकारकी तपस्याके फलस्वरूप शिवजी मुझे प्राप्त हुए और ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे उन सर्वव्यापी योगीने मेरा पाणिग्रहण किया; परंतु देवमायावश मुझे उनके शृङ्गारजन्य तेजकी प्राप्ति नहीं हुई। परमेश्वर! इसी कारण पुत्र दुःखसे दुःखी होकर मैं आपका स्तवन कर रही हूँ और | इस समय आपके सदृश पुत्र प्राप्त करना चाहती हूँ; परंतु अङ्गसहित वेदमें आपने ऐसा विधान बना रखा है कि इस व्रतमें अपने स्वामीकी दक्षिणा दी जाती है (जो बड़ा दुष्कर कार्य है) । कृपासिन्धो! यह सब सुनकर आपको मुझपर कृपा करनी चाहिये।

नारद! वहाँ ऐसा कहकर पार्वती चुप हो गयीं। जो मनुष्य मनको पूर्णतया एकाग्र करके भारतवर्ष में इस पार्वतीकृत स्तोत्रको सुनता है, उसे निश्चय ही विष्णुके समान पराक्रमी उत्तम पुत्रकी प्राप्ति होती है। जो वर्षभरतक हविष्यान्नका भोजन करके भक्तिभावसे श्रीहरिकी अर्चना करता है, वह इस उत्तम पुण्यक व्रतके फलको - पाता है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। ब्रह्मन् ! यह विष्णुका स्तवन सम्पूर्ण सम्पत्तियोंकी वृद्धि करनेवाला, सुखदायक, मोक्षप्रद, साररूप, स्वामीके सौभाग्यका वर्धक, सम्पूर्ण सौन्दर्यका बीज, यशकी राशिको बढ़ानेवाला, हरि भक्तिका - दाता और तत्त्वज्ञान तथा बुद्धिकी विशेषरूपसे उन्नति करनेवाला है। (अध्याय ७)