नारदजीने पूछा-
हरिके अंशसे उत्पन्न हुए। महाभाग नारायण! आपकी कृपासे मैंने गणेशका सारा शुभ चरित सुन लिया। किंतु ब्रह्मन् ! विष्णुने उस बालकके धड़पर गजराजके दो दाँतोंवाले मुखको जोड़ा था; फिर वह शिशु एकदन्त कैसे हो गया? उसका वह दूसरा दाँत कहाँ चला गया ? वह प्रसङ्ग बतलानेकी कृपा कीजिये; क्योंकि आप सर्वेश्वर, सर्वज्ञ, कृपालु और भक्तवत्सल हैं।
नारायणने कहा-
नारद! एकदन्तका चरित सम्पूर्ण मङ्गलोंका मङ्गल करनेवाला है। मैं उस प्राचीन इतिहासका वर्णन करता हूँ, सुनो। मुने! एक समयकी बात है, राजा कार्तवीर्य शिकार खेलनेके लिये वनमें गया। वहाँ वह बहुत -से वन्य पशुओंका वध करके थक गया। इतने में सूर्यास्त हो चला, तब उस राजाने सायंकाल में सेनासहित वहीं वनमें जमदग्नि ऋषिके आश्रम के निकट पड़ाव डाल दिया और बिना कुछ खाये - पीये रात्रि व्यतीत की। प्रातः काल राजा सरोवरमें स्नान करके पवित्र हुआ और अपने शरीरको अलंकृत करके दत्तात्रेयद्वारा दिये गये मन्त्रका भक्तिपूर्वक जप करने लगा। मुनिवर जमदग्निने देखा कि राजाके कण्ठ, ओष्ठ और तालु सूख गये हैं; तब उन्होंने प्रेमके साथ आदरपूर्वक कोमल वाणीसे राजाका कुशल- समाचार पूछा। तदनन्तर राजाने बड़ी उतावलीके साथ सूर्यके समान तेजस्वी मुनिको प्रणाम किया और मुनिने चरणों में पड़े हुए राजाको स्नेहपूर्वक शुभाशीर्वाद दिया। राजाने अपने उपवास आदिका सारा वृत्तान्त कह सुनाया; तब मुनिने तुरंत ही डरते-डरते राजाको निमन्त्रण दे दिया। इसके बाद मुनिश्रेष्ठ जमदग्नि हर्षपूर्वक अपने आश्रमको लौट आये और वहाँ उन्होंने लक्ष्मीसदृशी माता कामधेनुसे सारा वृत्तान्त कह सुनाया। तब कामधेनु भयभीत हुए मुनिसे बोली- 'मुने! मेरे रहते आपको भय कैसा ? आप तो मेरे द्वारा सारे जगत्को भोजन कराने समर्थ हैं; फिर राजाकी क्या बात है? आप राजाओंके भोजन योग्य त्रिलोकीमें दुर्लभ जिन - जिन पदार्थोंकी याचना करेंगे, वह सब मैं आपको प्रदान करूँगी।' तदनन्तर कामधेनुने अनेक प्रकारके भोजन करनेके योग्य सोने और चाँदीके बर्तन, असंख्यों भोजन बनानेके पात्र और बहुत से स्वादिष्ट पदार्थोंसे परिपूर्ण बर्तन मुनिको - दिये। फिर नाना प्रकारके स्वादिष्ट और पके हुए कटहल, आम, नारियल और बेलके फल प्रदान किये। नारद! स्वादिष्ट लड्डुओंकी तो असंख ढेरियाँ लग गयीं। जौ और गेहूँके आटेकी बनीं हुई पूड़ियों और भाँति-भाँतिके पकवानोंका पर्वत तथा उत्तम उत्तम अन्नोंका ढेर लग गया। दूध, दही और घीकी नदियाँ बह चलीं। शक्करका ढेर तथा मोदकोंका पहाड़ लग गया। उत्तम धानके चिउड़ोंका पर्वत-सा ढेर लगा दिया। फिर कौतुकवश राजाओंके योग्य पूर्णतया कर्पूर आदिसे सुवासित ताम्बूल और सुन्दर वस्त्राभूषण प्रदान किया। इस प्रकार सामग्रीसे सम्पन्न हो मुनिने खेल-ही-खेलमें सेनासहित राजाको मनोहर पदार्थ देकर भोजन कराया। तब जो जो वस्तुएँ परम दुर्लभ थीं, उन्हें भरीपूरी देखकर राजाधिराज कार्तवीर्यको महान् विस्मय हुआ। फिर उन बर्तनोंको देखकर वह कहने लगा।
राजाने कहा-
सचिव! जरा पता तो लगाओ कि ये दुर्लभ पदार्थ सहसा कहाँसे आ गये? ये मेरे लिये असाध्य हैं और बहुतोंका तो मैंने नाम भी नहीं सुना है।
मन्त्री बोला-
महाराज! मैंने मुनिके आश्रममें सब कुछ देख लिया है, सुनिये। वहाँ तो अग्निकुण्ड, समिधा, कुश, पुष्प, फल, कृष्णमृगचर्म, स्रुवा, स्रुक्, शिष्यसमुदाय और सूर्यके तेजके आधारपर पकनेवाले अन्न आदि ही हैं। वह सम्पूर्ण सम्पत्तियोंसे रहित है। वहाँ मैंने यह भी देखा है कि सभी लोग जटाधारी हैं और वृक्षोंकी छाल ही उनका वस्त्र है। परंतु आश्रमके एक भागमें मैंने एक मनोहर कपिला गौको देखा है। उसके अङ्ग बड़े सुन्दर हैं। चाँदनीकी-सी उसकी कान्ति है और लाल कमलके समान उसके नेत्र हैं। पूर्णिमाके चन्द्रमाकी-सी कान्तिमती वह गौ वहाँ तेजसे उद्दीप्त हो रही थी। वही साक्षात् लक्ष्मीकी तरह सम्पूर्ण सम्पत्तियों और गुणोंकी आधार है। तदनन्तर मन्त्रीके कहनेपर वह दुर्बुद्धि राजा मुनिसे उस गौकी याचना करनेके लिये उद्यत हो गया; क्योंकि वह उस समय सर्वथा कालपाशसे बँधा हुआ था। भला, पुण्य अथवा उत्तम बुद्धि क्या कर सकती है; क्योंकि होनहार ही सब तरहसे बली होता है। इसी कारण पुण्यवान् एवं बुद्धिमान् होकर भी राजेन्द्र कार्तवीर्य दैववश ब्राह्मणसे याचना करना चाहता है। पुण्यसे भारतवर्ष में पुण्यरूप कर्म और पापसे भयदायक पापरूप कर्म प्रकट होता है। पुण्यकर्मसे स्वर्गका भोग करके मनुष्य पुण्यस्थलमें जन्म लेते हैं और पापकर्मसे नरकका भोग करनेके पश्चात् प्राणियोंकी निन्दित योनिमें उत्पत्ति होती है। नारद ! कर्मके वर्तमान रहते प्राणियोंका उद्धार नहीं होता; इसलिये संतलोग निरन्तर कर्मका क्षय ही करते रहते हैं। वही विद्या, वही तप, वही ज्ञान, वही गुरु, वही भाई बन्धु, वही माता, वही पिता और वही पुत्र सार्थक है, जो कर्मक्षयमें सहायता करता है। प्राणियोंके कर्मोंका शुभ-अशुभ भोग दारुण रोगके समान है, जिसे भक्तरूपी वैद्य श्रीकृष्ण भक्तिरूपी रसायनके द्वारा नष्ट करते हैं। - जगत्का धारण-पोषण करनेवाली बुद्धिदायिनी माया प्रत्येक जन्ममें सेवा किये जानेपर संतुष्ट होकर भक्तको वह भक्ति प्रदान करती है। तदनन्तर मायासे विमुग्ध हुए राजा कार्तवीर्यने यत्नपूर्वक मुनिको अपने पास बुलाया और हर्षके साथ अञ्जलि बाँधकर भक्तिपूर्वक उनसे विनयपूर्ण वचन कहा।
राजा बोला-
भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये उद्यत रहनेवाले भक्तेश! आप तो कल्पतरुके समान हैं; अतः मुझ भक्तको कामनापूर्ण करने वाली इस कामधेनुको भिक्षारूपमें प्रदान कीजिये। तपोधन! आप जैसे दाताओंके लिये भारतमें कोई वस्तु अदेय नहीं है। मैंने सुना भी है कि पूर्वकालमें दधीचिने देवताओंको अपनी हड्डी दे डाली थी । तपोराशे! आप तो भारतवर्ष में लीलापूर्वक भ्रूभङ्गमात्र से समूह की समूह कामधेनुओंकी सृष्टि करनेमें समर्थ हैं।
मुनिने कहा -
राजन् ! आश्चर्य है, तुम तो - उलटी बात कह रहे हो। अरे मूर्ख एवं छली नरेश! मैं ब्राह्मण होकर क्षत्रियको दान कैसे दूँगा? इस कामधेनुको परमात्मा श्रीकृष्णने गोलोकमें यज्ञके अवसरपर ब्रह्माको दिया था, अतः प्राणों से बढ़कर प्यारी यह गौ देने योग्य नहीं है। भूमिपाल ! फिर ब्रह्माने इसे अपने प्रिय पुत्र भृगुको दिया और भृगुने मुझे दिया। इस प्रकार यह कपिला मेरी पैतृक सम्पत्ति है। यह कामधेनु गोलोकमें उत्पन्न हुई है; अतः त्रिलोकीमें दुर्लभ है। तब भला मैं लीलापूर्वक ऐसी कपिलाकी सृष्टि करनेमें कैसे समर्थ हो सकता हूँ। न तो मैं हलवाहा हूँ और न तुम्हारी सहायतासे बुद्धिमान् हुआ हूँ। मैं अतिथिको छोड़कर शेष सबको क्षणमात्रमें भस्मसात् करनेकी शक्ति रखता हूँ। अतः अपने घर जाओ और स्त्री-पुत्रों को देखो। मुनिके इस वचनको सुनकर राजाको क्रोध आ गया। तब वह मुनिको नमस्कार करके सेनाके मध्यमें चला गया। उस समय भाग्यने उसे बाधित कर दिया था; अतः क्रोधके कारण उसके होंठ फड़क रहे थे। उसने सेनाके निकट जाकर बलपूर्वक गौको लानेके लिये नौकरोंको भेजा। इधर शोकके कारण, जिनका विवेक नष्ट हो गया था, वे मुनिवर जमदग्नि कपिलाके संनिकट जाकर रोने लगे और उन्होंने सारा वृत्तान्त कह सुनाया। तब भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये उद्यत रहनेवाली वह गौ, जो साक्षात् लक्ष्मीस्वरूपा थी, ब्राह्मणको रोते देखकर बोली।
सुरभिने कहा-
मुने! जो निरन्तर अपनी वस्तुओंका शासक, पालक और दाता है, चाहे वह इन्द्र हो अथवा हलवाहा, वही अपनी वस्तुका दान कर सकता है। तपोधन! यदि आप स्वेच्छानुसार मुझे राजाको देंगे, तभी मैं स्वेच्छा अथवा आपकी आज्ञासे उसके साथ जाऊँगी। यदि आप नहीं देंगे तो मैं आपके घरसे नहीं जाऊँगी। आप मेरे द्वारा दी गयी सेनाके सहारे राजाको भगा दीजिये। सर्वज्ञ! मायासे विमुग्ध चित्त होकर आप क्यों रो रहे हैं? अरे! ये संयोग-वियोग तो कालकृत हैं, आत्मकृत नहीं हैं। आप मेरे कौन हैं और मैं आपकी कौन हूँ यह सम्बन्ध तो कालद्वारा नियोजित है। जबतक यह सम्बन्ध है तभीतक आप मेरे हैं। मन जबतक जिस वस्तुको केवल अपना मानता है और उसपर अपना अधिकार समझता है, तभीतक उसके वियोगसे दुःख होता है। इतना कहकर कामधेनुने सूर्यके सदृश कान्तिमान् नाना प्रकारके शस्त्रास्त्र और सेनाएँ उत्पन्न कीं। उस कपिलाके मुख आदि अङ्गोंसे करोड़ों करोड़ों खड्गधारी, शूलधारी, धनुर्धारी, दण्ड, शक्ति और गदाधारी शूरवीर निकल आये। करोड़ों वीर राजकुमार और म्लेच्छ निकले। इस प्रकार कपिलाने मुनिको सेनाएँ देकर उन्हें निर्भय कर दिया और कहा- 'ये सेनाएँ युद्ध करेंगी; आप वहाँ मत जाइये। उस सामग्रीसे सम्पन्न होनेके कारण मुनिको महान् हर्ष प्राप्त हुआ। इधर राजाद्वारा भेजे गये भृत्यने लौटकर राजाको सारा वृत्तान्त बतलाया। कपिलाकी सेनाका वृत्तान्त और अपने पक्षकी पराजय सुनकर नृपश्रेष्ठ कार्तवीर्य भयभीत हो गया। उसके मनमें कातरता छा गयी। तब उसने दूत भेजकर अपने देशसे और सेनाएँ मँगवायीं। (अध्याय २४)
Summary of chapter 20 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Gaṇeśa Khaṇḍa is as follows:
Leaving his father's hermitage, young Parashurāma traveled to the snow-capped peak of Mount Kailāsa, falling prostrate before Lord Śiva and begging to become His disciple. Pleased by the young warrior's humility and intense devotion, Lord Śiva accepted him as His beloved student and subjected him to rigorous tests of spiritual purity, physical endurance, and mental focus. For hundreds of years, Parashurāma performed severe penance, meditating upon the Supreme Lord Śrī Kṛshṇa while mastering the divine arts of warfare, archery, and cosmic weaponry under Lord Śiva's direct guidance, preparing himself to become an unbeatable instrument of divine justice.