श्रीनारायणजी कहते हैं-
नारद! तदनन्तर विष्णुने शुभ समय आनेपर देवों तथा मुनियोंके साथ सर्वश्रेष्ठ उपहारोंसे उस बालकका पूजन किया और उससे यों कहा- 'सुरश्रेष्ठ! मैंने सबसे पहले तुम्हारी पूजा की है; अतः वत्स! तुम सर्वपूज्य तथा योगीन्द्र होओ। यों कहकर श्रीहरिने उसके गलेमें वनमाला डाल दी और उसे मुक्तिदायक ब्रह्मज्ञान तथा सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्रदान करके अपने समान बना दिया। फिर षोडशोपचारकी सुन्दर वस्तुएँ दीं और मुनियों तथा देवोंके साथ उसका इस प्रकार नामकरण किया विघ्नेश, गणेश, हेरम्ब, गजानन, लम्बोदर, एकदन्त, शूर्पकर्ण और विनायक - उसके ये आठ नाम रखे गये। पुनः सनातन श्रीहरिने उन मुनियोंको बुलवाकर उसे आशीर्वाद दिलाया। तदनन्तर सभी देव-देवियोंने तथा मुनियों आदिने अनेक प्रकारके उपहार गणेशको दिये और फिर क्रमश: उन्होंने भक्तिपूर्वक उसकी पूजा की।
नारद! तदनन्तर जगज्जननी पार्वतीने, जिनका मुखकमल हर्षके कारण विकसित हो रहा था, अपने पुत्रको रत्ननिर्मित सिंहासनपर बैठाया। फिर उन्होंने आनन्दपूर्वक समस्त तीर्थोके जलसे भरे हुए सौ कलशोंसे मुनियोंद्वारा वेद मन्त्रोच्चारणपूर्वक उसे स्नान कराया और अग्निमें तपाकर शुद्ध किये हुए दो वस्त्र दिये। फिर पाद्यके लिये गोदावरीका जल, अर्घ्यके निमित्त गङ्गाजल और आचमनके हेतु दूर्वा, अक्षत, पुष्प और चन्दनसे युक्त पुष्करका जल लाकर दिया। रत्नपात्रमें रखे हुए शक्करयुक्त द्रवका मधुपर्क प्रदान किया। पुनः स्वर्गलोकके वैद्य अश्विनीकुमारद्वारा निर्मित स्नानोपयोगी विष्णुतैल, बहुमूल्य रत्नोंके बने हुए सुन्दर आभूषण, पारिजातके पुष्पोंकी सौ मालाएँ, मालती, चम्पक आदि अनेक प्रकारके पुष्प, तुलसीके अतिरिक्त पूजोपयोगी तरह तरहके पत्र, चन्दन, अगुरु, कस्तूरी, कुंकुम, ढेर-के-ढेर रत्नप्रदीप और धूप सादर समर्पित किये। तत्पश्चात् उसे प्रिय लगनेवाले नैवेद्यों तिलके लड्डू, और गेहूँके चूर्ण, पूड़ी, अत्यन्त स्वादिष्ट तथा मनोहर पक्वान्न, शर्करामिश्रित स्वादिष्ट स्वस्तिक के आकारका बना हुआ त्रिकोण पकवानविशेष, गुड़युक्त खील, चिउड़ा और अगहनीके चावलके आटेके बने हुए पदार्थके नाना प्रकारके व्यञ्जनोंके साथ पहाड़ लगा दिया। नारद! फिर उस पूजनमें सुन्दरी पार्वतीने हर्षमें भरकर एक लाख घड़े, दूध, एक लाख घड़े दही, तीन लाख घड़े मधु और पाँच लाख घड़े घी सादर अर्पित किया। नारद! फिर अनार और बेलके असंख्य फल, भाँति-भाँतिके खजूर, कैथ, जामुन, आम, कटहल, केला और नारियलके असंख्य फल दिये। इनके सिवा और भी जो ऋतुके अनुसार विभिन्न देशों में उत्पन्न हुए स्वादिष्ट एवं मधुर पके हुए फल थे, उन्हें भी महामायाने समर्पित किया। पुनः आचमन और पान करनेके लिये अत्यन्त निर्मल कर्पूर आदिसे सुवासित स्वच्छ गङ्गाजल दिया। नारद! इसके बाद उसी प्रकार सुवासित उत्तम रमणीय पानके बीड़े और बायनसे परिपूर्ण सैकड़ों स्वर्णपात्र दिये।
तदनन्तर मेनका, हिमालय, हिमालयके पुत्र और प्रिय अमात्योंने गिरिजाके पुत्रका पूजन किया। वहाँ उपस्थित ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि सभी देवता―
"ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं गणेश्वराय ब्रह्मरूपाय चारवे । सर्वसिद्धिप्रदेशाय विघ्नेशाय नमो नमः ॥"
– इसी मन्त्रसे भक्तिपूर्वक वस्तुएँ समर्पित करके परमानन्दमें मग्न थे। इस मन्त्रमें बत्तीस अक्षर हैं। यह सम्पूर्ण कामनाओंका दाता, धर्म, अर्थ, काम, मोक्षका फल देनेवाला और सर्वसिद्धिप्रद है। इसके पाँच लाख जपसे ही जापकको मन्त्रसिद्धि प्राप्त हो जाती है। भारतवर्षमें जिसे मन्त्रसिद्धि हो जाती है, वह विष्णु-तुल्य हो जाता है। उसके नाम स्मरणसे सारे विघ्न भाग जाते हैं। निश्चय ही वह महान् वक्ता, महासिद्ध, सम्पूर्ण सिद्धियों से सम्पन्न, श्रेष्ठ कवियोंमें भी श्रेष्ठ गुणवान्, विद्वानोंके गुरुका गुरु तथा जगत्के लिये साक्षात् वाक्पति हो जाता है। उस उत्सवके अवसरपर आनन्दमग्न हुए देवताओंने इस मन्त्रसे शिशुकी पूजा करके अनेक प्रकारके बाजे बजवाये, उत्सव कराया, ब्राह्मणों को भोजनसे तृप्त किया; फिर उन ब्राह्मणोंको तथा विशेषतया वन्दियोंको दान दिया।
श्रीनारायणजी कहते हैं-
नारद! तदनन्तर उस सभाके बीच विष्णु परमभक्तिपूर्वक सम्पूर्ण विघ्नोंके विनाशक उन गणेश्वरकी भलीभाँति करके उनकी स्तुति करने लगे। पूजा श्रीविष्णुने कहा – ईश ! मैं सनातन - ब्रह्मज्योतिः स्वरूप आपका स्तवन करना चाहता हूँ, परंतु आपके अनुरूप निरूपण करनेमें मैं सर्वथा असमर्थ हूँ; क्योंकि आप इच्छारहित, सम्पूर्ण देवोंमें श्रेष्ठ, सिद्धों और योगियोंके गुरु, सर्वस्वरूप, सर्वेश्वर, ज्ञानराशिस्वरूप, अव्यक्त, अविनाशी, नित्य, सत्य, आत्मस्वरूप, वायुके समान अत्यन्त निर्लेप, क्षतरहित, सबके साक्षी, संसार-सागरसे पार होनेके लिये परम दुर्लभ मायारूपी नौकाके कर्णधारस्वरूप, भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले, श्रेष्ठ, वरणीय, वरदाता, वरदानियोंके भी ईश्वर, सिद्ध, सिद्धिस्वरूप, सिद्धिदाता, सिद्धिके साधन, ध्यानसे अतिरिक्त ध्येय, ध्यानद्वारा असाध्य, धार्मिक, धर्मस्वरूप, धर्मके ज्ञाता, धर्म और अधर्मका फल प्रदान करनेवाले, संसार वृक्षके बीज, अंकुर और उसके आश्रय, स्त्री-पुरुष और नपुंसकके स्वरूपमें विराजमान तथा इनकी इन्द्रियों परे, सबके आदि, अग्रपूज्य, सर्वपूज्य, गुणके सागर, स्वेच्छासे सगुण ब्रह्म तथा स्वेच्छासे ही निर्गुण ब्रह्मका रूप धारण करनेवाले, स्वयं प्रकृतिरूप और प्रकृतिसे परे प्राकृतरूप हैं। शेष अप सहस्रों मुखोंसे भी आपकी स्तुति करनेमें असमर्थ हैं। आपके स्तवनमें न पञ्चमुख महेश्वर समर्थ हैं न चतुर्मुख ब्रह्मा ही; न सरस्वतीकी शक्ति है और न मैं ही कर सकता हूँ। न चारों वेदोंकी ही शक्ति है, फिर उन वेदवादियोंकी क्या गणना ?
इस प्रकार देवसभामें देवताओंके साथ सुरेश्वर गणेशकी स्तुति करके सुराधीश रमापति मौन हो गये। मुने! जो मनुष्य एकाग्रचित्त हो भक्तिभावसे प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल इस विष्णुकृत गणेशस्तोत्रका सतत पाठ करता है, विघ्नेश्वर उसके समस्त विघ्नोंका विनाश कर देते हैं, सदा उसके सब कल्याणोंकी वृद्धि होती है और वह स्वयं कल्याणजनक हो जाता है। जो यात्राकालमें भक्तिपूर्वक इसका पाठ करके यात्रा करता है, निस्संदेह उसकी सभी अभीप्सित कामनाएँ सिद्ध हो जाती हैं। उसके द्वारा देखा गया दुःस्वप्न सुस्वप्रमें परिणत हो जाता है। उसे कभी दारुण ग्रहपीड़ा नहीं भोगनी पड़ती। उसके शत्रुओंका विनाश और बन्धुओंका विशेष उत्कर्ष होता है। निरन्तर विघ्नोंका क्षय और सदा सम्पत्तिकी वृद्धि होती रहती है। उसके घरमें पुत्र-पौत्रको बढ़ानेवाली लक्ष्मी स्थिररूपसे वास करती हैं। वह इस लोकमें सम्पूर्ण ऐश्वर्योंका भागी होकर अन्तमें विष्णु पदको प्राप्त हो जाता है। तीर्थों, यज्ञों और सम्पूर्ण महादानोंसे जो फल मिलता है, वह उसे श्रीगणेशकी कृपासे प्राप्त हो जाता है - यह ध्रुव सत्य है।
नारदजीने कहा-
प्रभो ! गणेशके स्तोत्र तथा उनके मनोहर पूजनको तो मैंने सुन लिया, अब मुझे जन्म-मृत्युके चक्रसे छुड़ानेवाले कवचके सुननेकी इच्छा है।
श्रीनारायणने कहा -
नारद! उस देवसभा - मध्य जब गणेशकी पूजा समाप्त हुई, तब शनैश्चर सबके तारक जगद्गुरु विष्णुसे कहा।
शनैश्चर बोले-
वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ भगवन् ! सम्पूर्ण दुःखोंके विनाश और दुःखकी पूर्णतया शान्तिके लिये विघ्नहन्ता गणेशके कवचका वर्णन कीजिये। प्रभो! हमारा मायाशक्तिके साथ विवाद हो गया है; अतः उस विघ्नके प्रशमनके लिये मैं उस कवचको धारण करूँगा।
तदनन्तर भगवान् विष्णुने कवचकी गोपनीयता और महिमा बतलाते हुए कहा सूर्यनन्दन ! दस लाख जप करनेसे कवच सिद्ध हो जाता है। जो मनुष्य कवच सिद्ध कर लेता है, वह मृत्युको जीतनेमें समर्थ हो जाता है। सिद्ध कवचवाला मनुष्य उसके ग्रहणमात्रसे भूतलपर वाग्मी, चिरजीवी, सर्वत्र विजयी और पूज्य हो जाता है। इस मालामन्त्रको तथा इस पुण्यकवचको धारण करनेवाले मनुष्योंके सारे पाप निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं। भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्माण्ड, ब्रह्मराक्षस, डाकिनी, योगिनी, बेताल आदि, बालग्रह, ग्रह तथा क्षेत्रपाल आदि कवचके शब्दमात्रके श्रवणसे भयभीत होकर भाग खड़े होते हैं। जैसे गरुड़के निकट सर्प नहीं जाते, उसी तरह कवचधारी पुरुषोंके संनिकट आधि (मानसिक रोग), व्याधि (शारीरिक रोग) और भयदायक शोक नहीं फटकते। इसे अपने सरल स्वभाववाले गुरुभक्त शिष्यको ही बतलाना चाहिये।
शनैश्चर! इस 'संसारमोहन' नामक कवचके प्रजापति ऋषि हैं, बृहती छन्द है और स्वयं लम्बोदर गणेश देवता हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्षमें इसका विनियोग कहा गया है। मुने! यह सम्पूर्ण कवचोंका सारभूत है। 'ॐ गं हुं श्रीगणेशाय स्वाहा' यह मेरे मस्तककी रक्षा करे। बत्तीस अक्षरोंवाला मन्त्र सदा मेरे ललाटको बचावे । 'ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं गम्' यह निरन्तर मेरे नेत्रोंकी रक्षा करे। विघ्नेश भूतलपर सदा मेरे तालुकी रक्षा करें। 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं' यह निरन्तर मेरी नासिकाकी रक्षा करे तथा ॐ गौं गं शूर्पकर्णाय स्वाहा' यह मेरे ओठको सुरक्षित रखे। षोडशाक्षर मन्त्र मेरे दाँत, तालु और जीभको बचावे। 'ॐ लं श्रीं लम्बोदराय स्वाहा' सदा गण्डस्थलकी रक्षा करे। 'ॐ क्लीं ह्रीं विघ्ननाशाय स्वाहा' सदा कानों की रक्षा करे। 'ॐ श्रीं गं गजाननाय स्वाहा' सदा कंधोंकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं विनायकाय स्वाहा' सदा पृष्ठभागकी रक्षा करे। 'ॐ क्लीं ह्रीं' कंकालकी और 'गं' वक्षःस्थलकी रक्षा करे। विघ्ननिहन्ता हाथ, पैर तथा सर्वाङ्गको सुरक्षित रखे। पूर्वदिशामें लम्बोदर और अग्निकोणमें विघ्ननायक रक्षा करें। दक्षिणमें विघ्रेश और नैर्ऋत्यकोणमें गजानन रक्षा करें। पश्चिममें पार्वतीपुत्र, वायव्यकोणमें शंकरात्मज, उत्तरमें परिपूर्णतम श्रीकृष्णका अंश, ईशानकोणमें एकदन्त और ऊर्ध्वभागमें हेरम्ब रक्षा करें। अधोभागमें सर्वपूज्य गणाधिप सब ओरसे मेरी रक्षा करें । शयन और जागरणकालमें योगियोंके गुरु मेरा पालन करें। वत्स! इस प्रकार जो सम्पूर्ण मन्त्रसमूहोंका विग्रहस्वरूप है, उस परम अद्भुत संसारमोहन नामक कवचका तुमसे वर्णन कर दिया। सूर्यनन्दन ! इसे प्राचीनकालमें गोलोकके वृन्दावनमें रासमण्डल अवसरपर श्रीकृष्णने मुझ विनीतको दिया था। वही मैंने तुम्हें प्रदान किया है। तुम इसे जिस किसीको मत दे डालना। यह परम श्रेष्ठ, सर्वपूज्य और सम्पूर्ण संकटोंसे उबारनेवाला है। जो मनुष्य विधिपूर्वक गुरुकी अभ्यर्चना करके इस कवचको गलेमें अथवा दक्षिण भुजापर धारण करता है, वह निस्संदेह विष्णु ही है। ग्रहेन्द्र ! हजारों अश्वमेध और सैकड़ों वाजपेय यज्ञ इस कवचकी सोलहवीं कलाकी समानता नहीं कर सकते। जो मनुष्य इस कवचको जाने बिना शंकर सुवन गणेशकी भक्ति करता है, उसके लिये सौ लाख जपनेपर भी मन्त्र सिद्धिदायक नहीं होता। इस प्रकार सूर्यपुत्र शनैश्चरको यह कवच प्रदान करके सुरेश्वर विष्णु चुप हो गये। तब समीपमें स्थित परमानन्दमें निमग्न हुए देवताओंने कहा। (अध्याय १३)
Summary of chapter 11 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Gaṇeśa Khaṇḍa is as follows:
To ensure that no obstacle would ever touch her son again and to establish his supreme status across the universe, Goddess Pārvatī requested the assembly of deities to declare his eternal position. Lord Śrī Vishṇu, Lord Brahmā, and Lord Śiva unanimously proclaimed that Lord Gaṇeśa would forever hold the absolute primacy of worship among all living beings, Devas, and sages across all three worlds. They decreed that no religious ceremony, Vedic sacrifice, marriage, temple consecration, or auspicious undertaking would yield any fruit unless Lord Gaṇeśa was worshipped first with offerings of Modakas, Tulasī, and Dūrvā grass, establishing his eternal glory as the supreme remover of obstacles.