रेणुकाने पूछा-
ब्रह्मन् ! अब मैं अपने प्राणनाथका अनुगमन करना चाहती हूँ। दूसरोंको मान देनेवाले ये मेरे पतिदेव आज मेरे ऋतुकालके चौथे दिन मृत्युको प्राप्त हुए हैं; अतः वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ मुने! बतलाइये, अब इस विषयमें कैसी व्यवस्था करनी चाहिये। मेरे कई जन्मोंका पुण्य उदय हुआ है, जिसके फलस्वरूप आप सहसा उपस्थित हुए हैं।
भृगुने कहा-
अहो महासति! तुम अपने पुण्यात्मा पतिका अनुगमन करो; क्योंकि ऋतुका चौथा दिन पतिके सभी कार्योंमें शुद्ध माना जाता है। जो भक्तिदाता है, वही पुत्र है; जो अनुगमन करती है, वही स्त्री है; जो दान देता है, वही बन्धु है; जो गुरुकी अर्चना करता है, वही शिष्य है; जो रक्षा करे, वही अभीष्ट देवता है; जो प्रजाका पालन करे, वही राजा है; जो अपनी पत्नीकी बुद्धिको धर्ममें नियोजित करता है, वही स्वामी है; जो धर्मोपदेशक तथा हरिभक्ति प्रदान करनेवाला है, वही गुरु है- ये सभी वेदों तथा पुराणों में निश्चितरूपसे प्रशंसनीय कहे गये हैं।
रेणुकाने पूछा-
मुने! भारतवर्षमें कैसी नारियाँ अपने पतिके साथ सती हो सकती हैं और कैसी नहीं हो सकतीं? तपोधन! यह मुझे बतलानेकी कृपा कीजिये।
भृगुने कहा-
रेणुके! जिनके बच्चे छोटे हों, जो गर्भिणी हों, जिन्होंने ऋतुकालको देखा ही न हो, जो रजस्वला, कुलटा, कुष्ठरोगसे ग्रस्त, पतिकी सेवा न करनेवाली, पति भक्तिरहित - और कटुवादिनी हों- ये यदि दैववश सती भी हो जायँ तो वे अपने पतिको नहीं प्राप्त होतीं। पतिव्रताएँ चितामें शयन करनेवाले पतिको पहले संस्कारसे शुद्ध हुई आग देकर पीछे उसका अनुगमन करती हैं। यदि वे सचमुच पतिव्रता होती हैं तो अपने पतिको पा लेती हैं। जो अपने प्रियतमका अनुगमन करती हैं, वे उसीको पतिरूपमें पाती हैं और प्रत्येक जन्ममें उसीके साथ स्वर्गमें पुण्यका उपभोग करती हैं। पतिव्रते! गृहस्थों की यह व्यवस्था तो मैंने तुम्हें बतला दी। अब तीर्थ में मरनेवाले ज्ञानियों तथा वैष्णवोंके विषयमें श्रवण करो। जो साध्वी नारी जहाँ-जहाँ अपने वैष्णव पतिका अनुगमन करती है, वहाँ-वहाँ वह स्वामीके साथ वैकुण्ठमें जाकर श्रीहरिकी संनिधि प्राप्त करती है। नारद ! कृष्णभक्तिपरायण जीवन्मुक्त भक्तोंके तीर्थमें अथवा अन्यत्र मरनेमें कोई विशेषता नहीं है; क्योंकि उन्हें दोनों जगह समान फल मिलता है। इसलिये यदि स्त्री अथवा पुरुष भगवान् नारायण तथा कमलालया लक्ष्मीका भजन करे तो उस भजनके प्रभावसे महाप्रलय होनेपर भी उन दोनोंका नाश नहीं होता। वहाँ रेणुका इतना कहकर भृगुमुनि परशुरामसे समयोचित तथा वेदविहित वचन बोले।
"महाभाग वत्स! यहाँ आओ और इस अमाङ्गलिक शोकको त्याग दो। भृगुनन्दन! अपने पिताको दक्षिण सिर करके उत्तान कर दो, नया वस्त्र और यज्ञोपवीत पहनाओ और आँसू रोककर दक्षिणाभिमुख हो बैठ जाओ। फिर भक्तिपूर्वक अरणीसे उत्पन्न हुई अनि हाथमें लो और पृथ्वी पर जो-जो तीर्थ हैं, उन सबका स्मरण करो। गया आदि तीर्थ, पुण्यमय पर्वत, कुरुक्षेत्र, सरिताओंमें श्रेष्ठ गङ्गा, यमुना, कौशिकी, सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाली चन्द्रभागा, गण्डकी, काशी, पनसा, सरयू, पुष्पभद्रा, भद्रा, नर्मदा, सरस्वती, गोदावरी, कावेरी, स्वर्णरेखा, पुष्कर, रैवत, वराह, श्रीशैल, गन्धमादन, हिमालय, कैलास, सुमेरु, रत्नपर्वत, वाराणसी, प्रयाग, पुण्यमय वन वृन्दावन, हरिद्वार और बदरी- इनका बारंबार स्मरण करो। फिर चन्दन, अगुरु, कस्तूरी तथा सुगन्धित पुष्प देकर और वस्त्रसे आच्छादित करके पिताके शवको चिताके ऊपर स्थापित करो। तात! फिर सोनेकी सलाईसे कान, आँख, नाक और मुखमें निर्मन्थन करके उसे आदरसहित ब्राह्मणको दान कर दो। तत्पश्चात्, तिलसहित ताँबेका पात्र, गौ, चाँदी और सोना दक्षिणासहित दान करके स्वस्थचित्त हो दाह-कर्म करो। ॐ जो जानकारीमें अथवा अनजानमें पाप-कर्म करके मृत्यु-कालके वशीभूत हो पञ्चत्वको प्राप्त हुआ। ॐ धर्म-अधर्मसे युक्त तथा लोभ मोहसे समावृत उस मनुष्यके सारे - शरीरको जलाता हूँ; वह दिव्य लोकोंमें जाय।' इस मन्त्रको पढ़कर पिताकी प्रदक्षिणा करो और फिर 'ॐ तुम हमारे कुलमें उत्पन्न हुए हो, मैं पुनः तुम्हारा होकर उत्पन्न होऊँ, तुम्हें स्वर्गलोककी प्राप्ति हो स्वाहा' इस प्रकार उच्चारण करो तथा श्रीहरिका स्मरण करते हुए इसी मन्त्रसे पिताका दाह करो। हे भृगुनन्दन ! पहले तुम भाइयोंके साथ सिरमें आग लगाओ।" तब भृगुमुनिके आज्ञानुसार परशुरामने अपने गोत्रवालोंके साथ वह सारा कार्य सम्पन्न किया।
तदनन्तर रेणुकाने वहाँ अपने पुत्र परशुरामको छातीसे लगा लिया और परिणाममें सुखदायक कुछ वचन कहे- 'बेटा! इस भवसागरमें विरोध न करना सम्पूर्ण मङ्गलोंका मङ्गल है और विरोध नाशका कारण तथा समस्त उपद्रवोंका हेतु है। अतः भयंकर क्षत्रियोंके साथ विरोध न करना ही उचित है; किंतु मेरे सुनते-सुनते तुमने जो प्रतिज्ञा की है उसे पूर्ण करना चाहिये। इसके लिये तुम दिव्य मन्त्रोंके ज्ञाता भृगु और ब्रह्माके साथ विचार करके जैसा उचित हो वैसा करना। सज्जनोंद्वारा आलोचित कर्म शुभकारक होता है।' यों कहकर रेणुका परशुरामको छोड़कर अपने पतिका आलिङ्गन करके श्रीहरिका स्मरण करते हुए परशुरामकी ओर निहारती हुई चितामें सो गयी। तब भाइयों के साथ परशुरामने चितामें आग लगा दी। फिर भाइयों और पिताके शिष्योंके साथ वे विलाप करने लगे। इतनेमें ही सती रेणुका 'राम, राम, राम' यों उच्चारण करके परशुरामके देखते-देखते जलकर राख हो गयी। तब अपने स्वामीका नाम सुनकर वहाँ श्रीहरिके दूत आ पहुँचे। वे सभी रथपर सवार थे। उनके शरीरका रंग श्याम था । सुन्दर चार भुजाएँ थीं, जिनमें शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये हुए थे। उनके गलेमें वनमाला लटक रही थी और वे किरीट, कुण्डल तथा रेशमी पीताम्बरसे विभूषित थे। वे उस रेणुकाको रथमें बिठाकर ब्रह्मलोकमें गये और जमदग्निको लेकर श्रीहरिके संनिकट जा पहुँचे। वहाँ वैकुण्ठमें वे दोनों पति-पत्नी निरन्तर श्रीहरिकी परिचर्या, जो मङ्गलोंकी मङ्गल है, करते हुए श्रीहरिके संनिकट रहने लगे।
नारद! इधर परशुरामने ब्राह्मणों तथा भृगुजीके सहयोगसे माता-पिताकी शेष क्रिया समाप्त करके ब्राह्मणोंको बहुत-सा धन दान दिया। फिर गौ, भूमि, स्वर्ण, वस्त्र, सुवर्णनिर्मित पलंगसहित मनोरम दिव्य शय्या, जल, अन्न, चन्दन, रत्नदीप, चाँदीका पहाड़, सुवर्णके आधारसहित स्वर्णनिर्मित उत्तम आसन, सुवासित ताम्बूल, छत्र, पादुका, फल, मनोहर माला, फल-मूल-जल और मनोहर मिष्टान्न तथा धन ब्राह्मणोंको देकर वे ब्रह्मलोकको चल पड़े। ब्रह्मलोकमें पहुँचकर परशुरामने भक्तिभाव अव्ययात्मा ब्रह्माजीको नमस्कार करके रोते हुए सारी घटना कह सुनायी कृपामय ब्रह्माजीने सारी बातें सुनकर उन्हें शुभाशीर्वाद दिया और अपने हृदयसे लगा लिया। भृगुवंशी परशुरामकी बहुत-से जीवोंका विनाश करनेवाली, दुष्कर एवं भयंकर प्रतिज्ञाको सुनकर चतुर्मुख ब्रह्माको महान् विस्मय हुआ। वे 'प्रारब्धवश सब कुछ घटित हो सकता है। ऐसा मनमें विचारकर परशुरामसे परिणाममें सुखदायक वचन बोले ।
ब्रह्माने कहा –
वत्स ! बहुसंख्यक जीवोंका - विनाश करनेवाली तुम्हारी प्रतिज्ञा दुष्कर है; क्योंकि यह सृष्टि भगवान् श्रीहरिकी इच्छा से उत्पन्न होती है। बेटा! उन्हीं परमेश्वरकी आज्ञासे मैंने बड़े कष्टसे इस सृष्टिकी रचना की है; किंतु तुम्हारी निर्दयतापूर्ण घोर प्रतिज्ञा सृष्टिका लोप कर देनेवाली है। तुम एक क्षत्रियके अपराध से पृथ्वीको इक्कीस बार भूपरहित कर देना चाहते हो और क्षत्रिय जातिको समूल नष्ट करनेकी तुमने ठान ली है। किंतु ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र यह चार प्रकारकी सृष्टि नित्य है, जो श्रीहरिकी ही आज्ञासे पुनः पुनः आविर्भूत और तिरोहित होती रहती है। अन्यथा किसी प्राक्तन कर्मानुसार तुम्हारी प्रतिज्ञा पूर्ण होगी। तुम्हें अपनी कार्यसिद्धिके लिये बड़ा परिश्रम करना पड़ेगा अतः वत्स ! तुम शिवलोकमें जाओ और शंकरकी शरण ग्रहण करो; क्योंकि भूतलपर बहुत से नरेश शंकरके भक्त हैं। जब वे शक्तिस्वरूपा पार्वती और शंकरके दिव्य कवचको धारण करके खड़े होंगे, तब महेश्वरकी आज्ञाके बिना उन्हें मारनेमें कौन समर्थ हो सकता है? अतः जो विजयका कारण एवं शुभकारक है, उस उपायको तुम यत्नपूर्वक करो; क्योंकि उपायपूर्वक आरम्भ किये गये कार्य ही सिद्ध होते हैं। इसलिये तुम शंकरसे श्रीकृष्ण के मन्त्र और कवचको ग्रहण करो। वह वैष्णव तेज परम दुर्लभ है। उसके प्रभावसे तुम शैव और शाक्त दोनों तेजोंपर विजय पा सकोगे। जगदीश्वर शिव तुम्हारे जन्म-जन्मान्तरके गुरु हैं। अतः मुझसे मन्त्र ग्रहण करना तुम्हारे लिये युक्त नहीं है; क्योंकि जो उपयुक्त होता है, वही विधि है। कर्मभोगसे ही मन्त्र, स्वामी, स्त्री गुरु और देवता स्त्री, प्राप्त होते हैं। जो जिनके हैं, वे उनके पास स्वयं ही उपस्थित होते हैं, यह ध्रुव है। भृगुनन्दन ! तुम त्रैलोक्यविजय नामक श्रेष्ठ कवच ग्रहण करके इक्कीस बार पृथ्वीको भूपरहित कर डालोगे। दानी शंकर तुम्हें दिव्य पाशुपतास्त्र प्रदान करेंगे। उस दिये हुए मन्त्रके बलसे तुम क्षत्रियसमुदायको जीत लोगे। (अध्याय २८)
Summary of chapter 23 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Gaṇeśa Khaṇḍa is as follows:
The narrative introduces the formidable monarch Kārtavīryārjuna, the king of the Haihaya dynasty who ruled from his grand capital of Māhishmatī. Endowed with a thousand arms through the grace of his preceptor Maharshi Dattātreya, Kārtavīryārjuna was a ruler of matchless physical strength and martial accomplishment who had conquered the entire earth and even defeated the demon king Rāvaṇa. However, despite his noble qualities and initial adherence to justice, the king gradually became intoxicated with absolute power and martial pride, setting the stage for his downfall through an offense against a holy sage.