श्रीनारायण कहते हैं-
नारद ! युद्धमें मत्स्यराजके गिर जानेपर महाराज कार्तवीर्यके भेजे हुए बृहद्बल, सोमदत्त, विदर्भ, मिथिलेश्वर, निषधराज, मगधाधिपति एवं कान्यकुब्ज, सौराष्ट्र, राढीय, वारेन्द्र, सौम्य बंगीय, महाराष्ट्र, गुर्जरजातीय और कलिंग आदिके सैकड़ों सैकड़ों राजा बारह अक्षौहिणी सेनाके साथ आये; परंतु परशुरामजीने सबको रणभूमिमें सुला दिया। यह देखकर एक लाख नरपतियोंके साथ बारह अक्षौहिणी सेना लेकर राजा सुचन्द्र रणस्थलमें आये सुचन्द्रके साथ भयानक युद्ध हुआ, पर वे परास्त न हो सके। तब परशुरामने देखा कि मुण्डमाला धारण किये हुए विकटानना भयंकरी जगज्जननी भद्रकाली उनकी रक्षा कर रही हैं। यह देखकर परशुरामने शस्त्रास्त्रका त्याग करके महामायाकी स्तुति आरम्भ की।
परशुराम बोले -
आप शंकरजीकी प्रियतमा पत्नी हैं, आपको नमस्कार है। सारस्वरूपा आपको बारंबार प्रणाम है। दुर्गतिनाशिनीको मेरा अभिवादन है। मायारूपा आपको मैं बारंबार सिर झुकाता हूँ। जगद्धात्रीको नमस्कार-नमस्कार। जगत्कर्त्रीको पुनः पुनः प्रणाम जगज्जननीको मेरा नमस्कार प्राप्त हो। कारणरूपा आपको बारंबार अभिवादन है। सृष्टिका संहार करनेवाली जगन्माता! प्रसन्न होइये मैं आपके चरणोंकी शरण ग्रहण करता हूँ, मेरी प्रतिज्ञा सफल कीजिये। मेरे प्रति आपके विमुख हो जानेपर कौन मेरी रक्षा कर सकता है ? भक्तवत्सले ! शुभे! आप मुझ भक्तपर कृपा कीजिये। सुमुखि ! पहले शिवलोकमें आपलोगोंने मुझे जो वरदान दिया था, उस वरको आपको सफल करना चाहिये।
परशुरामद्वारा किये गये इस स्तवनको सुनकर अम्बिकाका मन प्रसन्न हो गया और 'भय मत करो' यों कहकर वे वहीं अन्तर्धान हो गयीं। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस परशुरामकृत स्तोत्रका पाठ करता है, वह अनायास ही महान् भयसे छूट जाता है। वह त्रिलोकीमें पूजित, त्रैलोक्यविजयी, ज्ञानियों में श्रेष्ठ और शत्रुपक्षका विमर्दन करनेवाला हो जाता है। इसी बीच ब्रह्माजी धर्मात्माओं में श्रेष्ठ भृगुवंशी परशुरामके पास आकर उनसे उस रहस्यका वर्णन करने लगे।
ब्रह्माजी बोले-
महाभाग राम! अपनी प्रतिज्ञा सफल करनेके लिये पहले तुम सुचन्द्रकी विजयके हेतुभूत रहस्यका मुझसे श्रवण करो। पूर्वकालमें दुर्वासाने सुचन्द्रको दशाक्षरी महाविद्या तथा भद्रकालीका परम दुर्लभ कवच प्रदान किया था। भद्रकालीका कवच देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ है। वह कवच सम्पूर्ण शत्रुओंका विनाश करनेवाला, अत्यन्त पूजनीय, प्रशंसनीय और त्रिलोकीपर विजय पानेका कारण है। वह कवच जिसके गलेमें वर्तमान है, उसे जीतने के लिये भूतलपर तुम कैसे समर्थ हो सकते हो ? अतः भार्गव ! तुम भिक्षाके लिये जाओ और राजासे प्रार्थना करो। सूर्यवंशमें उत्पन्न हुआ वह राजा परम धर्मात्मा एवं दानी है। माँगनेपर वह निश्चय ही प्राण, कवच, मन्त्र आदि सब कुछ दे डालेगा। मुने ! तब परशुराम संन्यासीका वेष धारण करके राजाके पास गये और उससे उन्होंने मन्त्र तथा परम अद्भुत कवचकी याचना की। तब राजाने अत्यन्त आदरपूर्वक उन्हें मन्त्र और कवच दे दिया। तदनन्तर परशुरामने शंकरजीके त्रिशूल से उस राजाका काम तमाम कर दिया (अध्याय ३६)
Summary of chapter 31 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Gaṇeśa Khaṇḍa is as follows:
Filled with profound devotion and a desire to seek the audience of his divine master, Parashurāma climbed the sacred heights of Mount Kailāsa. As he approached the inner gates of Lord Śiva's residence, he found the cosmic realm bathed in quiet serenity, with Lord Śiva and Goddess Pārvatī engaged in private conversation inside their inner chambers. Standing guard at the golden entrance was Lord Gaṇeśa, the elder son of Lord Śiva, who had been commanded by his mother to ensure that no visitor, regardless of status, entered the inner palace during their private repose.