[तदनन्तर महादेवजीके पूछनेपर] परशुरामने कहा –
'दयानिधान ! मैं भृगुवंशी जमदग्निका पुत्र परशुराम हूँ। आपका दास हूँ। आपके शरणागत हूँ। आप मेरी रक्षा करें। इसके बाद सारी
घटना विस्तारसे सुनाकर परशुरामने कहा कि मैंने पृथ्वीको इक्कीस बार क्षत्रियशून्य करने तथा मेरे पिताका वध करनेवाले कार्तवीर्यको मारनेकी प्रतिज्ञा की है। आप मेरी प्रतिज्ञाको पूर्ण करें।
इस बातको सुनकर भगवती पार्वती और भद्रकालीने क्रुद्ध होकर परशुरामकी भर्त्सना की। तब परशुराम भगवती गौरी और कालिकाके क्रोधभरे वचन सुनकर उच्चस्वरसे रोने लगे और प्राण-विसर्जनके लिये तैयार हो गये। तब दयासागर भक्तानुग्रहकारी प्रभु महादेवने ब्राह्मण बालकको रोते देखकर स्नेहार्द्रचित्तसे अत्यन्त विनयपूर्ण वचनोंके द्वारा गौरी और कालिकाका क्रोध शान्त किया और उन दोनोंकी तथा अन्यान्य सबकी अनुमति लेकर परशुरामसे कहना आरम्भ किया।
शंकरजीने कहा-
हे वत्स! आजसे तुम मेरे लिये एक श्रेष्ठ पुत्रके समान हुए; अतः मैं तुम्हें ऐसा गुह्य मन्त्र प्रदान करूँगा, जो त्रिलोकीमें दुर्लभ है। इसी प्रकार एक ऐसा परम अद्भुत कवच बतलाऊँगा, जिसे धारण करके तुम मेरी कृपासे अनायास ही कार्तवीर्यका वध कर डालोगे। विप्रवर! तुम इक्कीस बार पृथ्वीको भूपालोंसे शून्य भी कर दोगे और सारे जगत्में तुम्हारी कीर्ति व्याप्त हो जायगी- इसमें संशय नहीं है।
नारद! इतना कहकर शंकरजीने परशुरामको परम दुर्लभ मन्त्र और 'त्रैलोक्यविजय' नामक परम अद्भुत कवच प्रदान किया। फिर स्तोत्र, पूजाका विधान, पुरश्चरणपूर्वक मन्त्रसिद्धिका अनुष्ठान, नियमका ठीक-ठीक क्रम, सिद्धिस्थान और कालकी संख्या आदि बतलायी। उसी समय उन्हें सम्पूर्ण वेद वेदाङ्ग भी पढ़ा दिये। तत्पश्चात् शिवजीने परशुरामको नागपाश, पाशुपतास्त्र, अत्यन्त दुर्लभ ब्रह्मास्त्र, आग्नेयास्त्र, नारायणास्त्र, वायव्यास्त्र, वारुणास्त्र, गान्धर्वास्त्र, गारुडास्त्र, जृम्भणास्त्र, गदा, शक्ति, परशु, अमोघ उत्तम त्रिशूल, विधिपूर्वक नाना प्रकारके शस्त्रास्त्रों के मन्त्र शस्त्रास्त्रोंके संहार और संधान, अक्षय धनुष, आत्मरक्षाका उपाय, संग्राम में विजय पानेका क्रम, अनेक प्रकारके मायायुद्ध, मन्त्रपूर्वक हुंकार, अपनी सेनाकी रक्षा तथा शत्रुसेनाके विनाशका ढंग, युद्धसंकटके समय नाना प्रकार के अनुपम उपाय, संसारको मोहित करनेवाली तथा बुढ़ापा और मृत्युका हरण करनेवाली विद्या भी सिखायी। परशुरामने चिरकालतक गुरुकुलमें ठहरकर सम्पूर्ण विद्याओंको सीखा। फिर तीर्थमें जाकर मन्त्रसिद्धि प्राप्त की। इसके बाद शिव आदिको नमस्कार करके वे अपने आश्रमको लौट आये। (अध्याय ३०)
Summary of chapter 25 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Gaṇeśa Khaṇḍa is as follows:
Blinded by royal arrogance and greed, King Kārtavīryārjuna demanded that Sage Jamadagni surrender the divine cow Kāmadhenu to him, arguing that such a priceless treasure belonged in a king's palace rather than an ascetic's hut. Sage Jamadagni gently refused, explaining that the divine cow was essential for supplying milk and clarified butter for sacred Vedic sacrifices and could never be sold or gifted. Ignoring the sage's righteous words, the arrogant king ordered his royal guards to forcibly seize Kāmadhenu and her calf, dragging them away from the hermitage while the holy sage stood in helpless sorrow.