नारायण कहते हैं-
मुने ! मनोरमाने अपने स्वामीके मुखसे भविष्यकी जो-जो बातें सुनीं, उन्हें मनमें धारण कर लिया और यह समझ लिया कि ये बातें अवश्य सत्य होंगी; अतः उसने उसी क्षण अपने प्राणनाथको अपनी छातीसे लगा लिया और पुत्रों, बान्धवों तथा अपने भृत्योंको आगे करके वह भगवच्चरणोंका ध्यान करने लगी। फिर उसने योगद्वारा षट्चक्रका भेदन करके वायुको मूर्धामें स्थापित किया और चञ्चल मनको जलके बुलबुलेके सदृश क्षणभङ्गुर विषयोंसे खींचकर, ब्रह्मरन्ध्र में स्थित सहस्रदलसंयुक्त कमलपर स्थापित करके उसे ज्ञानद्वारा निष्कल ब्रह्ममें बाँध दिया। तत्पश्चात् निर्मूल एवं पुनर्जन्मरहित द्विविध कर्मका परित्याग करके उसने वहीं प्राण त्याग दिये; परंतु प्राणोंसे अधिक प्रिय राजाको नहीं छोड़ा।
तदनन्तर राजा विविध भाँतिसे करुण विलाप करके फूट-फूटकर रोने लगे। राजाके विलापको सुनकर इस प्रकार आकाशवाणी हुई–'महाराज ! शान्त हो जाओ, क्यों रो रहे हो? तुम तो दत्तात्रेयकी कृपासे बड़े-बड़े ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ हो; अतः सारे संसारको, जो रमणीय दीख रहा है, जलके बुलबुलेके सदृश क्षणभङ्गुर समझो। वह साध्वी मनोरमा तो लक्ष्मीके अंशसे उत्पन्न हुई थी, अतः वह लक्ष्मीके वासस्थानको चली गयी। अब तुम भी रणभूमिमें युद्ध करके वैकुण्ठमें जाओ।' आकाशवाणीके इस वचनको सुनकर नरेशने शोकका परित्याग कर दिया। तत्पश्चात् चन्दनकी लकड़ीसे दिव्य चिता तैयार की और पुत्रद्वारा अग्निसंस्कार कराकर उसका दा कराया। फिर मनोरमाके पुण्यके निमित्त हर्षपूर्वक ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके रत्न, भाँति-भाँति के वस्त्र और अनेक तरहके अन्यान्य दान दिये। मुने! उस अवसरपर कार्तवीर्यके आश्रममें सर्वत्र निरन्तर यही शब्द होता था कि 'दान दो, दान दो और खाओ, खाओ'। उस समय राजाद्वारा अधिकृत कोषोंमें जो-जो धन मौजूद था, उसे उसने मनोरमाके पुण्यके निमित्त हर्षपूर्वक ब्राह्मणोंको दान कर दिया। तदनन्तर असंख्य बाजों तथा सैन्यसमूहोंको साथ लेकर राजा दुःखी हृदय से समरभूमिके लिये प्रस्थित हुआ आगे बढ़नेपर यद्यपि राजाको प्रत्येक मार्गमें अमङ्गलके ही दर्शन हुए तथापि वह रणक्षेत्रकी ओर ही बढ़ता गया; पुनः राजधानीको नहीं लौटा। राजाको मार्गमें एक नग्न स्त्री मिली, जिसके बाल बिखरे थे, नाक कटी थी और वह रो रही थी। दूसरी विधवा भी मिली, जो काला वस्त्र पहने थी। आगे मुखदुष्टा, योनिदुष्टा, रोगिणी, कुट्टनी, पति पुत्रसे विहीन, डाकिनी, कुलटा, कुम्हार, तेली, व्याघ्र, सर्पद्वारा जीविका चलानेवाला (सँपेरा), कुत्सित वस्त्र, अत्यन्त रूखा शरीर, नंगा, काषाय वस्त्रधारी, चरबी बेचनेवाला, कन्या विक्रयी, चितामें जलता हुआ शव बुझे हुए अङ्गारोंवाली राख, सर्पसे डँसा हुआ मनुष्य, साँप, गोह, खरगोश, विष, श्राद्धके लिये पकाया हुआ पाक, पिण्ड, मोटक, तिल, देवमूर्तियोंपर चढ़े हुए धनसे जीवन निर्वाह करनेवाला ब्राह्मण, वृषवाह (बैलपर सवारी करनेवाला अथवा बैलको जोतनेवाला), शूद्रके श्राद्धान्नका भोजी, शूद्रका रसोइया, शूद्रका पुरोहित, गाँवका पुरोहित, कुशकी पुत्तलिका, मुर्दा जलानेवाला, खाली घड़ा, फूटा घड़ा, तेल, नमक, हड्डी, रुई, कछुआ, धूल, भूँकता हुआ कुत्ता, दाहिनी ओर भयंकर शब्द करता हुआ सियार, जटा, हजामत, कटा हुआ बाल, नख, मल, कलह, विलाप करता हुआ मनुष्य, अमङ्गलसूचक विलाप करनेवाला तथा शोककारक रुदन करनेवाला, झूठी गवाही देनेवाला, चोर मनुष्य, हत्यारा, कुलटाका पति और पुत्र, कुलटाका अन खानेवाला, देवता, गुरु और ब्राह्मणोंकी वस्तुओं तथा धनका अपहरण करनेवाला, दान देकर छीन लेनेवाला, डाकू, हिंसक, चुगलखोर, दुष्ट, पिता मातासे विरक्त, ब्राह्मण और पीपलका विघातक, सत्यका हनन करनेवाला, कृतघ्न, धरोहर हड़प लेनेवाला मनुष्य, विप्रद्रोही, मित्रद्रोही, घायल, विश्वासघातक, गुरु, देवता और ब्राह्मणकी निन्दा करनेवाला, अपने अङ्गोंको काटनेवाला, जीवहिंसक, अपने अङ्गसे हीन, निर्दयी, व्रत-उपवाससे रहित, दीक्षाहीन, नपुंसक, कुष्ठरोगी, काना, बहरा, पुक्कस (जातिविशेष), कटे हुए लिङ्गवाला (नागा), मदिरासे मतवाला, मदिरा, पागल, खून उगलनेवाला, भैंसा, गदहा, मूत्र, विष्ठा, कफ, मनुष्यकी सूखी खोपड़ी, प्रचण्ड आँधी, रक्तकी वृष्टि, बाजा, वृक्षका गिराया जाना, भेड़िया, सूअर, गीध, बाज, कङ्क (एक मांसाहारी पक्षी), भालू, पाश, सूखी लकड़ी, कौआ, गन्धक, पहले-पहल दान लेनेवाला ब्राह्मण (महापात्र), तन्त्र-मन्त्रसे जीविका चलानेवाला, वैद्य, रत्न पुष्प, औषध, भूसी, दूषित समाचार, मृतककी बातचीत, ब्राह्मणका दारुण शाप, दुर्गन्धयुक्त वायु और दुःशब्द आदि राजाके सामने आये। राजाका मन दूषित हो गया, प्राण निरन्तर क्षुब्ध रहने लगे, बायाँ अङ्ग फड़कने लगा और शरीर में जडता आ गयी तथापि राजाको युद्धमें ही अपना मङ्गल दीख रहा था; अतः वह निःशङ्क हो सारी सेनाओंको साथ लेकर युद्धक्षेत्र में प्रविष्ट हुआ। वहाँ भृगुवंशी परशुरामको सामने देखकर वह तुरंत रथसे उतर पड़ा और भक्तिपूर्वक बड़े-बड़े राजाओंके साथ दण्डकी भाँति भूमिपर लेटकर उन्हें प्रणाम किया। तब परशुरामने 'तुम स्वर्गमें जाओ' ऐसा राजाको उसका अभीष्ट आशीर्वाद दिया। वह उनके मनोऽनुकूल ही हुआ; क्योंकि ब्राह्मणके आशीर्वचन दुर्लङ्घ्य होते हैं। तदनन्तर राजराजेश्वर कार्तवीर्य उसी क्षण राजाओंसहित परशुरामको नमस्कार करके तुरंत ही रथपर, जो नाना प्रकारकी युद्ध सामग्रीसे सम्पन्न था, सवार हुआ। फिर उसने सहसा दुन्दुभि, मुरज आदि
तरह-तरहके बाजे बजवाये और ब्राह्मणोंको धन दान किया। तब वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ परशुराम राजाओंकी उस सभामें राजाधिराज कार्तवीर्यसे हितकारक, सत्य एवं नीतियुक्त वचन बोले।
परशुरामने कहा-
अये धर्मिष्ठ राजेन्द्र ! तुम तो चन्द्रवंशमें उत्पन्न हुए हो और विष्णुके अंशभूत बुद्धिमान् दत्तात्रेयके शिष्य हो। तुम स्वयं विद्वान् हो और वेदज्ञोंके मुखसे तुमने वेदोंका श्रवण भी किया है; फिर भी तुम्हें इस समय सज्जनोंको विडम्बित करनेवाली दुर्बुद्धि कैसे उत्पन्न हो गयी ? तुमने पहले लोभवश निरीह ब्राह्मणकी हत्या कैसे कर डाली ? जिसके कारण सती साध्वी ब्राह्मणी शोक संतप्त होकर पतिके साथ सती हो गयी। भूपाल! इन दोनोंके वध परलोकमें तुम्हारी क्या गति होगी? यह सारा संसार तो कमलके पत्तेपर पड़े हुए जलकी बूँदकी तरह मिथ्या ही है। सुयश हो अथव अपयश, इसकी तो कथामात्र अवशिष्ट रह जाती है। अहो ! सत्पुरुषों की दुष्कीर्ति हो, इससे बढ़कर और क्या विडम्बना होगी? कपिला कहाँ गयी, तुम कहाँ गये, विवाद कहाँ गया और मुनि कहाँ चले गये; परंतु एक विद्वान् राजाने जो कर्म कर डाला, वह हलवाहा भी नहीं कर सकता। मेरे धर्मात्मा पिताने तो तुम जैसे नरेशको उपवास करते देखकर भोजन कराया और तुमने उन्हें वैसा फल दिया! राजन् ? तुमने शास्त्रों का अध्ययन किया है, तुम प्रतिदिन ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक दान देते हो और तुम्हारे यशसे सारा जगत् व्याप्त है। फिर बुढ़ापेमें तुम्हारी अपकीर्ति कैसे हुई ? प्राचीन कालके वन्दीगण ऐसा कहते हैं कि भूतलपर कार्तवीर्यार्जुनके समान दाता, सर्वश्रेष्ठ, धर्मात्मा, यशस्वी, पुण्यशाली और उत्तम बुद्धिसम्पन्न न कोई हुआ है और न आगे होगा। जो पुराणोंमें विख्यात है, उसकी ऐसी अपकीर्ति ! आश्चर्य है। राजन् ! प्राणियोंके लिये दुर्वाक्य ती अस्त्रसे भी बढ़कर दुस्सह होता है; इसीलिये संकट-कालमें भी सत्पुरुषोंके मुखसे दुर्वचन नहीं निकलते । राजेन्द्र ! मैं तुमपर दोषारोपण नहीं कर रहा हूँ, बल्कि सच्ची बात कह रहा हूँ; अतः इस राजसभामें तुम मुझे उत्तर दो। इस सभामें सूर्य, चन्द्र और मनुके वंशज विद्यमान हैं; अतः सभामें तुम ठीक-ठीक बतलाओ, जिसे तुम्हारे पितर और देवगण भी सुनें। साथ ही सत्- असत्को कहनेमें समर्थ ये सारे नरेश भी श्रवण करें; क्योंकि समदृष्टि रखनेवाले सत्पुरुष लोग पक्षपातकी बात नहीं कहते। युद्धस्थलमें इतना कहकर परशुराम चुप हो गये। तब बृहस्पतिके समान बुद्धिमान् राजाने कहना आरम्भ किया।
कार्तवीर्यार्जुनने कहा-
हे राम! आप श्रीहरिके अंश, हरिके भक्त और जितेन्द्रिय हैं। मैंने जिनके मुखसे धर्म श्रवण किया है, आप उनके गुरुके भी गुरु हैं। जो कर्मवश ब्राह्मण कुलमें उत्पन्न हुआ है, ब्रह्म-चिन्तन करता है और अपने धर्ममें तत्पर एवं शुद्ध है, इसीलिये वह ब्राह्मण कहलाता है। जो मनन करने के कारण नित्य बाहर भीतर कर्म करता रहता है, सदा मौन धारण किये रहता है और समय आनेपर बोलता है, वह मुनि कहलाता है। जिसकी सुवर्ण और मिट्टीके ढेलेमें, घर और जंगलमें तथा कीचड़ और अत्यन्त चिकने चन्दनमें समताकी भावना है, वह योगी कहा जाता है। जो सम्पूर्ण जीवोंमें समत्व बुद्धिसे विष्णुकी भावना करता है और श्रीहरिकी भक्ति करता है, वह हरिभक्त कहा जाता है। ब्राह्मणोंका धन तप है। चूँकि तपस्या कल्पतरु और कामधेनुके समान है, इसीलिये उनकी निरन्तर तपमें इच्छा लगी रहती है। रजोगुणी पुरुष कर्मोंके रागवश राजसिक कार्य करता है और रागान्ध होकर रजोगुणी कार्यों में लगा रहता है; इसी कारण वह राजा कहा जाता है। मुने! रागवश मैंने कामधेनुकी याचना की थी; अतः मुझ अनुरागी क्षत्रियका इसमें कौन-सा अपराध हुआ? फिर भी, आपके पिताने महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न बहुत-से भूपालोंका वध कर डाला। इस समय यहाँ शिशु अवस्थावाले राजकुमार ही आये हैं। आपने सम्पूर्ण पृथ्वीको इक्कीस बार भूपालोंसे शून्य कर देनेके लिये जो प्रतिज्ञा की है, उसका पालन कीजिये युद्ध करना तो क्षत्रियोंका धर्म ही है। युद्धमें मृत्युको प्राप्त हो जाना उनके लिये निन्दित नहीं है; परंतु ब्राह्मणोंकी रण-स्पृहा लोक और वेद- दोनों में विडम्बनाकी पात्र है। वाणी ही जिनका बल और तप ही जिनका धन है, उन ब्राह्मणोंकी शान्ति ही प्रत्येक युगमें स्वस्तिकारक कर्म है। युद्ध करना ब्राह्मणका धर्म नहीं है। शान्तिपरायण ब्राह्मण युद्धके लिये उद्योगशील हो, ऐसा तो न देखने में ही आया है और न सुना ही गया है। भगवान् नारायणके विद्यमान रहते यह दूसरी तरहका उलट-फेर कैसे हो गया ?
रणाङ्गणमें यों कहकर राजेन्द्र कार्तवीर्य शान्त हो गया। उसके उस वचनको सुनकर सभी लोग मौन हो गये। तदनन्तर परशुरामके सभी भाई, जो बड़े शूरवीर तथा हाथोंमें अत्यन्त तीखे शस्त्र धारण किये हुए थे, उनकी आज्ञासे युद्ध करनेके लिये आगे बढ़े। तब जो स्वयं मङ्गलस्वरूप तथा मङ्गलोंका आश्रयस्थान था, उस महाबली मत्स्यराजने भी उन सबको युद्धोन्मुख देखकर युद्ध करना आरम्भ किया। उस राजेन्द्रने बाणोंका जाल बिछाकर उन सभीको रोक दिया। तब जमदग्रिके पुत्रोंने उस बाण समूहको छिन्न-भिन्न कर दिया। मुने! राजाने सैकड़ों सूर्योके समान प्रकाशमान दिव्यास्त्र चलाया; परंतु मुनियोंने माहेश्वरास्त्रके द्वारा खेल-ही-खेलमें उसे काट दिया। पुनः मुनियोंने दिव्यास्त्रद्वारा राजाके बाणसहित धनुष, रथ, सारथि और कवचकी धज्जियाँ उड़ा दीं। इस प्रकार राजाको शस्त्रहीन देखकर मुनियोंको महान् हर्ष हुआ। तब उन्होंने मत्स्यराजका वध करनेकी इच्छासे शिवजीका त्रिशूल हाथमें उठाया। त्रिशूल चलाते समय आकाशवाणी हुई - 'विप्रवरो! शिवजीका यह त्रिशूल अमोघ है, इसे मत चलाओ; क्योंकि मत्स्यराजके गलेमें सर्वाङ्गोंकी रक्षा करनेवाला शिवजीका दिव्य कवच बँधा है, जिसे पूर्वकालमें दुर्वासाने दिया था। अतः पहले राजासे उस प्राण-प्रदान करनेवाले कवचको माँग लो।' मुने! तदनन्तर परशुरामने त्रिशूल चलाकर राजापर चोट की, परंतु राजाके शरीरसे टकराकर उस त्रिशूलके सौ टुकड़े हो गये। तब आकाशवाणी सुनकर महान् पराक्रमी जमदग्निनन्दन परशुराम शृङ्गधारी संन्यासीका वेष धारण करके राजासे कवचकी याचना की। राजाने 'ब्रह्माण्ड विजय' । नामक वह उत्तम कवच उन्हें दे दिया। उस कवचको लेकर परशुरामने पुनः त्रिशूलसे ही प्रहार किया। उसके आघातसे मत्स्यराज, जो चन्द्रवंशमें उत्पन्न, गुणवान् और महाबली था, जिसके मुखकी कान्ति सैकड़ों चन्द्रमाओंके समान थी, भूतलपर गिर पड़ा।
नारदने कहा –
महाभाग नारायण ! मत्स्यराजने - शिवजीके जिस कवचको धारण किया था, उसका वर्णन कीजिये; क्योंकि उसे सुननेके लिये मुझे कौतूहल हो रहा है।
नारायण बोले -
विप्रवर! महात्मा शंकरके उस 'ब्रह्माण्डविजय' नामक कवचका, जो सर्वाङ्गकी रक्षा करनेवाला है, वर्णन करता हूँ; सुनो। पूर्वकालमें दुर्वासाने बुद्धिमान् मत्स्यराजको सम्पूर्ण पापोंका समूल नाश करनेवाला षडक्षर मन्त्र बतलाकर इसे प्रदान किया था। यदि सिद्धि प्राप्त हो जाय तो इस कवचके शरीरपर स्थित रहते अस्त्र-शस्त्र प्रहारके समय, जलमें तथा अग्निमें प्राणियोंकी मृत्यु नहीं होती- इसमें संशय नहीं है। जिसे पढ़कर एवं धारण करके दुर्वासा सिद्ध होकर लोकपूजित हो गये, जिसके पढ़ने और धारण करनेसे जैगीषव्य महायोगी कहलाने लगे। जिसे धारण करके वामदेव, देवल स्वयं च्यवन अगस्त्य और पुलस्त्य विश्ववन्द्य हो गये। ॐ नमः शिवाय' यह सदा मेरे मस्तककी रक्षा करे। ॐ नमः शिवाय स्वाहा' यह सदा ललाटकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं शिवाय स्वाहा' सदा नेत्रोंकी रक्षा करे । ॐ ह्रीं क्लीं हूं शिवाय नमः' मेरी नासिकाकी रक्षा करे। 'ॐ नमः शिवाय शान्ताय स्वाहा' सदा कण्ठकी रक्षा करे। ॐ ह्रीं श्रीं हूं संहारकर्त्रे स्वाहा' सदा कानोंकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं पञ्चवक्त्राय स्वाहा' सदा दाँतकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं महेशाय स्वाहा' सदा मेरे ओठकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं त्रिनेत्राय स्वाहा' सदा केशोंकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं ऐं महादेवाय स्वाहा' सदा छातीकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं रुद्राय स्वाहा' सदा नाभिकी रक्षा करे। ॐ ह्रीं ऐं श्री ईश्वराय स्वाहा' सदा पृष्ठभागकी रक्षा करे । ॐ ह्रीं क्लीं मृत्युञ्जयाय स्वाहा' सदा भौंहोंकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ईशानाय स्वाहा' सदा पार्श्वभागकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं ईश्वराय स्वाहा' सदा मेरे उदरकी रक्षा करे। 'ॐ श्रीं क्लीं मृत्युञ्जयाय स्वाहा' सदा भुजाओंकी रक्षा करे । 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ईश्वराय स्वाहा' मेरे हाथों की रक्षा करे। 'ॐ महेश्वराय रुद्राय नमः' सदा मेरे नितम्बकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं भूतनाथाय स्वाहा' सदा पैरोंकी रक्षा करे। 'ॐ सर्वेश्वराय सर्वाय स्वाहा' सदा सर्वाङ्गकी रक्षा करे। पूर्वमें 'भूतेश' मेरी रक्षा करें। अग्निकोणमें 'शंकर' रक्षा करें। दक्षिणमें 'रुद्र' तथा नैर्ऋत्यकोणमें स्थाणु मेरी रक्षा करें। पश्चिममें 'खण्डपरशु', वायव्यकोणमें 'चन्द्रशेखर', उत्तरमें 'गिरिश' और ईशानकोणमें स्वयं 'ईश्वर' रक्षा करें। ऊर्ध्वभागमें 'मृड' और अधोभागमें स्वयं 'मृत्युञ्जय' सदा रक्षा करें। जलमें, स्थलमें, आकाशमें सोते समय अथवा जागते रहनेपर भक्तवत्सल 'पिनाकी' सदा मुझ भक्तकी स्नेहपूर्वक रक्षा करें।
वत्स! इस प्रकार मैंने तुमसे इस परम अद्भुत कवचका वर्णन कर दिया। इसके दस लाख जपसे ही सिद्धि हो जाती है, यह निश्चित है। यदि यह कवच सिद्ध हो जाय तो वह निश्चय ही रुद्र तुल्य हो जाता है। वत्स! तुम्हारे स्नेहके कारण मैंने वर्णन कर दिया है, तुम्हें इसे किसीको नहीं बतलाना चाहिये; क्योंकि यह काण्वशाखोक्त कवच अत्यन्त गोपनीय तथा परम दुर्लभ है। सहस्रों अश्वमेध और सैकड़ों राजसूय ये सभी - इस कवचकी सोलहवीं कलाकी समानता नहीं कर सकते। इस कवचकी कृपासे मनुष्य निश्चय ही जीवन्मुक्त, सर्वज्ञ, सम्पूर्ण सिद्धियोंका स्वामी और मनके समान वेगशाली हो जाता है। इस कवचको बिना जाने जो भगवान् शंकरका भजन करता है, उसके लिये एक करोड़ जप करनेपर भी मन्त्र सिद्धिदायक नहीं होता। (अध्याय ३५)
Summary of chapter 30 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Gaṇeśa Khaṇḍa is as follows:
Fulfilling his solemn oath, Parashurāma marched across the five continents twenty-one times, engaging and destroying corrupt Kshatriya dynasties, tyrannical kings, and their massive armies wherever they existed. Earth-shaking battles raged across every kingdom, filling rivers with the blood of oppressors and purging the world of demonic elements that had burdened the earth for generations. After completing his twenty-one campaigns and restoring moral order, Parashurāma performed a grand sacrifice, donating the conquered land to holy Brāhmaṇas and retiring toward Mount Kailāsa to offer his victorious battle-axe to his spiritual preceptor Lord Śiva.