नारायण कहते हैं-
नारद ! तदनन्तर इन्द्र गुरु बृहस्पति तथा अन्यान्य देवोंको साथ लेकर लक्ष्मीकी प्राप्तिके लिये प्रसन्न-मनसे शीघ्र ही क्षीरसागरके तटपर गये। वहाँ उन्होंने अमूल्य रत्नकी गुटिकासे युक्त कवचको गलेमें बाँधकर पुनः पुनः उस दिव्य स्तोत्रका मन-ही-मन स्मरण किया। फिर सब लोगोंने भक्तिभावपूर्वक कमल वासिनी लक्ष्मीका स्तवन किया। उस समय उनके सिर भक्तिके कारण झुके हुए थे और अत्यन्त दीनतावश नेत्रों में आँसू छलक आये थे। उनके द्वारा की गयी स्तुतिको सुनकर सहस्रदल कमलपर वास करनेवाली तथा सैकड़ों चन्द्रमाओंके समान कान्तिमती महालक्ष्मी तुरंत ही वहाँ प्रकट हो गयीं। मुने! उन जगन्माताकी उत्तम प्रभा सारा जगत् व्याप्त हो गया। तदनन्तर जगत्का धारण-पोषण करनेवाली लक्ष्मीने देवताओंसे यथोचित हितकारक एवं साररूप वचन कहा।
श्रीमहालक्ष्मी बोलीं -
बच्चो ! तुमलोग ब्रह्मशापके कारण भ्रष्ट हो गये हो, अतः मेरा तुमलोगोंके घर जानेका विचार नहीं है। इस समय मैं ऐसा करनेमें समर्थ नहीं हूँ; क्योंकि मैं ब्रह्मशापसे डर रही हूँ। ब्राह्मण मेरे प्राण हैं । वे सभी सदा मुझे पुत्रसे भी बढ़कर प्रिय हैं। वे ब्राह्मण जो कुछ देते हैं, वही मेरी जीविकाका साधन होता है। यदि वे विप्र प्रसन्नतापूर्वक मुझसे कहें तो मैं उनकी आज्ञासे चल सकूँगी। वे तपस्वी मेरी पूजा करनेमें समर्थ नहीं हैं। जब अभाग्यका समय आ जाता है, तभी वे गुरु, ब्राह्मण, देव, संन्यासी तथा वैष्णवोंद्वारा शापित होते हैं। जो सबके कारण, ऐश्वर्यशाली, सर्वेश्वर और सनातन हैं, वे भगवान् नारायण भी ब्रह्मशापसे भय मानते हैं।
ब्रह्मन् ! इसी बीच अङ्गिरा, प्रचेता, क्रतु, भृगु, पुलह, पुलस्त्य, मरीचि, अत्रि, सनक, सनन्दन, तीसरे सनातन, साक्षात् नारायणस्वरूप भगवान् सनत्कुमार, कपिल, आसुरि, वोढु, पञ्चशिख, दुर्वासा, कश्यप, अगस्त्य, गौतम, कण्व, और्व, कात्यायन, कणाद, पाणिनि, मार्कण्डेय, लोमश और स्वयं भगवान् वसिष्ठ- ये सभी ब्राह्मण हर्षपूर्ण चित्तसे वहाँ आये। वे सभी ब्रह्मतेजसे प्रज्वलित हो रहे थे और उनके मुखोंपर मुस्कराहट थी। उन्होंने अनेक प्रकारकी पूजा सामग्रीसे भगवती लक्ष्मीका पूजन किया और देवताओंने उन्हें वन्य पदार्थोंका नैवेद्य समर्पित किया। फिर उन मुनीश्वरोंने हर्षके साथ उनकी स्तुति करके भक्तिपूर्वक उनका आराधन किया और कहा- 'जगदम्बिके! आप देवलोक तथा मर्त्यलोकमें पधारिये।' उनका वह वचन सुनकर जगज्जननी संतुष्ट हो गयीं और ब्राह्मणोंकी आज्ञासे निर्भय हो चलनेके लिये उद्यत होकर उनसे बोलीं।
श्रीमहालक्ष्मीने कहा-
विप्रवरो ! मैं आपलोगोंकी आज्ञासे देवताओंके घर जाऊँगी, किंतु भारतवर्षमें जिन-जिनके घर नहीं जाऊँगी, उनका विवरण सुनिये पुण्यात्मा गृहस्थों और उत्तम नीतिके जानकार नरेशोंके घरमें तो मैं स्थिररूपसे निवास करूँगी और पुत्रकी भाँति उनकी रक्षा करूँगी। जिस जिसके प्रति उसके गुरु, देवता, माता, पिता, भाई-बन्धु, अतिथि और पितर लोग रुष्ट हो जायँगे, उसके घर मैं नहीं जाऊँगी। जो मिथ्यावादी, पराक्रमहीन और दुष्ट स्वभाववाला है तथा 'मेरे पास कुछ नहीं है' यों सदा कहता रहता है, उसके घर मैं नहीं जाऊँगी। जो सत्यहीन, धरोहर हड़प लेनेवाला, झूठी गवाही देनेवाला, विश्वासघाती और कृतघ्न है, उसके गृह मैं नहीं जाऊँगी। जो चिन्ताग्रस्त, भयभीत, शत्रुके चंगुलमें फँसा हुआ, महान् पापी, कर्जदार और अत्यन्त कृपण है- ऐसे पापियोंके घर मैं नहीं जाऊँगी। जो दीक्षाहीन, शोकार्त, मन्दबुद्धि और सदा स्त्रीके वशमें रहनेवाला है। तथा जो कुलटा स्त्रीका पति अथवा पुत्र है, उसके घर मैं कभी नहीं जाऊँगी। जो दुष्ट वचन बोलनेवाला और झगड़ालू है, जिसके घरमें निरन्तर कलह होता रहता है तथा जिसके घरमें स्त्रीका स्वामित्व है- ऐसे लोगोंके घर मैं नहीं जाऊँगी। जहाँ श्रीहरिकी पूजा और उनके गुणोंका कीर्तन नहीं होता तथा उनकी प्रशंसामें उत्सुकता नहीं है, उसके घर मैं नहीं जाऊँगी। जो कन्या, अन्न और वेदको बेचनेवाला, मनुष्यघाती और हिंसक है, उसका घर नरककुण्डके समान है; अतः मैं उसके घर नहीं जाऊँगी। जो कृपणतावश माता, पिता, भार्या, गुरुपत्नी, गुरु, पुत्र, अनाथ बहिन और आश्रयहीन बान्धवोंका पालन-पोषण नहीं करता; सदा धन-संग्रहमें ही लगा रहता है; उसके नरक कुण्ड-सदृश घरमें मैं नहीं जाऊँगी। जिसके दाँत और वस्त्र मलिन, मस्तक रूखा और ग्रास तथा हास विकृत रहते हैं, उसके घर मैं नहीं जाऊँगी। जो मन्दबुद्धि मल-मूत्रका परित्याग करके उसपर दृष्टि डालता है और गीले पैरों सोता है, उसके घर मैं नहीं जाऊँगी। जो बिना पैर धोये सोता है; गाढ़ निद्राके वशीभूत होकर सोते समय नंगा हो जाता है तथा संध्याकाल और दिनमें शयन करनेवाला है; उसके घर मैं नहीं जाऊँगी। जो पहले मस्तकपर तेल लगाकर पीछे उस तेलसे अन्य अङ्गोंका स्पर्श करता है अथवा सारे शरीरमें लगाता है। उसके घर मैं नहीं जाऊँगी। जो मस्तक और शरीरमें तेल लगाकर मल-मूत्रका त्याग करता है, नमस्कार करता है और पुष्प तोड़कर ले आता है, उसके घर मैं नहीं जाऊँगी। जो नखोंसे तृण तोड़ता और नखोंसे भूमि कुरेदता है तथा जिसके शरीर और पैरमें मैल जमी रहती है, उसके घर
मैं नहीं जाऊँगी। जो अपने द्वारा अथवा पराये द्वारा दी हुई ब्राह्मणकी और देवताकी वृत्तिका अपहरण करता है, वह ज्ञानशील ही क्यों न हो, उसके घर मैं नहीं जाऊँगी। जो मूर्ख कर्म करके दक्षिणा नहीं देता, वह शठ पापी और पुण्यहीन है; उसके घर मैं नहीं जाऊँगी। जो मन्त्रविद्या (झाड़-फूँक) से जीविका चलानेवाला, ग्रामयाजी - (पुरोहित), वैद्य, रसोइया और देवल (वेतन) लेकर मूर्ति पूजा करनेवाला) है; उसके घर मैं नहीं जाऊँगी। जो क्रोधवश विवाह अथवा धर्मकार्यको काट देता है तथा जो दिनमें स्त्री प्रसङ्ग करता - है, उसके घर मैं नहीं जाऊँगी।
नारद! इतना कहकर महालक्ष्मी अन्तर्धान हो गयीं। फिर उन्होंने देवताओंके गृह तथा मृत्युलोककी ओर देखा। तब सभी देवता और मुनिगण आनन्दपूर्वक महालक्ष्मीको प्रणाम करके शीघ्र ही अपने-अपने वासस्थानको चले गये। उस समय उनके गृहोंको शत्रुओंने छोड़ दिया था और वे सुहृदोंसे परिपूर्ण थे। मुने! फिर तो स्वर्गमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं और फूलोंकी वर्षा होने लगी। इस प्रकार देवताओंने अपना राज्य और स्थिरा लक्ष्मीको प्राप्त किया। वत्स! इस प्रकार मैंने लक्ष्मीके उत्तम चरितका, जो सुखदायक, मोक्षप्रद और साररूप है, वर्णन कर दिया। अब | और क्या सुनना चाहते हो ? (अध्याय २३)
Summary of chapter 19 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Gaṇeśa Khaṇḍa is as follows:
To relieve the earth of the unbearable burden caused by tyrannical Kshatriya kings who had strayed from the path of Dharma, the Supreme Lord Śrī Vishṇu descended into the house of Sage Jamadagni and Reṇukā as their fifth son, named Parashurāma. From his very infancy, the child displayed extraordinary divine effulgence, martial inclinations, and unyielding devotion to Lord Śiva. Recognizing the transcendent nature of his youngest son, Sage Jamadagni initiated him into the sacred Vedic scriptures, while Parashurāma felt an irresistible inner calling to undertake severe penance to acquire the divine strength necessary to fulfill his cosmic mission.