श्रीनारायण कहते हैं-
नारद! तदनन्तर भृगुवंशी परशुराम हर्षपूर्वक शिव, दुर्गा तथा भद्रकालीको प्रणाम करके पुष्करतीर्थमें गये और वहाँ मन्त्र सिद्ध करने लगे। उन्होंने एक महीनेतक अन्न-जलका परित्याग कर दिया और भक्तिपूर्वक श्रीकृष्णके चरणकमलका ध्यान करते हुए वायुको अवरुद्ध कर दिया। फिर आँखें खोलकर देखा तो उनको आकाश एक अद्भुत तेजसे व्याप्त दिखायी पड़ा। उस तेजसे दसों दिशाएँ उद्दीस हो रही थीं और सूर्यका तेज प्रतिहत हो गया था। उस तेजोमण्डलके मध्य उन्हें एक रत्ननिर्मित विमान दीख पड़ा, जिसपर एक अत्यन्त सुन्दर श्रेष्ठ पुरुष दृष्टिगोचर हो रहे थे। वे भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले थे तथा उनका मुख मन्द मुस्कानसे खिल रहा था। परशुरामने उन ईश्वरको दण्डकी भाँति लेटकर सिरसे प्रणाम किया और वर माँगा– 'भगवन्! मैं इक्कीस बार पृथ्वीको भूपालोंसे रहित कर दूँ, आपके चरणकमलोंमें मेरी अनपायिनी सुदृढ़ भक्ति हो और मैं निरन्तर आपके पादारविन्दका दास बना रहूँ- यह वर मुझे प्रदान कीजिये। तब श्रीकृष्ण उन्हें वह वर देकर वहीं अन्तर्धान हो गये और परशुराम उन
परात्परको नमस्कार करके अपने आश्रमको लौट आये। उस समय उनका दाहिना अङ्ग फड़कने लगा, जो शुभ मङ्गलोंका सूचक था। रातमें उन्हें वाञ्छासिद्धिको प्रकट करनेवाला उत्तम स्वप्न भी दीख पड़ा। इससे उनका मन रात दिन प्रसन्न और संतुष्ट रहने लगा। वे - स्वजनोंसे सारा वृत्तान्त पूर्णतया बतलाकर आनन्दपूर्वक आश्रममें निवास करने लगे। तदनन्तर महाबली परशुरामने अपने शिष्योंको, पिताके शिष्योंको, भाइयोंको तथा बन्धुबान्धवों को बुला- बुलाकर उनके साथ तरह-तरह की सलाह की और उनसे अपना पूर्वापरका वृत्तान्त कहकर शुभ मुहूर्तमें वे उन्हींके साथ विजययात्रा के लिये उद्यत हुए। उस समय परशुरामको मङ्गल शकुन दिखायी पड़ने लगे और जयकी सूचना देनेवाले शब्द सुनायी दिये। तब उन्होंने मन-ही-मन सबका विचार करके निश्चय कर लिया कि मेरी विजय होगी और शत्रुओं का संहार होगा। यात्रा के अवसरपर सहसा मुनिको अपने सामने मयूरकी बोली, सिंहकी गर्जना, घण्टा और दुन्दुभिकी ध्वनि, संगीत, कल्याणकारी नवीन सांकेतिक शब्द और विजयसूचक बादलोंकी गड़गड़ाहट सुनायी पड़ी। उसी समय आकाशवाणी भी हुई कि 'तुम्हारी विजय होगी। इस तरह अनेक प्रकारके शुभ शब्दोंको सुनते हुए भगवान् परशुराम यात्रा आरम्भ की चलते ही उन्होंने अपने आगे ब्राह्मण, वन्दी, ज्योतिषी और भिक्षुकको देखा। फिर नाना प्रकारके आभूषणोंसे सजी हुई एक पति पुत्रसम्पन्ना सती नारी हाथमें प्रज्वलित दीपक लिये हुए मुस्कराती हुई सामने आयी। चलते चलते परशुरामने अपने दाहिनी ओर यात्रा के समय मङ्गलकी सूचना देनेवाले शव, शृगाली, जलसे पूर्ण घट, नीलकण्ठ, नेवला, कृष्णसार मृग, हाथी, सिंह, घोड़ा, गैंडा, द्विप, चमरी गाय, राजहंस, चक्रवाक, शुक, कोयल, मोर, खंजन, सफेद चील, चकोर, कबूतर, बगुलोंकी पंक्ति, बत्तख, चातक, गौरैया, बिजली, इन्द्रधनुष, सूर्य, सूर्यकी प्रभा, तुरंतका काटा हुआ मांस, जीवित मछली, शङ्ख, सुवर्ण, माणिक्य, चाँदी, मोती, हीरा, मूँगा, दही, लावा, सफेद धान, सफेद फूल, कुंकुम, पानका पत्ता, पताका, छत्र, दर्पण, श्वेत चँवर, सवत्सा गौ, रथारूढ़ भूपाल, दूध, घी, राशि राशि अमृत, खीर, शालग्राम, पका हुआ फल, स्वस्तिक, शक्कर, मधु, बिलाव, साँड़, भेड़ा, पर्वतीय चूहा, मेघाच्छन्न सूर्यका उदय, चन्द्रमण्डल, कस्तूरी, पंखा, जल, हल्दी, तीर्थकी मिट्टी, पीली या सफेद सरसों, दूब, ब्राह्मणका बालक और कन्या, मृग, वेश्या, भौंरा, कपूर, पीला वस्त्र, गोमूत्र, गोबर, गौके खुरकी धूलि, गोपदसे चिह्नित गोष्ठ, गौओंका मार्ग (डहर), रमणीय गोशाला, सुन्दर गोगति, भूषण, देवप्रतिमा, प्रज्वलित अग्नि महोत्सव, ताँबा, स्फटिक, वैद्य, सिंदूर, माला, चन्दन, सुगन्ध, हीरा और रत्न देखा। उन्हें सुगन्धित वायुका आघ्राण और ब्राह्मणोंका शुभाशीर्वाद प्राप्त हुआ। इस प्रकार माङ्गलिक अवसर जानकर वे हर्षपूर्वक आगे बढ़े और सूर्यास्त होते-होते नर्मदाके तटपर पहुँच गये।
वहाँ उन्हें एक अत्यन्त मनोहर दिव्य अक्षयवट दिखायी दिया। वह अत्यन्त ऊँचा, विस्तारवाला और उत्तम एवं पावन आश्रम स्थान था। वहाँ सुगन्धित वायु बह रही थी। वहीं पुलस्त्य नन्दनने तपस्या की थी। वहीं कार्तवीर्यार्जुनके आश्रमके निकट परशुराम अपने गणोंके साथ ठहर गये। वहाँ उन्होंने रातमें पुष्प शय्यापर शयन किया। थके तो वे थे ही, अतः किंकरों द्वारा भलीभाँति सेवा किये जानेपर परमानन्दमें निमग्न हो निद्राके वशीभूत हो गये। रात व्यतीत होते होते भार्गव परशुरामको एक सुन्दर स्वप्न दिखायी दिया, जो वायु, पित्त और कफके प्रकोपसे रहित था और जिसका पहले मनमें विचार भी नहीं किया गया था। उन्होंने देखा कि मैं हाथी, घोड़ा, पर्वत, अट्टालिका, गौ और फलयुक्त वृक्षपर चढ़ा हुआ हूँ। मुझे कीड़े काट रहे हैं जिससे मैं रो रहा हूँ। मेरे शरीरमें चन्दन लगा है। मैं पीले वस्त्रसे शोभित तथा पुष्पमाला धारण किये हुए हूँ। मेरा सारा शरीर मल मूत्रसे सराबोर है और उसमें मज्जा और पीब चुपड़ा हुआ है, ऐसी दशामें मैं नौकापर सवार हूँ और उत्तम वीणा बजा रहा हूँ। फिर देखा कि मैं नदीतटपर बड़े-बड़े कमल पत्रोंपर रखकर दही, घी और मधु मिश्रित खीर खा रहा हूँ । पुनः देखा कि मैं पान चबा रहा हूँ। मेरे सामने फल, पुष्प और दीपक रखे हुए हैं तथा ब्राह्मण मुझे आशीर्वाद दे रहे हैं। फिर अपनेको बारंबार पके हुए फल, दूध, शक्करमिश्रित गरमा गरम अन्न, स्वस्तिकके आकारकी बनी हुई मिठाई खाते देखा। पुनः उन्होंने देखा कि मुझे जल-जन्तु, बिच्छू, मछली तथा सर्प काट रहे हैं और मैं भयभीत होकर भाग रहा हूँ। फिर देखा कि मैं चन्द्रमा और सूर्यका मण्डल, पति और पुत्रसे सम्पन्न नारी और मुस्कराते हुए ब्राह्मणको देख रहा हूँ। पुनः अपनेको सुन्दर वेषवाली परम संतुष्ट कन्या तथा संतुष्ट एवं मुस्कानयुक्त ब्राह्मणद्वारा आलिङ्गित होते हुए देखा। फिर देखा कि मैं फल-पुष्पसमन्वित वृक्ष, देवताकी मूर्ति तथा हाथीपर एवं रथपर सवार हुए राजाको देख रहा हूँ। पुनः उन्होंने देखा कि मैं एक ऐसी ब्राह्मणीको देख रहा हूँ, जो पीला वस्त्र धारण किये हुए है, रत्नोंके आभूषणोंसे विभूषित है और घरमें प्रवेश कर रही है। फिर अपनेको शङ्ख, स्फटिक, श्वेत माला, मोती, चन्दन, सोना, चाँदी और रत्न देखते हुए पाया। | पुनः भार्गवको हाथी, बैल, श्वेत सर्प, श्वेत चँवर, नीला कमल और दर्पण दिखायी पड़ा। परशुरामने स्वप्नमें अपनेको रथारूढ़, नये रत्नोंसे संयुक्त, मालतीकी मालाओंसे शोभित और रत्नसिंहासनपर स्थित देखा परशुरामने स्वप्नमें कमलोंकी पंक्ति, भरा हुआ घट, दही, लावा, घी, मधु, पत्तेका छत्र और नाई देखा। भृगुनन्दनने स्वप्नमें बगुलोंकी कतार, हंसोंकी पाँति और मङ्गल कलशकी पूजा करती हुई व्रती कन्याओंकी पंक्ति देखी। परशुरामने स्वप्नमें उन ब्राह्मणोंको देखा, जो मण्डपमें स्थित होकर शिव और विष्णुकी पूजा कर रहे थे तथा 'जय हो' ऐसा उच्चारण कर रहे थे। फिर परशुरामने स्वप्नमें सुधावृष्टि, पत्तोंकी वर्षा, फलोंकी वृष्टि, लगातार होती हुई पुष्प और चन्दनकी वर्षा, तुरंतका काटा हुआ मांस, जीवित मछली, मोर, श्वेत खंजन, सरोवर, तीर्थ, कबूतर, शुक, नीलकण्ठ, सफेद चील, चातक, बाघ, सिंह, सुरभी, गोरोचन, हल्दी, सफेद धानका विशाल पर्वत, प्रज्वलित अग्नि, दूब, समूह-के समूह देव मन्दिर, पूजित शिवलिङ्ग और पूजा की हुई शिवकी मृण्मयी मूर्तिको देखा। परशुरामने स्वप्रमें जौ और गेहूँके आटेकी पूड़ी और लड्डू देखा और उन्हें बारंबार खाया फिर अकस्मात् अपनेको शस्त्रसे घायल और जंजीरसे बँधा हुआ देखकर उनकी नींद टूट गयी और वे प्रातःकाल श्रीहरिका स्मरण करते हुए उठ बैठे। इस स्वप्न उन्हें अत्यन्त हर्ष हुआ। तत्पश्चात् उन्होंने अपना
प्रातःकालिक नित्य कर्म सम्पन्न किया और मनमें ऐसा समझ लिया कि निश्चय ही सारे शत्रुओंको जीत लूँगा।
(अध्याय ३३)
Summary of chapter 28 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Gaṇeśa Khaṇḍa is as follows:
While Parashurāma was away from the hermitage, the revengeful sons of King Kārtavīryārjuna seized the opportunity to attack the defenseless forest ashram. Finding Sage Jamadagni deep in silent meditation, the cowards brutally murdered the peaceful sage, striking him twenty-one times with their swords before fleeing into the forest. Returning to find her husband dead in a pool of blood, Mother Reṇukā fell into agonizing grief, beating her chest twenty-one times and weeping bitterly. When Parashurāma returned and beheld his father's martyred body and his mother's agony, his heart burned with terrifying spiritual anger.