पार्वतीने कहा-
प्रभो! जगत्में सभी लोग शंकरकी किंकरी मुझ दुर्गाको जानते हैं कि यह अपेक्षारहित दासी है, उसका जीवन व्यर्थ है। परंतु ईश्वरके लिये तृणसे लेकर पर्वतपर्यन्त सभी जातियाँ समान हैं; अतः दासीपुत्र गणेश और आपके शिष्य परशुराम- इन दोनों में किसका दोष है, इसपर विचार करना उचित है; क्योंकि आप धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ हैं। वीरभद्र, कार्तिकेय और पार्षदगण इसके साक्षी हैं। भला, गवाहीके काममें झूठ कौन कहेगा। साथ ही ये दोनों भाई इन लोगोंके लिये समान हैं। यों तो धर्म निर्णयके अवसरपर गवाही देते समय सत्पुरुषोंके लिये शत्रु और मित्र समान हो जाते हैं (अर्थात् उनकी पक्षपातकी भावना नहीं रहती); क्योंकि जो गवाह गवाही के विषयको ठीक-ठीक जानते हुए भी सभामें काम, क्रोध, लोभ अथवा भयके कारण झूठी गवाही देता है, वह अपनी सौ पीढ़ियोंको नरकमें गिराकर स्वयं भी कुम्भीपाक नरकमें जाता है। यद्यपि मैं इन दोनों को समझाने तथा इसका निर्णय करनेमें समर्थ हूँ, तथापि आपके समक्ष मेरा आज्ञा देना श्रुतिमें निन्दित कहा गया है। प्रभो ! सभामें राजाके वर्तमान रहते भृत्योंकी प्रभाका उसी प्रकार मूल्य नहीं होता, जैसे सूर्यके उदय होनेपर पृथ्वीपर जुगनूकी कोई गणना नहीं होती। सदा परित्यागके भयसे डरी हुई मैंने चिरकालतक तपस्या करके आपके चरणकमलोंको -स्नेहके कारण पाया है; अतः जगन्नाथ ! दारुण पुत्र र क्रोध, शोक और मोहके वशीभूत होकर मैंने जो कुछ कहा है, उसे क्षमा कीजिये। यदि आपने मेरा परित्याग कर दिया तो उस पुत्रसे क्या लाभ? क्योंकि उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई पतिव्रता नारीके लिये पति सौ पुत्रोंसे बढ़कर है। जो नारी नीच कुलमें उत्पन्न, दुष्टस्वभाववाली, ज्ञानहीन और माता-पिताके दोषसे निन्दित होती है, वह अपने पतिको नहीं मानती उत्तम कुलमें पैदा हुई स्त्री अपने निन्दित, पतित, मूर्ख, दरिद्र, रोगी और जड पतिको भी सदा विष्णुके समान समझती है। समस्त तेजस्वियोंमें श्रेष्ठ अग्नि अथवा सूर्य पतिव्रताके तेजकी सोलहवीं कलाकी समानता नहीं कर सकते। महादान, पुण्यप्रद व्रतोपवास और तप - ये सभी पति-सेवाके सोलहवें अंशकी समता करनेके योग्य नहीं हैं। उत्तम कुलमें जन्म लेनेवाली स्त्रियोंके लिये चाहे पुत्र हो, पिता हो अथवा सहोदर भाई हो, कोई भी पतिके समान नहीं होता। स्वामीसे इतना कहकर दुर्गाने अपने सामने परशुरामको देखा, जो निर्भय होकर शम्भुके चरणकमलोंकी सेवा कर रहे थे। तब पार्वती उनसे बोलीं।
पार्वतीने कहा-
हे महाभाग राम! तुम ब्रह्मवंशमें उत्पन्न हुए हो। तुम्हारी बुद्धि सदसत्का विवेचन करनेवाली है। तुम जमदग्निके पुत्र और योगियोंके गुरु इन महादेवके शिष्य हो। सती साध्वी रेणुका, जो लक्ष्मीके अंशसे उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई हैं, तुम्हारी माता हैं। तुम्हारे नाना विष्णुभक्त और मामा उनसे भी बढ़कर वैष्णव हैं। तुम मनुके वंशमें उत्पन्न हुए राजा रेणूक के दौहित्र हो । साधुस्वभाववाले शूरवीर राजा विष्णुयशा तुम्हारे मामा हैं। तुम किसके दोषसे ऐसे दुर्धर्ष हो गये हो ? इस अशुद्धिका कारण मुझे ज्ञात नहीं हो रहा है; क्योंकि जिनके दोषसे मनुष्य दूषित हो जाता है, तुम्हारे वे सभी सम्बन्धी शुद्ध मनवाले हैं। तुमने करुणासागर गुरु और अमोघ फरसा पाकर पहले क्षत्रिय जातिपर परीक्षा करके पुनः गुरु-पुत्रपर परीक्षा की है। कहाँ तो श्रुतिमें 'गुरुको दक्षिणा देना उचित है'- यों सुना जाता है और कहाँ तुमने गुरुपुत्रके दाँतको ही तोड़ दिया, अब उसका मस्तक भी काट डालो। शंकरके वरदान तथा अमोघवीर्य फरसेसे तो चूहोंको खानेवाला सियार सिंह और शार्दूलको भी मार सकता है। जितेन्द्रिय पुरुषों में श्रेष्ठ गणेश तुम्हारे जैसे लाखों - करोड़ों जन्तुओंको मार डालनेकी शक्ति रखता है, परंतु वह मक्खीपर हाथ नहीं उठाता। श्रीकृष्णके अंशसे उत्पन्न हुआ यह गणेश तेजमें श्रीकृष्ण के ही समान है। अन्य देवता श्रीकृष्णकी कलाएँ हैं। इसीसे इसकी अग्रपूजा होती है।
यों कहकर पार्वती क्रोधवश उन परशुरामको मारनेके लिये उद्यत हो गयीं। तब परशुरामने मन-ही-मन गुरुको प्रणाम करके अपने इष्टदेव श्रीकृष्णका स्मरण किया। इतनेमें ही दुर्गाने अपने सामने एक अत्यन्त बौने ब्राह्मण-बालकको उपस्थित देखा। उसकी कान्ति करोड़ों सूर्योके समान थी। उसके दाँत स्वच्छ थे। वह शुक्ल वस्त्र, शुक्ल यज्ञोपवीत, दण्ड, छत्र और ललाटपर उज्ज्वल तिलक धारण किये हुए था। उसके गले में तुलसीकी माला पड़ी थी। उसका रूप परम मनोहर था, मुखपर मन्द मुसकान थी और वह रत्नोंके बाजूबंद, कङ्कण और रत्नमालासे विभूषित था। पैरों में रत्नोंके नूपुर थे। मस्तकपर बहुमूल्य रत्नोंके मुकुटकी उज्ज्वल छटा थी और कपोलोंपर रत्ननिर्मित दो कुण्डल झलमला रहे थे, जिससे उसकी विशेष शोभा हो रही थी।
वह भक्तोंका ईश और भक्तवत्सल था तथा भक्तोंको बायें हाथसे स्थिरमुद्रा और दाहिने हाथ से अभयमुद्रा दिखा रहा था। उसके साथ नगरके हँसते हुए बालक और बालिकाओंका समूह था और कैलासवासी आबालवृद्ध सभी उसकी ओर हर्षपूर्वक देख रहे थे। उस बालकको देखकर पुत्रों तथा भृत्योंसहित शम्भुने घबराकर भक्तिपूर्वक सिर झुकाकर प्रणाम किया। तत्पश्चात् दुर्गाने भी दण्डकी भाँति भूमिपर लेटकर नमस्कार किया। तब बालकने सबको अभीष्टप्रद आशीर्वाद दिया। उसे देखकर सभी बालक भयके कारण महान् आश्चर्यमें पड़ गये। तदनन्तर शिवजीने भक्तिपूर्वक उसे षोडशोपचार समर्पित करके उस परिपूर्णतमकी वेदोक्त विधिसे पूजा की और फिर सिर झुकाकर काण्वशाखामें कहे हुए स्तोत्रद्वारा उन सनातन भगवान्की स्तुति की। उस समय उनके सर्वाङ्गमें रोमाञ्च हो आया था। पुनः जो रत्नसिंहासनपर आसीन थे और अपने उत्कृष्ट तेजसे जिन्होंने सबको आच्छादित कर रखा था, उन वामन भगवान्से स्वयं शंकरजी कहने लगे।
शंकरजीने कहा-
ब्रह्मन् ! जो आत्माराम हैं, उनके विषयमें कुशलप्रश्न करना अत्यन्त विडम्बनाकी बात है; क्योंकि वे स्वयं कुशलके आधार और कुशल-अकुशलके प्रदाता हैं। श्रीकृष्णकी सेवाके फलोदयसे आज आप जो मुझे अतिथिरूपसे प्राप्त हुए हैं, इससे मेरा जन्म सफल और जीवन धन्य हो गया कृपासागर परिपूर्णतम श्रीकृष्ण लोगोंके उद्धारके लिये पुण्यक्षेत्र भारतमें अपनी कलासे अवतीर्ण हुए हैं। जिसने अतिथिका आदर-सत्कार किया है, उसने मानो सम्पूर्ण देवताओंकी पूजा कर ली; क्योंकि जिसपर अतिथि प्रसन्न हो जाता है, उसपर स्वयं श्रीहरि प्रसन्न हो जाते हैं। समस्त तीर्थोंमें स्नान करनेसे, सर्वस्व दान करनेसे, सभी प्रकारके व्रतोपवाससे, सम्पूर्ण यज्ञोंमें दीक्षा ग्रहण करनेसे, सभी प्रकारकी तपस्याओंसे और नित्य नैमित्तिकादि विविध - कर्मानुष्ठानोंसे जो फल प्राप्त होता है - वह अतिथिसेवाकी सोलहवीं कलाकी समानता नहीं कर सकता। अतिथि जिसके गृहसे निराश एवं रुष्ट होकर चला जाता है, उसका पुण्य निश्चय ही नष्ट हो जाता है।
श्रीनारायण कहते हैं-
नारद! शंकरके वचन सुनकर जगत्पति स्वयं श्रीहरि संतुष्ट हो गये और मेघके समान गम्भीर वाणीद्वारा उनसे बोले ।
विष्णुने कहा –
शिवजी! आपलोगोंके कोलाहलको जानकर कृष्णभक्त परशुरामकी रक्षा करनेके लिये इस समय मैं श्वेतद्वीपसे आ रहा हूँ; क्योंकि इन कृष्णभक्तोंका कहीं अमङ्गल नहीं होता। गुरुके कोपके अतिरिक्त अन्य अवस्थाओं में मैं हाथमें चक्र लेकर उनकी रक्षा करता रहता हूँ। गुरुके रुष्ट होनेपर मैं रक्षा नहीं करता; क्योंकि गुरुकी अवहेलना बलवती होती है। जो गुरुकी सेवासे हीन है, उससे बढ़कर पापी दूसरा नहीं है। अहो! जिसकी कृपासे मानव सब कुछ देखता है, वह पिता सबके लिये सबसे बढ़कर माननीय और पूजनीय होता है। वह मनुष्योंके जन्म देनेके कारण जनक, रक्षा करनेके कारण पिता और विस्तीर्ण करनेके कारण कलारूपसे प्रजापति है। उस पितासे माता गर्भमें धारण करने एवं पालन पोषण करनेसे सौगुनी बढ़कर वन्दनीया, पूज्या और मान्या है। वह प्रसव करनेवाली वसुन्धराके समान है। अन्नदाता मातासे भी सौगुना वन्दनीय, पूज्य और मान्य है; क्योंकि अन्नके बिना शरीर नष्ट हो जाता है और विष्णु ही कलारूपसे अन्नदाता होते हैं। अभीष्टदेव अन्नदातासे भी सौगुना श्रेष्ठ कहा जाता है। किंतु विद्या और मन्त्र प्रदान करनेवाला गुरु अभीष्टदेवसे भी सौगुना बढकर है। जो अज्ञानरूपी अन्धकारसे आच्छादित हुए समस्त पदार्थोंको ज्ञानदीपकरूपी नेत्रसे दिखलाता है, उससे बढ़कर बान्धव कौन है ? गुरुद्वारा दिये गये मन्त्र और तपसे अभीष्ट सुख, सर्वज्ञता और समस्त सिद्धियोंकी प्राप्ति होती है; अतः गुरुसे बढ़कर बान्धव दूसरा कौन है ? गुरुद्वारा दी गयी विद्याके बलसे मनुष्य सर्वत्र समयपर विजयी होता है, इसलिये जगत्में गुरुसे बढ़कर पूज्य और उनसे अधिक प्रिय बन्धु कौन हो सकता है? जो मूर्ख विद्यामद अथवा धनमदसे अंधा होकर गुरुकी सेवा नहीं करता, वह ब्रह्महत्या आदि पापोंसे लिपायमान होता है; इसमें संशय नहीं है। जो दरिद्र, पतित एवं क्षुद्र गुरुके साथ साधारण मानवकी भाँति आचरण करता है, वह तीर्थस्नायी होनेपर भी अपवित्र है और उसका कर्मोंके करनेमें अधिकार नहीं है। शिव! जो छल-कपट करके माता, पिता, भार्या, गुरुपत्नी और गुरुका पालन-पोषण नहीं करता, वह महान् पापी है। गुरु ही ब्रह्मा, गुरु ही विष्णु, गुरु ही महेश्वरदेव, गुरु ही परब्रह्म, गुरु ही सूर्यरूप, गुरु ही चन्द्र, इन्द्र, वायु, वरुण और अग्रिरूप हैं। यहाँतक कि गुरु स्वयं सर्वरूपी ऐश्वर्यशाली परमात्मा हैं। वेदसे उत्तम दूसरा शास्त्र नहीं है, श्रीकृष्णसे बढ़कर दूसरा देवता नहीं है, गङ्गाके समान दूसरा तीर्थ नहीं है और तुलसीसे उत्तम दूसरा पुष्प नहीं है। पृथ्वी से बढ़कर दूसरा क्षमावान् नहीं है, पुत्रसे अधिक दूसरा कोई प्रिय नहीं है, दैवसे बढ़कर शक्ति नहीं है और एकादशीसे उत्तम व्रत नहीं है। शालग्रामसे बढ़कर यन्त्र, भारतसे उत्तम क्षेत्र और पुण्यस्थलोंमें वृन्दावनके समान पुण्यस्थान नहीं है। मोक्षदायिनी पुरियोंमें काशी और वैष्णवों में शिवके समान दूसरा नहीं है। न तो पार्वती से अधिक कोई पतिव्रता है और न गणेशसे उत्तम कोई जितेन्द्रिय है। न तो विद्याके समान कोई बन्धु है और न गुरुसे बढ़कर कोई अन्य पुरुष है। विद्या प्रदान करनेवालेके पुत्र और पत्नी भी निस्संदेह उसीके समान होते हैं। गुरुकी स्त्री और पुत्रकी परशुरामने अवहेलना कर दी है, उसीका सम्मार्जन करनेके लिये मैं तुम्हारे घर आया हूँ।
श्रीनारायण कहते हैं-
नारद! वहाँ भगवान् विष्णु शिवजीसे ऐसा कहकर दुर्गाको समझाते हुए सत्यके साररूप उत्तम वचन बोले।
विष्णुने कहा-
देवि! मैं नीतियुक्त, वेदका तत्त्वरूप तथा परिणाममें सुखदायक वचन कहता हूँ, मेरे उस शुभ वचनको सुनो। गिरिराजकिशोरी ! तुम्हारे लिये जैसे गणेश और कार्तिकेय हैं, निस्संदेह उसी प्रकार भृगुवंशी परशुराम भी हैं। सर्वज्ञे! इनके प्रति तुम्हारे अथवा शंकरजीके स्नेहमें भेदभाव नहीं है। अतः मातः ! सबपर विचार करके जैसा उचित हो, वैसा करो पुत्रके साथ पुत्रका यह विवाद तो दैवदोषसे घटित हुआ है। भला, दैवको मिटानेमें कौन समर्थ हो सकता है? क्योंकि दैव महाबली है। वत्से! देखो, तुम्हारे पुत्रका 'एकदन्त' नाम वेदोंमें विख्यात है। वरानने! सभी देव उसे नमस्कार करते हैं। ईश्वरि! सामवेदमें कहे हुए अपने पुत्रके नामाष्टक स्तोत्रको ध्यान देकर श्रवण करो मातः ! वह उत्तम स्तोत्र सम्पूर्ण विघ्नोंका नाशक है। मातः ! तुम्हारे पुत्रके गणेश, एकदन्त, हेरम्ब, विघ्रनायक, लम्बोदर, शूर्पकर्ण, गजवक्त्र और गुहाग्रज- ये आठ नाम हैं। इन आठों नामोंका अर्थ सुनो शिवप्रिये! यह उत्तम स्तोत्र सभी स्तोत्रोंका सारभूत और सम्पूर्ण विघ्नोंका निवारण करनेवाला है। 'ग' ज्ञानार्थवाचक और 'ण' निर्वाणवाचक है। इन दोनों (गण) के जो ईश - हैं; उन परब्रह्म 'गणेश' को मैं प्रणाम करता हूँ। 'एक' शब्द प्रधानार्थक है और 'दन्त' बलवाचक है; अतः जिनका बल सबसे बढ़कर है; उन 'एकदन्त' को मैं नमस्कार करता हूँ। 'हे' दीनार्थवाचक और 'रम्ब' पालकका वाचक है; अतः दीनोंका पालन करनेवाले 'हेरम्ब' को मैं शीश नवाता हूँ। 'विघ्न' विपत्तिवाचक और 'नायक' खण्डनार्थक है, इस प्रकार जो विपत्तिके विनाशक हैं; उन 'विघ्ननायक' को मैं अभिवादन करता हूँ। पूर्वकालमें विष्णुद्वारा दिये गये नैवेद्यों तथा पिताद्वारा समर्पित अनेक प्रकारके मिष्टान्नोंके खानेसे जिनका उदर लम्बा हो गया है; उन 'लम्बोदर' की मैं वन्दना करता हूँ जिनके कर्ण शूर्पाकार, विघ्न-निवारणके हेतु, सम्पदाके दाता और ज्ञानरूप हैं; उन 'शूर्पकर्ण' को मैं सिर झुकाता हूँ। जिनके मस्तकपर मुनिद्वारा दिया गया विष्णुका प्रसादरूप पुष्प वर्तमान है और जो गजेन्द्रके मुखसे युक्त हैं; उन 'गजवक्त्र' को मैं नमस्कार करता हूँ। जो गुह (स्कन्द) से पहले जन्म लेकर शिव-भवनमें आविर्भूत हुए हैं तथा समस्त देवगणोंमें जिनकी अग्रपूजा होती है; उन 'गुहाग्रज' देवकी मैं वन्दना करता हूँ। दुर्गे! अपने पुत्रके नामोंसे संयुक्त इस उत्तम नामाष्टक स्तोत्रको पहले वेदमें देख लो, तब ऐसा क्रोध करो। जो इस नामाष्टक स्तोत्रका, जो नाना अ संयुक्त एवं शुभकारक है, नित्य तीनों संध्याओंके समय पाठ करता है, वह सुखी और सर्वत्र विजयी होता है। उसके पाससे विघ्न उसी प्रकार दूर भाग जाते हैं, जैसे गरुड़के निकटसे साँप । गणेश्वरकी कृपासे वह निश्चय ही महान् ज्ञानी हो जाता है, पुत्रार्थीको पुत्र और भार्याकी कामनावालेको उत्तम स्त्री मिल जाती है तथा महामूर्ख निश्चय ही विद्वान् और श्रेष्ठ कवि हो जाता है। (अध्याय ४४)
Summary of chapter 38 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Gaṇeśa Khaṇḍa is as follows:
To completely pacify Goddess Pārvatī and glorify her supreme status as the Mother of all creation, Lord Śrī Kṛshṇa recited a magnificent, soul-stirring Stotra in her honor. He praised her as the primordial Prakṛti, the source of all cosmic energies, the embodiment of forgiveness, and the loving mother without whose grace no living being can attain liberation. Hearing these exquisite words of truth from the lips of the Supreme Lord Himself, Goddess Pārvatī's anger dissolved completely, replaced by overflowing divine love and motherly affection for all living beings.