श्री ब्रह्म वैवर्त महापुराण - गणेश खंड

6- पार्वतीजीका व्रतारम्भके लिये उद्योग, ब्रह्मादि देवों तथा ऋषि आदिका आगमन, शिवजीद्वारा उनका सत्कार तथा श्रीविष्णुसे पुण्यक-व्रतके विषयमें प्रश्न, श्रीविष्णुका व्रतके माहात्म्य तथा गणेशकी उत्पत्तिका वर्णन करना

नारदजीने पूछा-

मुनिश्रेष्ठ! पार्वतीजीने पतिकी आज्ञासे किस प्रकार उस शुभदायक व्रतका पालन किया था, वह मुझे बतलाइये। ब्रह्मन्! तत्पश्चात् उत्तम व्रतवाली पार्वतीके द्वारा उस व्रतके पूर्ण किये जानेपर गोपीश श्रीकृष्णने किस प्रकार जन्म धारण किया, वह मुझे बतलानेकी कृपा कीजिये।

श्रीनारायणने कहा-

नारद! शिवजी यद्यपि स्वयं ही तपके विधाता हैं तथापि वे पार्वतीसे व्रतकी विधि तथा उसकी दिव्य कथाका वर्णन करके तप करनेके लिये चले गये। यद्यपि शिवजी श्रीहरिके ही पृथक् स्वरूप हैं तथापि वे वहाँ श्रीहरिकी आराधनामें संलग्न होकर उन्हींके ध्यानमें तत्पर हो श्रीहरिकी भावना करने लगे। वे सनातनदेव ज्ञानानन्दमें निमग्न तथा परमानन्दसे परिपूर्ण थे और प्रकटरूपसे विष्णुमन्त्रके स्मरणमें इस प्रकार तल्लीन थे कि उन्हें रात-दिनका आना-जाना ज्ञात नहीं होता था। इधर शुभदायिनी पार्वतीदेवीने पतिके आज्ञानुसार हर्षपूर्ण मनसे व्रतकार्यके लिये ब्राह्मणों तथा भृत्यों को प्रेरित किया और व्रतोपयोगी सभी वस्तुओंको मँगवाकर शुभ मुहूर्तमें व्र करना आरम्भ किया। उसी समय ब्रह्माके पुत्र भगवान् सनत्कुमार वहाँ आ पहुँचे। वे तेजके मूर्तिमान् राशि थे और ब्रह्मतेजसे प्रज्वलित हो रहे थे। तदनन्तर पत्नीसहित ब्रह्मा भी प्रसन्नतापूर्वक ब्रह्मलोकसे वहाँ पधारे। अत्यन्त भयभीत हुए भगवान् महेश्वर भी वहाँ आये। नारद ! जो क्षीरसागरमें शयन करते हैं तथा जगत्के शासक और पालन-पोषण करनेवाले हैं, जिनके गले में वनमाला लटकती रहती है, जो रत्नोंके आभूषणोंसे विभूषित हैं तथा जिनके शरीरका वर्ण श्याम है, वे चार भुजाधारी भगवान् विष्णु लक्ष्मी तथा पार्षदोंके साथ बहुत-सी सामग्री लिये हुए रत्नजटि विमानपर आरूढ़ हो वहाँ उपस्थित हुए। तत्पश्चात् सनक, सनन्दन, कपिल, सनातन, आसुरि, ऋतु, हंस, वोढु, पञ्चशिख, आरुणि, यति, सुमति, अनुयायियोंसहित वसिष्ठ, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, भृगु, अङ्गिरा, अगस्त्य, प्रचेता, दुर्वासा, च्यवन, मरीचि, कश्यप, कण्व, जरत्कारु, गौतम, बृहस्पति, उतथ्य, संवर्त, सौभरि, जाबालि, जमदग्नि, जैगीषव्य, देवल, गोकामुख, वक्ररथ, पारिभद्र, पराशर, विश्वामित्र, वामदेव, ऋष्यशृङ्ग, विभाण्डक, मार्कण्डेय, मृकण्डु, पुष्कर, लोमश, कौत्स, वत्स, दक्ष, बालाग्नि, अघमर्षण, कात्यायन, कणाद, पाणिनि, शाकटायन, शङ्कु, आपिशलि, शाकल्य, शङ्ख- ये तथा और भी बहुत से मुनि शिष्योंसहित - वहाँ पधारे। मुने! धर्मपुत्र नर नारायण भी आये। पार्वतीके उस व्रतमें दिक्पाल, देवता, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर और गणोंसहित सभी पर्वत भी उपस्थित हुए। शैलराज हिमालय, जो अनन्त रत्नोंके उद्भवस्थान हैं, कौतुकवश अपनी कन्याके व्रतमें रत्नाभरणोंसे अलंकृत हो पत्नी, पुत्र, गण और अनुयायियोंसहित पधारे। उनके साथ नाना प्रकारके द्रव्योंसे संयुक्त बहुत बड़ी सामग्री थी। उसमें व्रतोपयोगी मणि-माणिक्य और रत्न थे। अनेक प्रकारकी ऐसी वस्तुएँ थीं, जो संसार में दुर्लभ हैं। एक लाख गज-रत्न, तीन लाख अश्व रत्न, दस लाख गो- रत्न, एक करोड़ स्वर्णमुद्राएँ, चार लाख मुक्ता, एक सहस्र कौस्तुभमणि और अत्यन्त स्वादिष्ट तथा मीठे पदार्थोंके एक लाख भार थे। इसके अतिरिक्त पार्वतीके व्रतमें ब्राह्मण, मनु, सिद्ध, नाग और विद्याधरोंके समुदाय तथा संन्यासी, भिक्षुक और बंदीगण भी आये। उस समय कैलासपर्वतके राजमार्गोंपर चन्दनका छिड़काव किया गया था। पद्मरागमणिके बने हुए शिवमन्दिरमें आमके पल्लवोंकी बंदनवारें बँधी थीं। कदलीके खंभे उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। वह दूब, धान्य, पत्ते, खील, फल और पुष्पोंसे सुसज्जित था। उपस्थित सारा जन समुदाय आनन्दपूर्वक उसे निहार रहा कैलासवासी परमानन्दमें निमग्न थे। सारे तदनन्तर शंकरजीने समागत अतिथियोंको ऊँचे-ऊँचे सिंहासनोंपर बैठाकर उनका आदर सत्कार किया। पार्वतीके इस व्रतमें इन्द्र दानाध्यक्ष, कुबेर कोषाध्यक्ष, स्वयं सूर्य आदेश देनेवाले और वरुण परोसनेके कामपर नियुक्त थे। उस समय दही, दूध, घृत, गुण, चीनी, तेल और मधु आदिकी लाखों नदियाँ बहने लगी थीं। इसी प्रकार गेहूँ, चावल, जौ और चिउरे आदिके पहाड़ों-के-पहाड़ लग गये थे। महामुने! पार्वती के व्रतमें कैलास पर्वतपर सोना, चाँदी, मूँगा और मणियोंके पर्वत सरीखे ढेर लगे हुए थे। लक्ष्मीने - भोजन तैयार किया था, जिसमें परम मनोहर खीर, पूड़ी, अगहनीका चावल और घृतसे बने हुए अनेकविध व्यञ्जन थे। देवर्षिगणोंके साथ स्वयं नारायणने भोजन किया। उस समय एक लाख ब्राह्मण परोसनेका काम कर रहे थे। (भोजन कर लेनेके पश्चात्) जब वे रत्नसिंहासनोंपर विराजमान हुए, तब परम चतुर लाखों ब्राह्मणोंने उन्हें कर्पूर आदिसे सुवासित पानके बीड़े समर्पित किये। ब्रह्मन्! देवर्षियोंसे भरी हुई उस सभामें जब क्षीरसागरशायी भगवान् विष्णु रत्नसिंहासनपर आसीन थे, प्रसन्न मुखवाले पार्षद उनपर श्वेत चँवर डुला रहे थे, ऋषि, सिद्ध तथा देवगण उनकी स्तुति कर रहे थे, वे गन्धर्वोके मनोहर गीत सुन रहे थे, उसी समय ब्रह्माकी प्रेरणा से शंकरजीने हाथ जोड़कर भक्तिपूर्वक उन ब्रह्मेश अपने अभीष्ट कर्तव्य व्रतके विषयमें प्रश्न किया

श्रीमहादेवजीने पूछा-

प्रभो! आप श्रीनिवास, तपः स्वरूप, तपस्याओं और कर्मोंके फलदाता, सबके द्वारा पूजित, सम्पूर्ण व्रतों, जप-यज्ञों और पूजनोंके बीजरूपसे वाञ्छाकल्पतरु और पापोंका हरण करनेवाले हैं। नाथ! मेरी एक प्रार्थना सुनिये । ब्रह्मन् ! पुत्रशोकसे पीड़ित हुई पार्वतीका हृदय दुःखी हो गया है, अतः वह पुत्रकी कामनासे परमोत्तम पुण्यक व्रत करना चाहती है। वह सुव्रता व्रतके फलस्वरूपमें उत्तम पुत्र और पति-सौभाग्यकी याचना कर रही है। इनके बिना उसे संतोष नहीं है। प्राचीन कालमें इस मानिनीने अपने पिताके यज्ञमें मेरी निन्दा होनेके कारण अपने शरीरका त्याग कर दिया था और अब पुनः हिमालयके घरमें जन्म धारण किया है। यह सारा वृत्तान्त तो आप जानते ही हैं, आप सर्वज्ञको मैं क्या बतलाऊँ। तत्त्वज्ञ ! इस विषयमें आपकी क्या आज्ञा है? आप परिणाममें शुभप्रदायिनी अपनी वह आज्ञा बतलाइये। नाथ ! मैंने सब कुछ निवेदन कर दिया है, अब जो कर्तव्य हो, उसे बतानेकी कृपा कीजिये; क्योंकि परामर्शपूर्वक किया हुआ सारा कार्य परिणाम में सुखदायक होता है।

श्रीनारायणजी कहते हैं-

नारद ! उस सभामें यों कहकर भगवान् शंकरने कमलापति विष्णुकी स्तुति की और फिर ब्रह्माके मुखकी ओर देखकर वे चुप हो गये। शंकरजीका वचन सुनकर जगदीश्वर विष्णु ठठाकर हँस पड़े और हितकारक तथा नीतिपूर्ण वचन कहने लगे।

श्रीविष्णुने कहा-

पार्वतीश्वर! आपकी पत्नी सती संतान प्राप्तिके लिये जिस उत्तम पुण्यक - व्रतको करना चाहती है, वह व्रतोंका सारतत्त्व, स्वामि-सौभाग्यका बीज, सबके द्वारा असाध्य, दुराराध्य, सम्पूर्ण अभीष्ट फलका दाता, सुखदायक, सुखका सार तथा मोक्षप्रद है। जो सबके आत्मा, साक्षीस्वरूप, ज्योतिरूप, सनातन, आश्रयरहित, निर्लिप्स, उपाधिहीन, निरामय, भक्तोंके प्राणस्वरूप, भक्तोंके ईश्वर, भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले, दूसरोंके लिये दुराराध्य, परंतु भक्तोंके लिये सुसाध्य, भक्तिके वशीभूत, सर्वसिद्ध और कलारहित हैं, ये ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर जिन पुरुषकी कलाएँ हैं, महान् विराट् जिनका एक अंश है, जो निर्लिप्स, प्रकृतिसे परे, अविनाशी, निग्रहकर्ता, उग्रस्वरूप, भक्तोंके लिये मूर्तिमान् अनुग्रहस्वरूप, ग्रहोंमें उग्र ग्रह और ग्रहोंका निग्रह करनेवाले हैं, वे भगवान् आपके बिना करोड़ों जन्मोंमें भी साध्य नहीं हो सकते। सूर्य, शिव, नारायणी माया, कला आदिकी दीर्घकालतक उपासना करनेके बाद मनुष्य भक्त संसर्गकी हेतुस्वरूपा कृष्णभक्तिको पाता है। शिवजी! उस निष्पक्व भक्तिको पाकर भारतवर्ष में बारंबार भ्रमण करते हुए जब भक्तोंकी सेवा करनेसे उसकी भक्ति परिपक्व हो जाती है, तब भक्तोंकी कृपासे तथा देवताओंके आशीर्वाद से उसे श्रीकृष्णमन्त्र प्राप्त होता है, जो परमोत्कृष्ट निर्वाणरूप फल प्रदान करनेवाला है। कृष्णव्रत और कृष्णमन्त्र सम्पूर्ण कामनाओंके फलके प्रदाता हैं। चिरकालतक श्रीकृष्णकी सेवा करनेसे भक्त श्रीकृष्ण तुल्य हो जाता है। महाप्रलयके अवसरपर समस्त प्राणियोंका विनाश हो जाता है - यह सर्वथा निश्चित है; परंतु जो कृष्णभक्त हैं, वे अविनाशी हैं। उन साधुओंका नाश नहीं होता। शिवजी ! श्रीकृष्णभक्त अत्यन्त निश्चिन्त होकर अविनाशी गोलोकमें आनन्द मनाते हैं। महेश्वर ! आप सबका संहार करनेवाले हैं, परंतु कृष्णभक्तोंपर आपका वश नहीं चलता। उसी प्रकार माया सबको मोहग्रस्त कर लेती है, परंतु मेरी कृपासे वह भक्तोंको नहीं मोह पाती। नारायणी माया समस्त प्राणियोंकी माता है। वह कृष्णभक्तिका दान करनेवाली है, वह नारायणी माया मूलप्रकृति, अधीश्वरी, कृष्णप्रिया, कृष्णभक्ता, कृष्णतुल्या, अविनाशिनी, तेजः स्वरूपा और स्वेच्छानुसार शरीर धारण करनेवाली है। (दैत्योंद्वारा) सुरनिग्रह के अवसरपर वह देवताओंके तेजसे प्रकट हुई थी । उसने दैत्यसमूहोंका संहार करके दक्षके अनेक जन्मोंकी तपस्याके फलस्वरूप भारतवर्षमें दक्षपत्नीके गर्भसे जन्म लिया। फिर वह सतीदेवी, जो सनातनी कृष्णशक्ति हैं पिताके यज्ञमें आपकी निन्दा होनेके कारण शरीरका त्याग करके गोलोकको चली गयीं। शंकर! तब पूर्वकालमें आप उनके रूप तथा गुणके आश्रयभूत परम सुन्दर शरीरको लेकर भारतवर्षमें भ्रमण करते हुए दुःखी हो गये थे। उस समय श्रीशैलपर नदीके किनारे मैंने आपको समझाया था। फिर उसी देवीने शीघ्र ही शैलराजकी पत्नीके गर्भसे जन्म लिया ।

शंकर! उत्तम व्रतका आचरण करनेवाली साध्वी शिवा पुण्यक नामक उत्तम व्रतका अनुष्ठान करें। इस व्रतके पालनसे सहस्रों राजसूय यज्ञोंका पुण्य प्राप्त होता है। त्रिलोचन ! इस व्रतमें सहस्त्रों राजसूय यज्ञोंके समान धनका व्यय होता है, - अतः यह व्रत सभी साध्वी महिलाओं द्वारा साध्य नहीं है। इस पुण्यक व्रतके प्रभावसे स्वयं - गोलोकनाथ श्रीकृष्ण पार्वतीके गर्भसे उत्पन्न होकर आपके पुत्र होंगे। वे कृपानिधि स्वयं समस्त देवगणोंके ईश्वर हैं, इसलिये त्रिलोकीमें 'गणेश' नामसे विख्यात होंगे। जिनके स्मरणमात्रसे निश्चय ही जगत्के विघ्नोंका नाश हो जाता है, इस कारण उन विभुका नाम 'विघ्ननिघ्न' हो गया। चूँकि पुण्यक व्रतमें उन्हें नाना प्रकारके द्रव्य समर्पित किये जाते हैं, जिन्हें खाकर उनका उदर लंबा हो जाता है; अतः वे 'लम्बोदर' कहलायेंगे। शनिकी दृष्टि पड़नेसे सिरके कट जानेपर पुनः हाथीका सिर जोड़ा जायगा, इस कारण उन्हें 'गजानन' कहा जायगा। परशुरामजीके फरसेसे जब इनका एक दाँत टूट जायगा, तब ये अवश्य ही 'एकदन्त' नामवाले होंगे। वे ऐश्वर्यशाली शिशु सम्पूर्ण देवगणोंके, हमलोगोंके तथा जगत्के पूज्य होंगे। मेरे वरदानसे उनकी सबसे पहले पूजा होगी। सम्पूर्ण देवोंकी पूजाके समय सबसे पहले उनकी पूजा करके मनुष्य निर्विघ्रतापूर्वक पूजाके फलको पा लेता है, अन्यथा उसकी पूजा व्यर्थ हो जाती है।

मनुष्योंको चाहिये कि गणेश, सूर्य, विष्णु, शम्भु, अग्नि और दुर्गा - इन सबकी पहले पूजा करके तब अन्य देवताका पूजन करे। गणेशका पूजन करनेपर जगत्के विघ्न निर्मूल हो जाते हैं। सूर्यकी पूजासे नीरोगता आती है। श्रीविष्णुके पूजनसे पवित्रता, मोक्ष, पापनाश, यश और ऐश्वर्यकी वृद्धि होती है। शंकरका पूजन तत्त्वज्ञान के विषयमें परम तृप्तिका बीज है। अग्रिका पूजन अपनी बुद्धिकी शुद्धिका उत्पादक कहा गया है। ब्रह्माद्वारा संस्कृत अग्निकी पूजासे मनुष्य अन्तसमयमें ज्ञान मृत्युको प्राप्त करता है तथा शंकराग्निके सेवनसे दाता और भोक्ता होता है। दुर्गाकी अर्चना हरिभक्ति प्रदान करनेवाली तथा परम मङ्गलदायिनी होती है। इनकी पूजाके बिना अन्यकी पूजा करनेसे वह पूजन विपरीत हो जाता है। महादेव! त्रिलोकीके लिये यही क्रम प्रत्येक कल्पमें निश्चित है। ये देव निरन्तर विद्यमान रहनेवाले, नित्य तथा सृष्टिपरायण हैं। इनका आविर्भाव और तिरोभाव ईश्वरकी इच्छापर ही निर्भर है। उस सभाके बीच यों कहकर श्रीहरि मौन हो गये। उस समय देवता, ब्राह्मण तथा पार्वतीसहित शंकर परम प्रसन्न हुए। (अध्याय ६)