तब श्रीनारायणने कहा-
नारद! एक बार देवराज इन्द्र निर्जन वनमें, एक पुष्पोद्यानमें गये थे। वहाँ रम्भा अप्सरासे उनका समागम हुआ। तदनन्तर वे दोनों जलविहार करने लगे। इसी बीच मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा वैकुण्ठसे कैलास जाते हुए शिष्यमण्डलीसहित वहाँ आ पहुँचे। देवराज इन्द्रने उन्हें प्रणाम किया। मुनिने आशीर्वाद दिया। फिर भगवान् नारायणका दिया हुआ पारिजात पुष्प इन्द्रको देकर मुनिने कहा- 'देवराज! भगवान् नारायणके निवेदित यह पुष्प सब विघ्नोंका नाश करनेवाला है। यह जिसके मस्तकपर रहेगा, वह सर्वत्र विजय प्राप्त करेगा और देवताओंमें अग्रगण्य होकर अग्रपूजाका अधिकारी होगा। महालक्ष्मी छायाकी तरह सदा उसके साथ रहेगी। वह ज्ञान, तेज, बुद्धि, बल-सभी बातों में सब देवताओंसे श्रेष्ठ और भगवान् हरिके तुल्य पराक्रमी होगा। परंतु जो पामर अहंकारवश भगवान् श्रीहरिके निवेदित इस पुष्पको मस्तकपर धारण नहीं करेगा, वह अपनी जातिवालों के सहित श्रीभ्रष्ट हो जायगा इतना कहकर दुर्वासाजी शंकरालयको चले गये। इन्द्रने उस पुष्पको अपने सिरपर न धारण करके ऐरावत हाथीके मस्तकपर रख दिया। इससे इन्द्र श्रीभ्रष्ट हो गये। इन्द्रको श्रीभ्रष्ट देख रम्भा उन्हें छोड़कर स्वर्ग चली गयी। गजराज इन्द्रको नीचे गिराकर महान् अरण्यमें चला गया और हथिनीके साथ विहार करने लगा। उस वनमें उसके बहुत से बच्चे हुए। इसी समय श्रीहरिने उस हाथीका मस्तक काटकर बालक (गणेश) के सिरपर - लगा दिया। वत्स! गजमुखके लगानेका प्रसङ्ग तुमको सुना दिया। इसके श्रवणसे पाप नष्ट होते हैं। अब और क्या सुनना चाहते हो, सो कहो ।
नारदने पूछा-
प्रभो ! किस ब्रह्मशापके कारण वे सभी देवता श्रीभ्रष्ट हो गये थे। पुनः किस प्रकार उन्होंने उन जगज्जननी कमलाको प्राप्त किया? उस समय महेन्द्रने क्या किया? आप उस परम दुर्लभ गोपनीय रहस्यको बतलानेकी कृपा करें।
नारायणने कहा –
नारद! जिसकी बुद्धि - अत्यन्त मन्द हो गयी थी, श्रीसे भ्रष्ट होनेके कारण जिसपर दीनता छायी हुई थी और जिसका आनन्द नष्ट हो गया था, वह इन्द्र गजेन्द्र और रम्भासे पराभूत होकर अमरावतीमें गया। मुने! वहाँ उसने देखा कि उस पुरीमें आनन्दका नामनिशान नहीं है। वह दीनतासे ग्रस्त बन्धुओं से हीन और शत्रुवर्गोंसे खचाखच भर गयी है। तब दूतके मुखसे सारा वृत्तान्त सुनकर वह गुरु बृहस्पतिके घर गया और फिर गुरु तथा देवगणोंके साथ वह ब्रह्माकी सभामें जा पहुँचा। वहाँ जाकर देवताओंसहित इन्द्रने तथा बृहस्पतिने ब्रह्माको नमस्कार किया और भक्तिभावसहित वेदविधिके अनुसार स्तोत्रद्वारा उनकी स्तुति की। तत्पश्चात् बृहस्पतिने प्रजापति ब्रह्मासे सारा वृत्तान्त कह सुनाया। उसे सुनकर ब्रह्माने नीचे मुख करके कहना आरम्भ किया।
ब्रह्मा बोले-
देवेन्द्र ! तुम मेरे प्रपौत्र हो और श्रीसम्पन्न होनेसे सदा प्रज्वलित होते रहते हो। किंतु राजन्! लक्ष्मीके समान सुन्दरी शचीके पति होनेपर भी तुम आचरणभ्रष्ट हो जाते हो। जो आचरणभ्रष्ट होता है, उसे लक्ष्मी अथवा यशकी प्राप्ति कहाँसे हो सकती है? वह पापी तो सदा सभी सभाओं में निन्दाका विषय बना रहता है। रम्भाने तुम्हें हतबुद्धि बना दिया था। इसी कारण तुमने दुर्वासाद्वारा दिये गये श्रीहरिके नैवेद्यको गजराजके मस्तकपर डाल दिया। इस समय सबके द्वारा भोगी जानेवाली वह रम्भा कहाँ है और श्रीसे भ्रष्ट हुए तुम कहाँ ? जिसके कारण तुम्हें लक्ष्मीसे रहित होना पड़ा, वह रम्भा भी तुम्हें क्षणभरमें ही त्यागकर चली गयी; क्योंकि वेश्या चञ्चला होती है। वह धनवानोंको ही पसंद करती है, निर्धनोंको नहीं तथा प्राचीन प्रेमीका तिरस्कार करके नये-नये नायकोंको खोजती रहती है। परंतु वत्स! जो बीत गया, वह तो चला ही गया; क्योंकि बीता हुआ पुनः वापस नहीं आता। अब तुम लक्ष्मीकी प्राप्तिके लिये भक्तिपूर्वक नारायणका भजन करो । इतना कहकर नारायणपरायण ब्रह्माने इन्द्रको जगत्स्स्रष्टा नारायणका स्तोत्र, कवच और मन्त्र दिया। तब इन्द्र देवताओं तथा गुरुके साथ पुष्करमें जाकर अपने अभीप्सित मन्त्रका जप करने लगे और कवच ग्रहण करके उसके द्वारा श्रीहरिकी स्तुतिमें तत्पर हो गये। इस प्रकार
पुण्यदायक शुभ भारतवर्ष में एक वर्षतक निराहार रहकर लक्ष्मीकी प्राप्तिके हेतु उन्होंने लक्ष्मीपतिकी सेवा की। तब श्रीहरिने प्रकट होकर इन्द्रको मनोवाञ्छित वर तथा लक्ष्मीका स्तोत्र, कवच और ऐश्वर्यवर्धक मन्त्र प्रदान किया। मुने! यह सब देकर श्रीहरि तो वैकुण्ठको चले गये और इन्द्र
क्षीरसागरपर पहुँचे। वहाँ उन्होंने कवच धारणकर स्तोत्रद्वारा स्तवन करके लक्ष्मीको प्राप्त किया। तत्पश्चात् देवराज इन्द्रने शत्रुको जीतकर अमरावतीको अपने अधिकारमें कर लिया। इसी प्रकार सभी देवता एक-एक करके अपने इच्छित स्थानको प्राप्त हुए। (अध्याय २०-२१)
Summary of chapter 17 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Gaṇeśa Khaṇḍa is as follows:
Following the departure of Sage Jaratkāru, Goddess Manasā gave birth to a radiant son named Āstīka, who was raised in the hermitage of Maharshi Gautama and trained in the highest Vedic lore. Years later, when King Janamejaya organized a massive, fiery snake sacrifice to annihilate the entire serpent race in revenge for his father Parīkshit's death, the young sage Āstīka intervened with profound eloquence and Vedic reasoning. Pleased by the boy's unmatched wisdom and moral purity, King Janamejaya stopped the sacrifice, saving the remaining serpents from extinction. Goddess Manasā and her son Āstīka were glorified across all worlds as the eternal protectors of the serpent race.