श्री ब्रह्म वैवर्त महापुराण - गणेश खंड

1-3 नारदजीकी नारायणसे गणेशचरितके विषयमें जिज्ञासा, नारायणद्वारा शिव-पार्वतीके विवाह तथा स्कन्दकी उत्पत्तिका वर्णन, पार्वतीकी महादेवजीसे पुत्रोत्पत्तिके लिये प्रार्थना, शिवजीका उन्हें पुण्यक -व्रतके लिये प्रेरित करना

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।

देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥

अन्तर्यामी नारायणस्वरूप श्रीकृष्ण, (उनके नित्यसखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीलाको प्रकट करनेवाली) देवी सरस्वती तथा (उस लीलाको संकलित करनेवाले) व्यासजीको नमस्कार करके जय (पुराण - इतिहास आदि ) - का पाठ करना चाहिये।

नारदजीने पूछा-

भगवन् ! जो सर्वोत्कृष्ट, मूढ़ोंके लिये ज्ञानकी वृद्धि करनेवाला तथा अमृतका उत्तम सागर है, उस अभीप्सित प्रकृतिखण्डको तो मैंने सुन लिया। अब मैं गणपतिखण्डको, जो मनुष्योंके सम्पूर्ण मङ्गलोंका भी मङ्गलस्वरूप तथा गणेशजीके जन्म-वृत्तान्तसे परिपूर्ण है, सुनना चाहता हूँ। जगदीश्वर! भला, पार्वतीजीके शुभ उदरसे सुरश्रेष्ठ गणेशकी उत्पत्ति कैसे हुई ? किस प्रकार पार्वतीदेवीने ऐसे पुत्रको प्राप्त किया ? गणेशजी किस देवताके अंशसे उत्पन्न हुए थे? उन्हें जन्म क्यों लेना पड़ा? वे अयोनिज थे थे अथवा किसी योनिसे उत्पन्न हुए थे ? उनका ब्रह्मतेज कैसा था? उनमें कितना पराक्रम था ? उनकी तपस्या कैसी थी? वे कितने ज्ञानी थे तथा उनका यश कितना निर्मल था? जगदीश्वर नारायण, शम्भु और ब्रह्माके रहते हुए सम्पूर्ण विश्वमें उनकी अग्रपूजा क्यों होती है? वे हाथी के मुखवाले एकदन्त तथा विशाल तोंदवाले कैसे हो गये? महाभाग ! पुराणों में उनके रहस्यमय जन्म वृत्तान्तका वर्णन किया गया है। आप उस परम मनोहर तथा अत्यन्त विस्तृत चरित्रको पूर्णरूपसे वर्णन कीजिये; क्योंकि उसे सुननेके लिये मुझे परम कौतूहल हो रहा है।

श्रीनारायणने कहा-

नारद! मैं उस परम अद्भुत रहस्यका वर्णन करता हूँ, सुनो! वह पाप-संतापका हरण करनेवाला, सम्पूर्ण विघ्नोंका विनाशक, समस्त मङ्गलोंका दाता, साररूप, निखिल श्रुतियोंके लिये मनोहर सुखप्रद, मोक्षका बीज तथा पापोंका मूलोच्छेद करनेवाला है। दैत्योंद्वारा पीड़ित हुए देवताओंकी तेजोराशि से उत्पन्न हुई देवीने दैत्यसमुदायका संहार कर डाला। तत्पश्चात् वे दक्षकी कन्या होकर प्रकट हुईं। उस समय उन देवीका नाम सती था।उन्होंने अपने स्वामी (शिवजी) की निन्दा होनेके - कारण योगधारणाद्वारा अपने शरीरका परित्याग कर दिया और फिर शैलराजकी प्रिय पत्नी (मेना) के पेटसे जन्म लिया पर्वतराजने उन पार्वतीजीका विवाह शंकरजीके साथ कर दिया। तब महादेवजी उन्हें साथ लेकर निर्जन वनमें चले गये। वहाँ दीर्घकालतक शंकर-पार्वतीका विहार चलता रहा। जब देवताओंने आकर विहारसे विरत होनेके लिये उनसे प्रार्थना की, तब भगवान् शंकर विरत हो गये। उस समय महादेवजीका शुक्र भूमिपर गिर पड़ा, जिससे स्कन्द-कार्तिकेय उत्पन्न हुए। तब पार्वतीजीने श्रीशंकरजीसे एक श्रेष्ठ पुत्रके लिये प्रार्थना की।

इसपर महादेवजीने कहा-

पार्वति! मैं उपाय बतलाता हूँ, सुनो। उससे तुम्हारा परम कल्याण होगा; क्योंकि त्रिलोकीमें उपाय करनेसे कार्यसिद्धि होती ही है। मैं तुमसे जिस उपायका वर्णन करूँगा, वह सम्पूर्ण अभीष्ट सिद्धिका बीजरूप, परम मङ्गलदायक तथा मनको हर्ष प्रदान करनेवाला है। वरानने ! तुम श्रीहरिकी आराधना करके व्रत आरम्भ करो। एक वर्षतक इसका अनुष्ठान करना होगा। इस व्रतका नाम पुण्यक है। यह महाकठोर बीज, कल्पतरुके समान अभीष्ट सिद्ध करनेवाला, उत्कृष्ट, सुखदायक, पुण्यदाता, साररूप, पुत्रप्रद और समस्त सम्पत्तियों को देनेवाला है। प्रिये ! जैसे नदियों में गङ्गा, देवताओं में श्रीहरि, वैष्णवों में मैं (शिव), देवियों में तुम, वर्णोंमें ब्राह्मण, तीर्थों में पुष्कर, पुष्पोंमें पारिजात, पत्रों में तुलसीदल, पुण्य प्रदान करनेवालों में एकादशी तिथि, वारोंमें पुण्यप्रद रविवार, मासों में मार्गशीर्ष, ऋतुओंमें वसन्त, वत्सरों में संवत्सर, युगोंमें कृतयुग, पूजनीयोंमें विद्या पढ़ानेवाले गुरु, गुरुजनोंमें माता, आप्तजनोंमें साध्वी पत्नी, विश्वस्तोंमें मन, धनोंमें रत्न, प्रियजनों में पति, बन्धुजनोंमें पुत्र, वृक्षोंमें कल्पतरु, फलोंमें आमका फल, वर्षोंमें भारतवर्ष, वनोंमें वृन्दावन, स्त्रियों में शतरूपा, पुरियोंमें काशी, तेजस्वियोंमें सूर्य, सुखदाताओंमें चन्द्रमा, रूपवानोंमें कामदेव, शास्त्रों में वेद, सिद्धोंमें कपिल मुनि, वानरोंमें हनुमान्, क्षेत्रों में ब्राह्मणका मुख, यश प्रदान करनेवालों में विद्या तथा मनोहारिणी कविता, व्यापक वस्तुओंमें आकाश, शरीरके अङ्गोंमें नेत्र, विभवोंमें हरिकथा, सुखोंमें हरिस्मरण, स्पर्शोमें पुत्रका स्पर्श, हिंसकोंमें दुष्ट, पापोंमें असत्यभाषण, पापियोंमें पुंश्चली स्त्री, पुण्यों में सत्यभाषण, तपस्याओंमें श्रीहरिकी सेवा, गव्य पदार्थोंमें घृत, तपस्वियोंमें ब्रह्मा, भक्ष्य वस्तुओंमें अमृत, अन्नों में धान, पवित्र करनेवालोंमें जल, शुद्ध पदार्थों में अग्नि, तैजस वस्तुओंमें सुवर्ण, मीठे पदार्थोंमें प्रियभाषण, पक्षियों में गरुड़, हाथियों में इन्द्रका वाहन ऐरावत, योगियों में कुमार (सनत्कुमार आदि), देवर्षियों में नारद, गन्धर्वोंमें चित्ररथ, बुद्धिमानोंमें बृहस्पति, श्रेष्ठ कवियों में शुक्राचार्य, काव्यों में पुराण, सोतों में समुद्र, क्षमाशीलोंमें पृथ्वी, लाभोंमें मुक्ति, सम्पत्तियोंमें हरिभक्ति, पवित्रों में वैष्णव, वर्णोंमें ॐ कार मन्त्रों में विष्णुमन्त्र, बीजोंमें प्रकृति, विद्वानोंमें वाणी, छन्दोंमें गायत्री छन्द, यक्षोंमें कुबेर, सर्पोंमें वासुकिनाग, पर्वतों में तुम्हारे पिता हिमवान्, गौओंमें सुरभि, वेदोंमें सामवेद, तृणोंमें कुश, सुखप्रदोंमें लक्ष्मी, शीघ्रगामियोंमें मन, अक्षरों में अकार, हितैषियोंमें पिता, यन्त्रों में शालग्रामशिला, पशु-अस्थियों में विष्णुपञ्जर, चौपायों में सिंह, जीवधारियोंमें मनुष्य, इन्द्रियोंमें मन, रोगोंमें मन्दाग्नि, बलवानों में शक्ति, शक्तिमानोंमें अहंकार, स्थूलों में महाविराट्, सूक्ष्मोंमें परमाणु, अदितिपुत्रों में इन्द्र, दैत्योंमें बलि, साधुओंमें प्रह्लाद, दानियों में दधीचि, अस्त्रों में ब्रह्मास्त्र, चक्रों में सुदर्शनचक्र, मनुष्यों में राजा रामचन्द्र और धनुर्धारियोंमें लक्ष्मण श्रेष्ठ हैं तथा जैसे श्रीकृष्ण सर्वाधार, समस्त जीवोंद्वारा सेवनीय, सबके बीजस्वरूप, सर्वाभीष्टप्रदाता और सम्पूर्ण वस्तुओंके साररूप हैं, उसी प्रकार यह पुण्यक व्रत सम्पूर्ण व्रतों में श्रेष्ठ है।

इसलिये महाभागे ! तुम इस व्रतका अनुष्ठान करो, यह तीनों लोकोंमें दुर्लभ है। इस व्रत के पालनसे ही तुम्हें सम्पूर्ण वस्तुओंका साररूप पुत्र प्राप्त होगा। इस व्रतके द्वारा सम्पूर्ण प्राणियोंके मनोरथ सिद्ध करनेवाले श्रीकृष्णकी आराधना की जाती है, जिनके सेवनसे मनुष्य अपने करोड़ों पितरोंके साथ मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य विष्णुमन्त्र ग्रहण करके श्रीहरिकी सेवा करता है, वह भारतवर्षमें अपने जन्म-धारणको सफल कर लेता है। वह अपने पूर्वजोंका उद्धार करके निश्चय ही वैकुण्ठमें जाता है और श्रीकृष्णका पार्षद होकर सुखपूर्वक आनन्दका उपभोग करता है।

वह भक्त अपने भाई, बन्धु बान्धव, भृत्य, संगी साथी तथा अपनी स्त्रीका उद्धार करके श्रीहरिके परमपदको प्राप्त हो जाता है। इसलिये गिरिजे! तुम इस परम दुर्लभ विष्णुमन्त्रको ग्रहण करो और उस व्रतकालमें इसी मन्त्रका जप करो; क्योंकि यह पितरोंकी मुक्तिका कारण है। यों कहकर भगवान् शंकर गिरिजाके साथ तुरंत ही गङ्गा तटपर गये और उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक कवच तथा स्तोत्रसहित मनोहर विष्णुमन्त्र पार्वतीजीको बतलाया। मुने! तत्पश्चात् उन्होंने पार्वतीसे पूजाकी विधि एवं नियमोंका भी वर्णन किया। (अध्याय १ - ३)