नारदजीने कहा-
मुनिश्रेष्ठ ! मैंने सब कुछ सुन लिया। अवश्य ही अब कुछ भी सुनना शेष नहीं रहा। केवल प्रकृतिदेवीके स्तोत्र और कवचका मुझसे वर्णन कीजिये।
श्रीनारायण बोले-
नारद! सबसे पहले गोलोकमें परमात्मा श्रीकृष्णने वसन्त ऋतु में - रासमण्डलके भीतर प्रसन्नतापूर्वक देवीकी पूजा करके उनकी स्तुति की थी। दूसरी बार मधु और कैटभके साथ युद्धके अवसरपर भगवान् विष्णुने देवीका स्तवन किया। तीसरी बार वहीं प्राणसंकटका अवसर आया जान ब्रह्माजीने दुर्गादेवीकी स्तुति की थी। मुने! चौथी बार त्रिपुरारि शिवने त्रिपुरोंके साथ अत्यन्त घोरतर युद्धका अवसर आनेपर भक्तिभावसे देवीका स्तवन किया था और पाँचवीं बार वृत्रासुरवधके समय घोर प्राणसंकटकी बेलामें सम्पूर्ण देवताओंसहित इन्द्रने दुर्गादेवीकी स्तुति की थी। तबसे मुनीन्द्रों, मनुओं और सुरथ आदि मनुष्योंने प्रत्येक कल्पमें परात्परा परमेश्वरीका स्तवन एवं पूजन करना आरम्भ किया। ब्रह्मन् ! अब तुम देवीका स्तोत्र सुनो, जो सम्पूर्ण विघ्नोंका नाश करनेवाला, सुखदायक, मोक्षदायक, सार वस्तु तथा भवसागरसे पार होनेका साधन है।
श्रीकृष्ण उवाच -
त्वमेव सर्वजननी मूलप्रकृतिरीश्वरी ।
त्वमेवाद्या सृष्टिविधौ स्वेच्छया त्रिगुणात्मिका ॥
कार्यार्थे सगुणा त्वं च वस्तुतो निर्गुणा स्वयम् ।
परब्रह्मस्वरूपा त्वं सत्या नित्या सनातनी ॥
तेजः स्वरूपा परमा भक्तानुग्रहविग्रहा।
सर्वस्वरूपा सर्वेशा सर्वाधारा परात्परा ॥
सर्वबीजस्वरूपा च सर्वपूज्या निराश्रया।
सर्वज्ञा सर्वतोभद्रा सर्वमङ्गलमङ्गला ॥
सर्वबुद्धिस्वरूपा च सर्वशक्तिस्वरूपिणी ।
सर्वज्ञानप्रदा देवी सर्वज्ञा सर्वभाविनी ॥
त्वं स्वाहा देवदाने च पितृदाने स्वधा स्वयम् ।
दक्षिणा सर्वदाने च सर्वशक्तिस्वरूपिणी ॥
निद्रा त्वं च दया त्वं च तृष्णा त्वं चात्मनः प्रिया ।
क्षुरक्षान्तिः शान्तिरीशा च कान्तिः सृष्टिश्च शाश्वती ॥
श्रद्धा पुष्टिश्च तन्द्रा च लज्जा शोभा दया तथा ।
सतां सम्पत्स्वरूपा च विपत्तिरसतामिह ॥
प्रीतिरूपा पुण्यवतां पापिनां कलहाङ्कुरा।
शश्वत्कर्ममयी शक्तिः सर्वदा सर्वजीविनाम् ॥
देवेभ्यः स्वपदोदात्री धातुर्धात्री कृपामयी।
हिताय सर्वदेवानां सर्वासुरविनाशिनी ॥
योगनिद्रा योगरूपा योगदात्री च योगिनाम् ।
सिद्धिस्वरूपा सिद्धानां सिद्धिदा सिद्धयोगिनी ॥
ब्रह्माणी माहेश्वरी च विष्णुमाया च वैष्णवी ।
भद्रदा भद्रकाली च सर्वलोकभयङ्करी ॥
ग्रामे ग्रामे ग्रामदेवी गृहदेवी गृहे गृहे।
सतां कीर्तिः प्रतिष्ठा च निन्दा त्वमसतां सदा ॥
महायुद्धे महामारी दुष्टसंहाररूपिणी ।
रक्षास्वरूपा शिष्टानां मातेव हितकारिणी ॥
वन्द्या पूज्या स्तुता त्वं च ब्रह्मादीनां च सर्वदा ।
ब्राह्मण्यरूपा विप्राणां तपस्या च तपस्विनाम् ॥
विद्या विद्यावतां त्वं च बुद्धिर्बुद्धिमतां सताम् ।
मेधास्मृतिस्वरूपा च प्रतिभा प्रतिभावताम् ॥
राज्ञां प्रतापरूपा च विशां वाणिज्यरूपिणी ।
सृष्टौ सृष्टिस्वरूपा त्वं रक्षारूपा च पालने ॥
तथान्ते त्वं महामारी विश्वस्य विश्वपूजिते ।
कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च मोहिनी ॥
दुरत्यया मे माया त्वं यया सम्मोहितं जगत् ।
यया मुग्धो हि विद्वांश्च मोक्षमार्ग न पश्यति ॥
इत्यात्मना कृतं स्तोत्रं दुर्गाया दुर्गनाशनम्।
पूजाकाले पठेद्यो हि सिद्धिर्भवति वाञ्छिता ॥
(प्रकृतिखण्ड ६६ ७ - २६)
श्रीकृष्ण बोले –
देवि ! तुम्हीं सबकी जननी, - मूलप्रकृति ईश्वरी हो। तुम्हीं सृष्टिकार्यमें आद्याशक्ति हो। तुम अपनी इच्छासे त्रिगुणमयी बनी हुई हो। कार्यवश सगुण रूप धारण करती हो । वास्तवमें स्वयं निर्गुणा हो । सत्या, नित्या, सनातनी एवं परब्रह्मस्वरूपा हो, परमा तेजः स्वरूपा हो। भक्तोंपर कृपा करनेके लिये दिव्य शरीर धारण करती हो। तुम सर्वस्वरूपा, सर्वेशा, सर्वाधारा, परात्परा, सर्वबीजस्वरूपा, सर्वपूज्या, निराश्रया, सर्वज्ञा, सर्वतोभद्रा (सब ओरसे मङ्गलमयी), सर्वमङ्गलमङ्गला, सर्वबुद्धिस्वरूपा, सर्वशक्तिरूपिणी, सर्वज्ञानप्रदा देवी, सब कुछ जाननेवाली और सबको उत्पन्न करनेवाली हो। देवताओंके लिये हविष्य दान करनेके निमित्त तुम्हीं स्वाहा हो, पितरोंके लिये श्राद्ध अर्पण करनेके निमित्त तुम स्वयं ही स्वधा हो, सब प्रकारके दानयज्ञमें दक्षिणा हो तथा सम्पूर्ण शक्तियाँ तुम्हारा ही स्वरूप हैं। तुम निद्रा, दया और मनको प्रिय लगनेवाली तृष्णा हो । क्षुधा, क्षमा, शान्ति, ईश्वरी, कान्ति तथा शाश्वती सृष्टि भी तुम्हीं हो। तुम्हीं श्रद्धा, पुष्टि, तन्द्रा, लज्जा, शोभा और दया हो। सत्पुरुषोंके यहाँ सम्पत्ति और दुष्टोंके घरमें विपत्ति भी तुम्हीं हो। तुम्हीं पुण्यवानोंके लिये प्रीतिरूप हो, पापियोंके लिये कलहका अङ्कुर हो तथा समस्त जीवोंकी कर्ममयी शक्ति भी सदा तुम्हीं हो। देवताओंको उनका पद प्रदान करनेवाली तुम्हीं हो। धाता (ब्रह्मा) का भी धारण-पोषण - करनेवाली दयामयी धात्री तुम्हीं हो सम्पूर्ण देवताओंके हितके लिये तुम्हीं समस्त असुरोंका विनाश करती हो। तुम योगनिद्रा हो । योग तुम्हारा स्वरूप है। तुम योगियोंको योग प्रदान करनेवाली हो। सिद्धोंकी सिद्धि भी तुम्हीं हो। तुम सिद्धिदायिनी और सिद्धयोगिनी हो । ब्रह्माणी, माहेश्वरी, विष्णु माया, वैष्णवी तथा भद्रदायिनी भद्रकाली भी तुम्हीं हो। तुम्हीं समस्त लोकोंके लिये भय उत्पन्न करती हो। गाँव-गाँवमें ग्रामदेवी और घर-घर में गृहदेवी भी तुम्हीं हो। तुम्हीं सत्पुरुषोंकी कीर्ति और प्रतिष्ठा हो। दुष्टोंकी होनेवाली सदा निन्दा भी तुम्हारा ही स्वरूप है। तुम महायुद्ध में दुष्टसंहाररूपिणी महामारी हो और शिष्ट पुरुषों के लिये माताकी भाँति हितकारिणी एवं रक्षारूपिणी हो । ब्रह्मा आदि देवताओंने सदा तुम्हारी वन्दना, पूजा एवं स्तुति की है। ब्राह्मणोंकी ब्राह्मणता और तपस्वीजनोंकी तपस्या भी तुम्हीं हो, विद्वानों की विद्या, बुद्धिमानों की बुद्धि, सत्पुरुषोंकी मेधा और स्मृति तथा प्रतिभाशाली पुरुषोंकी प्रतिभा भी तुम्हारा ही स्वरूप है। राजाओंका प्रताप और वैश्योंका वाणिज्य भी तुम्हीं हो। विश्वपूजिते! सृष्टिकालमें सृष्टिरूपिणी, पालनकालमें रक्षारूपिणी तथा संहारकालमें विश्वका विनाश करनेवाली महामारीरूपिणी भी तुम्हीं हो। तुम्हीं कालरात्रि, महारात्रि तथा मोहिनी, मोहरात्रि हो; तुम मेरी दुर्लङ्घय माया हो, जिसने सम्पूर्ण जगत्को मोहित कर रखा है तथा जिससे मुग्ध हुआ विद्वान् पुरुष भी मोक्षमार्गको नहीं देख पाता।
इस प्रकार परमात्मा श्रीकृष्णद्वारा किये गये दुर्गाके दुर्गम संकटनाशनस्तोत्रका जो पूजाकालमें पाठ करता है, उसे मनोवाञ्छित सिद्धि प्राप्त होती है।
जो नारी वन्ध्या, काकवन्ध्या, मृतवत्सा तथा दुर्भगा है, वह भी एक वर्षतक इस स्तोत्रका श्रवण करके निश्चय ही उत्तम पुत्र प्राप्त कर लेती है। जो पुरुष अत्यन्त घोर कारागारके भीतर दृढ़ बन्धनमें बँधा हुआ है, वह एक ही मासतक इस स्तोत्रको सुन ले तो अवश्य ही बन्धनसे मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य राजयक्ष्मा, गलि कोढ़, महाभयंकर शूल और महान् ज्वरसे ग्रस्त है, वह एक वर्षतक इस स्तोत्रका श्रवण कर ले तो शीघ्र ही रोगसे छुटकारा पा जाता है। पुत्र, प्रजा और पत्नीके साथ भेद (कलह आदि) होनेपर यदि एक मासतक इस स्तोत्रको सुने तो इस संकटसे मुक्ति प्राप्त होती है, इसमें संशय नहीं है। राजद्वार, श्मशान, विशाल वन तथा रणक्षेत्रमें और हिंसक जन्तुके समीप भी इस स्तोत्रके पाठ और श्रवणसे मनुष्य संकटसे मुक्त हो जाता है। यदि घरमें आग लगी हो, मनुष्य दावानलसे घिर गया हो अथवा डाकुओंकी सेनामें फँस गया हो तो इस स्तोत्रके श्रवणमात्रसे वह उस संकटसे पार हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं है। जो महादरिद्र और मूर्ख है, वह भी एक वर्षतक इस स्तोत्रको पढ़े तो निस्संदेह विद्वान् और धनवान् हो जाता है।
नारदजीने कहा-
समस्त धर्मोके ज्ञाता तथा सम्पूर्ण ज्ञानमें विशारद भगवन् ! ब्रह्माण्ड मोहन नामक प्रकृतिकवचका वर्णन कीजिये।
भगवान् नारायण बोले-
वत्स! सुनो। मैं उस परम दुर्लभ कवचका वर्णन करता हूँ। पूर्वकालमें साक्षात् श्रीकृष्णने ही ब्रह्माजीको इस कवचका उपदेश दिया था। फिर ब्रह्माजीने गङ्गाजीके तटपर धर्मके प्रति इस सम्पूर्ण कवचका वर्णन किया था। फिर धर्मने पुष्करतीर्थमें मुझे कृपापूर्वक इसका उपदेश दिया, यह वही कवच है, जिसे पूर्वकालमें धारण करके त्रिपुरारि शिवने त्रिपुरासुरका वध किया था और ब्रह्माजीने जिसे धारण करके मधु और कैटभसे प्राप्त होनेवाले भयको त्याग दिया था। जिसे धारण करके भद्रकालीने रक्तबीजका संहार किया, देवराज इन्द्रने खोयी हुई राज्य लक्ष्मी प्राप्त की, महाकाल चिरजीवी और धार्मिक हुए, नन्दी महाज्ञानी होकर सानन्द जीवन बिताने लगा, परशुरामजी शत्रुओंको भय देनेवाले महान् योद्धा बन गये तथा जिसे धारण करके ज्ञानिशिरोमणि दुर्वासा भगवान् शिवके तुल्य हो गये। 'ॐ दुर्गायै स्वाहा' यह मन्त्र मेरे मस्तककी रक्षा करे। इस मन्त्रमें छः अक्षर हैं। यह भक्तों के लिये कल्पवृक्षके समान है। मुने! इस मन्त्रको ग्रहण करनेके विषयमें वेदोंमें किसी बातका विचार नहीं किया गया है। मन्त्रको ग्रहण करनेमात्रसे मनुष्य विष्णुके समान हो जाता है। 'ॐ दुर्गायै नमः' यह मन्त्र सदा मेरे मुखकी रक्षा करे। 'ॐ दुर्गे रक्ष' यह मन्त्र सदा मेरे कण्ठकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं' यह मन्त्र निरन्तर मेरे कंधेका संरक्षण करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं' यह मन्त्र सदा सब ओरसे मेरे पृष्ठभागका पालन करे। 'ह्रीं' मेरे वक्षःस्थलकी और 'श्रीं' सदा मेरे हाथकी रक्षा करे। 'ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं' यह मन्त्र सोते और जागते समय सदा मेरे सर्वाङ्गका संरक्षण करे। पूर्वदिशामें प्रकृति मेरी रक्षा करे। अग्निकोणमें चण्डिका रक्षा करे। दक्षिणदिशामें भद्रकाली, नैर्ऋत्यकोणमें महेश्वरी, पश्चिमदिशामें वाराही और वायव्यकोणमें सर्वमङ्गला मेरा संरक्षण करे। उत्तरदिशामें वैष्णवी, ईशानकोणमें शिवप्रिया तथा जल, थल और आकाशमें जगदम्बिका मेरा पालन करे। वत्स! यह परम दुर्लभ कवच मैंने तुमसे कहा है। इसका उपदेश हर एकको नहीं देना चाहिये और न किसीके सामने इसका प्रवचन ही करना चाहिये। जो वस्त्र, आभूषण और चन्दनसे गुरुकी विधिवत् पूजा करके इस कवचको धारण करता है, वह विष्णु ही है, इसमें संशय नहीं है। मुने! सम्पूर्ण तीर्थोकी यात्रा और पृथ्वीकी परिक्रमा करनेपर मनुष्यको जो फल मिलता है, वही इस कवचको धारण करनेसे मिल जाता है। पाँच लाख जप करनेसे निश्चय ही यह कवच सिद्ध हो जाता है। जिसने कवचको सिद्ध कर लिया है, उस मनुष्यको रणसंकटमेंं अस्त्र नहीं बेधता है। अवश्य ही वह जल या अग्निमें प्रवेश कर सकता है। वहाँ उसकी मृत्यु नहीं होती है। वह सम्पूर्ण सिद्धोंका ईश्वर एवं जीवन्मुक्त हो जाता है। जिसको यह कवच सिद्ध हो गया है, वह निश्चय ही भगवान् विष्णुके समान हो जाता है।
मुने! इस प्रकार प्रकृतिखण्डका वर्णन किया गया, जो अमृतकी खाँड़से भी अधिक मधुर है। जिन्हें मूलप्रकृति कहते हैं तथा जिनके पुत्र गणेश हैं, उन देवी पार्वतीने श्रीकृष्णका व्रत करके ही गणपति जैसा पुत्र प्राप्त किया था। - साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण अपने अंशसे गणेश हुए थे। यह प्रकृतिखण्ड सुननेमें सुखद और सुधाके समान मधुर है। इसे सुनकर वक्ताको दही, अन्न भोजन करावे और उसे सुवर्ण दान दे। बछड़ेसहित सुन्दर गौका भक्तिपूर्वक दान करे। मुने! वाचकको वस्त्र, आभूषण तथा रत्न देकर संतुष्ट करे। पुष्प, आभूषण, वस्त्र तथा नाना प्रकारके उपहार ले भक्ति और श्रद्धा के साथ पुस्तककी पूजा करे। जो ऐसा करके कथा सुनता है, उसपर भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं। उ पुत्र-पौत्र आदिकी वृद्धि होती है। वह भगवान्की कृपासे यशस्वी होता है। उसके घरमें लक्ष्मी निवास करती हैं और अन्तमें वह गोलोकको प्राप्त होता है। उसे श्रीकृष्णका दास्यभाव सुलभ होता है तथा भगवान् श्रीकृष्णमें उसकी अविचल भक्ति हो जाती है। (अध्याय ६६-६७)
॥ प्रकृतिखण्ड सम्पूर्ण ॥