पार्वतीने पूछा-
प्रभो! अन्य कृतघ्नोंको जिस-जिस फलकी प्राप्ति होती है, उसके विषय में उन वेद वेदाङ्गके पारंगत विद्वानोंने क्या कहा ? श्रीमहेश्वर बोले- प्रिये ! राजेन्द्र सुयज्ञके प्रश्न करनेपर उन सब मुनियोंमें महान् ऋषि नारायणने प्रवचन देना आरम्भ किया।
नारायणने कहा-
भूपाल! जो अपनी या दूसरोंकी दी हुई ब्राह्मणवृत्तिका अपहरण करता है, उसे कृतन समझना चाहिये। उसे जो फल मिलता है, उसको सुनो। जिनकी जीविका छिन जाती है, उन ब्राह्मणोंके आँसुओंसे धरतीके जितने धूलिकण भीगते हैं, उतने सहस्र वर्षोंतक वह 'शूलप्रोत' नामक नरकमें रहता है। दहकते हुए अंगार उसे खानेको मिलते हैं और औटाया हुआ मूत्र पीनेको तपे हुए अंगारोंकी शय्यापर उसे सोना पड़ता है। उठनेकी चेष्टा करनेपर यमराजके दूत उन्हें पीटते हैं। उस नरकयातनाके अन्त वह महापापी जीव भारतवर्षमें विष्ठाका कीड़ा होता है। उस योनिमें उसे देवताके वर्षसे साठ हजार वर्षोंतक रहना पड़ता है। तत्पश्चात् वह मानव भूमिहीन, संतानहीन, दरिद्र, कृपण, रोगी और निन्दनीय शूद्र होता है। उसके बाद उसकी शुद्धि होती है।
नारद बोले-
जो नराधम अपनी अथवा परायी कीर्तिका हनन करता है, वह कृतघ्न कहा गया है। उसको मिलनेवाले फलका वर्णन सुनो। नरेश्वर! वह अत्यन्त दीर्घकालतक अन्धकूप नामक नरकमें निवास करता है। उसमें सरौते जैसे कीड़े उसे सदा काटते और खाते रहते हैं। वह पापी वहाँ तपाया हुआ खारा पानी पीता और खाता है। तदनन्तर सात जन्मोंतक सर्प और पाँच जन्मोंतक कौआ होनेके बाद वह शूद्र होता है।
देवलने कहा-
जो भारतवर्षमें ब्राह्मण, गुरु अथवा देवताके धनका अपहरण करता है, उसे महान् पापी एवं कृतन समझना चाहिये। वह बहुत लंबे समयतक 'अवटोद' नामक नरकमें निवास करता है। तदनन्तर शराबी और शूद्र होता है। इसके बाद उसकी शुद्धि होती है।
जैगीषव्य बोले-
जो पिता, माता तथा गुरुके प्रति भक्तिसे हीन होकर उनका पालन नहीं करता, उलटे वाणीद्वारा उनकी ताड़ना करता है, उसे 'कृतघ्न' कहा गया है। जो कुलटा नारी प्रतिदिन वाणीद्वारा अपने स्वामीको ताने मारती या फटकारती है, वह 'कृतघ्नी' कही गयी है। भारतवर्ष में वह बहुत बड़ी पापिनी है। कृतघ्न पुरुष हो या स्त्री, दोनों 'वह्निकुण्ड' नामक महाघोर नरकमें पड़ते हैं। वहाँ बहुत लंबे समयतक वे अग्निमें ही वास करते हैं। तत्पश्चात् सात जन्मोंतक जलौका (जोंक) होकर वह शुद्ध होता है।
वाल्मीकिने कहा-
राजन् ! जैसे सभी तरुओंमें सर्वत्र वृक्षत्व है, कहीं भी वृक्षत्वका त्याग नहीं है, उसी तरह सम्पूर्ण पापोंमें कृतघ्नता है। जो काम, क्रोध तथा भयके कारण झूठी गवाही देता है तथा सभामें पक्षपातपूर्वक बात करता है, वह कृतघ्न माना गया है। राजन् ! जो पुण्यमात्रका हनन करता है, वह भी कृतघ्न ही है। सर्वत्र सबके पुण्यकी हानिमें कृतघ्नता निहित है। नरेश्वर! जो भारतवर्षमें झूठी गवाही देता या पक्षपातपूर्ण बात करता है, वह निश्चय ही बहुत लंबे समयतक सर्पकुण्डमें निवास करता है। सदा उसके शरीरमें साँप लिपटे रहते हैं; वह डरा रहता है और साँप उसे खाये जाते हैं। यमदूतोंकी मार पड़नेपर वह साँपोंका मल-मूत्र खानेको विवश होता है। तदनन्तर भारतमें सात-सात जन्मोंतक वह अपनी सात पीढ़ीके पूर्वजोंसहित गिरगिट और मेढक होता है। इसके बाद विशाल वनमें सेमलका वृक्ष होता है। तत्पश्चात् गूँगा मनुष्य एवं शूद्र होकर वह शुद्धि-लाभ करता है।
आस्तीक बोले –
गुरुपत्नीगमन करनेपर मानव - मातृगामी समझा जाता है। मातृगमन करनेपर मनुष्योंके लिये प्रायश्चित्त नहीं मिलता। नृपश्रेष्ठ ! भारतवर्ष में मातृगामी पुरुषोंको जो दोष प्राप्त होता है, वह शूद्रोंको ब्राह्मणीके साथ समागम करनेपर लगता है। यदि ब्राह्मणी शूद्रके साथ मैथुन करे तो उसे भी उतना ही दोष प्राप्त होता है। कन्या, पुत्रवधू, सास, गर्भवती भौजाई और भगिनीके साथ समागम करनेपर भी वैसा ही दोष लगता है। राजेन्द्र ! अब ब्रह्माजीके बताये अनुसार दोषका निरूपण करूँगा जो महापापी मानव इन सबके साथ मैथुन करता है वह जीते-जी ही मृतक तुल्य होता है, चाण्डाल एवं अस्पृश्य समझा जाता है। उसे सूर्यमण्डलके दर्शनका भी अधिकार नहीं होता। वह शालग्रामका, उनके चरणामृतका, तुलसीदलमिश्रित जलका, सम्पूर्ण तीर्थजलका तथा ब्राह्मणोंके चरणोदकका स्पर्श भी नहीं कर सकता। वह पातकी मनुष्य विष्ठाके तुल्य घृणित होता है। उसे देवता, गुरु और ब्राह्मणको नमस्कार करनेका भी अधिकार नहीं रह जाता है। उसका जल मूत्रसे भी अधिक अपवित्र होता है। भारतमें पृथ्वी उसके भारसे दब जाती है। वह उसके बोझको ढोनेमें असमर्थ हो जाती है। बेटी बेचनेवाले पापीकी भाँति गुरुपत्नीगामीके पापसे भी सारा देश पतित हो जाता है। उसके स्पर्शसे, उसके साथ वार्तालाप करनेसे, सोनेसे, एक स्थानमें रहने और साथ-साथ भोजन करनेसे मनुष्योंको पाप लगता है। वह कुम्भीपाकमें निवास करता है। वहाँ उसे दिन-रात अविरामगतिसे चक्रकी भाँति घूमना पड़ता है। वह आगकी लपटोंसे जलता और यमदूतोंद्वारा पीटा जाता है। इस प्रकार वह महापापी प्रतिदिन नरक यातना भोगता है। घोर प्राकृतिक महाप्रलय बीतनेपर जब पुनः सृष्टिका आरम्भ होता है तो वह फिर वैसा ही हो जाता है। नरक यातनाके पश्चात् हजारों वर्षोंतक उसे विष्ठाका कीड़ा होना पड़ता है। तदनन्तर वह पत्नीहीन नपुंसक चाण्डाल होता है। तत्पश्चात् उसे सात जन्मोंतक गलित कोढ़से युक्त शूद्र एवं नपुंसक होना पड़ता है। इसके बाद वह कोढ़ी, अन्धा एवं नपुंसक ब्राह्मण होता है। इस प्रकार सात जन्म धारण करनेके पश्चात् उस महापापीकी शुद्धि होती है।
मुनि बोले-
इस प्रकार हमने शास्त्रके अनुसार सब बातें बतायीं। राजन् ! तुम इन विप्रवरको प्रणाम करो और निश्चय ही इन्हें अपने घरको लौटा ले चलो। वहाँ यत्नपूर्वक ब्राह्मण देवताका पूजन करके इनका आशीर्वाद लो। महाराज! इसके बाद शीघ्र ही वनको जाओ और तपस्या करो। ब्राह्मणके शापसे छुटकारा मिलने- पर फिर यहाँ आओगे।
पार्वति! ऐसा कहकर सब मुनि, देवता, राजा तथा बन्धुवर्गके लोग तुरंत अपने-अपने स्थानको चले गये। (अध्याय ५२)