भगवान् नारायण कहते हैं-
नारद ! वे भगवती सरस्वती स्वयं वैकुण्ठमें भगवान् श्रीहरिके पास रहती हैं। पारस्परिक कलहके कारण गङ्गाने इन्हें शाप दे दिया था। अतः ये भारतवर्षमें अपनी एक कलासे पधारकर नदीरूपमें प्रकट हुईं। मुने! सरस्वती नदी पुण्य प्रदान करनेवाली, पुण्यरूपा और पुण्यतीर्थ-स्वरूपिणी हैं। पुण्यात्मा पुरुषोंको चाहिये कि वे इनका सेवन करें। इनके तटपर पुण्यवानोंकी ही स्थिति है। ये तपस्वियोंके लिये तपोरूपा हैं और तपस्याका फल भी इनसे कोई अलग वस्तु नहीं है। किये हुए सब पाप लकड़ीके समान हैं। उन्हें जलानेके लिये ये प्रज्वलित अग्निस्वरूपा हैं। भूमण्डलपर रहनेवाले जो मानव इनकी महिमा जानते हुए इनके तटपर अपना शरीर त्यागते हैं, उन्हें वैकुण्ठमें स्थान प्राप्त होता है। भगवान् विष्णुके भवनपर वे बहुत दिनोंतक वास करते हैं।
तदनन्तर सरस्वती नदीमें स्नानकी और भी महिमा कहकर नारायणने कहा कि इस प्रकार सरस्वतीकी महिमाका कुछ वर्णन किया गया है। अब पुनः क्या सुनना चाहते हो।
सौति कहते हैं-
शौनक ! भगवान् नारायणकी बात सुनकर मुनिवर नारदने पुनः तत्काल ही उनसे यह पूछा।
नारदजीने कहा-
सत्त्वस्वरूपा तथा सदा पुण्यदायिनी गङ्गाने सर्वपूज्या सरस्वतीदेवीको शाप क्यों दे दिया ? इन दोनों तेजस्विनी देवियोंके विवादका कारण अवश्य ही कानोंको सुख देनेवाला होगा। आप इसे बतानेकी कृपा कीजिये ।
भगवान् नारायण बोले-
नारद! यह प्राचीन कथा मैं तुमसे कहता हूँ, सुनो। लक्ष्मी, सरस्वती और गङ्गा– ये तीनों ही भगवान् श्रीहरिकी भार्या हैं। एक बार सरस्वतीको यह संदेह हो गया कि श्रीहरि मेरी अपेक्षा गङ्गासे अधिक प्रेम करते हैं। तब उन्होंने श्रीहरिको कुछ कड़े शब्द कह दिये। फिर वे गङ्गापर क्रोध करके कठोर बर्ताव करने लगीं। तब शान्तस्वरूपा, क्षमामयी लक्ष्मीने उनको रोक दिया। इसपर सरस्वतीने लक्ष्मीको गङ्गाका पक्ष करनेवाली मानकर आवेशमें शप दे दिया कि 'तुम निश्चय ही वृक्षरूपा और नदीरूपा हो जाओगी।
लक्ष्मीने सरस्वतीके इस शापको सुन लिया; परंतु स्वयं बदलेमें सरस्वतीको शाप देना तो दूर रहा, उनके मनमें तनिक-सा क्रोध भी उत्पन्न नहीं हुआ। वे वहीं शान्त बैठी रहीं और सरस्वतीके हाथको अपने हाथसे पकड़ लिया। पर गङ्गासे यह नहीं देखा गया। उन्होंने सरस्वतीको शाप दे दिया। कहा- 'बहन लक्ष्मी! जो तुम्हें शाप दे चुकी है, वह सरस्वती भी नदीरूपा हो जाय। यह नीचे मर्त्यलोकमें चली जाय, जहाँ सब पापीजन निवास करते हैं।'
नारद! गङ्गाकी यह बात सुनकर सरस्वतीने उन्हें शाप दे दिया कि तुम्हें भी धरातलपर जाना होगा और तुम पापियोंके पापको अङ्गीकार करोगी। इतनेमें भगवान् श्रीहरि वहाँ आ गये। उस समय चार भुजावाले वे प्रभु अपने चार पार्षदोंसे सुशोभित थे। उन्होंने सरस्वतीका हाथ पकड़कर उन्हें अपने समीप प्रेमसे बैठा लिया। तत्पश्चात् वे सर्वज्ञानी श्रीहरि प्राचीन अखिल ज्ञानका रहस्य समझाने लगे। उन दुःखित देवियोंके कलह और शापका मुख्य कारण सुनकर परम प्रभुने समयानुकूल बातें बतायीं ।
भगवान् श्रीहरि बोले-
लक्ष्मी ! शुभे! तुम अपनी कलासे राजा धर्मध्वजके घर पधारो। तुम किसीकी योनिसे उत्पन्न न होकर स्वयं भूमण्डलपर प्रकट हो जाना। वहीं तुम वृक्षरूपसे निवास करोगी। 'शङ्खचूड' नामक एक असुर मेरे अंशसे
उत्पन्न होगा। तुम उसकी पत्नी बन जाना। तत्पश्चात् निश्चय ही तुम्हें मेरी प्रेयसी भार्या बननेका सौभाग्य प्राप्त होगा। भारतवर्षमें त्रिलोकपावनी 'तुलसी' के नामसे तुम्हारी प्रसिद्धि होगी। वरानने !अभी-अभी तो तुम भारतीके शाप से भारतमें 'पद्मावती' नामक नदी बनकर पधारो। तदनन्तर गङ्गासे कहा – 'गङ्गे! तुम सरस्वतीके - शापवश अपने अंशसे पापियोंका पाप भस्म करनेके लिये विश्वपावनी नदी बनकर भारतवर्षमें जाना सुकल्पिते ! भगीरथकी तपस्यासे तुम्हें वहाँ जाना पड़ेगा। धरातलपर तुमको सब लोग भगवती भागीरथी कहेंगे। समुद्र मेरा अंश है। मेरे आज्ञानुसार तुम उसकी पत्नी होना स्वीकार कर लेना।' इसके बाद सरस्वतीसे कहा- 'भारती ! तुम गङ्गाका शाप स्वीकार करके अपनी एक कलासे भारतवर्षमें चलो। तुम अपने पूर्ण अंश से ब्रह्मसदनपर पधारकर उनकी कामिनी बन जाओ; ये गङ्गा अपने पूर्ण अंशसे शिवके स्थान पर चलें।' यहाँ अपने पूर्ण अंशसे केवल लक्ष्मी रह जायँ। कारण, इनका स्वभाव परम शान्त है। ये कभी तनिक-सा क्रोध नहीं करतीं। मुझपर इनकी अटूट श्रद्धा है। ये सत्त्वस्वरूपा हैं। ये महान् साध्वी, अत्यन्त सौभाग्यवती, क्षमामूर्ति, सुन्दर आचरणोंसे सुशोभित तथा निरन्तर धर्मका पालन करती हैं।
इनके एक अंशकी कलाका महत्त्व है कि विश्वभरमें सम्पूर्ण स्त्रियाँ धर्मात्मा, पतिव्रता, शान्तरूपा तथा सुशीला बनकर प्रतिष्ठा प्राप्त करती हैं।
अब भगवान् श्रीहरि स्वयं अपना विचार कहने लगे- अहो ! विभिन्न स्वभाववाली तीन स्त्रियों, तीन नौकरों और तीन बान्धवोंका एकत्र रहना वेदकी अनुमतिसे विरुद्ध है। ये एक जगह रहकर कल्याणप्रद नहीं हो सकते। जिन गृहस्थोंके घर स्त्री पुरुषके समान व्यवहार करे और पुरुष स्त्रीके अधीन रहे, उसका जीवन निष्फल समझा जाता है। उसके प्रत्येक पगपर अशुभ है। जिसकी स्त्री मुखदुष्टा, योनिदुष्टा और कलहप्रिया हो, उसके लिये तो जंगल ही घरसे बढ़कर सुखदायी है। कारण, वहाँ उसे जल, स्थल और फल तो मिल ही जाते हैं। ये फल-जल आदि जंगलमें निरन्तर सुलभ रहते हैं, घरपर नहीं मिल सकते। अनिके पास रहना ठीक है; अथवा हिंसक जन्तुओंके निकट रहनेपर भी सुख मिल सकता है; किंतु दुष्टा स्त्रीके निकट रहनेवाले पुरुषको अवश्य ही महान् क्लेश भोगना पड़ता है। वरानने ! पुरुषोंके लिये व्याधिज्वाला अथवा विषज्वालाको ठीक बताया जा सकता है; किंतु दुष्टा स्त्रियोंके मुखकी ज्वाला मृत्युसे भी अधिक कष्टप्रद होती है। स्त्रीके वशमें रहनेवाले पुरुषोंकी शुद्धि शरीरके भस्म हो जानेपर भी हो जाय यह निश्चित नहीं है। स्त्रीके वशमें रहनेवाला व्यक्ति दिनमें जो कुछ कर्म करता है, उसके फलका वह भागी नहीं हो पाता। इस लोक और परलोकमें-सब जगह उसकी निन्दा होती है। जो यश और कीर्तिसे रहित है, उसे जीते हुए भी मुर्दा समझना चाहिये। एक भार्यावालेको ही चैन नहीं; फिर जिसके अनेक स्त्रियाँ हों, उसके लिये तो सुखकी कल्पना ही असम्भव है। अतएव गङ्गे! तुम शिवके पास जाओ और सरस्वती ! तुम्हें ब्रह्माके स्थानपर चले जाना चाहिये। यहाँ मेरे भवनपर केवल सुशीला लक्ष्मीजी रह जायँ; क्योंकि परम साध्वी, उत्तम आचरण करनेवाली एवं पतिव्रता स्त्रीका स्वामी इस लोकमें स्वर्गका सुख भोगता है और परलोकमें उसके लिये कैवल्यपद सुरक्षित है। जिसकी पत्नी पतिव्रता है, वह परम पवित्र, सुखी और मुक्त समझा जाता है।
भगवान् नारायण कहते हैं-
नारद ! इस प्रकार कहकर भगवान् श्रीहरि चुप हो गये। तब गङ्गा और लक्ष्मी तथा सरस्वती- तीनों देवियाँ परस्पर एक-दूसरेका आलिङ्गन करके रोने लगीं। शोक और भयने उनके शरीरको कँपा दिया था। उनकी आँखोंसे आँसू बह रहे थे। उन सबको एकमात्र भगवान् ही शरण्य दृष्टिगोचर हुए। अतः वे क्रमश: उनसे प्रार्थना करने लगीं।
सरस्वतीने कहा-
नाथ! मुझ दुष्टाको पाप, ताप और शापसे बचानेके लिये कोई प्रायश्चित्त बता दीजिये; जिससे मेरा जन्म और जीवन शुद्ध हो जाय। भला, आप जैसे महान् सच्चरित्र स्वामीके परित्याग कर देनेपर कहाँ कौन स्त्रियाँ जीवित रह सकती हैं? प्रभो! मैं भारतवर्ष में योगसाधन करके इस शरीरका त्याग कर दूँगी यह निश्चित है।
गङ्गा बोली-
जगत्प्रभो! आप किस अपराध मुझे त्याग रहे हैं? मैं जीवित नहीं रह सकूँगी।
लक्ष्मीने कहा-
नाथ! आप सत्त्व-स्वरूप हैं। बड़े आश्चर्यकी बात है, आपको कैसे क्षोभ हो गया। आप अपनी इन पत्नियोंपर कृपा कीजिये। कारण, श्रेष्ठ स्वामीके लिये क्षमा ही उत्तम है। मैं सरस्वतीका शाप स्वीकार करके अपनी एक कलासे भारतवर्षमें जाऊँगी। परंतु प्रभो ! मुझे कितने समयतक वहाँ रहना होगा और मैं पुनः कब आपके चरणोंके दर्शन प्राप्त कर सकूँगी। पापीजन मेरे जलमें स्नान और आचमन करके अपना पाप मुझपर लाद देंगे, तब उस पापसे मुक्त होकर आपके चरणोंमें आनेका अधिकार मुझे कैसे प्राप्त हो सकेगा ? अच्युत ! मैं अपनी एक कलासे धर्मध्वजकी पुत्री होकर जब 'तुलसी' (वृन्दा) रूपमें स्थित हो जाऊँगी, तब - मुझे पुनः कब आपके चरणकमल प्राप्त होंगे ? कृपानिधे! यह तो बताइये कि जब मैं वृक्षरूपमें उसकी अधिदेवी बनकर रहने लगूंगी, तब कबतक आप मेरा उद्धार करेंगे?यदि ये गङ्गा सरस्वतीके शापसे भारतवर्षमें चली जायँगी, तब फिर किस समय शाप और पापसे छुटकारा पाकर आपको प्राप्त कर सकेंगी? गङ्गाके शापसे ये सरस्वती भी यदि भारतमें जायँगी तो कब शापसे मुक्त होकर पुनः आपके चरणकमलोंको पा सकेंगी ? प्रभो! आप जो इन सरस्वतीसे कह रहे हैं कि तुम ब्रह्माके घर सिधारो अथवा गङ्गाको शिवके भवनपर जानेकी आज्ञा दे रहे हैं आपके इन वचनोंके लिये मैं आपसे क्षमा चाहती हूँ। आप कृपा करके इन्हें ऐसा दण्ड न दें।
नारद! इस प्रकार कहकर भगवती लक्ष्मीने अपने स्वामी श्रीहरिके चरण पकड़ लिये, उन्हें प्रणाम किया और अपने केशसे भगवान् के चरणोंको आवेष्टित करके वे बारंबार रोने लगीं। भगवान् श्रीहरि सदा भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले हैं। प्रार्थना सुनकर उन्होंने देवी कमलाको हृदय चिपका लिया और प्रसन्नमुखसे मुस्कराते हुए कहा।
भगवान् विष्णु बोले-
सुरेश्वरि ! कमलेक्षणे ! मैं तुम्हारी बात भी रखूँगा और अपने वचनकी भी रक्षा करूँगा। साथ ही तुम तीनोंमें समता कर दूँगा, अतः सुनो। ये सरस्वती कलाके एक अंशसे नदी बनकर भारतवर्ष में जायँ, आधे अंश से ब्रह्माके भवनपर पधारें तथा पूर्ण अंशसे स्वयं मेरे पास रहें। ऐसे ही ये गङ्गा भगीरथके सत्प्रयत्नसे अपने कलांशसे त्रिलोकीको पवित्र करनेके लिये भारतवर्षमें जायँ और स्वयं पूर्ण अंशसे मेरे पास भवनपर रहें। वहाँ इन्हें शंकरके मस्तकपर रहनेका दुर्लभ अवसर भी प्राप्त होगा। ये स्वभावतः पवित्र तो हैं ही, किंतु वहाँ जानेपर इनकी पवित्रता और भी बढ़ जायगी वामलोचने! तुम अपनी कलाके अंशांशसे भारतवर्षमें चलो। वहाँ तुम्हें 'पद्मावती' नदी और 'तुलसी' वृक्ष के रूपसे विराजना होगा। कलिके पाँच हजार वर्ष व्यतीत हो जानेपर तुम नदीरूपिणी देवियोंका उद्धार हो जायगा। तदनन्तर तुमलोग मेरे भवनपर लौट आओगी पद्मभवे! सम्पूर्ण प्राणियोंके पास जो सम्पत्ति और विपत्ति आती है- इसमें कोई-न-कोई हेतु छिपा रहता है। बिना विपत्ति सहे किन्हींको भी गौरव प्राप्त नहीं हो सकता। अब तुम्हारे शुद्ध होनेका उपाय बताता हूँ। मेरे मन्त्रोंकी उपासना करनेवाले बहुत से संत पुरुष भी तुम्हारे जलमें नहाने-धोनेके लिये पधारेंगे। उस समय तुम उनके दर्शन और स्पर्श प्राप्त करके सब पापोंसे छुटकारा पा जाओगी। सुन्दरि! इतना ही नहीं; किंतु भूमण्डलपर जितने असंख्य तीर्थ हैं, वे सभी मेरे भक्तोंके दर्शन और स्पर्श पाकर परम पावन बन जायँगे। भारतवर्षकी भूमि अत्यन्त पवित्र है। मेरे मन्त्रोंके उपासक अनगिनत भक्त वहाँ वास करते हैं। प्राणियोंको पवित्र करना और तारना ही उनका प्रधान उद्देश्य है। मेरे भक्त जहाँ रहते और अपने पैर धोते हैं, वह स्थान महान् तीर्थ एवं परम पवित्र बन जाता है— यह बिलकुल निश्चित है (मद्भक्ता यत्र तिष्ठन्ति पादं प्रक्षालयन्ति च। तत्स्थानं च महातीर्थं सुपवित्रं भवेद् ध्रुवम् ॥ (प्रकृतिखण्ड ६ । ९४))। घोर पापी भी मेरे भक्तके दर्शन और स्पर्शके प्रभावसे पवित्र होकर जीवन्मुक्त हो सकता है। नास्तिक व्यक्ति भी मेरे भक्तके दर्शन और स्पर्शसे पवित्र हो सकता है। जो कमरमें तलवार बाँधकर द्वारपालकी हैसियतसे जीविका चलाते हैं, मुनीमीमात्र जिनकी जीविकाका साधन है, जो इधर-उधर चिट्ठी-पत्री पहुँचाकर अपना भरण-पोषण करते हैं तथा गाँव-गाँव घूमकर भीख माँगना ही जिनका व्यवसाय है एवं जो बैलोंको जोतते हैं, ऐसे ब्राह्मणको अधम कहा जाता है; किंतु मेरे भक्त के दर्शन और स्पर्श उन्हें पवित्र कर देते हैं। विश्वासघाती, मित्रघाती, झूठी गवाही देनेवाले तथा धरोहर हड़पनेवाले नीच व्यक्ति भी मेरे भक्तोंके दर्शन और स्पर्शसे शुद्ध हो सकते हैं। मेरे भक्तके दर्शन एवं स्पर्शमें ऐसी अद्भुत शक्ति है कि उसके प्रभावसे महापातकी व्यक्तितक पवित्र हो सकता है। सुन्दरि! पिता, माता, स्त्री, छोटा भाई, पुत्र, पुत्री, बहन, गुरुकुल, नेत्रहीन बान्धव, सासु और श्वशुर- जो पुरुष इनके भरण-पोषणको व्यवस्था नहीं करता, उसे महान् पातकी कह हैं; किंतु मेरे भक्तोंके दर्शन और स्पर्श करनेसे वह भी शुद्ध हो जाता है। पीपलके वृक्षको काटनेवाले, मेरे भक्तोंके निन्दक तथा नीच ब्राह्मणको भी मेरे भक्तका दर्शन और स्पर्श पवित्र बना देता है। घोर पातकी मनुष्य भी मेरे भक्तोंके दर्शन और स्पर्शसे पवित्र हो सकते हैं।
श्रीमहालक्ष्मीने कहा -
भक्तोंपर कृपा करनेके लिये आतुर रहनेवाले प्रभो! अब आप उन अपने भक्तोंके लक्षण बतलाइये, जिनके दर्शन और स्पर्शसे हरिभक्तिहीन, अत्यन्त अहंकारी, अपने मुँह अपनी बड़ाई करनेवाले, धूर्त, शठ एवं साधुनिन्दक अत्यन्त अधम मानवतक तुरंत पवित्र हो जाते हैं तथा जिनके नहाने धोनेसे सम्पूर्ण तीर्थोंमें पवित्रता आ जाती है; जिनके चरणोंकी धूलिसे तथा चरणोदकसे पृथ्वीका कल्मष दूर हो जाता है तथा जिनका दर्शन एवं स्पर्श करनेके लिये भारतवर्ष में लोग लालायित रहते हैं; क्योंकि विष्णुभक्त पुरुषोंका समागम सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये परम लाभदायक है। जलमय तीर्थ ही तीर्थ नहीं हैं और न मृण्मय एवं प्रस्तरमय देवता ही देवता हैं; क्योंकि वे दीर्घकालतक सेवा करनेपर ही पवित्र करते हैं। अहो! साक्षात् देवता तो विष्णु भक्तोंको मानना चाहिये, जो क्षणभरमें पवित्र कर देते हैं। (न ह्यम्भयानि तीर्थानि न देवा मृच्छिलामयाः। ते पुनन्त्यपि कालेन विष्णुभक्ताः क्षणादहो ॥ (प्रकृतिखण्ड ६ । ११०) न वाञ्छन्ति सुखं मुक्तिं सालोक्यादिचतुष्टयम् ब्रह्मत्वममरत्वं वा तद्वाञ्छा मम सेवने ॥ इन्द्रत्वं च मनुत्वं च ब्रह्मत्वं च सुदुर्लभम् । स्वर्गराज्यादिभोगं च स्वप्नेऽपि च न वाञ्छति ॥ (प्रकृतिखण्ड ६ । ११९ १२०))
सूतजी कहते हैं—
शौनक ! महालक्ष्मीकी बात सुनकर उनके आराध्य स्वामी भगवान् श्रीहरिका मुखमण्डल मुस्कानसे खिल उठा। फिर वे अत्यन्त गूढ़ एवं श्रेष्ठ रहस्य कहनेके लिये प्रस्तुत हो गये।
श्रीभगवान् बोले-
लक्ष्मी ! भक्तोंके लक्षण श्रुति एवं पुराणों में छिपे हुए हैं। इन पुण्यमय लक्षणोंमें पापोंका नाश करने, सुख देने तथा भुक्ति मुक्ति प्रदान करनेकी प्रचुर शक्ति है । जिसको सद्गुरुके द्वारा विष्णुका मन्त्र प्राप्त होता है (और जो सब कुछ छोड़कर केवल मुझको ही सर्वस्व मानता है), उसीको वेद-वेदाङ्ग पुण्यात्मा एवं श्रेष्ठ मनुष्य बतलाते हैं। ऐसे व्यक्तिके जन्म लेनेमात्रसे पूर्वके सौ पुरुष, चाहे वे स्वर्गमें हों अथवा नरकमें- तुरंत मुक्तिके अधिकारी हो जाते हैं। यदि उन पूर्वजोंमेंसे किन्हींका कहीं जन्म हो गया है तो उन्होंने जिस योनिमें जन्म पाया है, वहीं उनमें जीवन्मुक्तता
आ जाती है और समयानुसार वे परमधाममें चले जाते हैं। मुझमें भक्ति रखनेवाला मानव मेरे गुणोंसे सम्पन्न होकर मुक्त हो जाता है। उसकी वृत्ति मेरे गुणका अनुसरण करनेमें ही लगी रहती है। वह सदा मेरी कथा वार्तामें लगा रहता है। मेरा गुणानुवाद सुननेमात्रसे वह आनन्दमग्न हो उठता है। उसका शरीर पुलकित हो जाता है और वाणी गद्गद हो जाती है। उसकी आँखोंमें आँसू भर आते हैं और वह अपनी सुधि बुधि खो बैठता है। मेरी पवित्र सेवामें नित्य नियुक्त रहनेके कारण सुख, चार प्रकारकी सालोक्यादि मुक्ति, ब्रह्माका पद अथवा अमरत्व कुछ भी पानेकी - अभिलाषा वह नहीं करता। मनु, इन्द्र एवं ब्रह्माकी उपाधि तथा स्वर्गके राज्यका सुख- ये सभी परम दुर्लभ हैं; किंतु मेरा भक्त स्वप्रमें भी इनकी इच्छा नहीं करता। ऐसे मेरे बहुत से भक्त भारतवर्ष में निवास करते हैं। उन भक्तोंके जैसा जन्म सबके - लिये सुलभ नहीं है। जो सदा मेरा गुणानुवाद सुनते और सुनने योग्य पद्योंको गाकर आनन्दसे विह्वल हो जाते हैं, वे बड़भागी भक्त अन्य साधारण मनुष्य, तीर्थ एवं मेरे परमधामको भी पवित्र करके धराधामपर पधारते हैं।
पद्मे ! इस प्रकार मैंने तुम्हारे प्रश्नका समाधान कर दिया। अब तुम्हें जो उचित जान पड़े, वह करो। तदनन्तर वे सभी देवियाँ, भगवान् श्रीहरिने जो कुछ आज्ञा दी थी, उसीके अनुसार कार्य करनेमें संलग्न हो गयीं। स्वयं भगवान् अपने सुखदायी आसनपर विराजमान हो गये। (अध्याय ६)