भगवान् नारायण कहते हैं-
नारद! तदनन्तर सरस्वती अपनी एक कलासे तो पुण्यक्षेत्र भारतवर्ष में पधारीं तथा पूर्ण अंशसे उन्हें भगवान् श्रीहरिके निकट रहनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ। भारत में पधारनेसे 'भारती', ब्रह्माकी प्रेमभाजन होनेसे 'ब्राह्मी' तथा वचनकी अधिष्ठात्री होनेसे वे 'वाणी' नामसे विख्यात हुईं श्रीहरि सम्पूर्ण विश्वमें व्यास रहते हुए भी सागरके जल स्रोतमें शयन करते देखे जाते हैं; अतः 'सरस्' से युक्त होनेके कारण उनका एक नाम 'सरस्वान्' है और उनकी प्रिया होनेसे इन देवीको 'सरस्वती' कहा जाता है। नदीरूपसे पधारकर ये सरस्वती परम पावन तीर्थ बन गयीं। पापीजनोंके पापरूपी ईंधनको भस्म करनेके लिये ये प्रज्वलित अग्निस्वरूपा हैं। नारद! तत्पश्चात् वाणीके शापसे गङ्गा अपनी कलासे धरातलपर आयीं। भगीरथके सत्प्रयत्नसे इनका शुभागमन हुआ। ये गङ्गा आ ही रही थीं कि शंकरने इन्हें अपने मस्तकपर धारण कर लिया। कारण, गङ्गाके वेगको केवल शंकर ही सँभाल सकते थे। अतएव उनके वेगको सहने में असमर्थ पृथ्वीकी प्रार्थनासे वे इस कार्यके लिये प्रस्तुत हो गये। फिर पद्मा अर्थात् लक्ष्मी अपनी एक कलासे भारतवर्षमें नदीरूपसे पधारीं। इनका नाम 'पद्मावती' हुआ। ये स्वयं पूर्ण अंश भगवान् श्रीहरिकी सेवामें उनके समीप ही रहीं। तदनन्तर अपनी एक दूसरी कलासे वे भारत में राजा धर्मध्वजके यहाँ पुत्रीरूपसे प्रकट हुईं। उस समय इनका नाम 'तुलसी' पड़ा। पहले सरस्वतीके शापसे और फिर श्रीहरिकी आज्ञासे इन विश्वपावनी देवीने अपनी कलाद्वारा वृक्षमयरूप धारण किया । कलिमें पाँच हजार वर्षोंतक भारतवर्षमें रहकर ये तीनों देवियाँ सरित् रूपका परित्याग करके वैकुण्ठमें चली जायँगी। काशी तथा वृन्दावन के अतिरिक्त अन्य प्रायः सभी तीर्थ भगवान् श्रीहरिकी आज्ञासे उन देवियोंके साथ वैकुण्ठ चले जायँगे। शालग्राम, श्रीहरिकी मूर्ति पुरुषोत्तम भगवान् जगन्नाथ कलिके दस हजार वर्ष व्यतीत होनेपर भारतवर्षको छोड़कर अपने धामको पधारेंगे। इनके साथ ही साधु, पुराण, शङ्ख, श्राद्ध, तर्पण तथा वेदोक्त कर्म भी भारतवर्षसे उठ जायँगे। देवपूजा, देवनाम, देवताओंके गुणोंका कीर्तन, वेद, शास्त्र, पुराण, संत, सत्य, धर्म, ग्रामदेवता, व्रत, तप और उपवास- ये सब भी उनके साथ ही इस भारतसे चले जायँगे (इनमें लोगों की श्रद्धा नहीं रह जायगी।)
प्रायः सभी लोग मद्य और मांसका सेवन करेंगे। झूठ और कपटसे किसीको घृणा न होगी। उपर्युक्त देवी एवं देवताओंके भारतवर्ष छोड़ देनेके पश्चात् शठ, क्रूर, दाम्भिक अत्यन्त अहंकारी, चोर, हिंसक- ये सब संसारमें फैल जायँगे पुरुषभेद (परस्पर मैत्रीका अभाव) होगा। अपने अथवा पुरुषका भेद, स्त्रीका भेद, विवाह, वाद निर्णय, जाति या वर्णका निर्णय, - अपने या पराये स्वामीका भेद तथा अपनी परायी वस्तुओंका भेद भी आगे चलकर नहीं रहेगा। सभी पुरुष स्त्रियोंके अधीन होकर रहेंगे। घर घरमें पुंश्चलियोंका निवास होगा। वे दुराचारिणी स्त्रियाँ सदा डॉट-फटकारकर अपने पतियोंको पीटेंगी। गृहिणी घरकी पूरी मालकिन बनी रहेगी, घरका स्वामी नौकरसे भी अधिक अधम समझा जायगा। घरमें जो बलवान् होंगे, उन्हींको कर्ता माना जायगा। भाई-बन्धु वे ही समझे जायँगे, जिनका सम्बन्ध योनि या जन्मको लेकर होगा, जैसे पुत्र, भाई आदि। (अर्थात् जरा भी दूरके सम्पर्कवालेको लोग भाई-बन्धु भी नहीं मानेंगे।) विद्याध्ययनसे सम्बन्ध रखनेवाले गुरु- भाई आदिके साथ कोई बात भी नहीं करेगा। पुरुष अपने ही परिवारके लोगोंसे अन्य अपरिचित व्यक्तियोंकी भाँति व्यवहार करेंगे। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र- चारों वर्ण अपनी जाति के आचार विचारको छोड़ देंगे। संध्या-वन्दन और - यज्ञोपवीत आदि संस्कार तो प्रायः बंद ही हो जायँगे। चारों ही वर्ण म्लेच्छके समान आचरण करेंगे। प्रायः सभी लोग अपने शास्त्रोंको छोड़कर म्लेच्छ शास्त्र पढ़ेंगे। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र- चारों वर्णोंके लोग सेवावृत्तिसे जीविका चलायेंगे। सम्पूर्ण प्राणियों में सत्यका अभाव हो जायगा जमीनपर धान्य नहीं उपजेंगे। वृक्ष फलहीन हो जायँगे। गौओंमें दूध देनेकी शक्ति नहीं रहेगी। लोग बिना मक्खनके दूधका व्यवहार करेंगे। स्त्री और पुरुषमें प्रेमका अभाव होगा। गृहस्थ असत्य भाषण करेंगे। राजाओंका तेज - अस्तित्व समाप्त हो जायगा। प्रजा भयानक 'कर' के भारोंसे अत्यन्त कष्ट पायेगी। चारों वर्णोंमें धर्म और पुण्यका नितान्त अभाव हो जायगा। लाखों में कोई एक भी पुण्यवान् न हो सकेगा। बुरी बातें और बुरे शब्दोंका ही व्यवहार होगा। जंगलों में रहनेवाले लोग भी 'कर' के भारसे कष्ट भोगेंगे। नदियों और तालाबोंपर धान्य होंगे। अर्थात् समयोचित वर्षाके अभावसे अन्यत्र खेती न होनेके कारण लोग इनके तटपर ही खेती करेंगे। कलियुगमें सम्भ्रान्त कुलके पुरुषोंकी अवनति होगी।
नारद ! कलिके मनुष्य अश्लीलभाषी, धूर्त, शठ और असत्यवादी होंगे। भलीभाँति जोते बोये हुए खेत भी धान्य देनेमें असमर्थ रहेंगे। नीच वर्णवाले धनी होनेके कारण श्रेष्ठ माने जायँगे। देवभक्तोंमें नास्तिकता आ जायगी। नगरनिवासी हिंसक, निर्दयी तथा मनुष्यघाती होंगे। कलिमें प्रायः स्त्री और पुरुष - रोगी, थोड़ी उम्रवाले और युवा अवस्थासे रहित होंगे। सोलह वर्षमें ही उनके सिरके बाल पक जायँगे। बीस वर्षमें उन्हें बुढ़ापा घेर लेगा। कलियुगमें भगवन्नाम बेचा जायगा। मिथ्या दान होगा- मनुष्य अपनी कीर्ति बढ़ानेके लिये दान देकर स्वयं पुनः उसे वापस ले लेंगे। देववृत्ति, ब्राह्मणवृत्ति अथवा गुरुकुलवृत्ति- चाहे वह अपनी दी हुई हो अथवा दूसरेकी- कलिके मानव उसे छीन लेंगे। कलियुगमें मनुष्यको अगम्यागमनमें कोई हिचक न रहेगी। कलियुगमें स्त्रियों और पतियोंका निर्णय नहीं हो सकेगा। अर्थात् सभी स्त्री-पुरुषोंमें अवैध व्यवहार होंगे। प्रजा किन्हीं ग्रामों और धनोंपर अपना पूर्ण अधिकार नहीं प्राप्त कर सकेगी। प्रायः सब लोग अप्रिय वचन बोलेंगे। सभी चोर और लम्पट होंगे। सभी एक-दूसरेकी हिंसा करनेवाले एवं नरघाती होंगे। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य- सबके वंशजोंमें पाप प्रवेश कर जायगा। सभी लोग लाख, लोहा, रस और नमकका व्यापार करेंगे। पञ्चयज्ञ करनेमें द्विजोंकी प्रवृत्ति न होगी। यज्ञोपवीत पहनना उनके लिये भार हो जायगा। वे संध्या वन्दन और शौचसे विहीन रहेंगे। पुंश्चली, सूदसे जीविका चलानेवाली तथा कुटनी स्त्री रजस्वला रहती हुई भी ब्राह्मणोंके घर भोजन बनायेगी। अन्नोंमें, स्त्रियों में और आश्रमवासी मनुष्योंमें कोई नियम नहीं रहेगा। घोर कलिमें प्रायः सभी म्लेच्छ हो जायँगे।
इस प्रकार जब सम्यक् प्रकारसे कलियुग आ जायगा, तब सारी पृथ्वी म्लेच्छोंसे भर जायगी। तब विष्णुयशा नामक ब्राह्मणके घर उनके पुत्ररूपसे भगवान् कल्कि प्रकट होंगे। सुप्रसिद्ध पराक्रमी ये कल्कि भगवान् नारायणके अंश हैं। ये एक बहुत ऊँचे घोड़ेपर चढ़कर अपनी विशाल तलवारसे म्लेच्छोंका विनाश करेंगे और तीन रातमें ही पृथ्वीको म्लेच्छशून्य कर देंगे। यों वसुधाको म्लेच्छरहित करके वे स्वयं अन्तर्धान हो जायँगे तब एक बार पृथ्वीपर अराजकता फैल जायगी। डाकू सर्वत्र लूट-पाट मचाने लगेंगे। तदनन्तर मोटी धारसे असीम जल बरसने लगेगा। लगातार छः दिन-रात वर्षा होगी। पृथ्वीपर सर्वत्र जल ही जल दिखायी पड़ेगा। - पृथ्वी प्राणी, वृक्ष, गृहसे शून्य हो जायगी। मुने! इसके बाद बारह सूर्य एक साथ उदय होंगे, जिनके प्रचण्ड तेजसे पृथ्वी सूख जायगी।
यों होनेपर दुर्धर्ष कलियुग समाप्त हो जायगा, तब तप और सत्त्वसे सम्पन्न धर्मका पूर्णरूप से प्राकट्य होगा। उस समय तपस्वियों, धर्मात्माओं और वेदज्ञ ब्राह्मणोंसे पुनः पृथ्वी शोभा पायेगी। घर घरमें स्त्रियाँ पतिव्रता और धर्मात्मा होंगी। - धर्मप्राण न्यायपरायण क्षत्रियोंके हाथमें राज्यका प्रबन्ध होगा। वे सभी ब्राह्मणोंके भक्त, मनस्वी, तपस्वी, प्रतापी, धर्मात्मा और पुण्यकर्मके प्रेमी होंगे। वैश्य व्यापारमें तत्पर रहेंगे। वे मनमें धार्मिक भावना रखते हुए ब्राह्मणोंके प्रति श्रद्धा रखेंगे। शूद्र धर्मपर आस्था रखते हुए पवित्रतापूर्वक सेवा करेंगे। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंके वंशज भगवती जगदम्बा शक्तिके परम उपासक होंगे। उनके द्वारा देवीके मन्त्रका निरन्तर जप होने लगेगा। सब लोग देवीके ध्यानमें तत्पर रहेंगे। समयानुसार व्यवहार करनेवाले पुरुषों में श्रुति, स्मृति और पुराणका पूर्ण ज्ञान प्राप्त रहेगा। इसीको सत्ययुग कहते हैं। इस युगमें धर्म पूर्णरूपसे रहता है। त्रेतामें धर्म तीन पैरसे, द्वापरमें दो पैरसे और कलिमें केवल एक पैरसे रहता है। घोर कलि आनेपर तो यह सम्पूर्ण पैरोंसे हीन हो जाता है !
विप्र ! सात दिन हैं। सोलह तिथियाँ कही गयी हैं। बारह महीने और छः ऋतुएँ होती हैं। शुक्ल और कृष्ण-दो पक्ष तथा उत्तरायण एवं दक्षिणायन- दो अयन होते हैं। चार पहरका दिन होता है और चार पहरकी रात होती है। तीस दिनोंका एक महीना होता है। संवत्सर तथा इडावत्सर आदि भेदसे पाँच प्रकारके वर्ष समझने चाहिये। यही कालकी संख्याका नियम है। जैसे दिन आते-जाते रहते हैं, ऐसे ही चारों युगोंका भी आना-जाना लगा रहता है। मनुष्योंका एक वर्ष पूरा होनेपर देवताओंका एक दिन-रात होता है। कालकी संख्या के विशेषज्ञ पुरुषोंका सिद्धान्त है कि मनुष्योंके तीन सौ साठ युग व्यतीत होनेपर देवताओंका एक युग बीतता है। इस प्रकारके इकहत्तर दिव्य युगोंको एक मन्वन्तर कहते हैं। एक इन्द्र एक मन्वन्तरपर्यन्त रहते हैं। यों अट्ठाईस इन्द्र बीत जानेपर ब्रह्माका एक दिन-रात होता है। इस मानसे एक सौ आठ वर्ष व्यतीत होनेपर ब्रह्माकी आयु पूरी हो जाती है। इसीको प्राकृत प्रलय समझना चाहिये। उस समय पृथ्वी नहीं दिखायी पड़ती। पृथ्वीसहित सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जलमें लीन हो जाते हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शिव और ऋषि आदि सभी परात्पर श्रीकृष्णमें लीन हो जाते हैं। उन्होंमें प्रकृति भी लीन हो जाती है। मुने! इसीको प्राकृत प्रलय कहते हैं। इस प्रकार प्राकृत प्रलय हो जानेपर ब्रह्माकी आयु समाप्त हो जाती है। मुनिवर ! इतने सुदीर्घ कालको परमात्मा श्रीकृष्णका एक निमेष कहते हैं। इस प्रकार श्रीकृष्णके एक निमेषमें सम्पूर्ण विश्व और अखिल ब्रह्माण्ड नष्ट हो जाते हैं। केवल गोलोक, वैकुण्ठ तथा पार्षदोंसहित श्रीकृष्ण ही शेष रहते हैं। श्रीकृष्णका निमेषमात्र ही प्रलय है, जिसमें सारा ब्रह्माण्ड जलमग्न हो जाता है। निमेषकालके अनन्तर फिर सृष्टिका क्रम चालू हो जाता है। यों सृष्टि और प्रलय होते रहते हैं। कितने कल्प गये और आये- इसकी संख्या कौन जान सकता है ? नारद! सृष्टियों, प्रलयों, ब्रह्माण्डों और ब्रह्माण्डमें रहनेवाले ब्रह्मादि प्रधान प्रबन्धकोंकी संख्याका परिज्ञान भला किस पुरुषको हो सकता है ?
परमात्मा श्रीकृष्ण ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्डोंके एकमात्र ईश्वर हैं, जो प्रकृतिसे परे हैं। उनका विग्रह सत् चित् और आनन्दमय है। ब्रह्मा प्रभृति देवता, महाविराट् और स्वल्पविराट् - सभी उन परम प्रभु परमात्माके अंश हैं। प्रकृति भी उन्हींका अंश कही गयी है। वे श्रीकृष्ण दो रूपोंमें विभक्त हो जाते हैं- एक द्विभुज और दूसरे चतुर्भुज। चतुर्भुज श्रीहरि वैकुण्ठमें विराजते हैं और स्वयं द्विभुज श्रीकृष्णका गोलोकमें निवास है। ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त समस्त चराचर जगत् (प्राकृत सर्गके अन्तर्गत) है। जो जो प्राकृतिक सृष्टि है, वह सब नश्वर ही है। इस प्रकार सृष्टिके कारणभूत परब्रह्म परमात्मा नित्य, सत्य, सनातन, स्वतन्त्र, निर्गुण, निर्लिप्त और प्रकृतिसे परे हैं; उनकी न कोई लौकिक उपाधि है और न कोई भौतिक आकार। भक्तोंपर अनुग्रह करना उनका स्वरूप है- सहज स्वभाव है। वे अत्यन्त कमनीय हैं। उनकी अङ्गकान्ति नूतन जलधरके समान है। उनके दो भुजाएँ हैं। हाथमें मुरली है। गोपों जैसा वेष और किशोर अवस्था है। वे सर्वज्ञ, सर्वसेव्य, परमात्मा एवं ईश्वर हैं। तुम उनके स्वरूपको ऐसा ही जानो।
इन्हींके दिये हुए ज्ञानसे विराट् पुरुष (विष्णु) के नाभिकमलसे उत्पन्न ज्ञानस्वरूप ब्रह्मा अखिल ब्रह्माण्डकी सृष्टि करते हैं तथा सम्पूर्ण तत्त्वों के ज्ञाता मृत्युञ्जय शिव संहारका कार्य सँभालते हैं। उन्हींके दिये ज्ञानसे तथा उन्होंके लिये किये गये तपके प्रभावसे वे उनके समान ही महान् एवं सर्वेश्वर हुए हैं। उन परमात्मा श्रीकृष्णके ज्ञानके प्रभावसे ही भगवान् विष्णु महान् विभूतिसे सम्पन्न, सर्वज्ञ, सर्वदर्शी, सर्वव्यापी, सबके रक्षक, सम्पूर्ण सम्पत्ति प्रदान करनेमें समर्थ, सर्वेश्वर तथा समस्त जगत्के अधिपति हुए हैं। उन्हींके ज्ञानसे, उन्हींके लिये की गयी तपस्यासे तथा उन्हींके प्रति भक्ति और उन्हींकी सेवासे प्रकृति सर्वशक्तिमती महामाया और सर्वेश्वरी हुई है। उन्हींके ज्ञान, भजन, तपस्या एवं सेवा करनेसे देवमाता सावित्री वेदोंकी अधिष्ठात्री देवी और वेदमाता हुई हैं,वेदज्ञा तथा द्विजोंकी पूजनीया हो गयी हैं। परमात्मा श्रीकृष्णकी सेवा और तपका ही प्रभाव है कि सरस्वतीको समस्त विद्याकी अधिष्ठात्री माना जाता है। अखिल विद्वान् उनकी उपासना करते हैं। सनातनी महालक्ष्मी धन और सस्यकी अधिष्ठात्री देवी तथा सब सम्पत्तियोंको देनेमें समर्थ हुई हैं। इन्हींकी उपासिका होनेसे दुर्गाको सब लोग पूजते हैं और वे सर्वेश्वरी सबकी कामनाएँ पूर्ण कर देती हैं। इतना ही नहीं, वे दुर्गतिनाशिनी दुर्गा इन्हींकी कृपासे समस्त गाँवोंकी ग्रामदेवी, सम्पूर्ण सम्पत्ति देनेमें समर्थ, सबके द्वारा स्तुत्य और सर्वज्ञ हुई हैं। उन्होंने सर्वेश्वर शिवको जो पतिरूपमें प्राप्त किया है, वह उनकी श्रीकृष्ण सेवाका ही फल है।
श्रीकृष्णके वामभागसे प्रकट हुई श्रीराधा श्रीकृष्णकी प्रेमसे आराधना और सेवा करके ही उनके प्रेमकी अधिष्ठात्री तथा उन्हें प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हुई हैं। श्रीकृष्णकी सेवासे ही उन्होंने सबसे अधिक मनोहर रूप, सौभाग्य, मान, गौरव तथा श्रीकृष्णके वक्षःस्थलमें स्थान - उनका पत्नीत्व प्राप्त किया है। पूर्वकालमें राधाने शतशृङ्ग पर्वतपर एक सहस्त्र दिव्य युगोंतक निराहार रहकर तपस्या की। इससे वे अत्यन्त कृशकाय हो गयीं। श्रीकृष्णने देखा, राधा चन्द्रमाकी एक कलाके समान अत्यन्त कृश हो गयी हैं, अब इनके शरीरमें साँसका चलना भी बंद हो गया है, तब वे प्रभु करुणासे द्रवित हो उन्हें छाती से लगाकर फूट-फूटकर रोने लगे। उन्होंने राधाको वह सारभूत वर दिया, जो अन्य सब लोगोंके लिये दुर्लभ है। वे बोले- 'प्राणवल्लभे ! तुम्हारा स्थान मेरे वक्षःस्थलपर है, तुम यहीं रहो मुझमें तुम्हारी अविचल प्रेम-भक्ति हो। सौभाग्य, मान, प्रेम और गौरवकी दृष्टिसे तुम मेरे लिये सबसे श्रेष्ठ और सर्वाधिक प्रियतमा बनी रहो। संसारकी समस्त युवतियों में तुम्हारा सबसे ऊँचा स्थान है। तुम सबसे अधिक महत्व तथा गौरव प्राप्त करो। मैं
सदा तुम्हारे गुण गाऊँगा, पूजा करूँगा। तुम सदा मुझे अपने अधीन समझो मैं तुम्हारी प्रत्येक आज्ञाका पालन करनेके लिये बाध्य रहूँगा।' ऐसा कहकर जगदीश्वर श्रीकृष्णने उन्हें सचेत किया और अपनी उन प्राणवल्लभाको सौतके कष्टसे मुक्त कर दिया।
जिन-जिन देवताओंकी जो-जो देवियाँ पतिद्वारा सम्मानित हुई हैं, उनके उस सम्मानमें श्रीकृष्णकी आराधना ही कारण है। मुने! जिनकी जैसी तपस्या है, उन्हें वैसा ही फल प्राप्त हुआ है। देवी दुर्गाने सहस्त्र दिव्य वर्षोंतक हिमालयपर तप करते हुए श्रीकृष्ण चरणोंका ध्यान किया। इससे वे सबकी पूजनीया हो गयीं। सरस्वती श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये लाख दिव्य वर्षोतक गन्धमादन पर्वतपर तपस्या करके सबकी वन्दनीया हुई हैं। लक्ष्मी सौ दिव्य युगोंतक पुष्करतीर्थमें तपस्यापूर्वक श्रीकृष्णकी आराधना करके समस्त सम्पदाओंको देनेमें समर्थ हुई हैं। सावित्री मलयाचलपर साठ हजार दिव्य वर्षोंतक तप एवं श्रीकृष्ण-चरणोंका चिन्तन करके द्विजोंकी पूजनीया हो गयी हैं।
मुने! पूर्वकालमें ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवने सौ मन्वन्तरोंतक श्रीकृष्ण प्रीतिके लिये तपस्या - करके सृष्टि, पालन और संहारका अधिकार प्राप्त किया था। धर्म सौ मन्वन्तरोंतक तप करके सर्वपूज्य हुए। नारद! शेषनाग, सूर्यदेव, इन्द्र तथा चन्द्रमाने भी एक एक मन्वन्तरतक भक्तिपूर्वक श्रीकृष्णकी प्रसन्नता के लिये तप किया था। वायुदेवता सौ दिव्य युगोंतक भक्तिभावसे तपस्या करके सबके प्राण, सबके द्वारा पूजनीय तथा सबके आधार बन गये। इस प्रकार श्रीकृष्ण प्रीतिके लिये तपस्या करके सब देवता, मुनि, मानव, राजा तथा ब्राह्मण लोकमें पूजित हुए हैं। इस प्रकार मैंने तुमसे यह पुराण तथा आगमका सारभूत सारा तत्त्व सुना दिया। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो ? (अध्याय ७)