सावित्रीने कहा-
देव! अब आप मुझे सारभूत एवं परम दुर्लभ हरिभक्तिका उपदेश दीजिये। अन्य सब बातें मैंने आपसे सुन ली हैं। इस समय और किसी विषयको सुनना शेष नहीं है। अब तो मुझे भगवान् श्रीकृष्णके गुण कीर्तनरूप कुछ धर्मकी बात बताइये। वही लाखों मनुष्योंके उद्धारका बीज है। वही नरकके समुद्रसे पार उतारनेवाला है। श्रीकृष्णके गुणोंका कीर्तन मुक्तिके सारभूत तत्त्वकी प्राप्तिका कारण तथा समस्त अमङ्गलोंका निवारण करनेवाला है। वह कर्ममय वृक्षोंको उखाड़ फेंकनेवाला तथा किये हुए पापसमूहोंको हरनेवाला है। प्रभो ! मुक्तियाँ कितने प्रकारकी हैं? उनके लक्षण क्या हैं? हरिभक्तिका स्वरूप क्या है? उसके भेद कितने हैं? तथा निषेकका भी क्या लक्षण है? वह सारभूत तत्त्वज्ञान क्या है? यह आप बताइये। अपना सर्वस्व दान कर देना, उपवास व्रत - करना, तीर्थोंमें नहाना, व्रत रखना और तप करना- ये सब के सब ज्ञानहीनको ज्ञान देने से -जो पुण्य होता है, उसकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हो सकते। भगवन् ! यह निश्चय है कि गौरवकी दृष्टिसे पिताकी अपेक्षा माताका स्थान सौगुना ऊँचा है। परंतु ज्ञानदाता गुरु मातासे भी सौगुना अधिक पूजनीय होता है।
यम बोले-
बेटी! मैं पहले ही तुम्हें यह वर दे चुका हूँ कि तुम्हारे मनमें जो अभीष्ट प्रश्न होगा, वह सब मैं बताऊँगा- तुम जो कुछ जानना चाहोगी, उसका ज्ञान कराऊँगा। अतः इस समय मेरे वरसे तुम्हें भगवान् श्रीकृष्णकी भक्ति प्राप्त हो । कल्याणि! तुम जो भगवान् श्रीकृष्णके गुणोंका कीर्तन सुनना चाहती हो, वह बहुत ही उत्तम है। यह प्रश्न प्रश्नकर्ताके, उत्तर देनेवालेके और श्रोताओंके कुलका भी उद्धार करनेवाला है। परंतु है यह बहुत कठिन। सहस्र मुखवाले शेष भी इसे कहनेमें असमर्थ हैं। मृत्युञ्जय भगवान् शंकर यदि अपने पाँच मुखोंसे कहने लगें तो वे भी पार नहीं पा सकते। ब्रह्माजी चारों वेदों तथा अखिल जगत्के स्रष्टा हैं। चार मुखोंसे उनकी परम शोभा होती है। भगवान् विष्णु सर्वज्ञ हैं, परंतु ये दोनों प्रधान देव भी श्रीकृष्णके गुणोंका सम्यक् प्रकारसे वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हैं। स्वामी कार्तिकेय अपने छः मुखोंसे वर्णन करते रहें तो भी अन्त नहीं पा सकते महाभाग गणेशजीको योगीन्द्रोंके गुरु-का-गुरु कहा जाता है; किंतु भगवान् श्रीकृष्णके गुणोंका वर्णन कर पाना उनके लिये भी असम्भव है। सम्पूर्ण शास्त्रों के सारतत्त्व चार वेद हैं। ये वेद तथा इनसे परिचित विद्वान् भी श्रीकृष्णके गुणोंकी एक कला भी जानने में असमर्थ सिद्ध हो जाते हैं। श्रीकृष्णकी महिमाके वर्णनमें साक्षात् सरस्वती भी जड़के समान होकर असमर्थता प्रकट करने लगती हैं। सनत्कुमार, धर्म, सनक, सनातन सनन्द, कपिल तथा सूर्य- ये तथा श्रीब्रह्माजीके अन्यान्य सुयोग्य पुत्र भी उनके महत्त्वका वर्णन करने में सफलता नहीं प्राप्त कर सके, तब फिर अन्य व्यक्तियोंसे क्या आशा की जा सकती है? श्रीकृष्णके जिन गुणोंकी व्याख्या सिद्ध, मुनीन्द्र तथा योगीन्द्र भी नहीं कर सकते, उनका वर्णन अन्य पुरुष कैसे कर सकते हैं? तथा मैं ही कैसे कर सकता हूँ?
ब्रह्मा, विष्णु और शिव प्रभृति देवता जिनके चरणकमलोंका ध्यान करते हैं, वे भक्तोंके लिये जितने सुगम हैं, उतने ही भक्तहीन जनोंके लिये दुर्लभ भी हैं। श्रीकृष्णका गुणानुवाद परम पवित्र है। कुछ लोग किंचिन्मात्र उसे जानते हैं। परम ब्रह्मज्ञानी ब्रह्मा तथा उनके पुत्र आदि अधिक परिचित हैं। ज्ञानियोंके गुरु गणेशजी उनसे भी अधिक जानते हैं। सबसे अधिक सर्वज्ञ भगवान् शंकर ही जानते हैं; क्योंकि परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्णने पूर्वकालमें इनको ज्ञान प्रदान किया था। गोलोकके अत्यन्त निर्जन रमणीय रासमण्डल में श्रीकृष्णने जो शिवको अपने गुणोंके कीर्तनका महत्त्व बताया था, उसका स्वयं शिवजीने अपनी पुरीमें धर्मके प्रति उपदेश किया था। महाभाग सूर्यके पूछनेपर धर्मने पुष्करमें उनके सामने इसकी व्याख्या की थी। साध्वि! मेरे पिता भगवान् सूर्यने तपस्याद्वारा धर्मकी आराधना करके मुझे प्राप्त किया था। सुव्रते! पूर्व समयमें मेरे पिताजी यत्नपूर्वक मुझे यमपुरीका राज्य दे रहे थे; किंतु मैं लेना नहीं चाहता था। वैराग्य हो जाने के कारण मेरे मनमें तपस्या करनेकी बात आती थी। तब पिताजीने मेरे सामने भगवान्के गुणोंका जो वर्णन किया था, वह अत्यन्त दुर्गम है। मैं आगमके अनुसार उसे कुछ कहता हूँ, सुनो।
वरानने ! श्रीकृष्णके इतने अमित गुण हैं कि उन्हें वे स्वयं ही पूरा नहीं जानते; तब दूसरोंकी तो बात ही क्या है? जैसे आकाश स्वयं ही अपना अन्त नहीं जानता, उसी तरह भगवान् भी अपने गुणोंका अन्त नहीं जानते। भगवान् सबके अन्तरात्मा एवं सम्पूर्ण कारणोंके कारण हैं; वे सर्वेश्वर, सर्वाद्य, सर्ववित् और सर्वरूपधारी हैं, वे नित्यस्वरूप, नित्यविग्रह, नित्यानन्द, निराकार, निरङ्कुश, निःशङ्क, निर्गुण (प्राकृतगुणरहित), निरामय, निर्लिप्त, सर्वसाक्षी, सर्वाधार एवं परात्पर हैं। प्रकृति उन्हींसे उत्पन्न हुई है और सम्पूर्ण प्राकृत पदार्थ प्रकृतिके कार्य हैं। स्वयं परमपुरुष श्रीकृष्ण ही प्रकृति हैं और वे प्रकृतिसे परे भी हैं। रूपहीन होते हुए भी भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये वे नाना प्रकारके रूप धारण करते हैं। उनका दिव्य चिन्मय स्वरूप अत्यन्त कमनीय, सुन्दर और परम मनोहर है। वे नवीन मेघमालाके समान श्याम कान्ति धारण करते हैं। उनकी किशोर अवस्था है। वे गोपवेषमें सुशोभित होते हैं। कोटि-कोटि कामदेवोंकी लावण्यलीलाके धाम हैं। उनकी मोहिनी झाँकी मनको मोहे लेती है। उनके नेत्र शरत्कालके मध्याह्नमें पूर्णतः विकसित हुए कमलोंकी शोभाको छीने लेते हैं। उनका मुख शरत्पूर्णिमाके करोड़ों चन्द्रमाओंकी शोभाको तिरस्कृत करनेवाला है। अमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित दिव्य आभूषण उनके श्रीअङ्गोंकी शोभा बढ़ाते हैं। मन्द मुस्कानसे सुशोभित मुख एवं सर्वाङ्ग बहुमूल्य पीताम्बरसे सतत शोभायमान है। वे परब्रह्मस्वरूप हैं और ब्रह्मतेजसे उद्भासित होते हैं। भक्तजनोंको सुखपूर्वक उनका दर्शन सुलभ होता है। वे शान्तस्वरूप राधा-वल्लभ अनन्त गुण और महिमासे सम्पन्न हैं। प्रेममयी गोपियाँ सब ओरसे घेरकर उन्हें मन्द मुस्कराहटके साथ निहारती रहती हैं। वे रासमण्डलके मध्यभागमें रत्नमय सिंहासनपर विराजमान हैं। उनके दो भुजाएँ हैं। वे वनमालासे विभूषित हैं और मुरली बजा रहे हैं। मणिराज कौस्तुभ सदा ही उनके वक्षःस्थलको उद्भासित करता रहता है। केसर, रोली, अबीर, कस्तूरी तथा चन्दनसे उनका श्रीविग्रह चर्चित है। वे मनोहर चम्पा, कमल और मालतीकी मालाओंसे अलंकृत हैं। चारु चम्पाके फूलोंसे सुशोभि चूड़ामणि (मुकुट) की बंकिमा (लटक) उनके - मनोहर सौन्दर्यकी वृद्धि कर रही है।
भक्ति रससे ओतप्रोत भक्तजन भगवान् श्रीकृष्णके ऐसे ही स्वरूपका ध्यान करते हैं।जगद्धाता ब्रह्मा उन्हींका भय मानकर सृष्टिका विधान तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके भाग्यका उनके कर्मके अनुसार लेखन करते हैं। उन्होंकी आज्ञा अनुसार सबको तपस्याओं तथा कर्मोंका फल देते हैं। उन्हींके भयसे पालक भगवान् विष्णु सदा सबका पालन करते हैं। उनसे भीत रहनेवाले कालाग्रिरुद्रद्वारा अखिल जगत्का संहार होता है। जो ज्ञानियोंके गुरु-के-गुरु एवं मृत्युञ्जय नामसे प्रसिद्ध भगवान् शिव हैं, वे भी उन्हींको जानने तथा उनका ज्ञान प्रदान करनेसे सिद्धेश, योगीश तथा सर्वज्ञ हुए हैं। भक्ति एवं ज्ञानसे युक्त तथा परमानन्दसे सम्पन्न हैं। साध्वि! उन्हींके कृपा प्रसादसे शीघ्रगामियों में श्रेष्ठ पवनदेवता चलते तथा सूर्य उन्हींके भयसे निरन्तर तपते हैं। उन्हींकी आज्ञाके अनुसार इन्द्र वर्षा करते, मृत्यु समस्त प्राणियोंपर प्रभाव डालती, अग्नि जलाती एवं जल शीतल रहता तथा अत्यन्त भयभीत दिक्पाल दिशाओंकी रक्षा करते हैं। उन्हींके भयसे ग्रह राशिचक्रोंपर भ्रमण करते हैं। वृक्ष जो फूलते और फलते हैं, इसमें भी उनका भय ही कारण है। उन्हींकी आज्ञासे फल पकते हैं तथा बहुत से वृक्ष फलहीन रह जाते हैं। उनकी आज्ञासे ही जलचर जीव स्थलमें और स्थलचर प्राणी जलमें जीवित नहीं रह पाते हैं। उन्हींके भयसे मैं ( यमराज) धर्माधर्मके विषयमें नियन्त्रण करता हूँ। उनकी आज्ञासे ही काल सबको अपना ग्रास बनाता और सर्वत्र चक्कर लगाता ही रहता है। उन्हींके भयसे मृत्यु तथा काल किसीको असमयमें नहीं मार सकते। कोई जलती हुई आगमें या गहरे जलाशय अथवा समुद्रमें गिर जाय, वृक्षके ऊपर से नीचे पड़ जाय, तीखी तलवारपर गिर पड़े, सर्प आदिके मुँहमें पड़ जाय, संग्राममें तथा अन्य विषम संकटोंमें फँसकर नाना प्रकारके अस्त्र शस्त्रोंसे क्षत-विक्षत हो जाय तो भी जिनका भय मानकर काल उसे अकालमें नहीं ले जा सकता तथा जिनकी आज्ञा मिल जानेपर फूल और चन्दनसे सजी हुई सेजपर तन्त्र मन्त्र तथा भाई बन्धुओंसे सुरक्षित होकर सोते हुए मनुष्यको भी काल समय आनेपर अवश्य उठा ले जाता है, वे भगवान् ही सर्वोपरि हैं। उनके भयसे ही क सब कुछ करता है। उन्हींकी आज्ञासे वायु जलराशिको, जलराशि कच्छपको, कच्छप शेषनागको, शेषनाग पृथ्वीको तथा क्षमारूप पृथ्वी समुद्रों, सातों पर्वतों तथा नाना प्रकारके रूपवाले चराचर जगत्को धारण करती है। उन्हीं भगवान् श्रीकृष्ण से सम्पूर्ण भूत प्रकट होते और अन्तमें उन्होंके भीतर लीन हो जाते हैं।
पतिव्रते! इकहत्तर दिव्य युगोंकी इन्द्रकी आयु होती है। ऐसे अट्ठाईस इन्द्रोंका पतन हो जानेपर ब्रह्माका एक दिन रात होता है। इसी प्रकार तीस दिनोंका एक मास, दो मासोंकी एक ऋतु तथा छः ऋतुओंका एक वर्ष होता है। ऐसे सौ वर्षकी ब्रह्माकी आयु होती है। जबतक ब्रह्माका पतन नहीं होता तबतक श्रीहरिकी आँखें खुली रहती हैं - उनकी पलक उठी रहती है। जब वे आँख मूँदते या पलक गिराते हैं, तब ब्रह्माजीका पतन एवं प्रलय होता है। उसीको 'प्राकृतिक प्रलय' कहते हैं। उस प्राकृतिक प्रलयके समय सम्पूर्ण प्राकृत पदार्थ एवं देवता आदि चराचर प्राणी ब्रह्मामें लीन हो जाते हैं। और ब्रह्मा भगवान् श्रीकृष्णके नाभिकमलमें लीन हो जाते हैं। क्षीरसागरमें शयन करनेवाले श्रीविष्णु तथा वैकुण्ठवासी चतुर्भुज भगवान् श्रीविष्णु परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्णके वामपार्श्वमें लीन हो जाते हैं। रुद्र और भैरव आदि जितने भी शिवके अनुगामी हैं, वे मङ्गलाधार सनातन ज्ञानानन्दस्वरूप शिवमें लीन होते हैं। ज्ञानके अधिष्ठाता भगवान् शिव उन परमात्मा महादेव श्रीकृष्णके ज्ञान में विलीन हो जाते हैं। सम्पूर्ण शक्तियाँ विष्णुमाया दुर्गामें तिरोहित हो जाती हैं। विष्णुमाया दुर्गा भगवान् श्रीकृष्णकी बुद्धिमें स्थान ग्रहण कर लेती हैं; क्योंकि वे उनकी बुद्धिकी अधिष्ठात्री देवी हैं। नारायणके अंश स्वामिकार्तिकेय उनके वक्षःस्थलमें लीन हो जाते हैं। सुव्रते! गणोंके स्वामी देवेश्वर गणेशको भगवान् श्रीकृष्णका अंश माना गया है। वे उनकी दोनों भुजाओं में प्रविष्ट हो जाते हैं। लक्ष्मीकी अंशभूता देवियाँ लक्ष्मीमें तथा लक्ष्मी श्रीराधामें लीन हो जाती हैं। गोपियाँ तथा सम्पूर्ण देवपत्नियाँ भी श्रीराधामें ही लीन हो जाती हैं। भगवान् श्रीकृष्णके प्राणोंकी अधीश्वरी देवी श्रीराधा उनके प्राणोंमें निवास कर जाती हैं। सावित्री, वेद एवं सम्पूर्ण शास्त्र सरस्वतीमें प्रवेश कर जाते हैं। सरस्वती परब्रह्म परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णकी जिह्वामें विलीन हो जाती हैं। गोलोकके सम्पूर्ण गोप भगवान् श्रीकृष्णके रोमकूपोंमें लीन हो जाते हैं। उन प्रभुके प्राणोंमें सम्पूर्ण प्राणियोंके प्राणस्वरूप वायुका, उनकी जठराग्निमें समस्त अग्नियोंका तथा उनकी जिह्वाके अग्रभागमें जलका लय हो जाता है। जो सारसे भी सारतर हैं तथा भक्तिरसामृतका पान करते हैं, वे भक्त वैष्णवजन अत्यन्त आनन्दित हो उन भगवान् श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंमें विलीन हो जाते हैं। क्षुद्र विराट् महान् विराट्में और महान् विराट् परमात्मा श्रीकृष्णमें लीन हो जाते हैं। श्रीकृष्णके ही रोमकूपोंमें सम्पूर्ण विश्वकी स्थिति है। उन्हींके आँख मीचनेपर महाप्रलय होता है तथा उनकी आँख खुलते ही पुनः सृष्टिका कार्य आरम्भ हो जाता है। भगवान्की पलक जितनी देर उठी या खुली रहती है, उतनी ही देरतक बंद भी रहती है। दोनोंमें बराबर ही समय लगता है। ब्रह्माके सौ वर्षोंतक सृष्टि चालू रहती है, फिर उतने ही समयके लिये प्रलय हो जाता है। सुव्रते ! ब्रह्माकी सृष्टि और प्रलयकी कोई गिनती ही नहीं है। ठीक उसी तरह, जैसे भूमिके धूलिकणोंकी कोई गणना नहीं की जा सकती। जिन सर्वान्तरात्मा श्रीकृष्णके नेत्रों की पलक गिरते ही जगत्का प्रलय हो जाता है और पलकके उठते ही उन परमेश्वरकी इच्छासे सृष्टि आरम्भ हो जाती है, उनके गुणोंका कीर्तन करनेमें कौन समर्थ है ? मैंने पिताजीके मुखसे जैसा जैसा सुना है, वैसा - वैसा आगमोंके अनुसार वर्णन किया है।
चारों वेदोंने मुक्तिके चार भेद बतलाये हैं। उन सबसे प्रभुकी भक्तिको श्रेष्ठ माना गया है; क्योंकि इसके सामने सभी तुच्छ हैं। भक्ति मुक्तिसे भी बड़ी है। एक मुक्ति 'सालोक्य' प्रदान करनेवाली, दूसरी 'सारूप्य' देनेमें निपुण, तीसरी 'सामीप्य' प्रदान करनेवाली है और चौथी 'निर्वाणपद' पर पहुँचानेवाली कही जाती है। भक्त पुरुष परमप्रभु परमात्माकी सेवा छोड़कर इन मुक्तियोंकी इच्छा नहीं करते। वे सिद्धत्व, अमरत्व और ब्रह्मत्वकी भी अवहेलना करते हैं। मुक्ति सेवारहित होती है और भक्तिमें निरन्तर सेवाभावका उत्कर्ष होता रहता है। यही भक्ति और मुक्तिका भेद है। अब निषेकका लक्षण सुनो। विद्वान् पुरुष कहते हैं कि किये हुए कर्मोंका भोग ही निषेक है। उस कर्मभोग या प्रारब्धका भी खण्डन करके कल्याण प्रदान करनेवाली है श्रीकृष्णकी उत्तम सेवा साध्वि! यह तत्त्वज्ञान लोक और वेदका सार है। यह विघ्नोंका नाशक तथा शुभदायक है। बेटी! अब तुम सुखपूर्वक अपने घरको जाओ।
इस प्रकार कहकर सूर्यपुत्र यमराजने सावित्रीके पति सत्यवान्को जीवन प्रदान करके सावित्रीको शुभ आशीर्वाद दिया। तत्पश्चात् वे वहाँसे जानेके लिये उद्यत हो गये। उन्हें जाते देख सावित्री उनके चरणोंमें मस्तक झुका दोनों पैर पकड़कर रोने लगी। सच है, सत्पुरुषोंका बिछोह बड़ा ही दुःखदायक होता है। नारद! सावित्रीको रोती देख कृपानिधान यम भी रो पड़े और मन-ही मन संतुष्ट हो उससे इस प्रकार बोले ।
यमने कहा –
सावित्री! तुम पुण्यक्षेत्र भारतवर्ष में लाख वर्षोंतक सुख भोगनेके अनन्तर भगवान् श्रीकृष्णके गोलोकधाममें जाओगी। भद्रे! अब तुम अपने घर जाओ और भगवती सावित्रीका व्रत करो। चौदह वर्षोंतक करनेपर यह व्रत नारियोंको मोक्ष प्रदान करता है। ज्येष्ठमासके कृष्णपक्षमें चतुर्दशी तिथिको यह व्रत करना चाहिये। भाद्रपद मासके शुक्लपक्षमें अष्टमी तिथिके दिन महालक्ष्मीका शुभ व्रत होता है। यह व्रत सोलह वर्षोंतक प्रत्येक वर्षके प्रतिमासके शुक्लपक्षमें करना चाहिये। जो नारी भक्तिपूर्वक इस व्रतका पालन करती है, उसे भगवान् श्रीहरिका परमपद प्राप्त हो जाता है। प्रत्येक मङ्गलवारको मङ्गल प्रदान करनेवाली भगवती मङ्गलचण्डिकाकी पूजा करनी चाहिये। प्रत्येक मासके शुक्लपक्षमें षष्ठीके दिन मङ्गलप्रदा भगवती षष्ठी (देवसेना) की उपासना करनेका - विधान है। इसी प्रकार आषाढ़की संक्रान्तिके अवसरपर सम्पूर्ण सिद्धि प्रदान करनेवाली भगवती मनसाकी पूजा होती है। कार्तिकमासके शुक्लपक्षकी पूर्णिमा तिथिको रासमण्डलमें विराजमान भगवान् श्रीकृष्णकी प्राणाधिका श्रीराधाकी उपासना करनी चाहिये तथा प्रत्येक मासकी शुक्ला अष्टमी के दिन दुर्गतिनाशिनी, विष्णुमाया भगवती दुर्गाका व्रत करना चाहिये। जो नारी विशुद्ध पतिव्रताओंमें, श्रीयन्त्र आदिमें तथा प्रतिमाओंमें पतिपुत्रवती सती प्रकृतिस्वरूपिणी भगवती जगदम्बाकी भावना करके धन और संततिकी प्राप्तिके लिये भक्तिपूर्वक पूजा करती है, वह इस लोकमें सुख भोगकर अन्तमें श्रीहरिके परमपदको प्राप्त होती है।
इस प्रकार कहकर धर्मराज अपने स्थानपर पधार गये। सावित्री भी पतिदेवको लेकर अपने घर लौट गयी। नारद! यों सावित्री और सत्यवान् दोनों जब घरपर चले आये, तब सावित्रीने सत्यवान्से तथा अन्य बान्धवोंसे सारा वृत्तान्त कह सुनाया। फिर वरके प्रभावसे सावित्रीके पिता क्रमशः सौ पुत्रवाले हो गये। उसके श्वशुरकी आँखें ठीक हो गयीं और वे अपना राज्य पा गये। सावित्री स्वयं भी बहुत से पुत्रोंकी जननी बन गयी। उस पतिव्रता सावित्रीने पुण्यभूमि भारतवर्ष में अनेक वर्षोंतक सुख भोग किया। तत्पश्चात् वह अपने पतिके साथ गोलोकधाममें चली गयी। जो सविताकी अधिदेवी, सवितृदेवताके मन्त्रोंकी अधिष्ठात्री तथा वेदोंकी सावित्री (जननी) हैं, वे देवी इन्हीं गुणोंके कारण सावित्री' कही गयी हैं।
वत्स! इस प्रकार सावित्रीका श्रेष्ठ उपाख्यान तथा प्राणियोंके कर्मविपाक- ये प्रसङ्ग तुम्हें बता दिये। अब पुनः क्या सुनना चाहते हो ? (अध्याय ३४)