श्री ब्रह्म वैवर्त महापुराण - प्रकृति खंड

3- परिपूर्णतम श्रीकृष्ण और चिन्मयी श्रीराधासे प्रकट विराट्स्वरूप बालकका वर्णन

भगवान् नारायण कहते हैं-

नारद! तदनन्तर वह बालक जो केवल अण्डाकार था, ब्रह्माकी आयुपर्यन्त ब्रह्माण्डगोलकके जलमें रहा। फिर समय पूरा हो जानेपर वह सहसा दो रूपोंमें प्रकट हो गया। एक अण्डाकार ही रहा और एक शिशुके रूपमें परिणत हो गया। उस शिशुकी ऐसी कान्ति थी, मानो सौ करोड़ सूर्य एक साथ प्रकाशित हो रहे हों। माताका दूध न मिलने के कारण भूखसे पीड़ित होकर वह कुछ समयतक रोता रहा। माता-पिता उसे त्याग चुके थे। वह निराश्रय होकर जलके अंदर समय व्यतीत कर रहा था। जो असंख्य ब्रह्माण्डका स्वामी है, उसीने अनाथकी भाँति, आश्रय पानेकी इच्छासे ऊपरकी ओर दृष्टि दौड़ायी। उसकी आकृति स्थूलसे भी स्थूल थी। अतएव उसका नाम 'महाविराट्' पड़ा। जैसे परमाणु अत्यन्त सूक्ष्मतम होता है, वैसे ही वह अत्यन्त स्थूलतम था। वह बालक तेजमें परमात्मा श्रीकृष्णके सोलहवें अंशकी बराबरी कर रहा था। परमात्मस्वरूपा प्रकृति संज्ञक राधासे उत्पन्न यह महान् विराट् बालक सम्पूर्ण विश्वका आधार है। यही 'महाविष्णु' कहलाता है। इसके प्रत्येक रोमकूपमें जितने विश्व हैं, उन सबकी संख्याका पता लगाना श्रीकृष्णके लिये भी असम्भव है। वे भी उन्हें स्पष्ट बता नहीं सकते। जैसे जगत्के रजःकणको कभी नहीं गिना जा सकता, उसी प्रकार इस शिशुके शरीरमें कितने ब्रह्मा और विष्णु आदि हैं- यह नहीं बताया जा सकता। प्रत्येक ब्रह्माण्डमें ब्रह्मा, विष्णु और शिव विद्यमान हैं। पातालसे लेकर ब्रह्मलोकतक अनगिनत ब्रह्माण्ड बताये गये हैं। अतः उनकी संख्या कैसे निश्चित की जा सकती है? ऊपर वैकुण्ठलोक है। यह ब्रह्माण्डसे बाहर है। इसके ऊपर पचास करोड़ योजनके विस्तारमें गोलोकधाम है। श्रीकृष्णके समान ही यह लोक भी नित्य और चिन्मय सत्यस्वरूप है। पृथ्वी सात द्वीपोंसे सुशोभित है। सात समुद्र इसकी शोभा बढ़ा रहे हैं। उनचास छोटे-छोटे द्वीप हैं। पर्वतों और वनोंकी तो कोई संख्या ही नहीं है। सबसे ऊपर सात स्वर्गलोक हैं। ब्रह्मलोक भी इन्हीं में सम्मिलित है। नीचे सात पाताल हैं। यही ब्रह्माण्डका परिचय है। पृथ्वीसे ऊपर भूर्लोक, उससे परे भुवर्लोक, भुवर्लोकसे परे स्वर्लोक, उससे परे जनलोक, जनलोकसे परे तपोलोक, तपोलोकसे परे सत्यलोक और सत्यलोकसे परे ब्रह्मलोक है। ब्रह्मलोक ऐसा प्रकाशमान है, मानो तपाया हुआ सोना चमक रहा हो। ये सभी कृत्रिम हैं। कुछ तो ब्रह्माण्डके भीतर हैं और कुछ बाहर। नारद! ब्रह्माण्डके नष्ट होनेपर ये सभी नष्ट हो जाते हैं; क्योंकि पानीके बुलबुलेकी भाँति यह सारा जगत् अनित्य है। गोलोक और वैकुण्ठलोकको नित्य, । अविनाशी एवं अकृत्रिम कहा गया है। उस विराट्मय बालकके प्रत्येक रोमकूपमें असंख्य ब्रह्माण्ड निश्चितरूपसे विराजमान हैं। एक-एक ब्रह्माण्डमें अलग-अलग ब्रह्मा, विष्णु और शिव हैं। बेटा नारद! देवताओंकी संख्या तीन करोड़ है। ये सर्वत्र व्याप्त हैं। दिशाओंके स्वामी, दिशाओंकी रक्षा करनेवाले तथा ग्रह एवं नक्षत्र - सभी इसमें सम्मिलित हैं। भूमण्डलपर चार प्रकारके वर्ण हैं। नीचे नागलोक है। चर और अचर सभी प्रकारके प्राणी उसपर निवास करते हैं।

नारद! तदनन्तर वह विराट्स्वरूप बालक बार-बार ऊपर दृष्टि दौड़ाने लगा। वह गोलाकार पिण्ड बिलकुल खाली था। दूसरी कोई भी वस्तु वहाँ नहीं थी। उसके मनमें चिन्ता उत्पन्न हो गयी। भूखसे आतुर होकर वह बालक बार-बार रुदन करने लगा। फिर जब उसे ज्ञान हुआ, तब उसने परम पुरुष श्रीकृष्णका ध्यान किया। तब वहीं उसे सनातन ब्रह्मज्योतिके दर्शन प्राप्त हुए। वे ज्योतिर्मय श्रीकृष्ण नवीन मेघके समान श्याम थे। उनके दो भुजाएँ थीं। उन्होंने पीताम्बर पहन रखा था। उनके हाथमें मुरली शोभा पा रही थी। मुखमण्डल मुस्कानसे भरा था। भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये वे कुछ व्यस्त से जान पड़ते थे। - पिता परमेश्वरको देखकर वह बालक संतुष्ट होकर हँस पड़ा। फिर तो वरके अधिदेवता श्रीकृष्णने समयानुसार उसे वर दिया। कहा 'बेटा! तुम मेरे समान ज्ञानी बन जाओ। भूख और प्यास तुम्हारे पास न आ सके। प्रलयपर्यन्त यह असंख्य ब्रह्माण्ड तुमपर अवलम्बित रहे। तुम निष्कामी, निर्भय और सबके लिये वरदाता बन जाओ। जरा, मृत्यु, रोग और शोक आदि तुम्हें कष्ट न पहुँचा सकें।' यों कहकर भगवान् श्रीकृष्णने उस बालकके कानमें तीन बार षडक्षर महामन्त्रका उच्चारण किया। यह उत्तम मन्त्र वेदका प्रधान अङ्ग है। आदिमें 'ॐ' का स्थान है। बीचमें चतुर्थी विभक्ति के साथ 'कृष्ण' ये दो अक्षर हैं। अन्तमें अग्निकी पत्नी 'स्वाहा' सम्मिलित हो जाती है। इस प्रकार ॐ कृष्णाय स्वाहा' यह मन्त्रका स्वरूप है। इस मन्त्रका जप करनेसे सम्पूर्ण विघ्न टल जाते हैं।

ब्रह्मपुत्र नारद ! मन्त्रोपदेशके पश्चात् परम प्रभु श्रीकृष्णने उस बालकके भोजनकी जो व्यवस्था की, वह तुम्हें बताता हूँ, सुनो! प्रत्येक विश्वमें वैष्णवजन जो कुछ भी नैवेद्य भगवान्को अर्पण करते हैं, उसमेंसे सोलहवाँ भाग विष्णुको मिलता है और पंद्रह भाग इस बालकके लिये निश्चित है; क्योंकि यह बालक स्वयं परिपूर्णतम श्रीकृष्णका विराट् रूप है।

विप्रवर! सर्वव्यापी श्रीकृष्णने उस उत्तम मन्त्रका ज्ञान प्राप्त करानेके पश्चात् पुनः उस विराट्मय बालकसे कहा- 'पुत्र! तुम्हें इसके सिवा दूसरा कौन-सा वर अभीष्ट है, वह भी मुझे बताओ। मैं देनेके लिये सहर्ष तैयार हूँ।' उस समय विराट् व्यापक प्रभु ही बालकरूपसे विराजमान था भगवान् श्रीकृष्णकी बात सुनकर उसने उनसे समयोचित बात कही।

बालकने कहा-

आपके चरणकमलोंमें मेरी अविचल भक्ति हो— मैं यही वर चाहता हूँ। मेरी आयु चाहे एक क्षणकी हो अथवा दीर्घकालकी; परंतु मैं जबतक जीऊँ, तबतक आपमें मेरी अटल श्रद्धा बनी रहे। इस लोकमें जो पुरुष आपका भक्त है, उसे सदा जीवन्मुक्त समझना चाहिये। जो आपकी भक्तिसे विमुख है, वह मूर्ख जीते हुए भी मरेके समान है। जिस अज्ञानीजनके हृदयमें आपकी भक्ति नहीं है, उसे जप, तप, यज्ञ, पूजन, व्रत, उपवास, पुण्य अथवा तीर्थ सेवनसे क्या लाभ? उसका जीवन ही निष्फल है। प्रभो ! जबतक शरीरमें आत्मा रहता है, तबतक शक्तियाँ साथ रहती हैं। आत्माके चले जानेके पश्चात् सम्पूर्ण स्वतन्त्र शक्तियोंकी भी सत्ता वहाँ नहीं रह जाती महाभाग ! प्रकृतिसे परे वे सर्वात्मा आप ही हैं। आप स्वेच्छामय सनातन ब्रह्मज्योति स्वरूप परमात्मा सबके आदिपुरुष हैं।

नारद! इस प्रकार अपने हृदयका उद्गार प्रकट करके वह बालक चुप हो गया। तब भगवान् श्रीकृष्ण कानोंको सुहावनी लगनेवाली मधुर वाणीमें उसका उत्तर देने लगे।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा-

वत्स! मेरी ही भाँति तुम भी बहुत समयतक अत्यन्त स्थिर होकर विराजमान रहो। असंख्य ब्रह्माओंके जीवन समाप्त हो जानेपर भी तुम्हारा नाश नहीं होगा। प्रत्येक ब्रह्माण्डमें अपने क्षुद्र अंशसे तुम विराजमान रहोगे। तुम्हारे नाभिकमलसे विश्वस्त्रष्टा ब्रह्मा प्रकट होंगे। ब्रह्माके ललाटसे ग्यारह रुद्रोंका आविर्भाव होगा। शिवके अंशसे वे रुद्र सृष्टिके संहारकी व्यवस्था करेंगे। उन ग्यारह रुद्रोंमें 'कालाग्नि' नामसे जो प्रसिद्ध हैं, वे ही रुद्र विश्वके संहारक होंगे। विष्णु विश्वकी रक्षा करनेके लिये तुम्हारे क्षुद्र अंशसे प्रकट होंगे। मेरे वरके प्रभावसे तुम्हारे हृदयमें सदा मेरी भक्ति बनी रहेगी। तुम मेरे परम सुन्दर स्वरूपको ध्यानके द्वारा निरन्तर देख सकोगे, यह निश्चित है। तुम्हारी कमनीया माता मेरे वक्षःस्थलपर विराजमान रहेगी। उसकी भी झाँकी तुम प्राप्त कर सकोगे। वत्स! अब मैं अपने गोलोकमें जाता हूँ। तुम यहीं ठहरो ।

इस प्रकार उस बालकसे कहकर भगवान् श्रीकृष्ण अन्तर्धान हो गये और तत्काल वहाँ पहुँचकर उन्होंने सृष्टिकी व्यवस्था करनेवाले ब्रह्माको तथा संहारकार्यमें कुशल रुद्रको आज्ञा दी।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा-

वत्स! सृष्टि रचनेके लिये जाओ। विधे! मेरी बात सुनो, महाविराट्के एक रोमकूपमें स्थित क्षुद्र विराट् पुरुषके नाभिकमलसे प्रकट होओ। फिर रुद्रको संकेत करके कहा- 'वत्स महादेव ! जाओ। महाभाग ! अपने अंशसे ब्रह्माके ललाटसे प्रकट हो जाओ और स्वयं भी दीर्घकालतक तपस्या करो।'

नारद! जगत्पति भगवान् श्रीकृष्ण यों कहकर चुप हो गये। तब ब्रह्मा और कल्याणकारी शिव- दोनों महानुभाव उन्हें प्रणाम करके विदा हो गये। महाविराट् पुरुषके रोमकूपमें जो ब्रह्माण्ड-गोलकका जल है, उसमें वे महाविराट् पुरुष अपने अंशसे क्षुद्र विराट् पुरुष हो गये, जो इस समय भी विद्यमान हैं। इनकी सदा युवा अवस्था रहती है। इनका श्याम रंगका विग्रह है। ये पीताम्बर पहनते हैं। जलरूपी शय्यापर सोये रहते हैं। इनका मुखमण्डल मुस्कानसे सुशोभित है। इन प्रसन्नमुख विश्वव्यापी प्रभुको 'जनार्दन' कहा जाता है। इन्हींके नाभिकमलसे ब्रह्मा प्रकट हुए और उसके अन्तिम छोरका पता लगानेके लिये वे उस कमलदण्डमें एक लाख युगोंतक चक्कर लगाते रहे। नारद ! इतना प्रयास करनेपर भी वे पद्मजन्मा ब्रह्मा पद्मनाभकी नाभिसे उत्पन्न हुए कमलदण्डके अन्ततक जानेमें सफल न हो सके। तब उनके मनमें चिन्ता घिर आयी। वे पुनः अपने स्थानपर आकर भगवान् श्रीकृष्णके चरण कमलका ध्यान करने लगे। उस स्थितिमें उन्हें दिव्य दृष्टिके द्वारा क्षुद्र विराट् पुरुषके दर्शन प्राप्त हुए। ब्रह्माण्ड-गोलकके भीतर जलमय शय्यापर वे पुरुष शयन कर रहे थे। फिर जिनके रोमकूपमें वह ब्रह्माण्ड था, उन महाविराट् पुरुषके तथा उनके भी परम प्रभु भगवान् श्रीकृष्णके भी दर्शन हुए। साथ ही गोपों और गोपियोंसे सुशोभित गोलोकधामका भी दर्शन हुआ। फिर तो उन्होंने श्रीकृष्णकी स्तुति की और उनसे वरदान पाकर सृष्टिका कार्य आरम्भ कर दिया। सर्वप्रथम ब्रह्मासे सनकादि चार मानसपुत्र हुए। फिर उनके ललाटसे शिवके अंशभूत ग्यारह रुद्र प्रकट हुए। फिर क्षुद्र विराट् पुरुषके वामभागसे जगत्की रक्षाके व्यवस्थापक चार भुजाधारी भगवान् श्रीविष्णु प्रकट हुए। वे श्वेतद्वीपमें निवास करने लगे। क्षुद्र विराट् पुरुषके नाभिकमलमें प्रकट हुए ब्रह्माने विश्वकी रचना की। स्वर्ग, म और पाताल - त्रिलोकीके सम्पूर्ण चराचर प्राणियोंका उन्होंने सृजन किया।

नारद ! इस प्रकार महाविराट् पुरुषके सम्पूर्ण रोमकूपोंमें एक-एक करके अनेक ब्रह्माण्ड हुए । प्रत्येक ब्रह्माण्डमें एक क्षुद्र विराट् पुरुष, ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव आदि भी हैं। ब्रह्मन् ! इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णके मङ्गलमय चरित्रका वर्णन कर दिया। यह सारभूत प्रसंग सुख एवं मोक्ष प्रदान करनेवाला है। ब्रह्मन् ! अब तुम और क्या सुनना चाहते हो ? (अध्याय ३)