नारदजीने पूछा-
प्रभो! साध्वी तुलसी भगवान् श्रीहरिकी पत्नी कैसे बनी?इसका जन्म कहाँ हुआ था और पूर्वजन्ममें यह कौन थी? इस साध्वी देवीने किसके कुलको पवित्र किया था तथा इसके माता-पिता कौन थे ?किस तपस्याके प्रभावसे प्रकृतिके अधिष्ठाता भगवान् श्रीहरि इसे पतिरूपसे प्राप्त हुए? क्योंकि ये परम प्रभु तो बिलकुल निःस्पृह हैं। दूसरा प्रश्न यह है कि ऐसी सुयोग्या देवीको वृक्ष क्यों होना पड़ा और यह परम तपस्विनी देवी कैसे असुरके चंगुलमें फँस गयी ? सम्पूर्ण संदेहोंको दूर करनेवाले प्रभो ! आप मेरे इस संशयको मिटानेकी कृपा करें।
भगवान् नारायण कहते हैं-
नारद! दक्षसावर्णि नामसे प्रसिद्ध एक पुण्यात्मा मनु हो गये हैं। भगवान् विष्णुके अंशसे प्रकट ये मनु परम पवित्र, यशस्वी, विशद कीर्तिसे सम्पन्न तथा श्रीहरिके प्रति अटूट श्रद्धा रखनेवाले थे। इनके पुत्रका नाम था ब्रह्मसावर्णि। उनका भी अन्तः करण स्वच्छ था। उनके मनमें धार्मिक भावना थी और भगवान् श्रीहरिपर वे श्रद्धा रखते थे। ब्रह्मसावर्णिके पुत्र धर्मसावर्णि नामसे प्रसिद्ध हुए, जिनकी इन्द्रियाँ सदा वशमें रहती थीं और मन श्रीहरिकी उपासनामें निरत रहता था। धर्मसावर्णिसे इन्द्रियनिग्रही एवं परम भक्त रुद्रसावर्णि पुत्ररूपमें प्रकट हुए। इन रुद्रसावर्णिके पुत्रका नाम देवसावर्णि हुआ। ये भी परम वैष्णव थे। देवसावर्णिके पुत्रका नाम इन्द्रसावर्णि था। फिर भगवान् विष्णुके अनन्य उपासक इन इन्द्रसावर्णिसे वृषध्वजका जन्म हुआ। भगवान् शंकरमें इस वृषध्वजकी असीम श्रद्धा थी। स्वयं भगवान् शंकर इसके यहाँ बहुत कालतक ठहरे थे। इसके प्रति भगवान् शंकरका स्नेह पुत्रसे भी बढ़कर था राजा वृषध्वजकी भगवान् नारायण, लक्ष्मी और सरस्वती - इनमें किसीके प्रति श्रद्धा नहीं थी। उसने सम्पूर्ण देवताओंका पूजन त्याग दिया था। अभिमानमें चूर होकर वह भाद्रपदमासमें महालक्ष्मीकी पूजामें विघ्र उपस्थित किया करता था। माघकी शुक्ल पञ्चमीके दिन समस्त देवता सरस्वतीकी विस्तृतरूपसे पूजा करते थे; परंतु वह नरेश उसमें सम्मिलित नहीं होता था। यज्ञ और विष्णु पूजाकी निन्दा करना उसका मानो स्वभाव ही बन गया था। वह केवल भगवान् शिवमें ही श्रद्धा रखता था। ऐसे स्वभाववाले राजा वृषध्वजको देखकर सूर्यने उसे शाप दे दिया- 'राजन् ! तेरी श्री नष्ट हो जाय!'
भक्तपर संकट देख आशुतोष भोलेनाथ भगवान् शंकर हाथमें त्रिशूल उठाकर सूर्यपर टूट पड़े। तब सूर्य अपने पिता कश्यपजीके साथ ब्रह्माजीकी शरणमें गये शंकर त्रिशूल लिये ब्रह्मलोकको चल दिये। ब्रह्माको भी शंकरजीका भय था, अतएव उन्होंने सूर्यको आगे करके वैकुण्ठकी यात्रा की उस समय ब्रह्मा, कश्यप और सूर्य तीनों भयभीत थे उन तीनों महानुभावोंने सर्वेश भगवान् नारायणकी शरण ग्रहण की। तीनोंने मस्तक झुकाकर भगवान् श्रीहरिको प्रणाम किया, बारंबार प्रार्थना की और उनके सामने अपने भयका सम्पूर्ण कारण कह सुनाया। तब भगवान् नारायणने कृपापूर्वक उन सबको अभय प्रदान किया और कहा- 'भयभीत देवताओ! स्थिर हो जाओ। मेरे रहते तुम्हें कोई भय नहीं। विपत्तिके अवसरपर डरे हुए जो भी व्यक्ति जहाँ-कहीं भी मुझे याद करते हैं, मैं हाथमें चक्र लिये तुरंत वहीं पहुँचकर उनकी रक्षा करता हूँ (स्मरन्ति ये यत्र तत्र मां विपत्तौ भयान्विताः । तांस्तत्र गत्वा रक्षामि चक्रहस्तस्त्वरान्वितः ॥ (प्रकृतिखण्ड १३ । २०)) । देवो! मैं अखिल जगत्का कर्ता भर्ता हूँ। मैं ही - ब्रह्मारूपसे सदा संसारकी सृष्टि करता हूँ और शंकररूपसे संहार। मैं ही शिव हूँ। तुम भी मेरे ही रूप हो और ये शंकर भी मुझसे भिन्न नहीं हैं। मैं ही नाना रूप धारण करके सृष्टि और पालनकी व्यवस्था किया करता हूँ। देवताओ ! तुम्हारा कल्याण हो; जाओ, अब तुम्हें भय नहीं होगा। मैं वचन देता हूँ, आजसे शंकरका भय तुम्हारे पास नहीं आ सकेगा। वे सर्वेश भगवान् शंकर सत्पुरुषोंके स्वामी हैं। उन्हें भक्तात्मा और भक्तवत्सल कहा जाता है और वे सदा भक्तोंके अधीन रहते हैं। ब्रह्मन् ! सुदर्शनचक्र और भगवान् शंकर- ये दोनों मुझे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हैं। ब्रह्माण्डमें इनसे अधिक दूसरा कोई तेजस्वी नहीं है। ये शंकर चाहें तो लीलापूर्वक करोड़ों सूर्योको प्रकट कर सकते हैं। करोड़ों ब्रह्माओंके निर्माणकी भी इनमें पूर्ण सामर्थ्य है। इन त्रिशूलधारी भगवान् शंकरके लिये कोई भी कार्य असाध्य नहीं; तथापि कुछ भी बाहरी ज्ञान न रखकर ये दिन-रात मेरे ही ध्यानमें लगे रहते हैं। अपने पाँच मुखोंसे मेरे मन्त्रोंका जप करना और भक्तिपूर्वक मेरे गुण गाते रहना इनका स्वभाव-सा बन गया है। मैं भी रात-दिन इनके कल्याणकी चिन्तामें ही लगा रहता हूँ; क्योंकि जो जिस प्रकार मेरी उपासना करते हैं, मैं भी उसी प्रकार उनकी सेवामें तत्पर रहता हूँ (ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ॥ (प्रकृतिखण्ड १३ । २९)) - यह मेरा नियम है।'
इतनेमें भगवान् शंकर भी वहाँ पहुँच गये। उनके हाथमें त्रिशूल था। वे वृषभपर आरूढ़ थे और आँखें रक्तकमलके समान लाल थीं। वहाँ पहुँचते ही वे वृषभसे उतर पड़े और भक्तिविनम्र होकर उन्होंने शान्तस्वरूप परात्पर प्रभु लक्ष्मीकान्त भगवान् नारायणको श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया। उस समय भगवान् श्रीहरि रत्नमय सिंहासनपर विराजमान थे। रत्ननिर्मित अलङ्कारों से उनका श्रीविग्रह सुशोभित था। किरीट, कुण्डल, च और वनमालासे वे अनुपम शोभा पा रहे थे। नूतन मेघके समान उनकी श्याम कान्ति थी । उनका परम सुन्दर विग्रह चार भुजाओंसे सुशोभित था और चार भुजावाले अनेक पार्षद स्वच्छ चँवर डुलाकर उनकी सेवा कर रहे थे। नारद! उनका सम्पूर्ण अङ्ग दिव्य चन्द अनुलिस था। वे अनेक प्रकारके भूषण और पीताम्बर धारण किये हुए थे। लक्ष्मीका दिया हुआ ताम्बूल उनके मुखमें शोभा पा रहा था। ऐसे प्रभुको देखकर भगवान् शंकरका मस्तक उनके चरणोंमें झुक गया। ब्रह्माने शंकरको प्रणाम किया तथा अत्यन्त डरते हुए सूर्य भी शंकरको प्रणाम करने लगे। कश्यपने अतिशय भक्तिके साथ स्तुति और प्रणाम किया। तदनन्तर भगवान् शिव सर्वेश्वर श्रीहरिकी स्तुति करके एक सुखमय आसनपर विराज गये। विष्णु पार्षदोंने श्वेत चँवर डुलाकर उनकी सेवा की। जब उनके मार्गका श्रम दूर हो गया, तब भगवान् श्रीहरिने अमृतके समान अत्यन्त मनोहर एवं मधुर वचन कहा।
भगवान् विष्णु बोले-
महादेव !यहाँ कैसे पधारना हुआ?अपने क्रोधका कारण बताइये? महादेवने कहा- भगवन्! राजा वृषध्वज मेरा परम भक्त है। मैं उसे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय मानता हूँ। सूर्यने उसे शाप दे दिया है - यही मेरे क्रोधका कारण है। जब मैं अपने कृपापात्र पुत्रके शोकसे प्रभावित होकर सूर्यको मारनेके लिये तैयार हुआ, तब वह ब्रह्माकी शरणमें चला गया और इस समय ब्रह्मासहित उसने आपकी शरण ग्रहण कर ली है। जो व्यक्ति ध्यान अथवा वचनसे भी आपके शरणापन्न हो जाते हैं, उनपर विपत्ति और संकट अपना कुछ भी प्रभाव नहीं डाल सकते। वे जरा और मृत्युसे सर्वथा रहित हो जाते हैं। भगवन् !शरणागतिका फल तो प्रत्यक्ष ही है, फिर मैं क्या कहूँ? आपका स्मरण करते ही मनुष्य सदाके लिये अभय एवं मङ्गलमय बन जाते हैं। परंतु जगत्प्रभो! अब मेरे उस भक्तकी जीवनचर्या कैसे चलेगी- यह बतानेकी कृपा कीजिये; क्योंकि सूर्यके शापसे उसकी श्री नष्ट हो चुकी है। उसमें सोचने-समझनेकी शक्ति भी तनिक-सी नहीं रह गयी है।
भगवान् विष्णु बोले-
शम्भो ! दैवकी प्रेरणासे बहुत समय बीत गया। इक्कीस युग समाप्त हो गये। यद्यपि वैकुण्ठमें अभी आधी घड़ीका समय बीता है। अतः अब आप शीघ्र अपने स्थानपर पधारिये। किसीसे भी न रुकनेवाले अत्यन्त भयंकर कालने इस समय वृषध्वजको
अपना ग्रास बना लिया है। यही नहीं, किंतु उसका पुत्र रथध्वज भी अब जगत्में नहीं है। इस समय रथध्वजके दो पुत्र हैं, उन महाभाग पुत्रों के नाम हैं- धर्मध्वज और कुशध्वज वे परम वैष्णवपुरुष सूर्यके शापसे श्रीहीन होकर जीवन व्यतीत कर रहे हैं- ऐसा कहा जाता है। राज्य भी उनके हाथमें नहीं है। एकमात्र लक्ष्मीकी उपासना ही उनके जीवनका उद्देश्य बन गया है। अतः उनकी भार्याओंके उदरसे भगवती लक्ष्मी अपनी एक कलासे प्रकट होंगी। तब वे दोनों नरेश लक्ष्मीसे सम्पन्न हो जायँगे। शम्भो ! अब आपके सेवक वृषध्वजका शरीर नहीं रहा। अतः आप यहाँसे पधार सकते हैं। देवताओ! अब आपलोग भी जानेका कष्ट करें।
नारद! इस प्रकार कहकर भगवान् श्रीहरि लक्ष्मीके सहित सभासे उठे और अन्तःपुरमें चले गये। देवताओंने भी बड़ी प्रसन्नता के साथ अपने आश्रमकी यात्रा की परिपूर्णतम शंकर उसी क्षण तपस्या करनेके विचारसे चल पड़े। (अध्याय १३)