नारदजीने कहा-
प्रभो !भगवान् नारायणने कौन-सा रूप धारण करके तुलसीसे हास विलास किया था? यह प्रसङ्ग मुझे बतानेकी कृपा करें।
भगवान् नारायण ऋषि कहते हैं-
नारद ! भगवान् श्रीहरिने वैष्णवी माया फैलाकर शङ्खचूड़से कवच ले लिया। फिर शङ्खचूड़का ही रूप धारण करके वे साध्वी तुलसीके घर पहुँचे, वहाँ उन्होंने तुलसीके महलके दरवाजेपर दुन्दुभि बजवायी और जय जयकारके घोषसे उस सुन्दरीको अपने - आगमनकी सूचना दी।
तुलसीने पतिको युद्धसे आया देख उत्सव मनाया और महान् हर्षभरे हृदयसे स्वागत किया। फिर दोनोंमें युद्धसम्बन्धी चर्चा हुई; तदनन्तर शङ्खचूड़के वेषमें जगत्प्रभु भगवान् श्रीहरि सो गये। नारद! उस समय तुलसीके साथ उन्होंने सुचारुरूपसे हास-विलास किया तथापि तुलसीको इस बार पहलेकी अपेक्षा आकर्षण आदिमें व्यतिक्रमका अनुभव हुआ; अतः उसने सारी वास्तविकताका अनुमान लगा लिया और पूछा।
तुलसीने कहा-
मायेश! बताओ तो तुम कौन हो ? तुमने कपटपूर्वक मेरा सतीत्व नष्ट कर दिया; इसलिये अब मैं तुम्हें शाप दे रही हूँ। ब्रह्मन् ! तुलसीके वचन सुनकर शापके भयसे भगवान् श्रीहरिने लीलापूर्वक अपना सुन्दर मनोहर स्वरूप प्रकट कर दिया। देवी तुलसीने
अपने सामने उन सनातन प्रभु देवेश्वर श्रीहरिको विराजमान देखा। भगवान्का दिव्य विग्रह नूतन मेघके समान श्याम था। आँखें शरत्कालीन कमलकी तुलना कर रही थीं। उनके अलौकिक रूप-सौन्दर्यमें करोड़ों कामदेवोंकी लावण्य-लीला प्रकाशित हो रही थी। रत्नमय भूषण उन्हें आभूषित किये हुए थे। उनका प्रसन्नवदन मुस्कानसे भरा था। उनके दिव्य शरीरपर पीताम्बर सुशोभित था। उन्हें देखकर पतिके निधनका अनुमान करके कामिनी तुलसी मूच्छित हो गयी। फिर चेतना प्राप्त होनेपर उसने कहा।
तुलसी बोली-
नाथ ! आपका हृदय पाषाणके सदृश है; इसीलिये आपमें तनिक भी दया नहीं है। आज आपने छलपूर्वक (मेरे इस शरीरका) धर्म नष्ट करके मेरे (इस शरीरके) स्वामीको मार डाला। प्रभो! आप अवश्य ही पाषाण हृदय हैं, तभी तो इतने निर्दय बन गये! अतः देव! मेरे शापसे अब पाषाणरूप होकर आप पृथ्वीपर रहें। अहो! बिना अपराध ही अपने भक्तको आपने क्यों मरवा दिया ?
इस प्रकार कहकर शोकसे संतप्त हुई तुलसी आँखोंसे आँसू गिराती हुई बार बार विलाप करने लगी। तदनन्तर करुण रसके समुद्र कमलापति - भगवान् श्रीहरि करुणायुक्त तुलसीदेवीको देखकर नीतिपूर्वक वचनोंसे उसे समझाने लगे।
भगवान् श्रीहरि बोले-
भद्रे ! तुम मेरे लिये भारतवर्षमें रहकर बहुत दिनोंतक तपस्या कर चुकी हो। उस समय तुम्हारे लिये शङ्खचूड़ भी तपस्या कर रहा था। (वह मेरा ही अंश था।) अपनी तपस्याके फलसे तुम्हें स्त्रीरूपमें प्राप्त करके वह गोलोकमें चला गया। अब मैं तुम्हारी तपस्याका फल देना उचित समझता हूँ। तुम इस शरीरका त्याग करके दिव्य देह धारणकर मेरे साथ आनन्द करो। लक्ष्मीके समान तुम्हें सदा मेरे साथ रहना चाहिये। तुम्हारा यह शरीर नदीरूपमें परिणत हो 'गण्डकी' नामसे प्रसिद्ध होगा। यह पवित्र नदी पुण्यमय भारतवर्ष में मनुष्योंको उत्तम पुण्य देनेवाली बनेगी। तुम्हारे केशकलाप पवित्र वृक्ष होंगे। तुम्हारे केशसे उत्पन्न होनेके कारण तुलसीके नामसे ही उनकी प्रसिद्धि होगी। वरानने! तीनों लोकोंमें देवताओंकी पूजाके काममें आनेवाले जितने भी पत्र और पुष्प हैं, उन सबमें तुलसी प्रधान मानी जायगी। स्वर्गलोक, मर्त्यलोक, पाताल तथा वैकुण्ठलोकमें- सर्वत्र तुम मेरे संनिकट रहोगी। सुन्दरि! तुलसीके वृक्ष सब पुष्पोंमें श्रेष्ठ हों। गोलोक, विरजा नदीके तट, रासमण्डल, वृन्दावन, भूलोक, भाण्डीरवन, चम्पकवन, मनोहर चन्दनवन एवं माधवी, केतकी, कुन्द और मल्लिकाके वनमें तथा सभी पुण्य स्थानों में तुम्हारे पुण्यप्रद वृक्ष उत्पन्न हों और रहें। तुलसी वृक्षके नीचेके स्थान परम पवित्र एवं पुण्यदायक होंगे; अतएव वहाँ सम्पूर्ण तीर्थों और समस्त देवताओंका भी अधिष्ठान होगा। वरानने ! ऊपर तुलसीके पत्ते पडें, इसी उद्देश्यसे वे सब लोग वहाँ रहेंगे। तुलसीपत्रके जलसे जिसका अभिषेक हो गया, उसे सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करने तथा समस्त यज्ञोंमें दीक्षित होनेका फल मिल गया। साध्वी! हजारों घड़े अमृतसे नहलानेपर भी भगवान् श्रीहरिको उतनी तृप्ति नहीं होती है, जितनी वे मनुष्योंके तुलसीका एक पत्ता चढ़ाने से प्राप्त करते हैं। पतिव्रते! दस हजार गोदानसे मानव जो फल प्राप्त करता है, वही फल तुलसी पत्रके दानसे पा लेता है। जो मृत्युके समय मुखमें तुलसी पत्रका जल पा जाता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर भगवान् विष्णुके लोकमें चला जाता है। जो मनुष्य नित्यप्रति भक्तिपूर्वक तुलसीका जल ग्रहण करता है, वही जीवन्मुक्त है और उसे गङ्गा-स्नानका फल मिलता है। जो मानव प्रतिदिन तुलसीका पत्ता चढ़ाकर मेरी पूजा करता है, वह लाख अश्वमेध यज्ञोंका फल पा लेता है। जो - मानव तुलसीको अपने हाथमें लेकर और शरीर पर रखकर तीर्थों में प्राण त्यागता है, वह विष्णुलोक में चला जाता है। तुलसी काष्ठकी मालाको गलेमें धारण करनेवाला पुरुष पद पदपर अश्वमेध - यज्ञके फलका भागी होता है, इसमें संदेह नहीं।
जो मनुष्य तुलसीको अपने हाथपर रखकर प्रतिज्ञा करता है और फिर उस प्रतिज्ञाका पालन नहीं करता, उसे सूर्य और चन्द्रमाकी अवधिपर्यन्त 'कालसूत्र' नामक नरकमें यातना भोगनी पड़ती है। जो मनुष्य तुलसीको हाथमें लेकर या उसके निकट झूठी प्रतिज्ञा करता है, वह 'कुम्भीपाक' नामक नरकमें जाता है और वहाँ दीर्घकालतक वास करता है। मृत्युके समय जिसके मुख में तुलसीके जलका एक कण भी चला जाता है वह अवश्य ही विष्णुलोकको जाता है। पूर्णिमा, अमावास्या, द्वादशी और सूर्य-संक्रान्तिके दिन, मध्याह्नकाल, रात्रि, दोनों संध्याओं और अशौचके समय, तेल लगाकर बिना नहाये धोये अथवा - रातके कपड़े पहने हुए जो मनुष्य तुलसी पत्रोंको तोड़ते हैं, वे मानो भगवान् श्रीहरिका मस्तक छेदन करते हैं। साध्वि! श्राद्ध, व्रत, दान, प्रतिष्ठा तथा देवार्चनके लिये तुलसीपत्र बासी होनेपर भी तीन राततक पवित्र ही रहता है। पृथ्वीपर अथवा जलमें गिरा हुआ तथा श्रीविष्णुको अर्पित तुलसी पत्र धो देनेपर दूसरे कार्यके लिये शुद्ध माना जाता है। तुम निरामय गोलोक-धाममें तुलसीकी अधिष्ठात्री देवी बनकर मेरे स्वरूपभूत श्रीकृष्ण के साथ निरन्तर क्रीड़ा करोगी। तुम्हारी देहसे उत्पन्न नदीकी जो अधिष्ठात्री देवी है, वह भारतवर्ष में परम पुण्यदा नदी बनकर मेरे अंशभूत क्षार समुद्रकी पत्नी होगी। स्वयं तुम महासाध्वी तुलसीरूपसे वैकुण्ठमें मेरे संनिकट निवास करोगी। वहाँ तुम लक्ष्मीके समान सम्मानित होओगी। गोलोकके रासमें भी तुम्हारी उपस्थिति होगी, इसमें संशय नहीं है।
मैं तुम्हारे शापको सत्य करनेके लिये भारतवर्ष में 'पाषाण' (शालग्राम) बनकर रहूँगा। गण्डकी नदीके तटपर मेरा वास होगा। वहाँ रहनेवाले करोड़ों कीड़े अपने तीखे दाँतरूपी आयुधोंसे काट-काटकर उस पाषाणमें मेरे चक्रका चिह्न करेंगे। जिसमें एक द्वारका चिह्न होगा, चार चक्र होंगे और जो वनमालासे विभूषित होगा, वह नवीन मेघके समान श्यामवर्णका पाषाण 'लक्ष्मी नारायण' का बोधक होगा। जिसमें एक द्वार और चार चक्रके चिह्न होंगे तथा वनमालाकी रेखा नहीं प्रतीत होती होगी, ऐसे नवीन मेघकी तुलना करनेवाले श्यामरंगके पाषाणको 'लक्ष्मीजनार्दन' की संज्ञा दी जानी चाहिये। दो द्वार, चार चक्र और गायके खुरके चिह्नसे सुशोभित एवं वनमालाके ।
चिह्नसे रहित श्याम पाषाणको भगवान् 'राघवेन्द्र' का विग्रह मानना चाहिये। जिसमें बहुत छोटे दो चक्रके चिह्न हों, उस नवीन मेघके समान कृष्णवर्णके पाषाणको भगवान् 'दधिवामन' मानना चाहिये, वह गृहस्थोंके लिये सुखदायक है। अत्यन्त छोटे आकारमें दो चक्र एवं वनमालासे सुशोभित पाषाण स्वयं भगवान् श्रीधर' का रूप है- ऐसा समझना चाहिये। ऐसी मूर्ति भी गृहस्थोंको सदा श्रीसम्पन्न बनाती है। जो पूरा स्थूल हो, जिसकी आकृति गोल हो, जिसके ऊपर वनमालाका चिह्न अङ्कित न हो तथा जिसमें दो अत्यन्त स्पष्ट चक्र चिह्न दिखायी पड़ते हों, उस शालग्राम शिलाकी 'दामोदर' संज्ञा है। जो मध्यम श्रेणीका वर्तुलाकार हो, जिसमें दो चक्र तथा तरकस और बाणके चिह्न शोभा पाते हों, एवं जिसके ऊपर बाणसे कट जानेका चिह्न हो, उस पाषाणको रणमें शोभा पानेवाले भगवान् 'रणराम' की संज्ञा देनी चाहिये। जो मध्यम श्रेणीका पाषाण सात चक्रोंसे तथा छत्र एवं तरकससे अलंकृत हो, उसे भगवान् 'राजराजेश्वर' की प्रतिमा समझे उसकी उपासनासे मनुष्यों को राजाकी सम्पत्ति सुलभ हो सकती है। चौदह चक्रोंसे सुशोभित तथा नवीन मेघके समान रंगवाले स्थूल पाषाणको भगवान् 'अनन्त' का विग्रह मानना चाहिये। उसके पूजनसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- ये चारों फल प्राप्त होते हैं। जिसकी आकृति चक्रके समान हो तथा जो दो चक्र, श्री और गो-खुरके चिह्नसे शोभा पाता हो, ऐसे नवीन मेघके समान वर्णवाले मध्यम श्रेणी के पाषाणको भगवान् 'मधुसूदन' समझना चाहिये। केवल एक चक्रवाला 'सुदर्शन' का, गुप्तचक्र चिह्नवाला 'गदाधर' का तथा दो चक्र एवं अश्वके मुखकी आकृतिसे युक्त पाषाण भगवान् ‘हयग्रीव' का विग्रह कहा जाता है। साध्वि! जिसका मुख अत्यन्त विस्तृत हो, जिसपर दो चक्र चिह्नित हों तथा जो बड़ा विकट प्रतीत होता हो ऐसे पाषाणको भगवान् 'नरसिंह' की प्रतिमा समझनी चाहिये। वह मनुष्यको तत्काल वैराग्य प्रदान करनेवाला है। जिसमें दो चक्र हों, विशाल मुख हो तथा जो वनमालाके चिह्नसे सम्पन्न हो, गृहस्थोंके लिये सदा सुखदायी हो, उस पाषाणको भगवान् 'लक्ष्मीनारायण' का विग्रह समझना चाहिये। जो द्वार-देशमें दो चक्रोंसे युक्त हो तथा जिसपर श्रीका चिह्न स्पष्ट दिखायी पड़े, ऐसे पाषाणको भगवान् 'वासुदेव' का विग्रह मानना चाहिये। इस विग्रहकी अर्चनासे सम्पूर्ण कामनाएँ सिद्ध हो सकेंगी। सूक्ष्म चक्रके चिह्नसे युक्त, नवीन मेघके समान श्याम तथा मुखपर बहुत-से छोटे-छोटे छिद्रोंसे सुशोभित पाषाण 'प्रद्युम्न' का स्वरूप होगा। उसके प्रभावसे गृहस्थ सुखी हो जायँगे। जिसमें दो चक्र सटे हुए हों और जिसका पृष्ठभाग विशाल हो, गृहस्थोंको निरन्तर सुख प्रदान करनेवाले उस पाषाणको भगवान् 'संकर्षण' की प्रतिमा समझनी चाहिये जो अत्यन्त सुन्दर गोलाकार हो तथा पीले रंगसे सुशोभित हो, विद्वान् पुरुष कहते हैं कि गृहाश्रमियोंको सुख देनेवाला वह पाषाण भगवान् 'अनिरुद्ध' का स्वरूप है। जहाँ शालग्रामकी शिला रहती है, वहाँ भगवान् श्रीहरि विराजते हैं और वहीं सम्पूर्ण तीर्थोको साथ लेकर भगवती लक्ष्मी भी निवास करती हैं। ब्रह्महत्या आदि जितने पाप हैं, वे सब शालग्राम शिलाकी पूजा करनेसे नष्ट हो जाते हैं। छत्राकार शालग्राममें राज्य देनेकी तथा वर्तुलाकारमें प्रचुर सम्पत्ति देनेकी योग्यता है। शकटके आकारवाले शालग्रामसे दुःख तथा शूलके नोकके समान आकारवालेसे मृत्यु होनी निश्चित है। विकृत मुखवाले दरिद्रता, पिङ्गलवर्णवाले हानि, भग्नचक्रवा व्याधि तथा फटे हुए शालग्राम निश्चितरूपसे मरणप्रद हैं। व्रत, दान, प्रतिष्ठा तथा श्राद्ध आदि सत्कार्य शालग्रामकी संनिधिमें करनेसे सर्वोत्तम हो सकते हैं। जो अपने ऊपर शालग्राम शिलाका जल छिड़कता है, वह सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान कर चुका तथा समस्त यज्ञोंका फल पा गया। अखिल यज्ञों, तीर्थों, व्रतों और तपस्याओंके फलका वह अधिकारी समझा जाता है। साध्वि! चारों वेदोंके पढ़ने तथा तपस्या करनेसे जो पुण्य होता है, वही पुण्य शालग्राम शिलाकी उपासनासे प्राप्त हो जाता - है। जो निरन्तर शालग्राम शिलाके जलसे अभिषेक - करता है, वह सम्पूर्ण दानके पुण्य तथा पृथ्वीकी प्रदक्षिणाके उत्तम फलका मानो अधिकारी हो जाता है। शालग्राम शिलाके जलका निरन्तर पान - करनेवाला पुरुष देवाभिलषित प्रसाद पाता है; इसमें संशय नहीं। उसे जन्म, मृत्यु और जरासे छुटकारा मिल जाता है। सम्पूर्ण तीर्थ उस पुण्यात्मा पुरुषका स्पर्श करना चाहते हैं। जीवन्मुक्त एवं महान् पवित्र वह व्यक्ति भगवान् श्रीहरिके पदका अधिकारी हो जाता है। भगवान्के धाम में वह उनके साथ असंख्य प्राकृत प्रलयतक रहनेकी सुविधा प्राप्त करता है। वहाँ जाते ही भगवान् उसे अपना दास बना लेते हैं। उस पुरुषको देखकर, ब्रह्महत्या के समान जितने बड़े-बड़े पाप हैं, वे इस प्रकार भागने लगते हैं, जैसे गरुड़को देखकर सर्प उस पुरुषके चरणोंकी रजसे पृथ्वीदेवी तुरंत पवित्र हो जाती हैं। उसके जन्म लेते ही लाखों पितरोंका उद्धार हो जाता है। मृत्युकालमें जो शालग्रामके जलका पान करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर विष्णुलोकको चला जाता है। उसे निर्वाणमुक्ति सुलभ हो जाती है। वह कर्मभोगसे छूटकर भगवान् श्रीहरिके चरणोंमें लीन हो जाता है इसमें कोई संशय नहीं। शालग्रामको हाथमें लेकर मिथ्या बोलनेवाला व्यक्ति 'कुम्भीपाक' नरकमें जाता है और ब्रह्माकी आयुपर्यन्त उसे वहाँ रहना पड़ता है। जो शालग्रामको धारण करके की हुई प्रतिज्ञाका पालन नहीं करता, उसे लाख मन्वन्तरतक 'असिपत्र' नामक नरकमें रहना पड़ता है। कान्ते! जो व्यक्ति शालग्रामपरसे तुलसीके पत्रको दूर करेगा, उसे दूसरे जन्ममें स्त्री साथ न दे सकेगी। शङ्ख तुलसीपत्रका विच्छेद करनेवाला व्यक्ति भार्याहीन तथा सात जन्मोंतक रोगी होगा। शालग्राम, तुलसी और शङ्ख - इन तीनोंको जो महान् ज्ञानी पुरुष एकत्र सुरक्षितरूपसे रखता है, उससे भगवान् श्रीहरि बहुत प्रेम करते हैं। नारद! इस प्रकार देवी तुलसीसे कहकर भगवान् श्रीहरि मौन हो गये। उधर देवी तुलसी अपना शरीर त्यागकर दिव्य रूपसे सम्पन्न हो भगवान् श्रीहरिके वक्षःस्थलपर लक्ष्मीकी भाँति शोभा पाने लगी। कमलापति भगवान् श्रीहरि उसे साथ लेकर वैकुण्ठ पधार गये। नारद! लक्ष्मी, सरस्वती, गङ्गा और तुलसी- ये चार देवियाँ भगवान् श्रीहरिकी पत्तियाँ हुई। उसी समय तुलसीकी देहसे गण्डकी नदी उत्पन्न हुई और भगवान् श्रीहरि भी उसीके तटपर मनुष्योंके लिये पुण्यप्रद शालग्राम शिला बन गये। मुने! वहाँ रहनेवाले कीड़े शिलाको काट-काटकर अनेक प्रकारकी बना देते हैं। वे पाषाण जलमें गिरकर निश्चय ही उत्तम फल प्रदान करते हैं। जो पाषाण धरतीपर पड़ जाते हैं, उनपर सूर्यका ताप पड़नेसे पीलापन आ जाता है, ऐसी शिलाको पिङ्गला समझनी चाहिये। (वह शिला पूजामें उत्तम नहीं मानी जाती है।)
नारद! इस प्रकार यह सभी प्रसङ्ग मैंने कह सुनाया; अब पुनः क्या सुनना चाहते हो ? (अध्याय २१)