श्री ब्रह्म वैवर्त महापुराण - प्रकृति खंड

55- श्रीराधाके ध्यान, षोडशोपचार पूजन, परिचारिकापूजन, परिहारस्तवन, - पूजन-महिमा तथा स्तुति एवं उसके माहात्म्यका वर्णन

श्रीपार्वतीने पूछा-

भगवन् ! आप पुरुषोंके 'पूछा- भगवन्! ईश्वर श्रीकृष्णके मन्त्रके होते हुए उन वैष्णवनरेश सुयज्ञने राधाका मन्त्र क्यों ग्रहण किया ? सुतपाने राजाको श्रीराधाकी पूजाका कौन-सा विधान बताया? तथा किस ध्यान, किस स्तोत्र, किस कवच और किस मन्त्रका उपदेश दिया ? श्रीराधाकी पूजापद्धति क्या है? ये सब बातें बताइये।

श्रीमहेश्वर बोले-

प्रिये ! राजाने यह प्रश्न किया था कि 'हे विप्र! हे मुने! मैं किसका भजन करूँ? किसकी आराधनासे शीघ्र गोलोक प्राप्त कर लूँगा?' उनके ऐसा कहनेपर उन ब्राह्मणशिरोमणिने राजेन्द्र सुयज्ञसे कहा- 'महाराज ! श्रीकृष्णकी सेवासे उनके लोकको तुम बहुत जन्मों में प्राप्त करोगे, अतः उनके प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी परात्परस्वरूपा श्रीराधाका भजन करो। वे कृपामयी हैं। उनके प्रसादसे साधक शीघ्र ही उनके धामको प्राप्त कर लेता है ऐसा कहकर मुनिने उन्हें राधाके इस षडक्षर मन्त्रका उपदेश दिया। वह मन्त्र इस प्रकार है- ॐ राधायै स्वाहा।' इसके बाद प्राणायाम, भूतशुद्धि, मन्त्रन्यास, करन्यास, अङ्गन्यास, उनके सर्व दुर्लभ ध्यान, स्तोत्र और कवचकी भक्तिभावसे राजाको शिक्षा दी। राजाने उसी क्रमसे उस मन्त्रका जप किया। साथ ही श्रीकृष्णने पूर्वकालमें जिस ध्यानके द्वारा श्रीराधाका चिन्तन एवं पूजन किया था, उसी सामवेदोक्त ध्यानके अनुसार उनके स्वरूपका चिन्तन किया। वह ध्यान मङ्गलोंके लिये भी मङ्गलकारी है।

ध्यान -

श्रीराधाकी अङ्गकान्ति श्वेत चम्पाके समान गौर है। वे अपने अङ्गों में करोड़ों चन्द्रमाओंके समान मनोहर कान्ति धारण करती हैं। उनका मुख शरद ऋतुकी पूर्णिमाके चन्द्रमाको लज्जित करता - है। दोनों नेत्र शरत्कालके प्रफुल्ल कमलोंकी शोभाको छीने लेते हैं। उनके श्रोणिदेश एवं नितम्बभाग बहुत ही सुन्दर हैं। अधर पके हुए बिम्बफलकी लाली धारण करते हैं। वे श्रेष्ठ सुन्दरी हैं। मुक्ताकी पंक्तियोंको तिरस्कृत करनेवाली दन्तपङ्क्ति उनके मुखकी मनोहरताको बढ़ाती है। उनके वदनपर मन्द मुस्कानजनित प्रसन्नता खेलती रहती है। वे भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये व्याकुल रहती हैं। अग्निशुद्ध चिन्मय वस्त्र उनके श्रीअङ्गको आच्छादित करते हैं। वे रत्नोंके हारसे विभूषित हैं। रत्नमय केयूर और कंगन धारण करती हैं। रत्नोंके ही बने हुए मंजीर उनके पैरोंकी शोभा बढ़ाते हैं। रत्ननिर्मित विचित्र कुण्डल उनके दोनों कानोंकी श्रीवृद्धि करते हैं। सूर्यप्रभाकी प्रतिमारूप कपोल-युगलसे वे सुशोभित होती हैं। अमूल्य रत्नोंके बने हुए कण्ठहार उनके ग्रीवा प्रदेशको विभूषित करते हैं। उत्तम रत्नों के सारतत्त्वसे निर्मित किरीट-मुकुट उनकी उज्ज्वलताको जाग्रत् किये रहते हैं। रत्नोंकी मुद्रिका और पाशक (चेन या पासा आदि) उनकी शोभा बढ़ाते हैं। वे मालतीके पुष्पों और हारोंसे अलंकृत केशपाश धारण करती हैं। वे रूपकी अधिष्ठात्री देवी हैं और गजराजकी भाँति मन्द गतिसे चलती हैं। जो उन्हें अत्यन्त प्यारी हैं, ऐसी गोप-किशोरियाँ श्वेत चँवर लेकर उनकी सेवा करती हैं। कस्तूरीकी बेंदी,

चन्दनके बिन्दु और सिन्दूरकी टीकीसे उनके मनोहर सीमन्तका निम्नभाग अत्यन्त उद्दीप्स दिखायी देता है। रासमें रासेश्वरके सहित विराजित रासेश्वरी राधाका मैं भजन करता हूँ। इस प्रकार ध्यान कर मस्तकपर पुष्प अर्पित करके पुनः जगदम्बा श्रीराधाका चिन्तन करे और फूल चढ़ावे पुनः ध्यानके पश्चात् सोलह उपचार अर्पित करे। आसन, वसन, पाद्य, अर्घ्य, गन्ध, अनुलेपन, धूप, दीप, सुन्दर पुष्प, स्त्रानीय, रत्नभूषण, विविध नैवेद्य, सुवासित ताम्बूल, जल, मधुपर्क तथा रत्नमयी शय्या ये सोलह उपचार - हैं। राजाने इनमें से प्रत्येकको वेदमन्त्रके उच्चारणपूर्वक भक्तिभावसे अर्पित किया। शिवे इन उपचारोंके समर्पणके लिये जो सर्वसम्मत मन्त्र हैं, उन्हें सुनो।

(१) आसन

रत्नसारविकारं च निर्मितं विश्वकर्मणा ।

वरं सिंहासनं रम्यं राधे पूजासु गृह्यताम् ॥

राधे! पूजाके अवसरपर विश्वकर्माद्वारा रचित रमणीय श्रेष्ठ सिंहासन, जो रत्नसारका बना हुआ है, ग्रहण करो। (आसन आदिके स्थानपर साधारण लोग पुष्प आदिका आसन तथा अन्य उपचार, जो सर्वसुलभ हैं, दे सकते हैं; परंतु मानसिक भावनाद्वारा उसे रत्नसिंहासन आदि मानकर ही अर्पित करें। इस भावनाके अनुसार ये पूजासम्बन्धी मन्त्र हैं। मानसिक भावनाद्वारा उत्तम-से-उत्तम वस्तु इष्टदेवको अर्पित की जा सकती है।)

(२) वसन

अमूल्यरत्नखचितममूल्यं सूक्ष्ममेव च ।

वह्रिशुद्धं निर्मलं च वसनं देवि गृह्यताम् ॥

देवि! बहुमूल्य रत्नोंसे जटित सूक्ष्म वस्त्र, जिसका मूल्य आँका नहीं जा सकता, आपकी सेवामें प्रस्तुत है। यह अग्रिसे शुद्ध किया गया, चिन्मय एवं स्वभावतः निर्मल है। इसे स्वीकार करो।

(३) पाद्य

सद्रत्नसारपात्रस्थं सर्वतीर्थोदकं शुभम् ।

पादप्रक्षालनार्थं च राधे पाद्यं च गृह्यताम् ॥

राधे! उत्तम रत्नसारद्वारा निर्मित पात्रमें सम्पूर्ण तीर्थोंका शुभ जल तुम्हारी सेवामें अर्पित किया गया है। तुम्हारे दोनों चरणोंको पखारनेके लिये

यह पाद्य जल है। इसे ग्रहण करो।

(४) अर्घ्य

दक्षिणावर्त्तशङ्खस्थं सदूर्वापुष्पचन्दनम् ।

पूतं युक्तं तीर्थतोयै राधेऽर्घ्यं प्रतिगृह्यताम् ॥

राधे! दक्षिणावर्त शङ्खमें रखा हुआ दूर्वा, पुष्प, चन्दन तथा तीर्थजलसे युक्त यह पवित्र अर्घ्य प्रस्तुत है। इसे स्वीकार करो।

(५) गन्ध

पार्थिवद्रव्यसम्भूतमतीवसुरभीकृतम् ।

मङ्गलाई पवित्रं च राधे गन्धं गृहाण मे ॥

राधे! पार्थिव द्रव्योंसे सम्भूत अत्यन्त सुगन्धित  मङ्गलोपयोगी तथा पवित्र गन्ध मुझसे ग्रहण करो।

(६) अनुलेपन ( चन्दन )

श्रीखण्डचूर्ण सुस्निग्धं कस्तूरीकुङ्कुमान्वितम् ।

सुगन्धयुक्तं देवेशि गृह्यतामनुलेपनम् ॥

देवेश्वरि ! कस्तूरी, कुङ्कुम और सुगन्धसे युक्त यह सुस्निग्ध चन्दनचूर्ण अनुलेपनके रूपमें तुम्हारे सामने प्रस्तुत है। इसे स्वीकार करो ।

(७) धूप

वृक्षनिर्याससंयुक्तं पार्थिवद्रव्यसंयुतम् ।

अग्निखण्डशिखाजातं धूपं देवि गृहाण मे ॥

देवि! वृक्षकी गोंद (गुग्गुल) तथा पार्थिव द्रव्योंसे संयुक्त यह धूप प्रज्वलित अग्निशिखासे निर्गत धूमके रूपमें प्रस्तुत है। मेरी इस वस्तुको ग्रहण करो ।

(८) दीप

अन्धकारे भयहरममूल्यमणिशोभितम् ।

रत्नप्रदीपं शोभाढ्यं गृहाण परमेश्वरि ।

परमेश्वरि ! अमूल्य रत्नोंका बना हुआ यह परम उज्ज्वल शोभाशाली रत्नप्रदीप अन्धकार भयको दूर करनेवाला है। इसे स्वीकार करो ।

(९) पुष्प

पारिजातप्रसूनं च गन्धचन्दनचर्चितम् ।

अतीव शोभनं रम्यं गृह्यतां परमेश्वरि ॥

परमेश्वरि गन्ध और चन्दनसे चर्चित, अत्यन्त शोभायमान यह रमणीय पारिजात पुष्प ग्रहण करो।

(१०) स्त्रानीय

सुगन्धामलकीचूर्णं सुस्निग्धं सुमनोहरम् ।

विष्णुतैलसमायुक्तं स्त्रानीयं देवि गृह्यताम् ॥

देवि ! विष्णुतैलसे युक्त यह अत्यन्त मनोहर एवं सुस्निग्ध सुगन्धित आँवलेका चूर्ण सेवामें प्रस्तुत है। इस स्नानोपयोगी वस्तुको तुम स्वीकार करो ।

(११) भूषण

अमूल्यरत्ननिर्माणं केयूरवलयादिकम् ।

शङ्खं सुशोभनं राधे गृह्यतां भूषणं मम ॥

राधे! अमूल्य रत्नोंके बने हुए केयूर, कङ्कण आदि आभूषणोंको तथा परम शोभाशाली शङ्खकी चूड़ियोंको मेरी ओरसे ग्रहण करो।

(१२) नैवेद्य

कालदेशोद्भवं पक्वफलं च लड्डुकादिकम् ।

परमान्नं च मिष्टान्नं नैवेद्यं देवि गृह्यताम् ॥

देवि! देश-कालके अनुसार उपलब्ध हुए पके फल तथा लड्डू आदि उत्तम मिष्टान्न नैवेद्यके रूपमें प्रस्तुत किया गया है। इसे स्वीकार करो।

(१३) ताम्बूल और (१४) जल ताम्बूलं च वरं रम्यं कर्पूरादिसुवासितम्। सर्वभोगाधिकं स्वादु सलिलं देवि गृह्यताम् ॥

देवि! कर्पूर आदिसे सुवासित, सब भोगोंसे उत्कृष्ट, रमणीय एवं सुन्दर ताम्बूल तथा स्वादिष्ट जल ग्रहण करो।

(१५) मधुपर्क

अशनं रत्नपात्रस्थं सुस्वादु सुमनोहरम् ।

मया निवेदितं भक्त्या गृह्यतां परमेश्वरि ॥

परमेश्वरि ! रत्नमय पात्रमें रखा हुआ यह अशन (मधुपर्क) अत्यन्त स्वादिष्ट तथा परम मनोहर है। मैंने भक्तिभावसे इसे सेवामें समर्पित किया है। कृपया स्वीकार करो।

(१६) शय्या

रत्नेन्द्रसारनिर्माणं वह्निशुद्धांशुकान्वितम् ।

पुष्पचन्दनचर्चाढ्यं पर्य्यङ्कं देवि गृह्यताम् ॥

देवि! श्रेष्ठ रत्नोंके सारभागसे निर्मित अग्निशुद्ध निर्मल वस्त्रसे आच्छादित तथा पुष्प और चन्दन से चर्चित यह शय्या प्रस्तुत है। इसे ग्रहण करो। इस प्रकार देवी श्रीराधाका सम्यक् पूजन करके उनके लिये तीन बार पुष्पाञ्जलि दे तथा देवीकी आठ नायिकाओंका, जो उनकी परम प्रिया परिचारिकाएँ हैं, यत्नपूर्वक भक्तिभावसे पञ्चोपचार पूजन करे । प्रिये ! उनके पूजनका क्रम पूर्व आदिसे आरम्भ करके दक्षिणावर्त बताया | गया है। पूर्वदिशामें मालावती, अग्निकोणमें माधवी, दक्षिणमें रत्नमाला, नैर्ऋत्यकोणमें सुशीला, पश्चिममें शशिकला, वायव्यकोणमें पारिजाता, उत्तरमें पद्मावती तथा ईशानकोणमें सुन्दरीकी पूजा करे। व्रती पुरुष व्रतकालमें यूथिका (जूही), मालती और कमलोंकी माला चढ़ावे। तत्पश्चात् सामवेदोक्त रीतिसे परिहार नामक स्तुति करे - परिहारके मन्त्र इस प्रकार हैं

त्वं देवी जगतां माता विष्णुमाया सनातनी

कृष्णप्राणाधिदेवी च कृष्णप्राणाधिका शुभा ॥

कृष्णप्रेममयी शक्तिः कृष्णसौभाग्यरूपिणी ।

कृष्णभक्तिप्रदे राधे नमस्ते मङ्गलप्रदे॥

अद्य मे सफलं जन्म जीवनं सार्थकं मम ।

पूजितासि मया सा च या श्रीकृष्णेन पूजिता ॥

कृष्णवक्षसि या राधा सर्वसौभाग्यसंयुता ।

रासे रासेश्वरीरूपा वृन्दा वृन्दावने वने ॥

कृष्णप्रिया च गोलोके तुलसी कानने तु या ।

चम्पावती कृष्णसङ्गे क्रीडा चम्पककानने ॥

चन्द्रावली चन्द्रवने शतशृङ्गे सतीति च । विरजादर्पहन्त्री च विरजातटकानने ॥

पद्मावती पद्मवने कृष्णा कृष्णसरोवरे ।

भद्रा कुञ्जकुटीरे च काम्या वै काम्यके वने ॥

वैकुण्ठे च महालक्ष्मीर्वाणी नारायणोरसि ।

क्षीरोदे सिन्धुकन्या च मर्त्ये लक्ष्मीर्हरिप्रिया ॥

सर्वस्वर्गे स्वर्गलक्ष्मीर्देवदुःखविनाशिनी ।

सनातनी विष्णुमाया दुर्गा शङ्करवक्षसि ॥

सावित्री वेदमाता च कलया ब्रह्मवक्षसि ।

कलया धर्मपत्नी त्वं नरनारायणप्रसूः ॥

कलया तुलसी त्वं च गङ्गा भुवनपावनी ।

लोमकूपोद्भवा गोप्यः कलांशा रोहिणी रतिः ॥

कलाकलांशरूपा च शतरूपा शची दितिः ।

अदितिर्देवमाता च त्वत्कलांशा हरिप्रिया ॥

देव्यश्च मुनिपल्यश्च त्वत्कलाकलया शुभे।

कृष्णभक्तिं कृष्णदास्यं देहि मे कृष्णपूजिते ॥

एवं कृत्वा परीहारं स्तुत्वा च कवचं पठेत् ।

पुराकृतं स्तोत्रमेतद्भक्तिदास्यप्रदं शुभम् ॥

( प्रकृतिखण्ड ५५ । ४४-५७)

श्रीराधे! तुम देवी हो । जगज्जननी सनातनी विष्णुमाया हो। श्रीकृष्णके प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी तथा उन्हें प्राणोंसे भी अधिक प्यारी हो । शुभस्वरूपा हो । कृष्णप्रेममयी शक्ति तथा श्रीकृष्णसौभाग्यरूपिणी हो। श्रीकृष्णकी भक्ति प्रदान करनेवाली मङ्गलदायिनी राधे ! तुम्हें नमस्कार है। आज मेरा जन्म सफल है। आज मेरा जीवन सार्थक हुआ; क्योंकि श्रीकृष्णने जिसकी पूजा की है, वही देवी आज मेरे द्वारा पूजित हुई। श्रीकृष्णके वक्षःस्थलमें जो सर्वसौभाग्यशालिनी राधा हैं, वे ही रासमण्डलमें रासेश्वरी, वृन्दावनमें वृन्दा, गोलोकमें कृष्णप्रिया, तुलसी-काननमें तुलसी, कृष्णसंगमें चम्पावती, चम्पक-काननमें क्रीडा, चन्द्रवनमें चन्द्रावली, शतशृङ्ग पर्वतपर सती, विरजातटवर्ती काननमें विरजादर्पहन्त्री, पद्मवनमें पद्मावती, कृष्णसरोवरमें कृष्णा, कुञ्जकुटीरमें भद्रा, काम्यकवनमें काम्या, वैकुण्ठमें महालक्ष्मी, नारायणके हृदयमें वाणी, क्षीरसागरमें सिन्धुकन्या, मर्त्यलोकमें हरिप्रिया लक्ष्मी, सम्पूर्ण स्वर्गमें देवदुःखविनाशिनी स्वर्गलक्ष्मी तथा शंकरके वक्षःस्थलपर सनातनी विष्णुमाया दुर्गा हैं। वही अपनी कलाद्वारा वेदमाता सावित्री होकर ब्रह्मवक्ष में विलास करती हैं। देवि राधे! तुम्हीं अपनी कलासे धर्मकी पत्नी एवं मुनि नर-नारायणकी जननी हो। तुम्हीं अपनी कलाद्वारा तुलसी तथा भुवनपावनी गङ्गा हो। गोपियाँ तुम्हारे रोमकूपोंसे प्रकट हुई हैं। रोहिणी तथा रति तुम्हारी कलाकी अंशस्वरूपा हैं। शतरूपा, शची और दिति तुम्हारी कलाकी कलांशरूपिणी हैं। देवमाता हरिप्रिया अदिति तुम्हारी कलांशरूपा हैं। शुभे! देवाङ्गनाएँ और मुनिपत्नियाँ तुम्हारी कलाकी कलासे प्रकट हुई हैं। कृष्णपूजिते! तुम मुझे श्रीकृष्णकी भक्ति और श्रीकृष्णका दास्य प्रदान करो ।

इस प्रकार परिहार एवं स्तुति करके कवचका पाठ करे। यह प्राचीन शुभ स्तोत्र श्रीहरिकी भक्ति एवं दास्य प्रदान करनेवाला है। इस प्रकार जो प्रतिदिन श्रीराधाकी पूजा करता है, वह भारतवर्ष में साक्षात् विष्णुके समान है। जीवन्मुक्त एवं पवित्र है। उसे निश्चय ही गोलोकधामकी प्राप्ति होती है। शिवे! जो प्रतिवर्ष कार्तिककी पूर्णिमाको इसी क्रमसे राधाकी पूजा करता है, वह राजसूय यज्ञके फलका भागी होता है। इहलोकमें उत्तम ऐश्वर्यसे सम्पन्न एवं पुण्यवान् होता है और अन्तमें सब पापोंसे मुक्त हो श्रीकृष्णधाममें जाता है। पार्वति! आदिकालमें पहले श्रीकृष्णने इसी क्रमसे वृन्दावनके रासमण्डल में श्रीराधाकी स्तुति एवं पूजा की थी। दूसरी बार तुम्हारे वरसे वेदमाता सावित्रीको पाकर सृष्टिकर्ता ब्रह्माजीने इसी क्रमसे राधाका पूजन किया था। नारायणने भी श्रीराधाकी आराधना करके महालक्ष्मी, सरस्वती, गङ्गा तथा भुवनपावनी पराशक्ति तुलसीको प्राप्त किया था। क्षीरसागरशायी श्रीविष्णुने राधाकी आराधना करके ही सिन्धुसुताको प्राप्त किया था। पहले दक्षकन्याकी मृत्यु हो जानेपर मैंने भी श्रीकृष्णकी आज्ञासे पुष्करमें श्रीराधाकी पूजा की और उसके प्रभावसे तुम्हें प्राप्त किया। पतिव्रता श्रीराधाकी पूजा करके उनके दिये हुए वरसे कामदेवने रतिको, धर्मदेवने सती साध्वी मूर्तिको तथा देवताओं और मुनियोंने धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्षको प्राप्त किया था। इस प्रकार मैंने श्रीराधाकी पूजाका विधान बताया है। अब स्तोत्र सुनो।

एक बार श्रीराधाजी मान करके श्रीकृष्णके समीपसे अन्तर्धान हो गयीं। तब ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि सब देवता ऐश्वर्यभ्रष्ट, श्रीहीन, भार्यारहित तथा उपद्रवग्रस्त हो गये। इस परिस्थितिपर विचार करके उन सबने भगवान् श्रीकृष्णकी शरण ली। उनके स्तोत्रसे संतुष्ट हुए सबके परमात्मा श्रीकृष्णने स्नान करके शुद्ध हो सती राधिकाकी पूजा करके उनका इस प्रकार स्तवन किया।

श्रीकृष्ण बोले-

सुमुखि श्रीराधे! क्या मैं इसी प्रकार तुम्हारा प्रिय हूँ और मुझमें तुम्हारी प्रीति है? तुम्हारी वाणीमें जो छलना थी, वह आज अच्छी तरह प्रकट हो गयी। 'हे कृष्ण ! तुम मेरे प्राण हो, जीवात्मा हो' इस तरहकी बातें जो तुम नित्य निरन्तर प्रेमपूर्वक कहा करती थीं, वे अब तत्काल कहाँ चली गयीं? मैं पहले तुम्हारे सामने जो कुछ कहता था, मेरा वचन आज भी ध्रुव सत्य है। 'तुम मेरे पाँचों प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी हो', 'राधा मेरे लिये प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय है'– मेरी ये बातें जैसे पहले सत्य थीं, उसी तरह आज भी हैं। मैं तुम्हें अपने पास रखनेमें समर्थ न हो सका, अतः तुम्हारे बिना मेरे प्राण चले जा रहे हैं। अधिष्ठात्री देवीके बिना कौन कहाँ जीवित रह सकता है? तुम महाविष्णुकी माता, मूलप्रकृति ईश्वरी हो। अपनी कलासे तुम सगुणरूपमें प्रकट होती हो। स्वयं तो निर्गुणा (प्राकृत गुणोंसे रहित) ही हो। ज्योतिः पुञ्ज ही तुम्हारा स्वरूप है। तुम वास्तवमें निराकार हो। भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही तुम रूप धारण करती हो । भक्तोंकी विभिन्न रुचिके कारण नाना प्रकारकी मूर्तियाँ ग्रहण करती हो। वैकुण्ठमें महालक्ष्मी और सरस्वतीके रूपमें तुम्हारा ही निवास है। पुण्यक्षेत्र भारतवर्ष में सत्पुरुषोंकी जननी भी तुम्हीं हो। सती और पार्वतीके रूपमें तुम्हारा ही प्राकट्य हुआ है। तुम्हीं पुण्यरूपा तुलसी और भुवनपावनी गङ्गा हो। ब्रह्मलोकमें सावित्रीके रूपमें तुम्हीं रहती हो। तुम्हीं अपनी कलासे वसुन्धरा हुई हो, गोलोकमें तुम्हीं समस्त गोपालोंकी अधीश्वरी राधा हो। तुम्हारे बिना मैं निर्जीव हूँ। किसी भी कर्मको करनेमें असमर्थ हूँ। तुम्हें शक्तिके रूपमें पाकर ही शिव शक्तिमान् हैं। तुम्हारे बिना वे शिव नहीं, शव हैं। तुम्हें ही वेदमाता सावित्री के रूपमें अपने साथ पाकर साक्षात् ब्रह्माजी वेदोंके प्राकट्यकर्ता माने गये हैं। तुम लक्ष्मीका सहयोग मिलनेसे ही जगत्पालक नारायण जगत्का पालन करते हैं। तुम्हीं दक्षिणारूप साथ रहती हो, इसलिये यज्ञ फल देता है। पृथ्वीके रूपमें तुम्हें मस्तकपर धारण करके ही शेषनाग सृष्टिका संरक्षण करते हैं। गङ्गाधर शिव तुम्हें ही गङ्गारूपमें अपने मस्तकपर धारण करते हैं तुमसे ही सारा जगत् शक्तिमान् है तुम्हारे बिना सब कुछ शव (मृतक) के तुल्य है। तुम वाणी हो। तुम्हें पाकर ही सब लोग वक्ता बनते हैं। तुम्हारे बिना पौराणिक सूत भी मूक हो जाता है। जैसे कुम्हार सदा मिट्टीके सहयोगसे ही घड़ा बनानेमें समर्थ होता है, उसी प्रकार तुम प्रकृतिदेवीके साथ ही मैं सृष्टि रचनामें सफल होता हूँ। तुम्हारे बिना मैं सर्वत्र जड हूँ। कहीं भी शक्तिमान् नहीं हूँ। तुम्हीं सर्वशक्तिस्वरूपा हो । अतः मेरे निकट आओ अग्निमें तुम्हीं दाहिकाशक्ति हो। तुम्हारे बिना अग्नि दाहकर्ममें समर्थ नहीं हैं। चन्द्रमामें तुम्हीं शोभा बनकर रहती हो। तुम्हारे बिना चन्द्रमा सुन्दर नहीं लगेगा सूर्यमें तुम्हीं प्रभा हो। तुम्हारे बिना सूर्यदेव प्रभापूर्ण नहीं रह सकते। प्रिये! तुम्हीं रति । हो। तुम्हारे बिना कामदेव कामिनियोंके प्राणवल्लभ नहीं हो सकते।

इस प्रकार श्रीराधाकी स्तुति करके जगत्प्रभु श्रीकृष्णने उन्हें प्राप्त किया। फिर तो सब देवता सश्रीक, सस्त्रीक और शक्तिसम्पन्न हो गये। गिरिराजनन्दिनि ! तदनन्तर सारा जगत् सस्त्रीक हो गया। श्रीराधाकी कृपासे गोलोक गोपाङ्गनाओंसे परिपूर्ण हो गया। इसी प्रकार हरिप्रिया श्रीराधाकी स्तुति करके राजा सुयज्ञ गोलोकधाममें चले गये । जो मनुष्य श्रीकृष्णद्वारा किये गये इस राधास्तोत्रका पाठ करता है, वह श्रीकृष्णकी भक्ति और दास्यभाव प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है। स्त्रीसे वियोग होनेपर जो पवित्रभावसे एक मासतक इस स्तोत्रका श्रवण करता है, वह शीघ्र ही सती, सुन्दरी और सुशीला स्त्रीको प्राप्त कर लेता है। जो भार्या और सौभाग्यसे हीन है, वह यदि एक वर्षतक इस स्तोत्रका श्रवण करे तो उसे भी शीघ्र ही सुन्दरी, सुशीला एवं सती भार्याकी प्राप्ति हो जाती है। पार्वति! पूर्वकालमें जब दक्ष कन्या सतीकी मृत्यु हो गयी थी, तब परमात्मा श्रीकृष्णकी आज्ञा पाकर मैंने इसी स्तोत्रसे श्रीराधाकी स्तुति की और तुम्हें पा लिया। पूर्वकालमें ब्रह्माजीको भी इसी स्तोत्र प्रभावसे सावित्रीकी प्राप्ति हुई थी। पूर्वकालमें दुर्वासाके शापसे जब देवतालोग श्रीहीन हो गये, तब इसी स्तोत्रसे श्रीराधाकी स्तुति करके उन्होंने परम दुर्लभ लक्ष्मी प्राप्त की थी। पुत्रकी इच्छावाला पुरुष यदि एक वर्षतक इस स्तोत्रका श्रवण करे तो उसे पुत्र प्राप्त हो जाता है। इस स्तोत्रके प्रसादसे मनुष्य बहुत बड़ी व्याधि एवं रोगों से मुक्त हो जाता है। जो कार्तिककी पूर्णिमाको श्रीराधाका पूजन करके इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह अविचल लक्ष्मीको पाता है तथा राजसूय यज्ञके फलका भागी होता है। यदि नारी इस स्तोत्रका श्रवण करे तो वह पतिके सौभाग्यसे सम्पन्न होती है। जो भक्तिपूर्वक इस स्तोत्रको सुनता है, वह निश्चय ही बन्धनसे मुक्त हो जाता है। जो प्रतिदिन भक्तिभावसे श्रीराधाकी पूजा करके प्रेमपूर्वक इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह भवबन्धनसे मुक्त हो गोलोकधाममें जाता है। (अध्याय ५५)