तदनन्तर नारदजीके प्रश्नका उत्तर देते हुए भगवान् नारायण बोले-
ध्रुवके पौत्र तथा उत्कलके पुत्र बलवान् नन्दि स्वायम्भुव मनुके वंश में सत्यवादी एवं जितेन्द्रिय राजा थे। उन्होंने सौ अक्षौहिणी सेना लेकर महामति सुरथके राज्यको चारों ओरसे घेर लिया। नारद! दोनों पक्षों में पूरे एक वर्षतक निरन्तर युद्ध होता रहा। अन्त में चिरंजीवी वैष्णवनरेश नन्दिने सुरथपर विजय पायी। नन्दिने उन्हें राज्यसे बाहर कर दिया। भयभीत राजा सुरथ रातमें अकेले घोड़ेपर सवार हो गहन वनमें चले गये। वहाँ भद्रा नदीके तटपर उनकी एक वैश्यसे भेंट हुई। मुने! उन दोनोंने परस्पर बन्धुभावकी स्थापना की और उनमें बड़ा प्रेम हो गया। राजा वैश्यके साथ मेधस्के आश्रमपर गये। भारतमें सत्पुरुषोंके लिये जो दुष्कर पुण्यक्षेत्र है, उस पुष्करमें जाकर राजाने उन महातेजस्वी मुनिका दर्शन किया। मेधसूजी अपने शिष्योंको परम दुर्लभ ब्रह्मतत्त्वका उपदेश दे रहे थे। राजा और वैश्यने मस्तक झुकाकर उन मुनिश्रेष्ठको प्रणाम किया। मुनिने उन दोनों अतिथियोंका आदर किया और उन्हें शुभाशीर्वाद दिया। फिर पृथक्-पृथक् उन दोनोंका कुशल - मङ्गल, जाति और नाम पूछा। राजा सुरथने उन मुनीश्वरको क्रमशः उनके प्रश्नोंका उत्तर दिया। सुरथ बोले- ब्रह्मन् ! मैं राजा सुरथ हूँ। मेरा जन्म चैत्रवंशमें हुआ है। इस समय बलवान् राजा नन्दिने मुझे अपने राज्यसे निकाल दिया है। अब मैं कौन उपाय करूँ? किस प्रकार पुनः अपने राज्यपर मेरा अधिकार हो? यह आप बतावें । महाभाग मुने! मैं आपकी ही शरणमें आया हूँ। यह समाधि नामक वैश्य है और बड़ा धर्मात्मा है; तथापि दैववश इसके स्त्री-पुत्रोंने धनके लोभसे इसको घरसे बाहर निकाल दिया है। इसका अपराध इतना ही है कि यह स्त्री, पुत्रों और बन्धु बान्धवोंके मना करनेपर भी प्रतिदिन ब्राह्मणोंको प्रचुर धन और रत्न दानमें दिया करता था। इसीसे क्रोधमें आकर उन लोगोंने इसे घर से निकाल दिया। फिर शोकके कारण वे पुनः इसका अन्वेषण करते हुए आये। परंतु यह पवित्र, ज्ञान एवं विरक्त वैश्य उनके आग्रह करनेपर भी घरको नहीं लौटा। तब इसके पुत्र भी पितृशोकसे संतप्त हो सब कर्मोंसे विरक्त हो गये और सारा धन ब्राह्मणोंको देकर घर छोड़ वनको चले गये। 'श्रीहरिका परम दुर्लभ दास्य प्राप्त हो'- यही इस वैश्यका अभीष्ट मनोरथ है। इस निष्काम वैश्यको वह अभीष्ट वस्तु कैसे प्राप्त होगी? यह बात आप विस्तारपूर्वक बतानेकी कृपा करें।
श्रीमेधसूने कहा -
राजन् ! निर्गुण परमात्मा श्रीकृष्णकी आज्ञासे दुर्लजय त्रिगुणमयी विष्णुमाया सम्पूर्ण विश्वको अपनी मायासे आच्छन्न कर देती है। वह कृपामयी देवी जिन धर्मात्मा पुरुषोंपर कृपा करती है, उन्हें दया करके परम दुर्लभ श्रीकृष्ण भक्ति प्रदान करती है। नरेश्वर ! परंतु - जिन मायावी पुरुषोंपर विष्णुमाया दया नहीं करती है, उन दुर्गतिग्रस्त जीवोंको मायाद्वारा ही मोहजालसे बाँध देती है। फिर तो वे बर्बर जीव इस नश्वर एवं अनित्य संसारमें सदा नित्यबुद्धि कर लेते हैं और परमेश्वरकी उपासना छोड़कर दूसरे दूसरे देवताओंकी सेवामें लग जाते हैं तथा उन्हीं देवताओंके मन्त्रका जप करते हैं। लोभवश मनमें किसी मिथ्या निमित्तको स्थान देकर वे इस तरह भटक जाते हैं। अन्य देवता भी श्रीहरिकी कलाएँ हैं। उनका सात जन्मोंतक सेवन करनेके पश्चात् वे देवी प्रकृतिकी कृपासे उनकी आराधनामें संलग्न होते हैं। सात जन्मोंतक कृपामयी विष्णुमायाकी सेवा करनेके बाद उन्हें सनातन ज्ञानानन्दस्वरूप शिवकी भक्ति प्राप्त होती है। भगवान् शंकर श्रीहरिके ज्ञानके अधिष्ठाता देवता हैं। उनका सेवन करके मनुष्य शीघ्र ही उनसे श्रीविष्णु भक्ति प्राप्त कर लेते हैं। तब उनके द्वारा सत्त्वस्वरूप सगुण विष्णुकी सेवा होने लगती है। इससे उनको परम निर्मल ज्ञानका साक्षात्कार होता है। सगुण विष्णुकी आराधना पश्चात् सात्त्विक वैष्णव मानव प्रकृतिसे परवर्ती निर्गुण श्रीकृष्णकी भक्ति पाते हैं। तदनन्तर वे साधु पुरुष श्रीकृष्णके निरामय मन्त्रको ग्रहण करते हैं और उन निर्गुण देवकी आराधनासे स्वयं निर्गुण हो जाते हैं। वे वैष्णव पुरुष निरामय गोलोकमें रहकर निरन्तर भगवान्का दास्य (कैंकर्य) - मय सेवन करते हैं और अपनी आँखोंसे अगणित ब्रह्माओंका पतन (विनाश) देखते हैं। जो श्रेष्ठ मानव श्रीकृष्णभक्तसे उनके मन्त्रकी दीक्षा ग्रहण करता है, वह अपने पूर्वजोंकी सहस्रों पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। इतना ही नहीं, वह नानाके कुलकी सहस्रों पीढ़ियोंका, माताका तथा दास आदिका भी उद्धार करके गोलोकमें चला जाता है। महाभयंकर भवसागरमें कर्णधाररूपिणी दुर्गा श्रीकृष्ण भक्तिरूपी नौकाद्वारा उन सबको पार कर देती है। वैष्णवोंके कर्म-बन्धनका उच्छेद करनेके लिये परमात्मा श्रीकृष्णकी वह वैष्णवी शक्ति तीखे शस्त्रका काम करती है। नरेश्वर! उस शक्तिकी शक्ति भी दो प्रकारकी है। एक विवेचनाशक्ति और दूसरी आवरणी शक्ति पहली अर्थात् विवेचनाशक्ति तो वह भक्तोंको देती है और दूसरी आवरणी शक्ति अभक्तके पल्ले बाँधती है। भगवान् श्रीकृष्ण सत्यस्वरूप हैं। उनसे भिन्न सारा जगत् नश्वर है। विवेचना बुद्धि नित्यरूपा - एवं सनातनी है। यह मेरी श्री है। यही वैष्णव भक्तोंको प्राप्त होती है। किंतु आवरणी बुद्धि कर्मोंका फल भोगनेवाले अधम अवैष्णव पुरुषोंको प्राप्त हुआ करती है। राजन्! मैं प्रचेताका पुत्र और ब्रह्माजीका पौत्र हूँ तथा भगवान् शंकर से ज्ञान प्राप्त करके परमात्मा श्रीकृष्णका भजन करता हूँ। महाराज! नदीके तटपर जाओ और सनातनी दुर्गाका भजन करो तुम्हारे मनमें राज्य की कामना है, इसलिये वे देवी तुम्हें आवरणी बुद्धि प्रदान करेंगी तथा इस निष्काम वैष्णव वैश्यको वे कृपामयी वैष्णवीदेवी शुद्ध विवेचना-बुद्धि देंगी। ऐसा कहकर कृपानिधान मुनिवर मेधसूने उन दोनोंको दुर्गाजीकी पूजाकी विधि, स्तोत्र, कवच और मन्त्रका उपदेश दिया। वैश्यने उन कृपामयी देवीकी आराधना करके मोक्ष प्राप्त किया तथा राजाको अपना अभीष्ट राज्य, मनुका पद और मनोवाञ्छित परम ऐश्वर्य प्राप्त हुआ। इस प्रकार मैंने सुखद, सारभूत एवं मोक्षदायक परम उत्तम दुर्गाका उपाख्यान पूर्णरूपसे सुना दिया। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो ? (अध्याय ६२)