नारदजीने कहा-
भगवन्! आपने बतलाया है कि श्रीकृष्णके निमेषमात्रमें ब्रह्माकी आयु पूरी हो जाती है। उनका सत्ताशून्य हो जाना ही 'प्राकृतिक प्रलय' कहा जाता है। उस समय पृथ्वी अदृश्य हो जाती है। सम्पूर्ण विश्व जलमें डूब जाता है। सब के सब परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्णमें लीन हो जाते हैं। तब उस समय पृथ्वी छिपकर कहाँ रहती है और सृष्टिके समय वह पुनः कैसे प्रकट हो जाती है? धन्या, मान्या, सबकी आश्रयरूपा एवं विजयशालिनी होनेका सौभाग्य उसे पुनः कैसे प्राप्त होता है ? प्रभो ! अब आप पृथ्वीकी उत्पत्तिके मङ्गलमय चरित्रको सुनानेकी कृपा कीजिये।
भगवान् नारायण बोले -
नारद ! श्रुति कहती है कि सम्पूर्ण सृष्टियोंके आरम्भमें श्रीकृष्णसे ही सबकी उत्पत्ति होती है और समस्त प्रलयोंके अवसरपर प्राणी उन्होंमें लीन भी हो जाते हैं। अब पृथ्वीके जन्मका प्रसङ्ग सुनो। कुछ लोग कहते हैं, यह आदरणीया पृथ्वी मधु और कैटभके मेदसे उत्पन्न हुई है। इसका भाव यह है कि उन दैत्योंके जीवनकालमें पृथ्वी स्पष्ट दिखलायी नहीं पड़ती थी। वे जब मर गये, तब उनके शरीरसे मेद निकला- वही सूर्यके तेजसे सूख गया। अतः 'मेदिनी' इस नामसे पृथ्वी विख्यात हुई। इस मतका स्पष्टीकरण सुनो। पहले सर्वत्र जल ही जल दृष्टिगोचर हो रहा था। पृथ्वी जलसे ढकी थी। मेदसे केवल उसका स्पर्श हुआ। अतः लोग उसे 'मेदिनी' कहने लगे। मुने! अब पृथ्वीके सार्थक जन्मका प्रसङ्ग कहता हूँ। यह चरित्र सम्पूर्ण मङ्गल प्रदान करनेवाला है। मैं पुष्कर क्षेत्रमें था। महाभाग धर्मके मुखसे जो कुछ सुन चुका हूँ, वही तुमसे कहूँगा। महाविराट् पुरुष अनन्तकालसे जलमें विराजमान रहते हैं - यह स्पष्ट है। समयानुसार उनके भीतर सर्वव्यापी समष्टि मल प्रकट होता है। महाविराट् पुरुषके सभी रोमकूप उसके आश्रय बन जाते हैं। मुने! उन्हीं रोमकूपोंसे पृथ्वी निकल आती है। जितने रोमकूप हैं, उन सबमेंसे एक-एकसे जलसहित पृथ्वी बार-बार प्रकट होती और छिपती रहती है। सृष्टिके समय प्रकट होकर जलके ऊपर स्थिर रहना और प्रलयकाल उपस्थित होनेपर छिपकर जलके भीतर चले जाना—यही इसका नियम है। अखिल ब्रह्माण्डमें यह विराजती है। वन और पर्वत इसकी शोभा बढ़ाये रहते हैं। यह सात समुद्रोंसे घिरी रहती है। सात द्वीप इसके अङ्ग हैं। हिमालय और सुमेरु आदि पर्वत तथा सूर्य एवं चन्द्रमा प्रभृति ग्रह इसे सदा सुशोभित करते हैं। महाविराट्की आज्ञाके अनुसार ब्रह्मा,विष्णु तथा शिव आदि देवता प्रकट होते एवं समस्त प्राणी इसपर रहते हैं। पुण्यतीर्थ तथा पवित्र भारतवर्ष जैसे देशोंसे सम्पन्न होनेका इसे सुअवसर मिलता है। यह पृथ्वी स्वर्णमय भूमि है। इसपर सात स्वर्ग हैं। इसके नीचे सात पाताल हैं। ऊपर ब्रह्मलोक है। ब्रह्मलोकसे भी ऊपर ध्रुवलोक है।
नारद! इस प्रकार इस पृथ्वीपर अखिल विश्वका निर्माण हुआ है। ये निर्मित सभी विश्व नश्वर हैं। यहाँतक कि 'प्राकृत प्रलय' का अवसर आनेपर ब्रह्मा भी चले जाते हैं। उस समय केवल महाविराट् पुरुष विद्यमान रहते हैं। कारण, सृष्टिके आरम्भमें ही परब्रह्म श्रीकृष्णने इन्हें प्रकट करके इस कार्यमें नियुक्त कर दिया है। सृष्टि और प्रलय प्रवाहरूपसे नित्य हैं- इनका क्रम निरन्तर चालू रहता है। ये समयपर नियन्त्रण रखनेवाली अदृष्ट शक्तिके अधीन होकर रहते हैं। प्रवाहक्रमसे पृथ्वी भी नित्य है। वाराहकल्पमें यह मूर्तिमान् रूपसे विराजमान हुई थी और देवताओंने इसका पूजन किया था। मुनि, मनु, गन्धर्व और ब्राह्मण प्रायः सभी इसकी पूजामें सम्मिलित हुए थे। उस समय भगवान्का वाराहावतार हुआ था। श्रुतिके मतसे यह पृथ्वी उनकी पत्नी रूपमें विराजमान हुई। इससे मङ्गलका जन्म हुआ और मङ्गलसे घटेशकी उत्पत्ति हुई।
नारदने पूछा-
प्रभो! देवताओंने वाराहकल्पमें पृथ्वीकी किस रूपसे पूजा की थी ? सबको आश्रय प्रदान करनेवाली इस साध्वी देवीकी उस कल्पमें स्वयं भगवान् वाराहने तथा अन्य सबने भी पूजा की थी। भगवन्! इसके पूजनका विधान, जलके नीचेसे इसके ऊपर उठनेका क्रम एवं मङ्गलके जन्मका कल्याणमय प्रसङ्ग विस्तारपूर्वक बतानेकी कृपा कीजिये।
भगवान् नारायण बोले-
नारद! बहुत पहलेकी बात है। उस समय वाराहकल्प चल रहा था। ब्रह्माके स्तुति करनेपर भगवान् श्रीहरि हिरण्याक्षको मारकर पृथ्वीको रसातलसे निकाल ले आये। उसे जलपर इस प्रकार रख दिया, मानो तालाबमें कमलका पत्ता हो। उसीपर ब्रह्माने सम्पूर्ण मनोहर विश्वकी रचना की। पृथ्वी की अधिष्ठात्री एक परम सुन्दरी देवीके रूपमें थी। उसे देखकर भगवान् श्रीहरिके मनमें प्रेम हो गया। भगवान् वाराहकी कान्ति ऐसी थी, मानो करोड़ों सूर्य हों। उन्होंने अपना रूप परम मनोहर बना लिया तथा रतिके योग्य एक शय्या तैयार की। फिर उस देवीके साथ एक दिव्य वर्षतक वे एकान्तमें रहे। इसके बाद उन्होंने उस सुन्दरी देवीका संग छोड़ दिया और खेल-ही-खेलमें वे अपने पूर्व वाराहरूपसे विराजमान हो गये। उन्होंने परम साध्वी देवी पृथ्वीका ध्यान और पूजन किया। धूप, दीप, नैवेद्य, सिन्दूर, चन्दन, वस्त्र, फूल और बलि आदि सामग्रियोंसे पूजा करके भगवान्ने उससे कहा।
श्रीभगवान् बोले-
शुभे! तुम सबको आश्रय प्रदान करनेवाली बनो। मुनि, मनु, देवता, सिद्ध और दानव आदि सबसे सुपूजित होकर तुम सुख पाओगी। अम्बुवचीके (सौरमानसे आर्द्रा नक्षत्र के प्रथम चरणमें पृथ्वी ऋतुमती रहती है। इतने समयका नाम अम्बुवाची है।)अतिरिक्त दिनमें गृहप्रवेश, गृहारम्भ, वापी एवं तड़ागके निर्माण अथवा अन्य गृहकार्यके अवसरपर देवता आदि सभी लोग मेरे वरके प्रभावसे तुम्हारी पूजा करेंगे। जो मूर्ख तुम्हारी पूजा नहीं करना चाहेंगे, उन्हें नरकमें जाना पड़ेगा।
उस समय पृथ्वी गर्भवती हो चुकी थी। उसी गर्भसे तेजस्वी मङ्गल नामक ग्रहकी उत्पत्ति हुई। भगवान्की आज्ञाके अनुसार उपस्थित सम्पूर्ण व्यक्ति पृथ्वीकी उपासना करने लगे । कण्वशाखामें कहे हुए मन्त्रों को पढ़कर उन्होंने ध्यान किया और स्तुति की। मूलमन्त्र पढ़कर नैवेद्य अर्पण किया। यों त्रिलोकीभरमें पृथ्वी की पूजा और स्तुति होने लगी।
नारदजीने कहा-
भगवन्! पृथ्वीका किस प्रकार ध्यान किया जाता है, इसकी पूजाका प्रकार क्या है और कौन मूलमन्त्र है? सम्पूर्ण पुराणोंमें छिपे हुए इस प्रसङ्गको सुनने के लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल हो रहा है। अतः बतानेकी कृपा कीजिये।
भगवान् नारायण कहते हैं-
मुने! सर्वप्रथम भगवान् वाराहने इस पृथ्वीकी पूजा की। उनके पश्चात् ब्रह्मा उसके पूजनमें संलग्न हुए। तदनन्तर सम्पूर्ण प्रधान मुनियों, मनुओं और मानवोंद्वारा इसका सम्मान हुआ। नारद! अब मैं इसका ध्यान, पूजन और मन्त्र बतलाता हूँ, सुनो। 'ॐ ह्रीं श्रीं वसुधायै स्वाहा' इसी मन्त्रसे भगवान् विष्णु इसका पूजन किया था। ध्यानका प्रकार यह है 'पृथ्वी देवीके श्रीविग्रहका वर्ण स्वच्छ कमलके समान उज्ज्वल है। मुख ऐसा जान पड़ता है,
मानो शरत्पूर्णिमाका चन्द्रमा हो। सम्पूर्ण अङ्गोंमें ये चन्दन लगाये रहती हैं। रत्नमय अलंकारोंसे इनकी अनुपम शोभा होती है। ये समस्त रत्नों की आधारभूता और रत्नगर्भा हैं। रत्नोंकी खानें इनको गौरवान्वित किये हुए हैं। ये विशुद्ध चिन्मय वस्त्र धारण किये रहती हैं। इनके मुखपर मुस्कान छायी रहती है। सभी लोग इनकी वन्दना करते हैं। ऐसी भगवती पृथ्वीकी मैं आराधना करता हूँ।' इसी प्रकार ध्यान करनेसे सब लोगोंद्वारा पृथ्वीकी पूजा सम्पन्न होती है। विप्रेन्द्र ! अब कण्वशाखामें प्रतिपादित इनकी स्तुति सुनो।
भगवान् विष्णु बोले-
विजयकी प्राप्ति करानेवाली वसुधे! मुझे विजय दो। तुम भगवान् यज्ञवराहकी पत्नी हो जये! तुम्हारी कभी पराजय नहीं होती है। तुम विजयका आधार, विजयशील और विजयदायिनी हो। देवि! तुम्हीं सबकी आधारभूमि हो। सर्वबीजस्वरूपिणी तथा सम्पूर्ण शक्तियों से सम्पन्न हो। समस्त कामनाओंको देनेवाली देवि! तुम इस संसारमें मुझे सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तु प्रदान करो तुम सब प्रकारके शस्योंका घर हो । सब तरहके शस्यों से सम्पन्न हो। सभी शस्यों को देनेवाली हो तथा समयविशेषमें समस्त शस्योंका अपहरण भी कर लेती हो। इस संसारमें तुम सर्वशस्यस्वरूपिणी हो। मङ्गलमयी देवि! तुम मङ्गलका आधार हो। मङ्गलके योग्य हो । मङ्गलदायिनी हो। मङ्गलमय पदार्थ तुम्हारे स्वरूप हैं। मङ्गलेश्वरि ! तुम जगत्में मुझे मङ्गल प्रदान करो भूमे ! तुम भूमिपालोंका सर्वस्व हो, भूमिपालपरायणा हो तथा भूपालोंके अहंकारका मूर्तरूप हो। भूमिदायिनी देवि! मुझे भूमि दो। नारद! यह स्तोत्र परम पवित्र है। जो पुरुष पृथ्वीका पूजन करके इसका पाठ करता है, उसे अनेक जन्मोंतक भूपाल सम्राट् होनेका सौभाग्य प्राप्त होता है। इसे पढ़नेसे मनुष्य पृथ्वीके दानसे उत्पन्न पुण्यके अधिकारी बन जाते हैं। पृथ्वी दानके अपहरणसे, दूसरेके कुएँको बिना उसकी आज्ञा लिये खोदनेसे, अम्बुवाची योगमें पृथ्वीको खोदनेसे और दूसरेकी भूमिका अपहरण करनेसे जो पाप होते हैं, उन पापोंसे इस स्तोत्रका पाठ करनेपर मनुष्य छुटकारा पा जाता है, इसमें संशय नहीं है। मुने! पृथ्वीपर वीर्य त्यागने तथा दीपक रखनेसे जो पाप होता है, उससे भी पुरुष इस स्तोत्रका पाठ करनेसे मुक्त हो जाता है।
नारदजी बोले-
भगवन्! पृथ्वीका दान करनेसे जो पुण्य तथा उसे छीनने, दूसरेकी भूमिका हरण करने, अम्बुवाचीमें पृथ्वीका उपयोग करने, भूमिपर वीर्य गिराने तथा जमीनपर दीपक रखनेसे जो पाप बनता है, उसे मैं सुनना चाहता हूँ। वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ प्रभो ! मेरे पूछनेके अतिरिक्त अन्य भी जो पृथ्वीजन्य पाप हैं, उनको उनके प्रतीकारसहित बतानेकी कृपा करें।
भगवान् नारायण बोले-
मुने! जो पुरुष भारतवर्षमें किसी संध्यापूत ब्राह्मणको एक बित्ता भी भूमि दान करता है, वह भगवान् विष्णु धाममें जाता है। फसलोंसे भरी-पूरी भूमिको ब्राह्मणके लिये अर्पण करनेवाला सत्पुरुष उतने ही वर्षोतक भगवान् विष्णुके धाममें विराजता है, जितने उस जमीनके रजःकण हों। जो गाँव, भूमि और धान्य ब्राह्मणको देता है, उसके पुण्यसे दाता और प्रतिगृहीता दोनों व्यक्ति सम्पूर्ण - पापोंसे छूटकर वैकुण्ठधाममें स्थान पाते हैं। जो साधु पुरुष भूमिदानके लिये दाताको उत्साहित करता है, उसे अपने मित्र एवं गोत्रके साथ वैकुण्ठमें जानेका सौभाग्य प्राप्त होता है। अपनी अथवा दूसरेकी दी हुई ब्राह्मणकी भूमि हरण करनेवाला व्यक्ति सूर्य एवं चन्द्रमाकी स्थितिपर्यन्त 'कालसूत्र' नामक नरकमें स्थान पाता है। इतना ही नहीं, इस पापके प्रभावसे उसके पुत्र और पौत्र आदिके पास भी पृथ्वी नहीं ठहरती। वह श्रीहीन, पुत्रहीन और दरिद्र होकर घोर रौरव नरकमें गिरता है। जो । गोचरभूमिको जोतकर धान्य उपार्जन करता है और वही धान्य ब्राह्मणको देता है तो इस निन्दित कर्मके प्रभावसे उसे देवताओंके वर्षसे सौ वर्षतक 'कुम्भीपाक' नामक नरकमें रहना पड़ता है। गौओंके रहनेके स्थान तड़ाग तथा रास्तेको जोतकर पैदा किये हुए अन्नका दान करनेवाला मानव चौदह इन्द्रकी आयुतक 'असिपत्र' नामक नरकमें रहता है। जो कामान्ध व्यक्ति एकान्तमें पृथ्वीपर वीर्य गिराता है, उसे वहाँकी जमीनमें जितने रजःकण हैं, उतने वर्षोंतक 'रौरव' नरकमें रहना पड़ता है। अम्बुवाचीमें भूमि खोदनेवाला मानव 'कृमिदंश' नामक नरकमें जाता और उसे वहाँ चार युगोंतक रहना पड़ता है। जो दूसरेके तड़ागमें पड़ी हुई कीचड़को निकालकर शुद्ध जल होनेपर स्नान करता है, उसे ब्रह्मलोक में स्थान मिलता है। जो मन्दबुद्धि मानव भूमिपतिके पितरोंको श्राद्धमें पिण्ड न देकर श्राद्ध करता है, उसे अवश्य ही नरकगामी होना पड़ता है।
दीपक, शिवलिङ्ग, भगवतीकी मूर्ति, शङ्ख, यन्त्र, शालग्रामका जल, फूल, तुलसीदल, जपमाला, पुष्पमाला, कपूर, गोरोचन, चन्दनकी लकड़ी, रुद्राक्षकी माला, कुशकी जड़, पुस्तक और यज्ञोपवीत- इन वस्तुओंको भूमिपर रखनेसे मानव नरकमें वास करता है। गाँठमें बँधे हुए यज्ञसूत्रकी पूजा करना सभी द्विजातिवर्णोंके लिये अत्यावश्यक है। भूकम्प एवं ग्रहणके अवसरपर पृथ्वीको खोदनेसे बड़ा पाप लगता है। इस मर्यादाका उल्लङ्घन करनेसे दूसरे जन्ममें अङ्गहीन होना पड़ता है। इसपर सबके भवन बने हैं, इसलिये यह 'भूमि' कहलाती है। कश्यपकी पुत्री होनेसे 'काश्यपी' तथा स्थिररूप होनेसे 'स्थिरा' कही जाती है। महामुने! विश्वको धारण करने से 'विश्वम्भरा', अनन्तरूप होनेसे 'अनन्ता' तथा पृथुकी कन्या होनेसे अथवा सर्वत्र फैली रहने से इसका नाम 'पृथ्वी' पड़ा है। (अध्याय ८-९)