श्री ब्रह्म वैवर्त महापुराण - प्रकृति खंड

23- सावित्री देवीकी पूजा-स्तुतिका विधान

नारदजीने कहा-

भगवन्! अमृतकी तुलना करनेवाली तुलसीकी कथा मैं सुन चुका। अब आप सावित्रीका उपाख्यान कहनेकी कृपा करें। देवी सावित्री वेदोंकी जननी हैं; ऐसा सुना गया है। ये देवी सर्वप्रथम किससे प्रकट हुईं? सबसे पहले इनकी किसने पूजा की और बादमें किन लोगोंने ?

भगवान् नारायण कहते हैं-

मुने! सर्वप्रथम ब्रह्माजीने वेदजननी सावित्रीकी पूजा की। तत्पश्चात् ये देवताओंसे सुपूजित हुईं। तदनन्तर विद्वानों ने इनका पूजन किया। इसके बाद भारतवर्ष में राजा अश्वपतिने पहले इनकी उपासना की। तदनन्तर चारों वर्णोंके लोग इनकी आराधना में संलग्न हो गये।

नारदजीने पूछा-

ब्रह्मन् ! राजा अश्वपति कौन थे ? किस कामनासे उन्होंने सावित्रीकी पूजा की थी ?

भगवान् नारायण बोले-

मुने! महाराज अश्वपति मद्रदेशके नरेश थे शत्रुओंकी शक्ति नष्ट करना और मित्रोंके कष्टका निवारण करना उनका स्वभाव था। उनकी रानीका नाम मालती था। धर्मोंका पालन करनेवाली वह महाराज्ञी राजाके साथ इस प्रकार शोभा पाती थी, जैसे लक्ष्मीजी भगवान् विष्णुके साथ नारद! उस महासाध्वी रानीने वसिष्ठजीके उपदेशसे भक्तिपूर्वक भगवती सावित्रीकी आराधना की; परंतु उसे देवीकी ओर से न तो कोई प्रत्यादेश मिला और न देवीजीने साक्षात् दर्शन ही दिये। अतः मनमें कष्टका अनुभव करती हुई दुःखसे घबराकर वह घर चली गयी। राजा अश्वपतिने उसे दुःखी देखकर नीतिपूर्ण वचनोंद्वारा समझाया और स्वयं भक्तिपूर्वक वे सावित्रीकी प्रसन्नताके निमित्त तपस्या करनेके लिये पुष्करक्षेत्रमें चले गये। वहाँ रहकर इन्द्रियोंको वशमें करके उन्होंने बड़ी तपस्या की। तब भगवती सावित्रीके दर्शन तो नहीं हुए, किंतु उनका प्रत्यादेश (उत्तर) प्राप्त हुआ। महाराज अश्वपतिको यह आकाशवाणी सुनायी दी– 'राजन्! तुम दस लाख गायत्रीका जप करो।' इतनेमें ही वहाँ मुनिवर पराशरजी पधार गये। राजाने मुनिको प्रणाम किया। मुनि राजासे कहने लगे।

पराशरने कहा-

राजन्! गायत्रीका एक बारका जप दिनके पापको नष्ट कर देता है। दस बार जप करनेसे दिन और रातके सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं। सौ बार जप करनेसे महीनोंका उपार्जित पाप नहीं ठहर सकता। एक हजारके जपसे वर्षोंके पाप भस्म हो जाते हैं। गायत्रीके एक लाख जपमें एक जन्मके तथा दस लाख जपमें तीन जन्मोंके भी पापोंको नष्ट करनेकी अमोघ शक्ति है। एक करोड़ जप करनेपर सम्पूर्ण जन्मोंके पाप नष्ट हो जाते हैं। दस करोड़ गायत्री जप ब्राह्मणों को मुक्त कर देता है। द्विजको चाहिये कि वह पूर्वाभिमुख होकर बैठे। हाथको सर्पकी फणके समान कर ले। वह हाथ ऊर्ध्वमुख हो और ऊपरकी ओरसे कुछ-कुछ मुद्रित (मुँदा-सा) रहे। उसे किञ्चित् झुकाये हुए स्थिर रखे। अनामिकाके बिचले पर्वसे आरम्भ करके नीचे और बायें होते हुए तर्जनीके मूलभागतक अँगूठेसे स्पर्शपूर्वक जप करे हाथमें जप करनेका यही क्रम है। (करं सर्पफणाकारं कृत्वा तं तूर्ध्वमुद्रितम् ॥ आनम्रमूर्ध्वमचलं प्रजपेत् प्राङ्मुखो द्विजः । अनामिकामध्यदेशादधो वामक्रमेण च ॥ तर्जनीमूलपर्यन्तं जपस्यैष क्रमः करे । (प्रकृतिखण्ड २३ । १७-१९)) राजन्! श्वेत कमलके बीजोंकी अथवा स्फटिक मणिकी माला बनाकर उसका संस्कार कर लेना चाहिये। इन्हीं वस्तुओंकी माला बनाकर तीर्थमें अथवा किसी देवताके मन्दिरमें जप करे। पीपलके सात पत्तोंपर संयमपूर्वक मालाको रखकर गोरोचनसे अनुलिप्त करे। फिर गायत्री जपपूर्वक विद्वान् पुरुष - उस मालाको स्नान करावे। तत्पश्चात् उसी मालापर विधिपूर्वक गायत्रीके सौ मन्त्रोंका जप करना चाहिये। अथवा पञ्चगव्य या गङ्गाजलसे स्नान करा देनेपर भी मालाका संस्कार हो जाता है। इस तरह शुद्ध की हुई मालासे जप करना चाहिये।

राजर्षे! तुम इस क्रमसे दस लाख गायत्रीका जप करो। इससे तुम्हारे तीन जन्मोंके पाप क्षीण हो जायँगे । तत्पश्चात् तुम भगवती सावित्रीका साक्षात् दर्शन कर सकोगे। राजन्! तुम प्रतिदिन मध्याह्न, सायं एवं प्रातः कालकी संध्या पवित्र होकर करना; क्योंकि संध्या न करनेवाला अपवित्र व्यक्ति सम्पूर्ण कर्मोंके लिये सदा अनधिकारी हो जाता है। वह दिनमें जो कुछ सत्कर्म करता है, उसके फलसे वञ्चित रहता है। जो प्रातः एवं सायंकालकी संध्या नहीं करता है, वह ब्राह्मण सम्पूर्ण ब्राह्मणोचित कर्मोंसे बहिष्कृत माना जाता है जो प्रातः और सायंकालकी संध्योपासना नहीं करता है, वह शूद्रकी भाँति समस्त द्विजोचित कर्मोंसे बहिष्कृत कर देने योग्य हो जाता है। जीवनपर्यन्त त्रिकाल संध्या करनेवाले ब्राह्मणमें तेज अथवा तपके प्रभावसे सूर्यके समान तेजस्विता आ जाती है। ऐसे ब्राह्मणकी चरणरजसे पृथ्वी पवित्र हो जाती है। जिस ब्राह्मणके हृदयमें संध्याके प्रभावसे पाप स्थान नहीं पा सके हों, वह तेजस्वी द्विज जीवन्मुक्त ही है। उसके स्पर्शमात्रसे सम्पूर्ण तीर्थ पवित्र हो जाते हैं। पाप उसे छोड़कर वैसे ही भाग जाते हैं; जैसे गरुड़को देखकर सर्पोमें भगदड़ मच जाती है। त्रिकाल संध्या न करनेवाले द्विजके दिये हुए पिण्ड और तर्पणको उसके पितर इच्छापूर्वक ग्रहण नहीं करते तथा देवगण भी स्वतन्त्रतासे उसे लेना नहीं चाहते।

मुने! इस प्रकार कहकर मुनिवर पराशरने राजा अश्वपतिको सावित्रीकी पूजाके सम्पूर्ण विधान तथा ध्यान आदि अभिलषित प्रयोग बतला दिये। उन महाराजको उपदेश देकर मुनिवर अपने स्थानको चले गये; फिर राजाने सावित्रीकी उपासना की। उन्हें उनके दर्शन प्राप्त हुए और अभीष्ट वर भी प्राप्त हो गया।

नारदने पूछा-

भगवन् ! मुनिवर पराशरने सावित्रीके किस ध्यान, किस पूजा-विधान, किस स्तोत्र और किस मन्त्रका उपदेश दिया था तथा राजाने किस विधिसे श्रुति जननी सावित्रीकी - पूजा करके किस वरको प्राप्त किया ?किस विधानसे भगवती उनसे सुपूजित हुईं? मैं ये सभी प्रसङ्ग सुनना चाहता हूँ। सावित्रीकी श्रेष्ठ महिमा अत्यन्त रहस्यमयी है। कृपया मुझे सुनाइये।

भगवान् नारायण कहते हैं-

नारद! ज्येष्ठ कृष्ण त्रयोदशीके दिन संयमपूर्वक रहकर चतुर्दशीके दिन व्रत करके शुद्ध समयमें भक्तिके साथ भगवती सावित्रीकी पूजा करनी चाहिये। यह चौदह वर्षका व्रत है। इसमें चौदह फल और चौदह नैवेद्य अर्पण किये जाते हैं। पुष्प एवं धूप, वस्त्र तथा यज्ञोपवीत आदिसे विधिपूर्वक पूजन करके नैवेद्य अर्पण करनेका विधान है। एक मङ्गल कलश स्थापित करके उसपर फल और पल्लव रख दे। द्विजको चाहिये कि गणेश, सूर्य, अग्रि, विष्णु, शिव और पार्वतीकी पूजा करके आवाहित कलशपर अपनी इष्टदेवी सावित्रीका पूजन करे। देवी सावित्रीका ध्यान सुनो। यजुर्वेदकी माध्यन्दिनी शाखामें इसका प्रतिपादन हुआ है। स्तोत्र, पूजा विधान तथा समस्त कामप्रद मन्त्र भी बतलाता हूँ। ध्यान यह है -

'भगवती सावित्रीका वर्ण तपाये हुए सुवर्णके समान है। ये सदा ब्रह्मतेजसे देदीप्यमान रहती हैं। इनकी प्रभा ऐसी है, मानो ग्रीष्म ऋतुके - मध्याह्नकालिक सहस्रों सूर्य हों। इनके प्रसन्न मुखपर मुस्कान छायी रहती है। रत्नमय भूषण इन्हें अलंकृत किये हुए हैं। दो अग्निशुद्ध वस्त्रोंको इन्होंने धारण कर रखा है। भक्तोंपर कृपा करने के लिये ही ये साकाररूपसे प्रकट हुई हैं। जगद्धाता प्रभुकी इन प्राणप्रियाको 'सुखदा', 'मुक्तिदा', 'शान्ता', 'सर्वसम्पत्स्वरूपा' तथा 'सर्वसम्पत्प्रदात्री' कहते हैं। ये वेदोंकी अधिष्ठात्री देवी हैं (वेद शास्त्र इनके स्वरूप हैं। मैं ऐसी वेदबीजस्वरूपा वेदमाता आप भगवती सावित्रीकी उपासना करता हूँ।' इस प्रकार ध्यान करके अपने मस्तकपर पुष्प रखे। फिर श्रद्धा के साथ ध्यानपूर्वक कलशके ऊपर भगवती सावित्रीका आवाहन करे। वेदोक्त मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए सोलह प्रकारके उपचारोंसे व्रती पुरुष भगवतीकी पूजा करे। विधिपूर्वक पूजा और स्तुति सम्पन्न हो जानेपर देवेश्वरी सावित्रीको प्रणाम करे। आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, अनुलेपन, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, शीतल जल, वस्त्र, भूषण, माला, गन्ध, आचमन और मनोहर शय्या- ये देने योग्य षोडश उपचार हैं ।

[आसन समर्पण मन्त्र]

दारुसारविकारं च हेमादिनिर्मितं च वा ।

देवाधारं पुण्यदं च मया तुभ्यं निवेदितम् ॥ ५५ ॥

देवि! यह आसन उत्तम काष्ठके सारतत्त्व से बना हुआ है। साथ ही सुवर्ण आदिका बना हुआ आसन भी प्रस्तुत है। देवताओंके बैठनेयोग्य यह पुण्यप्रद आसन मैंने सदाके लिये आपकी सेवामें समर्पित कर दिया है ॥ ५५ ॥

[पाद्य-मन्त्र]

तीर्थोदकं च पाद्यं च पुण्यदं प्रीतिदं महत् ।

पूजाङ्गभूतं शुद्धं च मया भक्त्या निवेदितम् ॥ ५६ ॥

देवेश्वरि ! यह तीर्थका पवित्र जल आपके लिये पाद्यके रूपमें प्रस्तुत है, जो अत्यन्त प्रीतिदायक तथा पुण्यप्रद है। पूजाका अङ्गभूत यह शुद्ध पाद्य मैंने भक्तिभावसे आपके चरणों में अर्पित किया है ॥ ५६॥

[अर्घ्य-मन्त्र ]

पवित्ररूपमर्घ्यं च दूर्वापुष्पाक्षतान्वितम् ।

पुण्यदं शङ्खतोयाक्तं मया तुभ्यं निवेदितम् ॥ ५७॥

देवि! यह शङ्ख के जलसे युक्त तथा दूर्वा, पुष्प और अक्षतसे सम्पन्न परम पवित्र पुण्यदायक अर्घ्य मेरे द्वारा आपकी सेवामें निवेदन किया गया है ॥ ५७ ॥

[स्त्रानीय-मन्त्र]

सुगन्धिधात्रीतैलं च देहसौन्दर्यकारणम् ।

मया निवेदितं भक्त्या स्त्रानीयं प्रतिगृह्यताम् ॥ ५८ ॥

देवि! जो शरीरके सौन्दर्यको बढ़ाने में कारण है, वह सुगन्धित आँवलेका तैल और स्नानके लिये जल मैंने भक्तिभावसे सेवामें निवेदित किया है। आप यह सब स्वीकार करें ॥ ५८ ॥

[अनुलेपन-मन्त्र]

मलयाचलसम्भूतं देहशोभाविवर्द्धनम् ।

सुगन्धयुक्तं सुखदं मया तुभ्यं निवेदितम् ॥ ५९ ॥

देवेश्वरि ! यह मलयपर्वतसे उत्पन्न, सुगन्धयुक्त सुखद चन्दन, जो देहकी शोभाको बढ़ानेवाला है, मैंने अनुलेपनके रूपमें आपको अर्पित किया है ॥ ५९ ॥

[धूप-समर्पण-मन्त्र]

गन्धद्रव्योद्भवः पुण्यः प्रीतिदो दिव्यगन्धदः ।

मया निवेदितो भक्त्या धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम् ॥ ६० ॥

देवि! जो सुगन्धित द्रव्योंसे बना हुआ, पवित्र, प्रीतिदायक तथा दिव्य सुगन्ध प्रकट करनेवाला है, ऐसा यह धूप मैंने भक्तिभावसे आपको अर्पित किया है। आप इसे ग्रहण करें ॥ ६० ॥

[दीप-समर्पण-मन्त्र]

जगतां दर्शनीयं च दर्शनं दीप्तिकारणम् ।

अन्धकारध्वंसबीजं मया तुभ्यं निवेदितम् ॥ ६१ ॥

देवेश्वरि ! जो जगत्के लिये दर्शनीय दृष्टिका सहायक तथा दीप्ति (प्रकाश) का कारण है, जिसे अन्धकार विनाशका बीज कहा गया है, वह दिव्य दीप मेरे द्वारा आपकी सेवामें निवेदन किया गया है ॥ ६१ ॥

[ नैवेद्य-समर्पण-मन्त्र ]

तुष्टिदं पुष्टिदं चैव प्रीतिदं क्षुद्विनाशनम् ।

पुण्यदं स्वादुरूपं च नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम् ॥ ६२ ॥

देवि! जो तुष्टि, पुष्टि, प्रीति तथा पुण्य प्रदान करनेवाला तथा भूख मिटानेमें समर्थ है, ऐसा सुस्वादु नैवेद्य आपके समक्ष प्रस्तुत है, आप इसे स्वीकार करें ।। ६२ ।।

[ताम्बूल-समर्पण-मन्त्र]

ताम्बूलं च वरं रम्यं कर्पूरादिसुवासितम्।

तुष्टिदं पुष्टिदं चैव मया भक्त्या निवेदितम् ॥ ६३ ॥

देवेश्वरि ! यह सुन्दर, रमणीय, संतोषप्रद, पुष्टिकारक एवं कर्पूर आदिसे सुवासित ताम्बूल मैंने भक्तिभावसे अर्पित किया है। कृपया ग्रहण करें ॥ ६३ ॥

[ शीतल-जल-समर्पण मन्त्र ]

सुशीतलं वासितं च पिपासानाशकारणम् ।

जगतां जीवरूपं च जीवनं प्रतिगृह्यताम् ॥ ६४ ॥

हे देवि! यह प्यास मिटानेमें समर्थ तथा सम्पूर्ण जगत्का जीवनरूप सुवासित एवं सुशीतल जल अर्पित है, इसे स्वीकार करें ॥ ६४ ॥

[वस्त्र-समर्पण-मन्त्र]

देहशोभास्वरूपं च सभाशोभाविवर्द्धनम् ।

कार्पासजं च कृमिजं वसनं प्रतिगृह्यताम् ॥ ६५ ॥

देवेश्वरि! यह सूती और रेशमी वस्त्र देहकी शोभाका तो स्वरूप ही है, सभामें शरीरकी विशेष शोभाकी वृद्धि करनेवाला है। अतः इसे ग्रहण करें ।। ६५ ।।

[भूषण-समर्पण-मन्त्र]

काञ्चनादिविनिर्माणं श्रीयुक्तं श्रीकरं सदा ।

सुखदं पुण्यदं चैव भूषणं प्रतिगृह्यताम् ॥ ६६ ॥

देवि! सुवर्ण आदिका बना हुआ यह आभूषण सेवामें अर्पित है। यह स्वयं तो सुन्दर है ही; जो इसे धारण करता है, उसकी शोभाको भी यह सदा बढ़ाता रहता है। इससे सुख और पुण्यकी प्राप्ति होती है, अतः आप कृपापूर्वक इसे स्वीकार करें ॥६६॥

[ माल्य-समर्पण-मन्त्र ]

नानापुष्पविनिर्माणं बहुभाससमन्वितम् ।

प्रीतिदं पुण्यदं चैव माल्यं च प्रतिगृह्यताम् ॥ ६७ ॥

देवेश्वरि ! नाना प्रकारके फूलोंका बना हुआ यह सुन्दर हार अत्यन्त प्रकाशमान है। इससे आपको प्रसन्नता प्राप्त होगी। अतः कृपया इस पुण्यदायक हारको आप ग्रहण करें ।। ६७ ॥

[गन्ध-समर्पण-मन्त्र]

सर्वमङ्गलरूपश्च सर्वमङ्गलदो वरः ।

पुण्यप्रदश्च गन्धाढ्यो गन्धश्च प्रतिगृह्यताम् ॥ ६८ ॥

देवि ! यह सर्वमङ्गलरूप एवं सर्वमङ्गलदायक, श्रेष्ठ, पुण्यप्रद तथा सुगन्धित गन्ध आपकी सेवामें समर्पित है, इसे स्वीकार कीजिये ॥ ६८ ॥

[आचमनीय-समर्पण-मन्त्र ]

शुद्धं शुद्धिप्रदं चैव शुद्धानां प्रीतिदं महत् ।

रम्यमाचमनीयं च मया दत्तं प्रगृह्यताम् ॥ ६९ ॥

देवेश्वरि ! मेरा दिया हुआ यह रमणीय आचमनीय शुद्ध होनेके साथ ही शुद्धिदायक भी है। इससे शुद्ध पुरुषोंको बड़ी प्रसन्नता प्राप्त होती है। आप कृपापूर्वक इसे स्वीकार करें ॥ ६९ ॥

[शय्या-समर्पण-मन्त्र]

रत्नसारादिनिर्माणं पुष्पचन्दनसंयुतम् ।

सुखदं पुण्यदं चैव सुतल्पं प्रतिगृह्यताम् ॥ ७० ॥

 देवि! यह सुन्दर शय्या रत्नसार आदिकी बनी हुई है। इसपर फूल बिछे हैं और चन्दनका छिड़काव हुआ है। अतएव यह सुखदायिनी और पुण्यदायिनी भी है। आप इसे ग्रहण करें ॥ ७० ॥

[फल-समर्पण मन्त्र]

नानावृक्षसमुद्भूतं नानारूपसमन्वितम् ।

फलस्वरूपं फलदं फलं च प्रतिगृह्यताम् ॥ ७१ ॥

देवेश्वरि ! अनेक वृक्षोंसे उत्पन्न तथा नाना रूपोंमें उपलब्ध अभीष्ट फलस्वरूप एवं अभिलषित फलदायक यह फल सेवामें प्रस्तुत है। इसे स्वीकार करें ॥ ७९ ॥

[सिन्दूर-समर्पण-मन्त्र]

सिन्दूरं च वरं रम्यं भालशोभाविवर्द्धनम् ।

पूरणं भूषणानां च सिन्दूरं प्रतिगृह्यताम् ॥ ७२ ॥

देवि ! यह सुन्दर एवं सुरम्य सिन्दूर भालकी शोभाको बढ़ानेवाला है। इसे आभूषणोंका पूरक माना गया है। आप इसे ग्रहण करें ॥ ७२ ॥

[यज्ञोपवीत-समर्पण-मन्त्र]

विशुद्धग्रन्थिसंयुक्तं पुण्यसूत्रविनिर्मितम् ।

पवित्रं वेदमन्त्रेण यज्ञसूत्रं च गृह्यताम् ॥ ७३ ॥

देवेश्वरि ! पवित्र सूतका बना हुआ यह यज्ञोपवीत विशुद्ध ग्रन्थियोंसे युक्त है। इसे वेदमन्त्रसे पवित्र किया गया है। कृपया स्वीकार करें ॥ ७३ ॥

विद्वान् पुरुष इन द्रव्योंको मूलमन्त्रसे भगवती सावित्रीके लिये अर्पण करके स्तोत्र पढ़े। तदनन्तर भक्तिपूर्वक ब्राह्मणको दक्षिणा दे। 'सावित्री' इस शब्दमें चतुर्थी विभक्ति लगाकर अन्तमें 'स्वाहा' शब्दका प्रयोग होना चाहिये। इसके पूर्व लक्ष्मी, माया और कामबीजका उच्चारण हो। 'श्रीं ह्रीं क्लीं सावित्र्यै स्वाहा' यह अष्टाक्षर मन्त्र ही मूलमन्त्र कहा गया है। भगवती सावित्रीका सम्पूर्ण कामनाओंको प्रदान करनेवाला स्तोत्र माध्यन्दिनी शाखामें वर्णित है। ब्राह्मणोंके लिये। जीवनस्वरूप इस स्तोत्रको तुम्हारे सामने मैं व्यक्त करता हूँ, सुनो। पूर्वकालमें गोलोकधाममें विराजमान भगवान् श्रीकृष्णने सावित्रीको ब्रह्माके साथ जानेकी आज्ञा दी; परंतु सावित्री उनके साथ ब्रह्मलोक जानेको प्रस्तुत नहीं हुईं। तब भगवान् श्रीकृष्णके कथनानुसार ब्रह्माजी भक्तिपूर्वक वेदमाता सावित्रीकी स्तुति करने लगे। तदनन्तर सावित्रीने संतुष्ट होकर ब्रह्माको पति बनाना स्वीकार कर लिया। ब्रह्माजीने सावित्रीकी इस प्रकार स्तुति की।

ब्रह्माजीने कहा-

सुन्दरि! तुम नारायणस्वरूपा एवं नारायणी हो। सनातनी देवि! भगवान् नारायणसे ही तुम्हारा प्रादुर्भाव हुआ है। तुम मुझपर प्रसन्न होनेकी कृपा करो। देवि! तुम परम तेजः स्वरूपा हो। तुम्हारे प्रत्येक अङ्गमें परम आनन्द व्याप्त है। द्विजातियोंके लिये जातिस्वरूपा सुन्दरि ! तुम मुझपर प्रसन्न हो जाओ। सुन्दरि! तुम नित्या, नित्यप्रिया तथा नित्यानन्दस्वरूपा हो। तुम अपने सर्वमङ्गलमय रूपसे मुझपर प्रसन्न हो जाओ। शोभने! तुम ब्राह्मणोंके लिये सर्वस्व हो। तुम सर्वोत्तम एवं मन्त्रोंकी सार तत्त्व हो । तुम्हारी उपासनासे सुख और मोक्ष सुलभ हो जाते हैं। मुझपर प्रसन्न हो जाओ। सुन्दरि! तुम ब्राह्मणोंके पापरूपी ईंधनको जलानेके लिये प्रज्वलित अग्नि हो। ब्रह्मतेज प्रदान करना तुम्हारा सहज गुण है! तुम मुझपर प्रसन्न हो जाओ। मनुष्य मन, वाणी अथवा शरीरसे जो भी पाप करता है, वे सभी पाप तुम्हारे नामका स्मरण करते ही भस्म हो जायँगे।

इस प्रकार स्तुति करके जगद्धाता ब्रह्माजी वहीं गोलोककी सभामें विराजमान हो गये। तब सावित्री उनके साथ ब्रह्मलोकमें जानेके लिये प्रस्तुत हो गयीं। मुने! इसी स्तोत्रराजसे राजा अश्वपतिने भगवती सावित्रीकी स्तुति की थी,तब उन देवीने प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिये। राजाने उनसे मनोऽभिलषित वर प्राप्त किया। यह स्तवराज परम पवित्र है। पुरुष यदि संध्याके पश्चात् इस स्तवका पाठ करता है तो चारों वेदोंके पाठ करनेसे जो फल मिलता है, उसी फलका वह अधिकारी हो जाता है। (अध्याय २३)