श्री ब्रह्म वैवर्त महापुराण - प्रकृति खंड

29- नरक-कुण्डों और उनमें जानेवाले पापियों तथा पापोंका वर्णन

भगवान् नारायण कहते हैं-

नारद! रविनन्दन धर्मराजने सावित्रीको विधिपूर्वक विष्णुका महामन्त्र देकर 'अशुभकर्मका विपाक' कहना आरम्भ किया।

धर्मराजने कहा-

पतिव्रते! मानव शुभकर्मके विपाकसे नरकमें नहीं जा सकता। नरकमें जानेमें कारण है- अशुभकर्मका विपाक अतएव अब मैं अशुभकर्मका विपाक बतलाता हूँ, सुनो। नाना प्रकारके स्वर्ग हैं। प्राणी अपने-अपने कर्मोंके प्रभावसे उन स्वर्गोंमें जाते हैं। नरकोंमें जाना कोई मनुष्य नहीं चाहते, परंतु अशुभकर्मविपाक उन्हें नरकमें जानेके लिये विवश कर देते हैं। नरकोंके नाना प्रकारके कुण्ड हैं। विभिन्न पुराणोंके भेदसे इनके नामोंके भी भेद हो गये हैं। ये सभी कुण्ड बड़े ही विस्तृत हैं। पापियोंको दुःखका भोग कराना ही इन कुण्डोंका प्रयोजन है। वत्से! ये भयंकर कुण्ड अत्यन्त भयावह तथा कुत्सित हैं। इनमें छियासी कुण्ड तो प्रसिद्ध हैं, जो संयमनीपुरीमें स्थित हैं। इनके अतिरिक्त कुछ अप्रसिद्ध भी हैं। साध्वि! उन प्रसिद्ध कुण्डोंके नाम बतलाता हूँ, सुनो वह्निकुण्ड, तप्तकुण्ड, भयानक क्षारकुण्ड, विट्कुण्ड, मूत्रकुण्ड, दुःसह श्लेष्मकुण्ड, गरकुण्ड, दूषिकाकुण्ड, वसाकुण्ड, शुक्रकुण्ड, असृक्कुण्ड, कुत्सित अश्रुकुण्ड, गात्रमलकुण्ड, कर्णविट्कुण्ड, मज्जाकुण्ड, मांसकुण्ड, दुस्तर नखकुण्ड, लोमकुण्ड, केशकुण्ड, दुःखद अस्थिकुण्ड, ताम्रकुण्ड, महान् क्लेशदायक प्रतप्तलौहकुण्ड, तीक्ष्ण कण्टककुण्ड, विघ्नप्रद विषकुण्ड, घर्मकुण्ड, तप्तसुराकुण्ड, प्रतप्ततैलकुण्ड, दुर्वहदन्तकुण्ड, कृमिकुण्ड, पूयकुण्ड, दुरन्त सर्पकुण्ड, मशकुण्ड, दंशकुण्ड, भयंकर गरलकुण्ड, वज्रदंष्ट्रकुण्ड, वृश्चिककुण्ड, शरकुण्ड, शूलकुण्ड, भयंकर खड्गकुण्ड, गोलकुण्ड, नक्रकुण्ड, शोकास्पद काककुण्ड, सञ्चालकुण्ड, बाजकुण्ड, दुस्तर वन्धकुण्ड, तप्तपाषाणकुण्ड, तीक्ष्ण पाषाणकुण्ड, लालाकुण्ड, मसीकुण्ड, सुदारुण चूर्णकुण्ड, चक्रकुण्ड, वज्रकुण्ड, अत्यन्त दुःसह कूर्मकुण्ड, ज्वालाकुण्ड, भस्मकुण्ड, पूतिकुण्ड, तप्तसूर्मिकुण्ड, असिपत्रकुण्ड, क्षुरधारकुण्ड, सूचीमुखकुण्ड, गोधामुखकुण्ड, नक्रमुखकुण्ड, गजदंशकुण्ड, गोमुखकुण्ड तथा कुम्भीपाक, कालसूत्र, अवटोद, अरुन्तुद, पांशुभोज, पाशवेष्ट, शूलप्रोत, प्रकम्पन, उल्कामुख, अन्धकूप, वेधन, दण्डताडन, जालबन्ध, देहचूर्ण, दलन, शोषणकरं, सर्पमुख, ज्वालामुख, जिम्भ, धूमान्ध तथा नागवेष्टनकुण्ड हैं। सावित्री! ये सभी कुण्ड पापियोंको क्लेश देने के लिये निर्मित हैं। दस लाख किंकरगण सदा इनकी देख-रेखमें नियुक्त रहते हैं। उन किंकरों के हाथों में दण्ड, शूल और पाश रहते हैं। वे भयंकर एवं मदाभिमानी किंकर हाथोंमें भयावह गदा और शक्ति लिये रहते हैं। उनमें दयाका नामतक नहीं रहता। उन्हें कोई किसी प्रकार भी रोक नहीं सकता। उन तेजस्वी एवं निर्भीक अनुचरोंकी ताँबेके सदृश रक्तवर्णकी आँखें कुछ-कुछ पीले

रंगकी हैं। योगसिद्धिसे सम्पन्न होनेके कारण वे नाना प्रकारके रूप धारण कर लिया करते हैं। मृत्युकाल उपस्थित होनेपर समस्त पापी जीवोंको वे स्वयं दिखायी पड़ते हैं। शिव, देवी, सूर्य और गणपतिके उपासक तथा अपने कर्मोंमें निरत रहनेवाले सिद्ध एवं योगी पुरुषोंको अपने पुण्य प्रभावसे उनके सम्मुख नहीं जाना पड़ता। जो अपने धर्ममें सदा निरत रहते हैं, जिनका हृदय विशाल है तथा जो पूर्ण स्वतन्त्र हैं, जिन्हें स्वप्रमें भी कहीं भी इष्टदेवका दर्शन प्राप्त हो सका है, ऐसे वैष्णव पुरुषोंको वे बलवान् एवं निश्शङ्क यम किंकर कभी दिखायी नहीं देते।

साध्वि! इन कुण्डोंकी संख्याका निरूपण तो कर चुका, अब किन पापियोंको किन कुण्डोंमें जाना पड़ता है, उन्हें बताता हूँ, सुनो।

साध्वि! भगवान् श्रीहरिकी सेवामें संलग्न रहनेवाले पुण्यात्मा, योगी, सिद्ध, व्रती, तपस्वी और ब्रह्मचारी पुरुष नरकमें नहीं जाते, यह ध्रु सत्य है। जो शक्तिशाली मनुष्य बलके अभिमानमें आकर खलताके कारण अपने कटुवचनोंके द्वारा बान्धवोंको दग्ध करता है, वह अग्निकुण्ड नामक नरकमें जाता है। उसके शरीरमें जितने रोम होते हैं, उतने वर्षोंतक उसे उस नरकमें वास करना पड़ता है। फिर वह तीन बार पशु-योनिमें जन्म पाता है। जो मूर्ख मानव घरपर आये हुए भूखे और प्यासे दुःखी ब्राह्मणको भोजन नहीं देता, वह तप्तकुण्ड नामक नरकमें जाता है। अपने रोमके बराबर वर्षोंतक उस दुःखप्रद नरकमें वास करनेके पश्चात् सात जन्मोंतक वह पक्षी होता है। जो मनुष्य रविवार, सूर्यसंक्रान्ति, अमावास्या और श्राद्धके दिन वस्त्रोंको क्षार पदार्थसे धोता है, उसे सूतके बराबर वर्षोंतक क्षारकुण्डमें रहना पड़ता है। फिर सात जन्मोंतक वह धोबी होता है। जो अपने अथवा दूसरेके द्वारा दी हुई ब्राह्मण और देवताओंकी वृत्तिको छीन लेता है, वह साठ हजार वर्षोंके लिये विट्कुण्ड नामक नरकमें जाता है। पुनः पृथ्वीपर आकर उतने ही वर्षोंतक वह विष्ठाके कीड़ेकी योनिमें रहता है। जो दूसरोंके तड़ागमें बिना उसकी आज्ञा लिये तड़ाग निर्माण कराता है (तड़ाग बनवानेका झूठा यश लेता है) तथा भाग्यदोषसे उसका विधिवत् उत्सर्ग करता है, ऐसा व्यक्ति उस दोषके कारण मूत्रकुण्ड नामक नरकमें जाता है। उसे वहाँ वे ही मूत्रादि अपवित्र वस्तुएँ भोजनके लिये मिलती हैं। फिर सात जन्मोंतक भारतवर्षमें वह गोधा होकर रहता है। मधुर पदार्थको अकेले ही खा जानेवाला व्यक्ति श्लेष्मकुण्ड नामक नरकमें जाता है। तत्पश्चात् वह प्रेत बनता है। जो पिता-माता, गुरु, स्त्री, पुत्र पुत्री अथवा अनाथका भरण-पोषण नहीं करता, वह गरल (विष) कुण्ड नामक नरकमें जाता है और पूरे एक हजार वर्षोंतक उसे खानेके लिये विष ही मिलता है। तत्पश्चात् वह भूतयोनिमें जाता है। जो मनुष्य अतिथिको क्रोधभ नेत्रोंसे देखता है, उस पापीके दिये हुए जलको पितर और देवता ग्रहण नहीं करते। उसको यहीं । ब्रह्महत्या जैसे घोर पापोंका फल मिल जाता है। - अन्तमें इनके फलस्वरूप प्राणी दूषिकाकुण्ड नामक नरकमें जाता है। वहाँ पूरे सौ वर्षोंतक दूषित पदार्थ भोजन करके रहना पड़ता है। फिर भूतकी योनिमें रहनेके पश्चात् वह पवित्र होता है। यदि ब्राह्मणको दी हुई वस्तु फिर दूसरेको दे दी जाय तो उस दूषित कर्मके प्रभावसे दाताको सौ वर्षोंके लिये वसाकुण्ड नामक नरकमें जाना पड़ता है। तदनन्तर सात जन्मोंतक उसे भारतमें गिरगिट होना पड़ता है। जो स्त्री पर पुरुषसे अथवा पुरुष परायी स्त्रीसे अवैध सम्बन्ध करता है या उसे शुक्रपान कराता है, वह शुक्रकुण्ड नामक नरकमें जाता है और सौ वर्षोंतक वही खाता है। तत्पश्चात् सौ वर्षोतक कीटयोनिमें रहकर वह शुद्ध होता है।

जो गुरु अथवा ब्राह्मणको मारकर उनके शरीरसे रक्त बहा देता है, उसे असृक्कुण्ड नामक नरककी प्राप्ति होती है। उसमें रहकर वह रक्तपान करता है। तदनन्तर सात जन्मोंतक वह व्याघ्र होता है। फिर क्रमशः मानवयोनिमें जन्म पाता है। जो श्रीकृष्ण गुणगानके अवसरपर भक्तको आँसू बहाते तथा गद्दवाणीसे हरिगुण गाते देखकर अनुचित रूपसे उसका उपहास करता है, वह मानव सौ वर्षोतक अश्रुकुण्ड नामक नरकमें वास करता है। भोजनके लिये उसे अश्रु ही मिलते हैं। तत्पश्चात् तीन जन्मोंतक चाण्डाली योनिमें उसका जन्म होता है, तब वह शुद्ध होता है। जो मनुष्य सुहृदूके साथ निरन्तर शठताका व्यवहार करता है, वह गात्रमलकुण्ड नामक नरकमें जाता है। इसके बाद उसे तीन जन्मोंतक गदहेकी तथा तीन जन्मोंतक शृगालकी योनि प्राप्त होती है। तत्पश्चात् वह शुद्ध होता है। जो बहरेको देखकर हँसता और अभिमानवश उसकी निन्दा करता है, उसका कर्णविट् नामक नरककुण्डमें वास होता है और वहाँ उसे कानोंकी मैल भोजनके लिये मिलती है। फिर परम दरिद्र होकर जन्म लेता है और उसके कानोंमें सुननेकी शक्ति नहीं रहती। जो मनुष्य लोभवश अपने भरण-पोषणके लिये प्राणियोंकी हिंसा करता है, वह बहुत दीर्घकालतक मज्जाकुण्ड नामक नरकमें स्थान पाता है। वहाँ मज्जा ही उसे भोजनके लिये मिलती है। इसके बाद वह खरगोशकी योनिमें जन्म पाता है; फिर सात जन्मोंतक मछलीका शरीर पाता है। फिर कर्मोंके प्रभावसे उसे मृग आदि योनियाँ प्राप्त होती हैं। तदनन्तर वह शुद्ध होता है। जो अपनी कन्याको पाल पोषकर उसे बेचता है, वह अर्थलोभी महान् मूर्ख मानव मांसकुण्ड नामक नरकमें जाता है। कन्याका मांस ही उसे भोजनके लिये मिलता है। मेरे अनुचर उसे डंडोंसे पीटते हैं। मांसका भार मस्तकपर उठाकर वह ढोता है और भूख लगनेपर उससे चूते हुए रक्तकी धारा चाटता है। तदनन्तर वह पापी भारतमें जन्म पाकर कन्याकी विष्ठाका कीड़ा होता है। फिर सात जन्मोंतक वधिक होता है। उसके बाद उसे तीन जन्मतक सूअर और सात जन्मोंतक कुत्तेकी योनि मिलती है। फिर सात सात जन्मोंतक मेंढक, जोंक और कौएकी योनि प्राप्त होती है। तत्पश्चात् वह शुद्ध हो जाता है।

जो मनुष्य व्रतों, श्राद्धों और उपवासके लिये संयमके दिन क्षौरकर्म कराता है, वह सम्पूर्ण कर्मों लिये अपवित्र माना जाता है। साध्वि! ऐसा करनेवाला व्यक्ति नखकुण्डमें स्थान पाता है। जो भारतमें केशयुक्त पार्थिव लिङ्गकी पूजा करता है, वह दीर्घकालतक केशकुण्डमें वास करता है। उसके बाद महादेवजीके कोपसे वह यवन होता है। फिर सौ वर्षके बाद उसकी शुद्धि होती है। जो मानव विष्णुपद नामक तीर्थमें पितरोंको पिण्ड नहीं देता है, वह अस्थिकुण्ड नामक नरकमें वास पाता है। फिर सात जन्मोंतक मानव शरीर पाकर वह लँगड़ा और अत्यन्त दरिद्र होता है। इस तरह दण्ड भोगनेके बाद उसकी शुद्धि होती है। जो महामूर्ख मानव अपनी गर्भवती स्त्रीका सेवन (उसके साथ समागम) करता है, वह प्रतप्त ताम्रकुण्ड नामक नरकर्मे वास पाता है। अवीरा तथा सद्यः ऋतुस्नाताका अन्न खानेवाला मनुष्य सौ वर्षोंतक प्रतप्त लौहकुण्ड नामक नरकमें रहता है। इसके बाद उसे रजककी योनि और चर्मकारकी योनि प्राप्त होती है। जो चाम छूकर बिना हाथ धोये देवद्रव्यका स्पर्श करता है, वह घर्मकुण्ड नामक नरकमें वास करता है। जो बिना निमन्त्रण मिले शूद्रके घर जाकर उसका अन्न खाता है, वह ब्राह्मण तप्तसुराकुण्डमें स्थान पाता है। जो कठोर वचन कहकर सदा स्वामीको कष्ट पहुँचाता है, वह तीक्ष्णकण्टक नामक नरककुण्डमें कण्टकभोजी बनकर वा करता है। मेरे दूत उसे डंडेसे कष्ट पहुँचाते हैं। जो निर्दयी व्यक्ति प्राणीको विष देकर मार डालता है, वह हजार वर्षोंतक विषभोजी होकर विषकुण्डमें रहता है। फिर सात जन्मोंतक नरघाती अर्थात् जल्लाद होता है। सात जन्मोंतक कोढ़ी होता है। उसके प्रत्येक अङ्गमें फोड़े-फुंसियाँ कष्ट देती हैं। तत्पश्चात् उसकी शुद्धि होती है । जो पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें जन्म पाकर बैल जोतनेवाला व्यक्ति डंडेसे बैलको स्वयं मारता है अथवा भृत्यद्वारा मरवाता है, वह प्रतप्त तप्ततैल नामक नरककुण्डमें रहता है। उस बैलके जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक उसे बैल होकर कष्ट भोगना पड़ता है। साध्वि! जो निर्दयी व्यक्ति डंडेसे, लोहेसे अथवा बंसीसे प्राणीकी हिंसा करता है, वह युगोंतक दन्तकुण्ड नामक नरकमें स्थान पाता है। इसके बाद मानव-योनिमें जन्म पाकर उदररोगसे दुःखी होता है जो ब्राह्मण मांस मछली खाता तथा श्रीहरिके नैवेद्यकी वस्तु (उन्हें अर्पण किये बिना ही) चट कर जाता है, वह कृमिकुण्ड नामक नरकमें जाता है। उसे आहार रूपमें मांस उपलब्ध होता है। तत्पश्चात् तीन जन्मोंतक उसे म्लेच्छकी योनि मिलती है। जो छोटे-बड़े अथवा क्रूर सर्पको मारता है, वह मानव सर्पकुण्ड नामक नरकका अधिकारी होता है, उसे वहाँ सर्प काटते हैं। सर्पका विट् उसे खाना पड़ता है। तत्पश्चात् वह सर्पकी योनि पाता है। इसके बाद थोड़ी आयुवाला मानव होता है। उसके शरीरमें दाद आदि चर्मरोग होते हैं। फिर वह साँपके काटनेपर बड़े क्लेश मृत्युको प्राप्त होता है ।

ब्रह्माके विधानमें रक्तपान जिनकी जीविका ही निश्चित है, उन मच्छर आदि क्षुद्र जन्तुओंको जो मारते हैं, वे मृत जीवोंके मशकुण्ड और दंशकुण्ड नामक नरकों में निवास करते हैं।दिन-रात वे जन्तु उन्हें काटते रहते हैं। उन्हें खानेको कुछ मिलता नहीं तदुपरान्त उस क्षुद्र जन्तुकी योनिमें उनका जन्म होता है। फिर वे अङ्गहीन मानव होते हैं। जो दण्ड न देने योग्य व्यक्तिको अथवा ब्राह्मणको दण्ड देता है, वह वज्रदंष्ट्रकुण्ड नामक नरकमें जाता है। उसमें कीड़े-ही-कीड़े रहते हैं। उसे कीड़े खाते हैं और वह हाहाकार मचाया करता है। जो मूढ़ भूपाल धनके लोभसे प्रजाको सताता है, वह वृश्चिककुण्ड नामक नरकमें स्थान पाता है। पुनः सात जन्मोंतक बिच्छू होता है। तत्पश्चात् मनुष्यकी योनिमें उसकी उत्पत्ति होती है। वह अङ्गहीन और रोगी होकर जीवन व्यतीत करता है जो ब्राह्मण होकर जीवोंके वधके लिये हथियार उठाता है, वह दूसरोंका धावन बनकर इधर-उधर जाता है। जो कभी संध्या नहीं करता तथा भगवान् श्रीहरिकी भक्तिसे विमुख रहता है, वह शर आदिके कुण्डमें जाता है। बाण आदिसे उसके अङ्ग निरन्तर छिदते रहते हैं। मदके अभिमानमें चूर रहनेवाला जो राजा थोड़े-से अपराधके कारण अन्धकारपूर्ण कारागारमें प्रजाओंको मारता है, उसे अपने दोषके फलस्वरूप गोलकुण्ड नामक नरकमें जाना पड़ता है। वह नरक बड़ा ही भयंकर है। उसमें खौलता हुआ जल भरा रहता है। अन्धकार छाया रहता है। तीखे दाँतवाले कीड़े सर्वत्र फैले रहते हैं। ऐसे दारुण नरकमें वह पड़ा रहता है। तत्पश्चात् मनुष्य होकर उन प्रजाओंका भृत्य बनता है। सरोवरसे निकले हुए नक्र आदि जलचर जीवोंको जो मारता है, वह नक्रकुण्ड नामक नरकमें जाता है। जो मनुष्य पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें आकर कामभावसे परस्त्रीके वक्षःस्थल, श्रोणी, स्तन एवं मुख देखता है, वह काकतुण्ड नामक नरकमें वास करता है। जो मूढ मानव भारतवर्ष में जन्म पाकर ताँबा और लोहा चुराता है, वह बाजकुण्ड नामक नरकमें स्थान पाता है। मेरे दूत बाणोंसे उसकी आँख फोड़ देते और उसे डंडोंसे पीटते हैं। इसके बाद वह तीन जन्मोंमें नेत्रहीन तथा सात जन्मोंमें दरिद्री होता है।

भारतवर्षमें जन्म पाकर देवताओंकी प्रतिमा तथा देवसम्बन्धी द्रव्यकी चोरी करनेवाला मानव दुस्तर वन्धकुण्ड नामक नरकमें निश्चितरूपसे वास करता है। तीखे वज्रोंसे उसका शरीर दग्ध सा होता रहता है। देवता और ब्राह्मणके रजत, गव्य (दूध-दही आदि) पदार्थ तथा वस्त्रकी चोरी करनेवाला व्यक्ति तप्तपाषाणकुण्डनामक नरकमें स्थान पाता है - यह निश्चित है। फिर तीन जन्मोंतक बगुला, तीन जन्मोंतक श्वेत हंस, एक जन्ममें सफेद चील, फिर अन्यान्य श्वेत पक्षी, इसके बाद अल्पायु मानव होता है। रक्त विकार और शूलरोगसे उसे असह्य पीड़ा सहनी पड़ती है। जो ब्राह्मण और देवताके पीतल तथा काँसेके पात्रका अपहरण करता है, वह तीक्ष्ण पाषाणकुण्डमें अपनी रोमकी संख्या के बराबर वर्षोंतक निश्चय ही निवास करता है। जो पुंश्चलीका अन्न खाता तथा उसकी कमाईसे जीविका चलाता है, वह लालाकुण्ड नामक नरकमें वास करता है। जिसमें लार-ही लार भरी रहती है, वहाँका दुःख भोगनेके पश्चात् मानव बनकर नेत्ररोग और शूलरोगसे कष्ट पाता है।

साध्वि! जो ब्राह्मण तथा देवताओंके धान्य आदिसे सम्पन्न खेती, ताम्बूल, आसन एवं शय्याका अपहरण करता है, वह पापी मानव चूर्णकुण्ड नामक नरकमें जाता है। जो मनुष्य ब्राह्मणका धन चुराकर उससे चक्र (पहिया अथवा तेल पेरनेका कोल्हू) बनवाता है, वह चक्रकुण्ड नामक नरकमें वास करता है। उसे वहाँ सैकड़ों वर्षोंत डंडोंकी मार सहनी पड़ती है। फिर तीन जन्मोंतक वह तेली, रोगी और निःसंतान होता है। भाई-बन्धुओं और ब्राह्मणोंके प्रति क्रूर दृष्टि रखनेवाला मानव दीर्घकालतक वत्रकुण्ड नामक नरकमें रहता है। तत्पश्चात् सात जन्मोंतक टेढ़े शरीरवाला तथा अङ्गहीन बनता है। दरिद्रता उसे घेरे रहती है। देवता और ब्राह्मणोंके घृत तथा तेलका अपहरण करनेवाला पातकी ज्वालाकुण्ड तथा भस्मकुण्ड नामक नरकका अधिकारी होता है। जो मानव देवता ब्राह्मणके सुगन्धित तैल, आँवला तथा अन्य भी किसी उत्तम गन्धवाले द्रव्यका अपहरण करता है, वह पूतिकुण्डसंज्ञक नरकमें रहकर रात-दिन दुर्गन्धका अनुभव करता है। साध्वि! जो बलवान् व्यक्ति किसी दूसरेकी पैतृक भूमिको छल-बलसे अथवा उसे मारकर छीन लेता है, उसे तप्तसूर्मि नामक नरकमें स्थान मिलता है। जैसे खौलते हुए तेलमें कोई जीव जलता है, उसी तरह वह दग्ध होता हुआ निरन्तर उसके भीतर चक्कर लगाता रहता है, तथापि जलकर भस्म नहीं हो जाता; क्योंकि प्राणीका भोगदेह (यातना शरीर) नष्ट नहीं होता। इसके बाद वह विष्ठाका कीड़ा होता है। फिर भूमिहीन एवं दरिद्र मानव होता है ।

साध्वि! जो अत्यन्त दारुण एवं निर्दयी व्यक्ति तलवारसे जीवोंको काटता तथा धनके लोभसे नरघाती बनकर मानवकी हत्या करता है, वह असिपत्र नामक नरकमें स्थान पाता है। मेरे दूत तलवारसे निरन्तर उसके अङ्ग काटते हैं। जब वह भोजनके अभावमें चिल्लाता है, तब दूत उसे मारते हैं। फिर सौ-सौ जन्मोंतक भारतमें चाण्डाल, शूकर और कूकर होता है। इसके बाद सात-सात जन्मोंतक शृगाल और व्याघ्र होता है, तीन जन्मोंतक भेड़िया, सात जन्मोंतक गेंडा और तीन जन्मोंतक भैंसा होता है। पतिव्रते! ग्रामों और नगरों में आग लगानेवाला पापी मानव क्षुरधारकुण्ड नामक नरकमें निवास करता है। तीन युगोंतक उसमें रहता है और यमदूत उसके अङ्गको काटते रहते हैं। फिर उसे प्रेतकी योनि मिल जाती है और मुँहसे आग उगलता हुआ वह जगत्‌में भ्रमण करता है। फिर सात-सात जन्मोंतक अमेध्य भोजी, खद्योत, महान् शूलरोगी एवं गलितकुष्ठी मानव होता है। जो दूसरेके कानमें मुँह लगाकर परायी निन्दा करता है, दूसरेके दोष जानने जिसकी विशेष स्पृहा रहती है तथा जो देवता एवं ब्राह्मणकी निन्दा किया करता है, वह तीन युगोंतक शूचीमुख नामक नरकमें स्थान पाता है। शूचीमें उसके सभी अङ्ग छिद जाते हैं। फिर बिच्छू, सर्प, वज्रकीट तथा आग फैलानेवाले कीड़ोंकी योनियों में सात-सात जन्मोंतक भटकता है। जो गृहस्थोंके घरमें सेंध लगाकर घुस जाता और भीतर पड़ी हुई वस्तुएँ चुरा लेता है तथा गाय, बकरे और भेड़ोंकी भी चोरी करता है, वह गोधामुख नामक नरकमें जाता है। मेरे दूतोंकी मार खाते हुए तीन युगोंतक उसे वहाँ रहना पड़ता है। साधारण वस्तु चुरानेवाला व्यक्ति नक्रमुख संज्ञक नरकमें जाता है। मेरे दूतोंकी मार सहते हुए वह वहाँ रहता है। फिर उसकी शुद्धि हो जाती है। जो हाथियों, घोड़ों एवं गौओंको मारता है तथा वृक्षोंको काटता है, वह महान् पातकी व्यक्ति गजदंश नामक नरकमें दीर्घकालतक रहता है। मेरे दूत हाथीके दाँत लेकर उन्हींसे उसको निरन्तर पीटते हैं। फिर तीन-तीन जन्मोंतक वह हाथी, घोड़े, गौ एवं म्लेच्छ जातिकी योनिमें उत्पन्न होता है। प्यासी गौके जल पीते समय जो उसे दूर हटा देता है, वह पुरुष गोमुखकुण्ड नामक नरकमें पड़ता है। वहाँ सब ओर कीड़े और खौलता हुआ जल भरा रहता है। वह उसीमें जलता हुआ वास करता है। इसके बाद दीर्घरोगी एवं दरिद्र मानव होता है।

जो गौ, ब्राह्मण, स्त्री, भिक्षुक तथा गर्भकी प्रत्यक्ष अथवा आतिदेशिकी हत्या करता है एवं अगम्या स्त्रीके साथ गमन करता है, वह महान् नीच व्यक्ति कुम्भीपाककुण्ड नरकमें निवास करता है। मेरे दूत निरन्तर मारते हुए उसे चूर्ण चूर्ण कर देते हैं। प्रज्वलित अग्रि, कण्टक और खौलते हुए तेलमें एवं गरम लोहे तथा आगसे संतप्त ताँबेपर वह क्षण-क्षणमें गिरता रहता है। फिर गीध, सूअर तथा कौवा और सर्प होता है। तदनन्तर वह विष्ठाका कीड़ा होता है। फिर बैल होनेके पश्चात् कोढ़ी मनुष्य होता है। दरिद्रता उसका साथ कभी नहीं छोड़ती।

साध्वि! जो भगवान् श्रीकृष्ण और उनकी प्रतिमामें, अन्य देवताओं तथा उनके विग्रहों में, शिव तथा शिवलिङ्गमें, सूर्य तथा सूर्यकान्तमणिमें, गणेश और उनकी प्रतिमामें- सर्वत्र भेदबुद्धि करता है, उसे आतिदेशिकी ब्रह्महत्या लगती है। अर्थात् शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार उसे ब्रह्महत्या लगती है। जो अपने गुरु, इष्टदेव और जन्मदात्री मातामें भेदबुद्धि करता है, उसे ब्रह्महत्या लगती है। जो विष्णुभक्तों तथा अन्य देवभक्तोंमें, ब्राह्मणों एवं ब्राह्मणेतरों में तुलना करता है, उसे ब्रह्महत्या लगती है। परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्ण सर्वेश्वरेश्वर हैं। ये सम्पूर्ण कारणोंके कारण हैं। इन सर्वान्तर्यामी आदिपुरुषकी सभी देवता उपासना करते हैं। ये मायासे अनेक रूप धारण करते हैं। वस्तुतः ये एक निर्गुण ब्रह्म हैं। जो इनकी दूसरे किसीसे समता करता है, वह आतिदेशिकी ब्रह्महत्याका अधिकारी माना जाता है। वेदमें कहे हुए देवताओं और पितरोंके परम्परागत पूजनका जो निषेध करता है, वह ब्रह्महत्याको प्राप्त करता है। जो भगवान् हृषीकेश तथा उनके मन्त्रोपासकोंकी निन्दा करता है; जो पवित्रों में भी परम पवित्र हैं, जिनका विग्रह आनन्दमय ज्ञानस्वरूप है तथा जो वैष्णवजनोंके परम आराध्य एवं देवताओंके सेव्य हैं, उन सनातन भगवान् श्रीहरिकी जो पूजा नहीं करते, बल्कि उलटे निन्दा करते हैं, उनको ब्रह्महत्या लगती है। जो सर्वदेवीस्वरूपा, सर्वाद्या, सर्ववन्दिता, सर्वकारणरूपा, विष्णुभक्तिप्रदायिनी, सती, विष्णुमाया, सर्वशक्तिस्वरूपा तथा सर्वमाता प्रकृति (दुर्गा) हैं, उनकी जो निन्दा करते हैं, उन्हें ब्रह्महत्या प्राप्त होती है। श्रीकृष्णजन्माष्टमी, रामनवमी, एकादशी, शिवरात्रि और रविवारव्रत- ये अत्यन्त पुण्य प्रदान करनेवाले हैं। जो ये परम पवित्र पाँच व्रत नहीं करते, वे चाण्डालसे भी अधिक नीच मानव ब्रह्महत्याके भागी होते हैं। जो भारतवासी | मानव अम्बुवाची योगमें अर्थात् आर्द्रा नक्षत्र के प्रथम चरणमें पृथ्वी खोदते तथा जलमें मल मूत्रादि करते हैं, उन्हें ब्रह्महत्या लगती है। जो समर्थ होकर भी गुरु माता, भाई, साध्वी स्त्री, पुत्र-पुत्री तथा अनाथोंका भरण-पोषण नहीं करता है, वह ब्रह्महत्याका अधिकारी होता है। जो भगवान् श्रीहरिकी भक्तिसे वञ्चित है, उसे ब्रह्महत्या लगती है। निरन्तर भगवान् श्रीहरिको भोग लगाकर भोजन नहीं करनेवाला और भगवान् विष्णु तथा पुण्यमय पार्थिवेश्वरकी उपासनासे विमुख रहनेवाला ब्रह्महत्यारा कहा जाता है।

(अब आतिदेशिकी गोहत्या बतलाते हैं-) कोई व्यक्ति गौको मार रहा हो, उसे देखकर जो निवारण नहीं करता तथा जो गौ और ब्राह्मणके बीचसे होकर निकलता है, वह गोहत्याका अधिकारी होता है। जो मूर्ख डंडोंसे गौको पीटता है, बैलपर आरूढ़ होता है, उसे प्रतिदिन गोवधका पाप लगता है। जो पैरसे अग्निका स्पर्श और गौपर चरण प्रहार करता है तथा स्नान करके बिना पैर धोये घरके भीतर प्रवेश करता है, उसे गोवधका पाप लगता है। जो पति अपनी स्त्रीका सतीत्व बेचकर जीविका चलाता है और संध्या नहीं करता, उसे गोहत्या लगती है। जो स्त्री अपने स्वामी तथा श्रीकृष्णमें भेदबुद्धि करती त कठोर वचनोंसे पतिके हृदयपर आघात पहुँचाती है, उसे निश्चय ही गोहत्या लगती है। जो गौओंके जानेके मार्गको खोदकर तथा तड़ाग एवं उसके ऊपरकी भूमिको जोतकर उसमें अनाज बोता है, वह गोहत्याके पापका भागी होता है। राजकीय उपद्रव और दैवी प्रकोपके अवसरपर जो स्वामी यत्नपूर्वक गौकी रक्षा नहीं करता, बल्कि उसे उलटे दुःख देता है, उस मूढ़ मानवको गोहत्या अवश्य लगती है। जो किसी प्राणीको, देवप्रतिमाके स्नान करानेके बाद वहाँसे बहते हुए जलको, देवताके नैवेद्यको तथा निर्माल्य पुष्पको लाँघता है, वह गोहत्याका भागी होता है। जो अतिथियोंके लिये सदा 'नहीं' ही किया करता, झूठ बोलता और दूसरोंको ठगता तथा देवता और गुरुसे द्वेष करता है, उसे गोहत्याका पाप लगता है। जो देवप्रतिमा, गुरु और ब्राह्मणको देखकर वेगपूर्वक उन्हें प्रणाम नहीं करता, उसे गोहत्या अवश्य लगती है। जो ब्राह्मण प्रणाम करनेवाले व्यक्तिको क्रोधमें आकर आशीर्वाद नहीं देता तथा विद्यार्थीको विद्या नहीं पढ़ाता, उसे गोहत्या लगती है।

गुरुपत्नी, राजपत्नी, सौतेली माँ, सगी माँ, पुत्री, पुत्र-वधू, सास, गर्भवती स्त्री, बहिन, सहोदर भाईकी पत्नी, मामी, दादी, नानी, बूआ, मौसी, भतीजी, शिष्या, शिष्य-पत्नी, भानजेकी स्त्री, भाईके पुत्रकी पत्नी - इन सबको ब्रह्माजीने अत्यन्त अगम्या बतलाया है। जो पुरुष कामभावसे इनपर दृष्टिपात करता है, उसे अधम मानव कहा गया है। वेदोंमें उसे मातृगामी कहा गया है। उसे ब्रह्महत्याका पाप - फल प्राप्त होता है। किसी भी सत्कर्ममें उसे नहीं लिया जा सकता। वह महापापी अत्यन्त दुष्कर कुम्भीपाक नामक नरकमें जाता है। भद्रे ! मैंने नरकोंमें जानेवाले लोगोंके कुछ लक्षण बतला दिये। इन नरककुण्डों से अतिरिक्त नरकोंमें जो जाते हैं, उनका प्रसङ्ग कहता हूँ, सुनो! साध्वि! जो द्विज पुंश्चली और वेश्याका अन्न खाता तथा उसके साथ गमन करता है, वह मरनेके पश्चात् कालसूत्र नामक नरकमें जाता है। इसके बाद रोगी होता है। एक पतिकी सेवा करनेवाली स्त्री 'पतिव्रता' कहलाती है। दूसरेसे सम्बन्ध स्थापित करनेपर उसे 'कुलटा' कहते हैं। तीसरेके सम्पर्कमें आनेपर उसे 'धर्षिणी' जानना चाहिये। चौथेके पास जानेवाली 'पुंश्चली' मानी जाती है। पाँचवें छठेंके साथ गमन करनेवाली स्त्रीकी 'वेश्या' संज्ञा होती है । सातवें आठवेंके सम्पर्कमें आनेवाली 'युग्मी' कहलाती है। इससे अधिक पुरुषोंके पास जानेवाली स्त्रीको 'महावेश्या' कहते हैं। वह सबके लिये अस्पृश्य है। जो द्विज कुलटा, धर्षिणी, पुंश्चली, वेश्या, युग्मी तथा महावेश्याके साथ गमन करता है, वह अवटोद नामक नरकमें जाता है - यह निश्चित है। कुलटागामी सौ वर्षोंतक, धर्षिणीगामी चार सौ वर्षोंतक, पुंश्चलीगामी छ: सौ वर्षोंतक, वेश्यागामी आठ सौ वर्षोंतक, युग्मीगामी एक हजार वर्षोंतक तथा महावेश्यागामी कामुक मानव इससे सौ गुने वर्षोंतक इस अवटोद नरकमें वास करता है। यमदूत उसपर प्रहार करते हैं। फिर कुलटागामी तित्तिर, धर्षिणीगामी कौआ, पुंश्चलीगामी कोयल, वेश्यागामी शृगाल, युग्मीगामी सूअर तथा महावेश्यागामी मरघटमें सेमलका वृक्ष होकर सात जन्मोंतक पापका फल भोगते हैं।

जो ज्ञानहीन मानव सूर्यग्रहण अथवा चन्द्रग्रहणके समय भोजन करता है, वह अरुन्तुद नामक नरकमें जाता है। वह जितने अन्नके दाने खाता है, उतने वर्षोंतक उसे उस नरकमें वास करना पड़ता है। इसके बाद वह उदररोगसे पीड़ित मानव होता है। फिर गुल्म-रोगी, काना और दन्तहीन होता है। जो अपनी कन्याका वाग्दान करके किसी दूसरे वरके साथ उसका विवाह करता है, वह पांशुभोज नामक नरकमें स्थान पाता है। पांशु ही उसे भोजनके लिये मिलता है। साध्वि! जो दानमें दी हुई वस्तुको फिर ले लेता है, वह पाशवेष्ट नामक नरकमें निवास करता है। वहाँ शयन करनेके लिये उसे बाणोंकी शय्या मिलती है। मेरे दूतोंकी मार भी खानी पड़ती है। जो ब्राह्मणको दण्ड देता है तथा जिसके भयसे ब्राह्मण काँपता है, वह व्यक्ति प्रकम्पन नामक नरकमें वास करता है। जो स्त्री क्रोधभरे मुखसे रोषपूर्वक अपने पतिको देखती तथा कटुवचन कहती है, वह उल्कामुख नामक नरकमें जाती है। मेरे दूत उसके मुखमें उल्का (लूक) देते हैं और डंडोंसे उसके मस्तकपर प्रहार करते हैं। इसके बाद मनुष्ययोनिमें आकर वह विधवा तथा रोगिणी होती है। वेश्याको वेधन कुण्डमें, युग्मीको दण्डताडनकुण्डमें, महावेश्याको जालबन्धकुण्डमें, कुलटाको देहचूर्णकुण्डमें, स्वैरिणीको दलनकुण्डमें तथा धृष्टाको शोषणकुण्डमें यातना भोगनेके लिये निवास करना पड़ता है। मेरे दूत उनपर प्रहार करते हैं। साध्वि! ये पापिनी स्त्रियाँ विष्ठा मूत्र आदि - अपवित्र वस्तुएँ खाकर निरन्तर कष्ट भोगती हैं।

जो पुरुष हाथमें तुलसी लेकर की हुई प्रतिज्ञाका पालन नहीं करता अथवा झूठी शपथ खाता है, वह ज्वालामुख नामक नरकमें जाता है। हाथमें गङ्गाजल तथा शालग्रामकी प्रतिमा ले प्रतिज्ञा करके उसका पालन नहीं करनेवाला भी ज्वालामुख नरकका ही भागी होता है। जो दाहिना हाथ उठाकर प्रतिज्ञा करता, देवमन्दिर में जाकर या गौ और ब्राह्मणको छूकर वचनबद्ध होता और फिर उसका पालन नहीं करता है, उसे भी ज्वालामुख नामक नरककी प्राप्ति होती है। मित्रद्रोही, कृतघ्न, विश्वासघाती तथा झूठी गवाही देनेवाला— ये सभी ज्वालामुख नरकमें स्थान पा हैं। वहाँ उन्हें प्रतप्त अङ्गार खानेके लिये मिलते हैं और मेरे दूत उन्हें पीड़ा पहुँचाते रहते हैं। तुलसी छूकर झूठी शपथ खानेवाला सात जन्मोंतक चाण्डाल होता है। गङ्गाजल लेकर प्रतिज्ञा करके उसे न पालनेवाला पाँच जन्मोंतक म्लेच्छ होता है। देवि! शालग्रामका स्पर्श करके की हुई प्रतिज्ञाका पालन न करनेवाला सात जन्मोंतक विष्ठाका कीड़ा होता है। देवप्रतिमाको छूकर झूठी शपथ खानेवाला फोड़ेका कीड़ा होता है। खुले हाथों देनेकी झूठी प्रतिज्ञा करनेवाला सात जन्मोंतक सर्प होता है। इसके बाद बिना हाथका मानव होकर फिर शुद्ध होता है। देवमन्दिरमें असत्य बोलनेवाला सात जन्मोंतक देवल होता है। ब्राह्मण आदिके सम्मुख प्रतिज्ञा करके उसका पालन न करनेवाला अग्रदानी होता है। तदनन्तर तीन जन्मोंतक वह गूँगा और बहरा मानव होता है। मित्रसे द्रोह करनेवाला नेवला होता है। कृतघ्न गैंडा और विश्वासघाती व्याघ्र होता है। वक्तव्यमें जो झूठी गवाही देता है, वह भालू होता है। ये उपर्युक्त पापी मानव अपने आगे और पीछेकी सात-सात पीढ़ियोंको नरकमें गिराते हैं। मूर्खताके कारण अपनी नित्यक्रियासे विहीन, वेदके वचनोंमें अनास्था रखकर निरन्तर कपटपूर्वक उनका उपहास करनेवाला तथा व्रत और उपवाससे रहित एवं उत्तम सद्वाक्यका निन्दक कुटिल ब्राह्मण जिम्भ एवं हिमोदक नरकमें वास करता है। जो देवता और ब्राह्मणके धनका अपहरण करता है, उसे आगे-पीछेकी दस-दस पीढ़ियोंको नरकमें गिराकर स्वयं भी वहाँ रहना पड़ता है। धूमके अन्धकारसे पूर्ण धूमान्ध नामक नरकमें जाता है। उसे धुएँके कारण कष्ट भोगना पड़ता है। भोजनके लिये उसे धूम्र ही मिलता है। इस प्रकारकी यातना भोगते हुए वह वहाँ रहता है। तत्पश्चात् स जन्मोंतक वह चूहेकी योनिमें जन्म पाता है। तदनन्तर नाना प्रकारके पक्षियों, कीड़ों, वृक्षों और पशुओंकी योनिमें जन्म पानेके पश्चात् शुद्ध होता है।

पतिव्रते! ये सुविख्यात नरककुण्ड बताये गये हैं। इनके अतिरिक्त अन्य छोटे-छोटे अप्रसिद्ध नरक भी गिनाये गये हैं। अपने दुष्कर्मोंके फल भोगनेवाले पापियोंसे उन नरकोंका कोना-कोना भरा रहता है। कर्म-फल भोगनेके लिये प्राणी नाना प्रकारकी योनियोंमें भटकते हैं। कहाँतक बताया जाय ? (अध्याय २९-३१)